सत्‍येंद्र दुबे का भांजा होने का भार और 27 नवंबर

♦ चंदन पांडेय

यह एक बड़ी चूक है, जो हम सबसे हो जाती है। हम सब, जो वक्‍त के साथ इंसाफ़ का तक़ाज़ा तक भूल जाते हैं। कितनी आसानी से हम सब सत्‍येंद्र दुबे को भूल गये। अब 27 नवंबर बीत चुका है, जिस तारीख को आज से छह साल पहले बिहार के गया ज़‍िले में उनकी हत्‍या कर दी गयी थी। वे ईमानदार थे, जिसकी क़ीमत उन्‍होंने चुकायी थी। सब भूल गये, मीडिया भी भूल गया और हत्‍यारे खुलेआम कहीं घूम रहे होंगे। हम सब बीते हुए पलों के गुनहगार हैं, क्‍योंकि घुट्टी में पिलाया गया यह वाक्‍य हमारी गर्दन में ताबीज़ की तरह लटका रहता है कि आगे देखो। चंदन का शुक्रिया कि उन्‍होंने वक्‍त रहते सत्‍येंद्र दुबे की याद दिलायी : मॉडरेटर

A sketch of Satyendra Dubey during a march organised in his memory in New Delhi.

सत्‍येंद्र दुबे। मसखरी राजनीति ने शहीद और इंकलाब जैसे मूल्यवान शब्दों को मजाक बना कर रख दिया है वरना आज मैं सत्‍येंद्र के लिए इस शब्द का प्रयोग ज़रूर करता। जानने वाले जानते हैं कि एक बेहद बूढ़े प्रधानमंत्री की स्वप्निल सड़क परियोजना से अगर किसी को सर्वाधिक नुकसान हुआ तो वे सत्‍येंद्र दुबे जी थे। इकत्तीस साल की कुल उम्र उन्‍हें मिली, जिसमें उन्‍होंने आदर्श जीवन जिया। परिवहन मंत्रालय की जिस परियोजना मे सत्‍येंद्र दुबे ‘प्रोजेक्ट डाईरेक्टर’ थे और जिस धोखाधड़ी के खुलासे करने के कारण उनकी गया (बिहार) में 27 नवंबर 2003 को सरेराह हत्या हुई, उन दिनों कहने भर का एक फौजी, परिवहन मंत्री था जो बाद मे मुख्यमंत्री भी बना। मेरे पिता को उनकी हत्या के बाद भी लगता रहा कि वो हत्यारों को सज़ा दिलवा देंगे। मुझे उनकी मासूमियत के लिए घोर अफ़सोस है।

सत्‍येंद्र दुबे मेरे मामा लगते थे। चाची के भाई। ऐसे मे मेरा बचपन अजीब सी तुलनाओं मे बीता। मामा के बारे मे किस्से थे, जो खूब मशहूर थे – सत्‍येंद्र 20 से 22 घंटे पढ़ता है (ऐसा अक्सर मुझे सुना कर कहा जाता था)। मुझे गिल्ली-डंडा खेलते देख गांव का कोई भी शुभचिंतक मुझे सुना देता था – इस उम्र मे सत्‍येंद्र को पढ़ते रहने से चश्मा लग गया था। यह सुन कर मैं खेलना छोड़ देता था। मुझे रजाई मे देख चाचा कहते थे – सत्‍येंद्र तो तकिया भी नहीं लगाता है। यह तब की बात है जब मामा ने आईआईटी की परीक्षा पास कर ली थी। बाद उम्र में आईईएस हुए। आईएएस भी क्वालिफाई किया और यह आज भी रहस्य है कि फिर भी उन्होने आईईएस ही क्यों चुना?

उनकी लगन इतनी मशहूर थी कि हम कभी यह अपेक्षा भी नहीं करते थे – वो हमारे घर आएंगे। उनके तो उनके, हमारे गांव के कितने ही भोले लोग इस इंतज़ार मे थे कि जब सत्‍येंद्र की नौकरी लगेगी तो वो उन सबका भी उद्धार करेंगे। इस बीच जब भी कभी वो हमारे गांव आये मैं उन्‍हें छुप के देखता था – ऐसा क्या है इनमें जो लोग इनसे मेरी तुलना करते हैं।

बात तब की है, जब मैं साहित्य से जुड़ चुका था। जानता तो किसी को नहीं था पर पढ़ता खूब था। साहित्य से पहला परिचय ही यह बता गया कि यही मेरा उद्देश्य होने वाला है। साहित्य तथा दोस्‍तों का प्यार मुझे इस बात का दिलासा देता रहा कि मैं भी जीवन में कुछ कर सकता हूं। मैं अपनी पहली कहानी लिख रहा था और कहीं न कहीं मेरी निगाह सत्‍येंद्र मामा पर भी थी। मुझे लगता था कि किस्से-कहानी मुझे इतना बड़ा क़द देंगे जितना कि खुद मामा का सामाजिक क़द।

तभी वो हादसा हुआ।

मैं अपनी पहली कहानी पूरी करने वाला था कि एक सुबह तड़के पापा आये। उनकी आवाज़ में डरावनी उदासी थी। इससे पहले पापा को मैंने आज तक उदास नहीं देखा था। उन्‍होंने कहा तो कुछ भी नहीं, हिंदुस्तान अखबार का पटना संस्‍करण और इंडियन एक्सप्रेस का अख़बार मेरी ओर बढ़ा दिया। मामा की हत्या की दुखद ख़बर छपी थी। अम्मा बहुत रोयी थी। बहुत। कुछ मामा के लिए, कुछ बूढ़े नाना-नानी के लिए और दूसरे आश्रितों के लिए। नाना ने उनकी पढ़ाई के लिए अपनी दुकान तक बेच दी थी।

मैने अपनी कहानी स्थगित कर दी थी। साल भर बाद मेरी नितांत पहली कहानी लिखी गयी।

अगर प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश से कुछ उधार लूं तो बड़ी उम्मीद से कहना चाहूंगा कि मामा आप अभी हैं। हमारे आस-पास। बस घर के किसी कोने मे आप, नेल कटर की तरह, खो गये हैं जो ढूढ़ने से भी नहीं मिल रहा।

chandan pandey(चंदन पांडेय। युवा कथाकर। बनारस से पढ़ाई-लिखाई। सुनो नाम की कहानी से मशहूरियत मिली। इन दिनों करनाल में रहते हैं और सामाजिक मुद्दों पर विभिन्‍न माध्‍यमों में लगातार लिख रहे हैं। उनके ब्‍लॉग का नाम है नयी बात। उनसे chandanpandey1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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