फ़ैसला आ गया है… न्‍यूडिटी चलती रहेगी…

समाचार : न्‍यूडिटी अब कोई मसला नहीं है और सार्वजनिक तौर पर इसके प्रदर्शन को ग़ैरक़ानूनी नहीं माना जा सकता। मुंबई पुलिस की सामाजिक सेवा शाखा को न्‍यूडिटी के मामले में अदालत की ओर से पलट कर जवाब मिला है। मॉडल मिलिंद सोमण और मधु सप्रे को एक स्थानीय अदालत ने 14 साल पुराने अश्लीलता के एक मामले में बरी कर दिया है। शाखा ने दोनों मॉडलों के खिलाफ 1995 में अश्‍लीलता का मामला दर्ज किया था। इन दोनों के ख़‍िलाफ़ एक प्रचार अभियान के लिए निर्वस्त्र अवस्था में केवल जूते पहन कर और शरीर पर अजगर को लिपटा कर फोटो खिंचवाने का आरोप था। गवाहों के बयान बदल लेने के बाद विज्ञापन छापने वाली दोनों पत्रिकाओं के प्रकाशक और वितरक, विज्ञापन एजेंसी और छायाकार सहित सभी आठ आरोपियों को क्लीन चिट मिल गयी है। पत्रिका की ज़ब्त की गयी प्रतियों को भी अदालत में सबूत की तरह कभी पेश नहीं किया गया।

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किसे ज़रूरत है न्‍यूडिटी की?

♦ उमेश चतुर्वेदी

साल 1995 : मिलिंद सोमण और मधु सप्रे की न्यूड जोड़ी की एक तस्‍वीर एक पत्रिका के कवर पेज पर छपी है। टफ शूज के विज्ञापन में ये जोड़ी बिल्कुल नंगी नजर आ रही है। उनके शरीर के गोपन अंगों को अजगर के जरिये ढांप रखा गया है।

साल 2009 : मॉडलिंग बिल्कुल वैसी ही है। इस बार भी जूते ही हैं। बस किरदार बदल गये हैं। इस बार मधु की जगह पर हैं बॉलीवुड की अभिनेत्री शौर्या चौहान और उनका साथ दे रहे हैं बन्नी आनंद। इस बार शरीर के गोपन अंगों को एक ही कपड़े के जरिये ढंका गया है।

1995 और 2009 के बीच महज चौदह साल का फासला है, लेकिन सोच के धरातल पर हमारी दुनिया कितनी बदल गयी है, इसका जीवंत उदाहरण है शौर्या और बन्नी के विज्ञापन का नोटिस भी नहीं लिया जाना। 1995 में जब ये विज्ञापन पहली बार एक फिल्मी पत्रिका के कवर पृष्ठ पर छपा था, तो जैसे हंगामा बरप गया था। शिवसेना ने इसका न सिर्फ ज़ोरदार विरोध किया था, बल्कि इसके खिलाफ कोर्ट भी गयी थी। लेकिन आज न तो शौर्या पर कोई सवाल उठ रहा है और न ही उसका साथ दे रहे बन्नी आनंद पर।

1991 में मनमोहनी मुस्कान के सहारे जब अपनी अर्थव्यवस्था उदार हो रही थी, तब वामपंथी और दक्षिणपंथी – दोनों तरह की विचारधारा के लोग कम से कम एक मसले पर एक विचार रखते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को समर्थन देने के अलावा कम ही मौके ऐसे रहे हैं – जब वैचारिकता के दो विपरीत ध्रुव एक राय रखते हों। दोनों का मानना था कि उदारीकरण हमारी अर्थव्यवस्था को ही नहीं, संस्कृति को भी बदलेगी। उदारीकरण की करीब डेढ़ दशक की यात्रा के बाद ये अंदेशा बिल्कुल सच साबित होता दिख रहा है। दिलचस्प बात ये है कि इसके समर्थकों की भी संख्या बढ़ती जा रही है। इसी साल की शुरुआत में जब फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पत्नी कार्ला ब्रूनी की न्यूड तस्‍वीर के करीब नौ लाख रुपये में बिकने की खबर आयी तो इस पर सवाल उठाने वालों की लानत-मलामत करने वालों की फौज जुट आयी थी। बदलाव की बयार का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा!

1996 में दिल्ली की एक वकील अंजलि ने एक सेमी पोर्न पत्रिका के कवर पृष्ठ के लिए सेमी न्यूड मॉडलिंग की थी। तब दिल्ली समेत देश के तमाम बार एसोसिएशनों ने उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग रखी थी। बार एसोसिएशन का मानना था कि न्यूडिटी का प्रचार करने वाली वकील की साख कैसे बन सकती है। उसके प्रति लोग आदर का भाव कैसे रख सकते हैं। पता नहीं उसके बाद कोई महिला वकील न्यूडिटी के ऐसे प्रचार के साथ बाज़ार में उतरी कि नहीं… लेकिन ये साफ है कि इस कृत्य के जरिये वकील बिरादरी ने अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर खींच दी, जिससे लांघना आसान नहीं होगा।

हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले बॉलीवुड ने न्यूडिटी के प्रसार में भी कम भूमिकाएं नहीं निभाई हैं। राजकपूर के जमाने में बैजयंती माला सेमी न्यूड यानी बिकनी में बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं वाले गाने में नज़र आयी थीं। हिंदी सिनेमा के ग्रेट शो मैन राजकपूर ने बाद की फिल्मों में कला और कहानी के नाम पर सेमी न्यूडिटी का जमकर इस्तेमाल किया। सत्यम शिवम सुंदरम की जीनत अमान हों या फिर राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी… कहानी की जरूरत और कला के नाम पर आपको सेमी न्यूडिटी दिख ही जाती है। सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्मी अर्थशास्त्र को सफल बनाने में महिला न्यूडिटी का ही ज़्यादा इस्तेमाल होता रहा है।

बॉलीवुड में कदम रखने वाली हर अदाकारा पहले न्यूडिटी से इनकार करती रही है, फिर कहानी की ज़रूरत और मांग के मुताबिक सेमी न्यूडिटी की नुमाइश करने से पीछे नहीं रही है। लेकिन माया मेम साहब के जरिये केतन मेहता ने पुरुष न्यूडिटी को भी नया आयाम दे दिया। माया मेम साहब फिल्म की नायिका केतन की पत्नी दीपा मेहता थीं। इस फिल्म के एक अंतरंग दृश्य में शाहरुख खान और दीपा दोनों नंगे नज़र आये थे। यह न्यूडिटी भी कला और कहानी की ज़रूरत के नाम पर फिल्मी दर्शकों को पेश की गयी थी। शेखर कपूर ने दस्यु सुंदरी फूलन देवी की ज़‍िंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्वीन बनायी, तो उसमें बलात्कार का खुलेआम सीन भी कहानी और ज़रूरत के तर्क के आधार पर ही पेश किया था। मीरा नायर की फिल्म कामसूत्र हो या फिर सलाम बांबे… उसमें भी न्यूडिटी कला के नाम पर जमकर परोसी गयी।

पुरूष न्यूडिटी को हाल के दिनों में नया आयाम दिया है राजकपूर के पोते रणवीर कपूर ने। भारतीय कानूनों के मुताबिक बेशक वे पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं दिख सकते थे, लेकिन सांवरिया के निर्देशक ने उन्हें निर्वस्त्र तो कर ही दिया। अब इस कड़ी में नया नाम अपने सुरीले गीतों के लिए मशहूर मुकेश के पोते नील नितिन मुकेश का जुड़ गया है, जो जेल फिल्म में पूरी तरह निर्वस्त्र नज़र आ रहे हैं। रानी मुखर्जी अब तक न्यूडिटी और अंग प्रदर्शन से बचती रही हैं – लेकिन अपना बाजार भाव बढ़ाने के लिए उन्हें भी सेमी न्यूडिटी पर ही आखिर में जाकर भरोसा बढ़ा नज़र आ रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिकनी में वह हड़िप्पा बोलती नज़र नहीं आतीं।

न्यूडिटी फिल्मों के जरिये टेलीविजन के पर्दे पर भी जम कर दिख रहा है और इसका सबसे बड़ा जरिया बन रहे हैं रियलिटी शो। बिग बॉस में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी के चेहरा रहे प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन ने स्वीमिंग पूल में पायल रोहतगी और मोनिका बेदी के साथ सीन दिये – उसे क्या कला के नाम पर पेश किया गया। टेलीविजन की एक सुशील बहू के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी श्‍वेता तिवारी ने हाल के दिनों में प्रसारित हुए रियलिटी शो इस जंगल से मुझे बचाओ में जिस तरह झरने के नीचे नहाते हुए पोज दिये या फिर बाद में आयी निगार खान और कश्मीरा शाह ने बिकनी बीच स्नान किया – सबके लिए कला की ही दुहाई दी जाती रही है।

बात इतनी तक ही रहती तो गनीमत था… फैशन शो में कपड़ों के बहाने जिस तरह देह की नुमाइश की जाती है, उसे भी कला ही माना जाता है। पश्चिमी देशों में न्यूडिटी के नाम पर ऐसे फैशनेबल कपड़ों का चलन बढ़ रहा है – जिसके जरिये न्यूडिटी का न सिर्फ प्रचार होता है, बल्कि ये कपड़े नैकेडनेस को रोकने का भी दावा करते हैं। अभी तक इस परिपाटी का प्रचार तो भारतीय बाज़ारों में नहीं हुआ है। लेकिन जिस तरह के कपड़े पहने लड़के-लड़कियां महानगरों में नज़र आने लगे हैं, उसे अगर वैधानिक दर्जा देने के लिए पश्चिम के इस विचार को उधार ले लिया जाए, तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

महिला न्यूडिटी को विजय माल्या जैसे रसिक रईसों ने नयी ऊंचाई ही दी है। हर साल वे दुनिया के खूबसूरत लोकेशनों पर न्यूडिटी के नाम पर हॉट बालाओं की तस्वीरें प्रोफेशनल फोटोग्राफरों के जरिये खिंचवाते हैं। इससे तैयार कैलेंडर रईस और रसूखदार लोगों के पास भेजे जाते हैं। जिन्हें ये कैलेंडर नहीं मिलते – वे खुद को कमतर करके आंकते हैं। न्यूडिटी के नाम पर तैयार इस कैलेंडर को कथित हाईप्रोफाइल सोसाइटी में जिस तरह सम्मान हासिल हुआ है, उससे साफ है कि कथित हाईप्रोफाइल सोसाइटी का जिंदगी के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल गया है। चूंकि इस वर्ग के पास न सिर्फ पैसा है, बल्कि रसूख भी है, लिहाजा इन्हें लुभाने के लिए अब न्यूडिटी को परोसने वाली कला दीर्घाएं भी खुलने लगी हैं।

दरअसल अपना देश दो हिस्सों में साफ बंटा नज़र आ रहा है। एक तरफ बहुसंख्यक गरीब और बदहाल जनता है, जिसमें से ज़्यादातर लोग गांवों या फिर शहरी स्लम में रहने को मजबूर हैं, वहीं उदारीकरण के बाद एक नव धनाढ्य वर्ग तेजी से उभरा है, जिसकी ज़‍िंदगी में मानवीय संवेदनाओं से कहीं ज़्यादा पैसे की चमक भरी पड़ी है। रिश्तों की गरमाहट और संस्कारों से उनका कम ही नाता है। ऐसे में अपनी ज़‍िंदगी के खालीपन को भरने की जितनी वजहें समझ में आती हैं, उसमें न्यूडिटी भी एक है। उनकी ये भूख कला को प्रश्रय देने के नाम पर पूरी होती है। ऐसे में कलाकार भला क्यों पीछे रहते? हालत ये देखिए कि इस प्रवृत्ति के विरोध के भी अपने ख़तरे हैं। अगर आपने विरोध किया तो आपको दक्षिणपंथी या प्रतिक्रियावादी घोषित किये जाने का ख़तरा बढ़ सकता है। करीब डेढ़ दशक पहले मध्यप्रदेश के एक पत्रकार ओम नागपाल ने ऐसे सवाल उठाये थे तो उन्हें ऐसे लांछनों का भरपूर उपहार मिला था।

नव दौलतिया वर्ग को छोड़ दें, तो आज भी भारतीय समाज के लिए जीवन मूल्य कहीं ज्यादा जरूरी हैं। लिहाजा अभी तक न्यूडिटी के मार्केट का आकलन नहीं हो पाया है। लेकिन ये भी सच है कि ये अरबों का कारोबार तो है ही। अकेले अमेरिका में ही पोर्न उद्योग करीब 13 अरब डॉलर का है। वहां बाकायदा इसे कानूनी मान्यता भी मिली हुई है। यही वजह है कि वहां कौमार्य बेचकर जब एक लड़की ने अपनी पढ़ाई की फीस जुटायी, तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उस पर कोई सवाल नहीं उठाया। दरअसल अमेरिकी समाज व्यक्तिगत आजादी का हिमायती है, लेकिन तभी तक – जब तक समाज को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। वहां भी कुछ मूल्य हैं। ये मूल्यों के प्रति अमेरिकी समाज का आग्रह ही है कि वहां की कोई अहम शख्सियत नैतिकता के पहरे और सीमा रेखा से खुद को बाहर नहीं रख पाती। भयानक मंदी के दौर में जब पिछले साल 700 अरब डॉलर के सहायता पैकेज का ऐलान किया तो पोर्न उद्योग खुद के राहत के लिए भी सहायता पैकेज की मांग को लेकर उतर गया। लेकिन खुलेपन के हिमायती अमेरिका के प्रथम नागरिक ने इस मांग पर सिरे से ही ध्यान नहीं दिया।

ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर हम न्यूडिटी के प्रचार के नाम पर किस तरह की दुनिया बसाना चाहते हैं। भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत अब भी भूख और अशिक्षा से निबटारा पाने की है। गांधी जी के हिंद स्वराज लिखे पूरे सौ साल हो गये हैं। उनका सपना था कि आजादी के बाद न सिर्फ हमारी सरकार अपनी होगी, बल्कि सामाजिक ढांचा भी हमारे जीवन मूल्यों और महान परंपराओं पर आधारित होंगे। गांधी जी की न्यूडिटी दया और गरीबों के लिए कुछ कर गुज़रने, उनके जीवन में नयी रोशनी लाने का सबब बनती थी। लेकिन आज की कथित न्यूडिटी में सेक्सुअल फैंटेसी और रोमांच के साथ भोग की इच्छा ज़्यादा है। गांधी ने कहा था कि जब तक आखिरी एक भी आदमी दुखी है, राज्य और समाज को चैन से नहीं बैठना चाहिए। काश कि हम न्यूडिटी की दुनिया में खर्च होने वाली करोड़ों की रकम को गांधी के सपनों को पूरा करने में लगाते।

Maya Memsaab

umesh chaturvedi(उमेश चतुर्वेदी। वरिष्‍ठ और संवेदनशील पत्रकार। प्रिंट और टीवी, दोनों ही माध्‍यमों में अच्‍छा-खास वक्‍त बिताया। दैनिक भास्‍कर, इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़, सकाल टीवी में सीनियर पदों पर रहे। सामयिक विषयों पर विभिन्‍न अख़बारों में लगातार लिखते रहते हैं। उनके ब्‍लॉग का नाम है बलिया बोले। उनसे uchaturvedi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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