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हिंदी मराठी ज़िंदाबाद, भारतमाता कौन हैं आप?

29 November 2009 5 Comments

♦ वीना

Bal Thakre

एक बड़े मैदान में कुछ लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। इनमें से चार लोग एक बड़ी-सी फूलों की माला में अटके शान से इतरा रहे हैं। वहां एक मुकुटधारी भी मौजूद है। मुकुट पर लिखा है – ‘मराठी।’ अचानक माला पहने लोगों में से एक चिल्लाया – ‘मराठी मानुस’ की इज्जत का लंगोट हम संभालेंगे! बोलो जय महाराष्ट्रा!’

अनुयायियों ने आज्ञा का पालन किया और हाथ में पकड़ी तलवारें उठा कर चीखे- ‘जय महाराष्ट्र…!’ पेड़ों पर इत्मीनान से अपने परिवार के साथ समय बिताते परिंदे इस अप्राकृतिक प्रलय का आभास न पा सके। डर के मारे वे अपने पंख फड़फड़ाना भूल गये और धम्म से ज़मीन पर यों आ गिरे जैसे युद्ध क्षेत्र में तलवार के वार से अलग किया गया शत्रु का सिर। ये देख मुकुटधारी मुस्कराया। लोगों ने फिर तलवारे उठा कर शक्ति का प्रदर्शन किया।

दूसरी ओर से गरदम-गरदम दिल दहला देने वाली आवाज़ के साथ धूल भागी चली आ रही है। औंधे मुंह पड़े परिंदे धरती में हुए इस भयानक कंपन से अचानक होश में आ गये और गिरते-पड़ते पेड़ों की तरफ लपके। जैसे-जैसे धूल का गुबार पास आया, कुछ हाथ भाले-लाठी घुमाते हुए नज़र आये। दूरी कुछ और कम हुई तो हाथ-पैरों पर अपनी पहचान का ठप्पा लगाते और लाठी-भालों की औकात बताते चेहरे भी नज़र आने लगे। झुंड में सबसे आगे तीन व्यक्ति हैं। एक अपने हाथों में बड़ी-सी ट्रॉफी थामे है जिस पर लिखा है – ‘उत्तर प्रदेश की शान।’ दूसरा सिर पर मुकुट सजाये है, जिस पर लिखा है ‘हिंदी।’ तीसरा हाथ में कलम-किताब लिये अपने पेट का पीछा कर रहा है। मुकुट वाला ट्रॉफी वाले को कुछ इस अंदाज़ में धकेल रहा है जैसे कह रहा हो कि ‘बताओ वह कौन कम्बख्त है, जिसने तुम्हारा अपमान किया। आज बच कर न जाने पाये।’

लाठी-भाला खेमा अब तलवार खेमे के नजदीक है। धीरे-धीरे कदमों की आवाज़ और धूल शांत हो जाते हैं। दोनों खेमों के सेवकों ने सिंहासननुमा कुर्सी आमने-सामने सजायी। जिन पर दोनों तरफ के मुकुटधारी विराजमान हुए। ‘तलवार कुटुंब’ की तरफ सिंहासन कुर्सी समेत चौदह कुर्सियां और ‘लाठी-भाला कुटुंब’ में सिंहासन समेत आठ-दस कुर्सियां स्थान ग्रहण कर चुकी है। दोनों तरफ के बाकी बचे बिन चेहरे के हथियार एक-दूसरे के आमने-सामने तने खड़े है। अब शुरु हुई मुकुटधारियों के बीच तू-तू, मैं-मैं।

भाला दिखाते हुए ‘हिंदी’ मुकुटधारी – ‘तूने हमारी भैंस को डंडा क्यूं मारा?’

‘मराठी’ मुकुटधारी – ‘क्योंकि महाराष्ट्र के मंच पर हिंदी में रंभाती है।’

‘हिंदी’ मुकुटधारी – ‘क्या तू जानता नहीं हिंदी देश की माई है?’

‘मराठी’ मुकुटधारी – ‘माई होगी तेरी, मेरी मुंबई की दासी है।’

‘हिंदी’ मुकुटधारी – ‘खामोश गुस्ताख़! जबान लड़ाता है? अभी हिंदी वीरों के लाठी-भालों से तेरी तलवारों के हाथ तुड़वा दूंगा।’

‘मराठी’ मुकुटधारी आग-बबूला होते हुए – ‘तेरी इतनी हिम्मत…। अभी मराठी तलवारों से तेरी लाठियों के टुकड़े करवाता हूं।’

‘हिंदी’ खेमे का कलम-किताबधारी कलम चलाते हुए – ‘आ देखें ज़रा किसमें कितना है दम…।’

दोनों मुकुटधारी अपने-अपने हथियार उठा कर एक साथ चिल्लाते है- ‘मुकाबला शुरू किया जाए..!’ दूर खड़ी हथियारों की भीड़ एक दूसरे पर तन गयी।

तभी तिरंगी पट्टी थामे कुछ हाथ मैदान में आये और शब्दों की पट्टी गले में पहने एक कन्या को बिन चेहरे के हथियारों के बीच खड़ा कर गायब हो गये। पट्टी पर लिखा है – ‘मराठी हिंदी की छोटी बहन या मौसी है। एक के प्रयोग से दूसरे के अपमान का सवाल ही नहीं उठता।’ कन्या के दो मुखौटे हैं। एक पर लिखा है ‘हिन्दी’ और दूसरे पर ‘मराठी।’ अपनी जान आफत में देख कन्या डरी-सहमी थर-थर कांप रही है।

तिरंगे पट्टीधारी हाथों की इस हरकत से मुकुटधारी और नफ़रत से भर गये। इधर अकेली कन्या को देख दोनों तरफ के बिन चेहरे के हथियार अपना आपा खो बैठे, और कन्या के जिस्म से वस्त्र नोचने लगे। कन्या ज़ोर से चिल्लायी। उसकी पुकार सुन धरती फटी और दिल थामे हैरान-परेशान धरती मां प्रकट हुई! कन्या को गले से लगा धरती मां मुकुटधारियों से बोली – ‘ये क्या कर रहे हो? ये दोनों हमारी बेटियां हैं। हम तुम्हें आदेश देते हैं अभी अपने हथियार फेंक दो।’

दोनों मुकुटधारी एक साथ मुस्कुराये और बोले – ‘ए बुढ़िया, टाइम खोटी मत कर। तेरा ये खिताब भगत सिंह और अशफाकउल्लाह के साथ झूल गया। हमारे माथे को अब तेरी मिट्टी की नहीं, हमारे इशारों पे नाचने वाले बिन चेहरे के इन हथियारों के खून की ज़रूरत है। समझी?’

भारत माता ने बिन चेहरे वाले हथियारों को समझाया – ‘तुम हमारे बेटे हो। एक-दूसरे का खून मत बहाओ!’ पर उन्होंने मां की बात नहीं सुनी। अरे, ये क्या? उन्होने मां-बेटी दोनों को नोचना शुरू कर दिया! कोई बचाओ…! बचाओ उन्हें…!

क्या हुआ? क्यों चिल्ला रही हो? किसे बचाओ? आंखें खोली तो सामने वह मैदान, बिन चेहरे के हथियार और उन्हें आदेश देते रहस्यमयी मुस्कान वाले मुकुटधारी कहीं नहीं थे। आस-पास के माहौल ने जब सपने और हक़ीकत का एहसास करवाया, तब कहीं जाकर दिल की धड़कनें सामान्य हुईं। मगर स्वार्थ की राजनीति कब तक इस सपने को हकीकत से दूर रखेगी..? पता नहीं!

Veena(वीना। फिल्‍मकार और पत्रकार। कई लघु फिल्‍मों और डाक्‍यूमेंट्रीज़ के लिए स्क्रिप्‍ट लेखन और निर्देशन। विभिन्‍न अख़बारों-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। उनसे veenavnx@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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5 Comments »

  • jitendra said:

    veena ji
    hum log iss kklekh ko apni patrika ke liye chhpne chhate hain

    patrika
    sadinama
    kolkata
    jitendra jitanshu
    09231845289
    jjitanshu@yahoo.com

  • Pramod Tambat said:

    सटीक और सही सहमय पर सही व्यंग्य। स्वार्थ की राजनीति को कदम कदम पर उघाड़ने की जरूरत है। एक अच्छी रचना के लिए लेखिका को बधाई।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    http://www.vyangya.blog.co.in
    http://www.vyangyalok.blogspot.com

  • Vibha rani said:

    बहुत बढिया.

  • Vibha rani said:

    बहुत पहले पं. प्रदीप ने लिख थी- “प्रांत प्रांत से टकराती है, भाषा से भाषा की लात, मैं पंजाबी, तू बंगाली, कौन करे भारत की बात.” अब लोगों के सामने सर्वाइवल की समस्या है सो सभी को अपनी अपनी बहिंस तो चाहिये ही ना!

  • अरविंद शेष said:

    ‘‘-अनुयायियों ने आज्ञा का पालन किया और हाथ में पकड़ी तलवारें उठा कर चीखे- ‘जय महाराष्ट्र…!’ पेड़ों पर इत्मीनान से अपने परिवार के साथ समय बिताते परिंदे इस अप्राकृतिक प्रलय का आभास न पा सके। डर के मारे वे अपने पंख फड़फड़ाना भूल गये और धम्म से ज़मीन पर यों आ गिरे जैसे युद्ध क्षेत्र में तलवार के वार से अलग किया गया शत्रु का सिर। ये देख मुकुटधारी मुस्कराया। लोगों ने फिर तलवारे उठा कर शक्ति का प्रदर्शन किया।

    दूसरी ओर से गरदम-गरदम दिल दहला देने वाली आवाज़ के साथ धूल भागी चली आ रही है। औंधे मुंह पड़े परिंदे धरती में हुए इस भयानक कंपन से अचानक होश में आ गये और गिरते-पड़ते पेड़ों की तरफ लपके।’’

    ’’-इधर अकेली कन्या को देख दोनों तरफ के बिन चेहरे के हथियार अपना आपा खो बैठे, और कन्या के जिस्म से वस्त्र नोचने लगे।’’

    इस शब्द चित्र के ये दो बिंब बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाते हैं।

    वीना जी को बहुत प्रभावी तरीके से केवल अपनी नहीं, एक बड़े जनसमुदाय की चुप्पी को आवाज़ देने के लिए शुक्रिया…

    तोड़ने या टूटने में महज कुछ पल लगते हैं, जोड़ने या जुड़ने में सदिया लग जाती हैं।

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