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वाजपेयी का मुखौटा या संघ का खिलौना

30 November 2009 6 Comments

♦ आशुतोष

vajpayeeलिब्रहान कमीशन ने अयोध्या का सच सामने लाने में 17 साल लगाये, उसे लेकर उसकी जी भर की आलोचना की जानी चाहिए। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद भी यह लगता है कि कमीशन ने कांग्रेस लीडरशिप को भी जाने-अनजाने बचाने की कोशिश की है। वो नरसिंहराव को ज़‍िम्मेदारी के बोझ से मुक्त कर देती है, लेकिन पूरी रिपोर्ट ने सबसे ज़्यादा चौंकाया अटल बिहारी वाजपेयी को अयोध्या मामले में घसीट कर। इस वजह से हिंदूवादियों और कुछ भ्रमित सेकुलरवादियों को मिर्ची लगी है। वो इसी आधार पर जस्टिस लिब्रहान की मंशा और विवेक पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

कमीशन बड़े दिलचस्प अंदाज में वाजपेयी को स्यूडो-मॉडरेट बताती है यानी वो शख्स जो दिखने में तो उदारवादी है, पर हकीकत में उदारवाद का ढोंग कर रहा है, वो छद्म उदारवादी है। पेज 942, पैरा 166.6 में रिपोर्ट लिखती है आडवाणी, वाजपेयी, जोशी को संघ परिवार की साज़‍िश पता न हो, यह नहीं माना जा सकता है। पैरा 166.7 – ये नेता संघ परिवार का आदेश न मानने की हिम्मत नहीं कर सकते थे, विशेषकर आरएसएस का आदेश। ऐसा करने की कीमत थी बीजेपी और सार्वजनिक जीवन से किनारा। आरएसएस पर इनका कोई नियंत्रण नहीं था और जिस दिशा में अयोध्या आंदोलन जा रहा था, उसको ये कतई प्रभावित नहीं कर सकते थे। ये सिर्फ आरएसएस के हाथ का खिलौना थे। पेज 943, पैरा 166.10 – इन छद्म उदारवादियों का काम था आरएसएस के फैसले को जनता में स्वीकार्य बनाना।

साफ है, कमीशन आडवाणी और जोशी के साथ-साथ वाजपेयी को भी माफ नहीं करता है और उन्हें बाबरी मस्जिद ढहाने में बराबर का अपराधी मानता है। आडवाणी और जोशी को तो सभी कट्टर हिंदूवादी मानते हैं और इन दोनों ने इसे कभी छिपाने की कोशिश भी नहीं की, लेकिन वाजपेयी ने हमेशा ये जताया कि वो कभी भी अयोध्या आंदोलन के पक्ष में नहीं थे और न ही बाबरी मस्जिद ढहाने को उन्होंने कभी सही माना। यह वाजपेयी का वो चेहरा है, जिसे कुछ बीजेपी विरोधी भी संदेह का लाभ दे नेहरूवादी परंपरा में डालने की गुस्ताखी करते हैं। लेकिन ऐसा करने वाले ये भूल जाते हैं कि वाजपेयी दिल और दिमाग दोनों से ही संघी थे और उन्होंने ये कभी भी नहीं छिपाया कि वो स्वयंसेवक नहीं थे। मुझे याद पड़ता है 1999 में न्यूयार्क में प्रधानमंत्री के तौर पर दिया उनका भाषण। उन्होंने कहा था वो पहले स्वयंसेवक हैं। बाद में जब हंगामा मचा तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने सफाई दी।

नेहरू से वाजपेयी की तुलना करने वाले भूल जाते हैं कि नेहरू ने आजादी के बाद गांधी जी की परंपरा को बढ़ाते हुए हिंदू मुस्लिम एकता को अपने जीवन का ध्येय बना लिया था और वो कभी भी वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसों के दबाव में इस मसले पर समझौता करने को तैयार नहीं हुए। पटेल से उनके मतभेदों का एक बड़ा कारण था मुस्लिम सवाल पर उनका नज़रिया। नेहरू जी हमेशा मानते थे कि विभाजन की सज़ा मुसलमानों को नहीं दी जा सकती और सरकार को आगे बढ़कर ये भरोसा मुसलमानों को देना चाहिए कि उनके साथ किसी भी तरह भेदभाव नहीं किया जाएगा।

वाजपेयी की ये राय कभी नहीं रही। अगर रही होती तो वो कभी आरएसएस के सदस्य नहीं होते, क्योंकि हेडगेवार की अगुवाई में जिन पांच लोगों ने 1925 में आरएसएस की नींव डाली, वे सभी मुस्लिम विरोधी थे और जो संगठन बना, उसकी विचारधारा के मूल में था मुसलमान विरोध। न यकीन हो तो गुरूजी गोलवलकर के विचार ‘बंच ऑफ थॉट’ में पढ़ लीजिए। भ्रम टूट जाएगा। वाजपेयी या उनके समर्थक ये नहीं कह सकते कि वाजपेयी संघ परिवार की इस बात से सहमत नहीं थे। विचारधारा में विश्वास न होता तो आरएसएस में शामिल न होते और आजीवन कुंवारे न रहते और अगर कभी इस विचारधारा पर आरएसएस के नेताओं से टकराव होता तो संगठन छोड़ देते। उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया, बल्कि प्रधानमंत्री रहते उन्होंने बाबरी विध्वंस को हिंदू भावना का प्रकटीकरण बताया था।

फिर गुजरात दंगों पर क्या कहेंगे। तर्क हो सकता है वो मोदी को हटाना चाहते थे लेकिन पार्टी उनके ख़‍िलाफ़ हो गयी। सवाल कई हैं। दंगे भड़कते ही एक प्रधानमंत्री के नाते उन्होंने क्या किया? दंगे होते रहे, लोग मरते रहे और वो देखते रहे। सरकार बर्खास्त क्यों नहीं की? मुझे याद है जार्ज फर्नांडीस को रक्षा मंत्री के नाते गुजरात भेजा गया था और जार्ज ने आकर रिपोर्ट भी दी थी। क्या तब उन्हें नहीं पता था कि किस तरह से राज्य सरकार का इस्तेमाल किया गया? फौरन क्यों नहीं गुजरात गये? गये भी तो एक महीने के बाद और सिर्फ यह कहा कि राजा को राजधर्म का पालन करना चाहिए।

एक प्रधानमंत्री के धर्म का क्या हुआ? और अगर दंगे पर आरएसएस और बीजेपी उनकी बात मानने को तैयार नहीं थी तो फिर अंतररात्मा की आवाज सुन पद त्याग क्यों नहीं दिया? पद छोड़ने की बात उन्होंने गुजरात पर नहीं की, लेकिन जब खुद उनकी अपनी राजनीति ख़तरे में पड़ने लगी तो ज़रूर उन्होंने इस्तीफे की बात की। याद कीजिए 2002 की वो घटना। आरएसएस का उन पर दबाव था कि वो राष्ट्रपति बन जाएं और आडवाणी प्रधानमंत्री। जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो बोल पड़े आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय की ओर प्रस्थान यानी इस्तीफे की धमकी और पूरा आरएसएस एक मिनट में उनके आगे नतमस्तक। समस्या ख़त्म। गुजरात दंगों पर यही तरकीब क्यों नहीं अपनायी? क्योंकि विचारधारा के स्तर पर मोदी और वाजपेयी की सोच एक थी, फर्क सिर्फ उस सोच के लागू करने के तरीके पर था।

ढेरों उदाहरण हैं। उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस को जला कर मारने की घटना हो या फिर दंगा में ईसाइयों के घर और चर्च जलाने का वाकया, हर जगह वही रवैया। संघ के कार्यकर्ताओं को बचाने की कोशिश। ऐसे में अगर लिब्रहान कमीशन इस नतीजे पर पहुंचा कि बाबरी विध्वंस पर इन नेताओं (वाजपेयी) को संदेह का लाभ देते हुए अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता, तो गलत नहीं किया। दरअसल इस देश के कुछ राजनीतिपसंद बुद्धिजीवी विचारधारा और राजनीति का फर्क नहीं समझते। वाजपेयी और आरएसएस की विचारधारा एक है। जो बुद्धिजीवी उन्हें उदारवादी कहते हैं, वो दरअसल ये समझते ही नहीं कि विचारधारा अपने स्वरूप में कट्टर या उदार होती है, उसको लागू करने का तरीका नहीं। वाजपेयी लोकतंत्र में संघ की विचारधारा के मुखौटे थे गोविंदाचार्य ने गलत नहीं कहा था। (दैनिक हिंदुस्‍तान से साभार)

ashutosh(आशुतोष। वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार। कांशीराम के थप्‍पड़ ने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मशहूरियत दी। जेएनयू से उच्‍चशिक्षा। आजतक से करियर की शुरुआत। फिलहाल आईबीएन 7 में मैनेजिंग एडिटर। वामपंथी रुझान वाली छवि रही। बीजेपी के सत्ता में आने के बाद नज़रिया बदला, लेकिन बीजेपी-संघ वालों की कभी-कभी इसी तरह लेते रहते हैं। ashutosh@tv18online.com पर संपर्क।)

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6 Comments »

  • Mazkoor Alam said:

    ashutosh jee chahe jaise bhi hon mujhe achchhe lagte rahe hain. is baar bhi unhone shandar likha hai. ismein koi shak nahin. aur raha sawal vajpayee ka to unki vichardhara ko lekar kuch budhijiviyon ko lekar kisi ko kabhi koi shak nahin raha..

  • Sheeba Aslam Fehmi said:

    JNU se hone ke natey Ashutosh jantey hi hongey ki Mahatma Gandhi ki hatya ki FIR me Nathuram ke saath aur kaun sathi they, isliye Vajpayee ki fitrat aur niyat dono par koi mughalta nahi ho sakta. yeh wohi kayar hai jisne Angrezon se likh kar maafi mangi thi aur likh hi ashwasan diya tha ki woh kabhi Angrez-virodhi gati vidhiyon me shamil nahi hoga.
    Is shaks ka mukhauta kabhi uski asliyat nahi chhupa saka, haan kuchh avsarwadiyon ko behti ganga me haath dhoney ke avsar zaroor mil gaye.

  • aabuu said:

    केवल आशुतोश ही क्यूं अविनाश

    मुझे आशुतोश के लेख से कोई िशकायत नहीं है .हां अगर कुछ बात कहना चाहता हूं तो वह मोहल्ला लाइव के संचालक अविनाश से .आखिर क्या वजह रही जो उन्होंने आशुतोश का यह लेख प्रकािशत करने की जरूरत समझी.शायद इसलिए कि इसमें दक्षिणपंथी लोगों की िशकायत मौजूद ह.ै या किसी वामपंथी रूझान वाले पत्रकार ने इसे लिखा है.
    अगर आशुतोश का लेख विचारोत्तेजक लगा. तो कल बेचारे शिश जी के लेख को क्यूं नहीं लिया गया. मेरी इस बात को केवल शिश जी के लेख से जोड़ कर नहीं देखा जाए . दुख नहीं अफसोस इसी बात का है कि अविनाश जैसे लोग जो अपने आप को किसी परम बुदि्धजीवी होने का दावा करते है. अक्सर ऐसे ही चादरों या पर्दे के पीछे से आपनी बात कहते हैं.
    अगर कोई गलती करे तो उसे करने का हक उसे है. मगर मेरे भाई अरबी में एक मशहूर कहावत है कि मनुश्य ही एकमात्र गदहा है जो एक ही गड्ढे में दोबारा गिरता है. आप भी बार बार अपने आप को एक दायरे में रोककर उसी गड्ढे में नजर आते हो अविनाश भाई. इसलिए पूछता हूं आपसे केवल आशुतोश ही क्यूं अविनाश.

  • Prashant (PD) said:

    Congress aur Nehru ki achchhi tarif hui hai.. badhiya hai.. :)

  • शेष नारायण सिंह said:

    सरदार पटेल मुस्लिम विरोधी नहीं थे

    इस लेख के बारे में ज़रूरी नहीं कि कोई राय बनायी जाय. बढ़िया है काफी विद्वत्तापूर्ण शैली में लिखा है .लेकिन एक बात स्पष्ट करना ज़रूरी है कि सरदार पटेल मुस्लिम विरोधी नहीं थे . . विद्वान् लेखक को चाहिए कि सरदार पटेल के बारे में मधु लिमये और राज मोहन गाँधी की किताब पढ़ लें . उसके बाद भी अगर उनकी यही राय रहती है तो कोई बात नहीं. मैं एक पुराने लेख के कुछ हिस्से उद्धरण के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं.कृपया एक नज़र डाल लें .

    उद्धरण
    कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ”सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए वे कृत संकल्प है।” (हिंदुस्तान टाइम्स – 17-12-1948)। सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं।सरदार अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, ”इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिए हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था। …………… मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूं। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ………… एक हफ्ते तक अपने हाथ बांधे रहिए और देखिए क्या होता है।मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।”

    सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ।.

  • आदर्श राठौर said:

    किसके मन में क्या है और वह क्या सोच रखता है इस बारे में हम आप सिर्फ कयास ही लगा सकते हैं.
    संघ की बात करूं तो एक बात बताना चाह रहा हूं
    हिमाचल प्रदेश, छोटा सा राज्य… वहीं का मैं रहने वाला हूं। यह क्षेत्र हिन्दू बहुल है और मुस्लिम जहां-जहां भी हैं उनका सामाजिक स्तर दूसरी जनता जैसा ही है। छोटा था घर के पास वाले स्कूल में शाखा लगा करती थी। लोगों को खेलते-कूदते देख मेरे मन में भी वहां जाने की इच्छा पैदा हुई। एक दिन मैं ऊभी वहां जा पहुंचा। और लगभग 3 महीने लगातार वहां गया। इसके बाद से वह शाखा लगना बंद हो गई। लेकिन इन तीन महीनों में मैंने धनीराम जी (क्षेत्रीय प्रचारक) को राष्ट्र से अलग बात करते हुए ही नहीं देखा। मुस्लिमों के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कुछ भी नहीं कहा जाता रहा। इसके बाद मैंने सरस्वती विद्या मंदिर (स्कूल) में दाखिल लिया। ये सेवा भारती का एक अंग है। वहां पर भी ऐसा कुछ कभी नहीं कहा गया जिससे धर्म वगैरह का विभेद पैदा हो। इसके बाद मैं सरकारी स्कूल से पढ़ाई की। चार साल पहले दिल्ली आया तभी मुझे वास्तविकता का आभास हुआ कि हिन्दू और मुस्लिमों के बीच में कितनी खाई है। यहीं आकर मुझे सुनने और पढ़ने को मिला कि आरएसएस मुस्लिम विरोधी है। पहले पहल तो सुनकर यकीन ही नहीं होता था। अब चीज़ों को देख रहा हूं, समझ रहा हूं।

    मैं तो सिर्फ ये कहना चाह रहा था कि हर संगठन पर वहां के सामाजिक परिवेश का प्रभाव रहता है। किसी संगठन से समाज पर प्रभाव पड़ना बाद की बात है। अब बहुसंख्यकों की जैसी मानसिकता है, उसी मानसिकता के लोग किसी संगठन में जाएंगे तो वही उस संगठन की प्रकृति भी बन जाएगी।

    संघ बुरा संगठन नहीं, इस बात को वही समझ सकता है जो कभी संघ के संपर्क में रहा हो। हां, मैं सांप्रदायिकता का धुर विरोधी हूं और बीजेपी की मौजूदा नीतियों का भी..। लेकिन व्यक्ति विशेष अगर चाहे तो अपने आदर्शों पर स्थापित रह सकता है। वाजपेयी जी ऐसे ही व्यक्ति हैं।

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