Articles Archive for December 2009
पुस्तक मेला, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत, समाचार »
विनीत कुमार ♦ पाठकों का रचना से सीधा रिश्ता कायम हो, इस क्रम में यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया का प्रयोग सफल रहा। दिल्ली की कंपकंपा देनेवाली ठंड में भी इंडिया हैबिटेट सेंटर का गुलमोहर सभागार लगभग भरा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रचना पाठ को लेकर पाठक अब भी कितने उत्सुक हैं। एक प्रकाशक की हैसियत से यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया ने इस बात की पहल की है कि रचना और पाठक के बीच एक स्वाभाविक संबंध विकसित हो। एक ऐसा संबंध, जो कि अख़बारों की फॉर्मूलाबद्ध समीक्षाओं और आलोचकों की इजारेदारी के बीच विकल्प के तौर पर काम कर सके। यह संबंध पाठक की गरिमा को बनाये रखे, उसे विज्ञापनदार समीक्षा पढ़ कर ग्राहक बनने पर मजबूर न करे।
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मिलिंद खांडेकर ♦ आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी बुधवार को स्टार न्यूज पर चल रहे अपने लाइव इंटरव्यू को बीच में ही छोड़कर उठ गये। तिवारी से उन पर लगे सेक्स स्कैंडल के आरोपों को लेकर जब कुछ सवाल पूछे गये तो वो गुस्से में उठ कर चले गये। स्टार न्यूज के नेशनल अफेयर्स एडीटर दीपक चौरसिया के साथ खास बातचीत में 84 वर्षीय तिवारी ने कहा कि वो उम्र के आखिरी पड़ाव में हैं और ऐसे समय में इन आरोपों से उन्हें तकलीफ हुई है। उन्होंने कहा कि उनकी मौत इन आरोपों का जवाब देगी। इंटरव्यू छोड़ने से पहले तिवारी ने कहा कि सेक्स स्कैंडल के आरोप सच्चाई से कोसों दूर हैं।
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डेस्क ♦ जब पूरा देश आंध्र के राजभवन में एक पतित परिघटना पर हैरान है, एक अख़बार है, जो उसको भी जस्टीफाई करने की कोशिश में है। एक संवैधानिक जगह पर अय्याशियों को लेकर उस अख़बार ने अपना रुख़ तो नहीं ही रखा है, बल्कि इसके पर्दाफ़ाश के पीछे वो राजनीतिक साज़िश बता रहा है। आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि उस अख़बार का नाम है नई दुनिया। वही नई दुनिया, जो पुरानी कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र की तरह दिल्ली से निकल रही है। इस मामले में इस अख़बार ने संपादकीय लिखा, जिसका लब्बोलुआब यह है कि इस बुजुर्ग नेता को संदेह का लाभ तक नहीं दिया गया।
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अनिल ♦ वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कल 29 दिसंबर को जहां एक ओर 12 वां स्थापना दिवस मनाया गया, वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई-लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे रहे। इन विद्यार्थियों ने इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया। पिछले नौ दिसंबर को दीक्षांत समारोह के बहिष्कार से लेकर आज यह दूसरा बड़ा आयोजन था, विद्यार्थियों द्वारा जिसके सामूहिक बहिष्कार की घोषणा की गयी। कुल तीन सौ नियमित विद्यार्थियों वाले हिंदी विश्वविद्यालय में कई छात्र पिछले बीस-पच्चीस दिनों से भूखे बैठे हैं और ऐसे अनुष्ठान पूरे घमंड के साथ जारी हैं।
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डेस्क ♦ पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स की ओर से ‘कुछ नया, कुछ पुराना’ के तहत कुछ गद्य अंशों के नाट्य-पाठ का आयोजन किया गया है। वाचक होंगे प्रसिद्ध युवा रंगकर्मी सुमन वैद्य। कृतियां होंगी चंगेज़ का बयान (मोहसिन हामिद), ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है (ज़किया ज़हीर), मार्था का देश (राजी सेठ), गेंद और अन्य कहानियां (चित्रा मुदगल) और आख़री मुग़ल/दि लास्ट मुग़ल (विलियम डेलरिंपल)। आज शाम सात बजे इंडिया हैबीटेट सेंटर, लोदी रोड, नयी दिल्ली के गुलमोहर सभागार में ये आयोजन है और इसके लिए तीन नंबर गेट से इंट्री है। शुरू होने से आधा घंटा पहले पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स ने दर्शकों के लिए चाय-पानी का भी इंतज़ाम किया हुआ है।
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मृत्युंजय प्रभाकर ♦ 12वें भारंगम का एक और आंकड़ा चौंकानेवाला है। भारत से मंचित होनेवाले 63 नाटकों में आधे से अधिक के निर्देशक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित छात्र हैं या उससे जुड़े लोग। भारंगम में नाटकों के चयन पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं कि इसमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जु़ड़े लोगों को तरजीह दी जाती है। 2008 का रंग महोत्सव तो पूरी तरह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लोगों को ही समर्पित था, जिसका विरोध ब़ड़े पैमाने पर हुआ था। भारत रंग महोत्सव के आयोजन का पैसा केंद्र सरकार से आता है, अतः इसका दुरुपयोग खटकता है। इस बार तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने डिप्लोमा प्रोडक्शंस को भी भारंगम का हिस्सा बना दिया है, जिसमें अंधा युग को छोड़ दें तो एक भी स्तरीय नाटक नहीं हैं।
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शेष नारायण सिंह ♦ सफ़दर की मौत के बाद दिल्ली और फिर पूरे देश में ग़म और गुस्से की एक लहर फूट पड़ी थी। जो काम सफ़दर करना चाहते थे और उन्हें कई साल लगते, वह एकाएक उनकी मौत के बाद स्वतःस्फूर्त तरीके से बहुत जल्दी हो गया। देश के हर हिस्से में संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले लोग इकठ्ठा होते गये और सफ़दर की याद में बना संगठन, सहमत एक ऐसे मंच के रूप में विकसित हो गया, जिसके झंडे के नीचे खड़े हो कर हिंदू पुनरुत्थानवाद को संस्कृति का नाम दे कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले आरएसएस के मातहत संगठनों को चुनौती देने के लिए सारे देश के प्रगतिशील संस्कृतिकर्मी लामबंद हो गये।
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रीतेश ♦ अगर संसदीय बोर्ड की बैठक में नितिन गडकरी को अध्यक्ष चुना गया तो यह अधिकार पार्टी के संसदीय बोर्ड को किस बीजेपी के संविधान से मिला कि दर्जन भर लोग लाखों कार्यकर्ताओं की पार्टी का नेता चुन लें? बोर्ड ने यह ताक़त खुद से विकसित कर ली है, तो क्या गडकरी के अलावा किसी और नाम पर भी विचार हुआ था? नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? क्या बोर्ड में गडकरी के नाम पर किसी ने कोई आपत्ति जाहिर की? नहीं की तो क्यों नहीं की? अगर संसदीय बोर्ड ने पार्टी संविधान के दायरे से बाहर जाकर ऐसा किया तो किसके इशारे पर किया?
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सुशांत झा ♦ कांग्रेस की ऑफिसियल साइट में इस आपराधिक लापरवाही से आम जनता के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन देश पर हुकूमत करने वाली पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल ज़रूर उठता है। सवाल ये भी उठता है कि एक माध्यम के रूप में पार्टी इंटरनेट को कितने हल्के रूप में लेती है। ये उस पार्टी की वेबसाइट है, जो हिंदुस्तान में कंम्प्यूटर क्रांति लाने का दंभ भरती है – लेकिन अपने उसी नेता के बारे में तथ्यात्मक ग़लतबयानी करती है, जो इसका सूत्रधार माना जाता है। दूसरी बात ये कि जिस नेहरुजी को देश और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक विचारों का पोषक मानता है, उन्हीं के खानदान द्वारा संचालित पार्टी एक आधुनिक प्रचार माध्यम पर अपने पितृपुरुष को भूल जाती है।
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विष्णु राजगढ़िया ♦ रणेंद्र का यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में महत्वपूर्ण प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को जमीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज्यादा जरूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।


