देखते-देखते गुज़र गये 25 साल! कैसा भयानक मंज़र था!!

बृजेश सिंह

तीन दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल हो रहे हैं। एक ऐसी त्रासदी, जिसने एक खूबसूरत शहर को मुर्दाघर में बदल दिया था। जो जीवित थे, उनके सामने ख़ौफ़नाक मंज़र था और अब उसकी त्रासद यादें। ऐसे ही एक सज्‍जन हैं श्‍याम बाबू। पुराने भोपाल में उनकी मशहूर पूड़ी की दुकान है। भास्‍कर डॉट कॉम से जुड़े युवा पत्रकार से उन्‍होंने दिसंबर ’84 की अपनी यादें साझा कीं : मॉडरेटर

Shyam Babu Poodiwale 3

भोपाल। 3 दिसंबर 1984 की ठंडी रात। दुकान बंद करने के बाद मैं अभी-अभी घर आया था। पत्नी ने कहा, खाना खालो… सुबह भी ऐसे ही बिना खाये चले गये थे। मैं खाना खाने बैठा ही था कि अचानक लोगों के चीखने की आवाज़ें सुनाई दी। ऐसा लगा, जैसे उन्हें कोई जान से मारने के लिए दौड़ा हो। मैं खाना छोड़कर घर की छत पर गया।

मेरे सामने जो मंज़र था, उसे देखने के बाद किसी के भी रोंगटे खड़े होना लाज़‍िमी था। मैंने देखा कि स्त्री-पुरुष और बच्चे बदहवास होकर इधर-उधर भाग रहे थे। मैने चिल्लाकर पूछा, क्या हुआ, आप सब कहां जा रहे हो?

तब उनमें से किसी की आवाज़ सुनाई दी कि यूनियन कार्बाइड से ज़हरीली गैस निकल रही है और शहर के सभी लोग एक-एक कर मरते जा रहे हैं। आप भी अपनी जान बचाइए और भागिए।

पुराने भोपाल में पूड़ी की दुकान चलाने वाले और मौत की उस रात अपनी जान की परवाह किये बिना लोगों की सेवा करने वाले 80 साल के श्याम बाबू अग्रवाल 25 साल पहले के इस वाकये को बताते वक्‍त अपने आंसू रोक नहीं पाते हैं।

इंसानी समंदर में तब्‍दील सड़कें

आंसू पोंछते हुए श्याम बाबू बताते हैं कि उस रात हर तरफ लोगों की चीत्‍कार सुनाई दे रही थी। सड़कें इंसानी समंदर में तब्‍दील हो चुकी थीं। गैस रिसने की ख़बर का लोगों पर क्या प्रभाव था, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि कई लोग बिना कपड़ों के ही घर से निकल भागे थे।

जो जिस अवस्था में था, उसी हालत में गैस रिसने की ख़बर सुनकर घर से निकल गया था। लोग बदहवास होकर भागे जा रहे थे लेकिन उन्‍हें पता नहीं था कि गैस की ज़द से बचने के लिए उन्‍हें कहां जाना चाहिए।

भागते हुए लाशों में बदले

लोगों को भागते देख मैंने भी वहां से निकलने का मन बनाया। पत्नी और बच्चों को घर में छोड़ मैं शहर में निकल गया। चौराहों पर पुलिस के जवान लोगों से वापस घर में जाने की अपील कर रहे थे। वो लाउडस्पीकर पर चिल्ला रहे थे कि आप लोग डरे नहीं गैस का रिसना बंद हो गया है और अब कोई ख़तरा नहीं है।

श्याम बताते हैं कि मैं एक पुलिस गाड़ी में सवार हो गया जो प्रभावित इलाकों का दौरा कर रही थी और लोगों से घर में वापस आने की अपील कर रही थी। जब जीप छोला इलाके में पहुंची, तो उस मंज़र को देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। सड़क पर लाशों का अंबार लगा था। हालत ऐसी थी कि जीप का आगे जाना संभव नहीं था।

लाशों को देखकर यह कहा जा सकता था कि वो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे पर मौत से तेज़ नहीं दौड़ सके। कई बच्चों के मुंह से खून निकल रहा था, कोई बेतहाशा हांफ रहा था, कोई अपने खोये हुए बच्चे को खोज लाने की मिन्नतें कर रहा था। लेकिन उनकी मदद के लिए वहां कोई नहीं था।

पुलिस वाले केवल यही अपील कर रहे थे कि आप परेशान न हों और अपने घर लौट जाएं।

लाशें थीं, लकड़ी और क़फ़न नहीं थे

श्याम बाबू बताते हैं कि गैस हादसे ने भोपाल को एक मुर्दाघर में बदल कर रख दिया था। शहर के कई कोने बिना कफन की लाशों से पटे पड़े थे। बचे हुए लोगों के सामने यह चुनौती थी कि लाशों का अंतिम संस्‍कार कैसे किया जाए।

फौरी तौर पर ट्रकों में लाशों को भरकर विश्राम घाट ले जाया जाने लगा। बकौल श्‍याम बाबू वो भी अपने बड़े भाई के साथ छोला विश्राम घाट पहुंचे, जो लाशों से पटा पड़ा था। वहां के कर्ताधर्ता ये नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर इतनी सारी लाशों का दाह संस्कार कैसे किया जाए।

जितनी लाशें घाट के अंदर थीं, उससे ज़्यादा गेट के बाहर थीं। इन लाशों को एक अदद कफन का टुकड़ा तक नसीब नहीं था। वहां इतनी लकड़ी भी नहीं थी कि सबका अंतिम संस्कार किया जा सके।

श्याम बाबू ने तत्‍काल कुछ लोगों की मदद से 15 ट्रक लकड़ी और 2 ट्रक कफन के कपड़े मंगवाये, जिसके बाद ही अंतिम संस्‍कार शुरू हो सका। शवदाह स्थल पर जगह न होने के कारण जो लाशें जहां पड़ी थीं, उन्हे वहीं जला दिया गया।

अन्‍न के आख़‍िरी दाने तक खाना बनाओ

एक तरफ ज़हरीली गैस मौत बनकर आ रही थी तो दूसरी ओर खाने की समस्‍या भी सिर उठाना शुरू कर चुकी थी। बचे हुए लोगों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। लोग सड़कों पर अधमरी हालत में भूखे पड़े थे।

श्याम बाबू ने तुरंत अपने होटल के कर्मचारियों समेत शहर के बाकी रसोइयों को भी बुलाया और कहा कि जब तक होटल में अन्न का एक दाना भी बाकी है, तब तक खाना बनाते रहो।

उन्‍होंने अपनी बेटी और दोनों बेटों को पूड़ी-सब्जी पैक करने के काम में लगा दिया। कई युवाओं को एकत्रित किया और पैकेट्स को अलग-अलग इलाकों में बंटवाना शुरू करवाया। श्‍याम बाबू का पूड़ी भंडार लगातार चार दिन तक लोगों को खाना खिलाता रहा।

(बृजेश से brijesh2709@gmail.com पर संपर्क करें)

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