इस कुत्ते की भी सुन लो!

कहते हैं कि जबतक कुत्तों का अपना इतिहासकार नहीं होगा तबतक उसे दुरदुराने-दुत्कारने वालों की ही इतिहास-गाथा लिखी जाएगी। बहुत नाइंसाफी है ये! 26 नवंबर 2008 को जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ तो देश-दुनिया के आम से लेकर खास लोगों तक ने टेसुए बहाए और अपनी बात कही। तब एक कुत्ता भी अपनी बात कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पाया था। आज उस हमले के तकरीबन एक साल बाद उस बेज़ुबान को ज़ुबान देने की इंसानी कोशिश की जा रही है। लेकिन यहां ध्यान रखा जाए कि ये बात पिछले साल मुंबई हमले के तुरंत बाद लिखी गयी थी : संदीप कुमार

dog cartoonमैं एक कुत्ता हूं। और कुत्तों का नेता भी। कोई परिवारवाद-भतीजावाद वाला मामला नहीं है। पूरे ‘भूंक-मत’ के साथ चुना गया हूं। चाणक्यपुरी से लेकर चांदनी चौक तक के कुत्तों ने भूंक-भूंक कर मुझे अपना सरदार चुना है। इधर मुंबई में 26 नवंबर को हमले हुए तो मेरे दोनों कान खड़े हो गये। कुत्तों का नेता हूं, आदमियों का नहीं जो कान में तेल डालकर कंबल खींच लेता। भई, चूक जो हुई थी हमारी जमात से। ज़िम्मेदारी तो लेनी ही पड़ेगी न। नेता हूं सो नैतिकता नाम की चीज़ भी साथ में नत्थी करके चलता हूं। अरे भई, ये भी कोई बात हुई कि हमला होने वाला हो और कुत्तों को पता न चले। ये कैसे हो गया कि बोट भर-भर के बारूद और असलहे मुंबई में पहुंच गये और कुत्तों की नाक ही न फड़की। अब खुफिया एजेंसियों की नाक और सुरक्षा एजेंसियों की नाकेबंदी भले धोखा खा जाएं पर ससुरा कुकुर अपनी परंपरा कैसे भूल सकता है। सदियों से दादी-नानी कहती आयी हैं कि कुत्तों को अनहोनी का एहसास पहले हो जाता है और रो-रोकर लोगों को इसकी इत्तिला भी करा देता है। लेकिन नहीं मालूम कि क्यों मायानगरी मुंबई की हमारी बिरादरी के कुत्तों की नाक को सांप सूंघ गया था। ज़रूर दिन ढलते पउवा चढ़ाकर कहीं लुढ़क गये होंगे सारे के सारे। छि:! इन बंबइया कुत्तों ने सारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी। अपनी बंबइया बिरादरी की इसी लापरवाही के मद्देनज़र राजधानी दिल्ली के भैरो बाबा मंदिर के पिछवाड़े अपनी जमात की एक हाईलेवल मीटिंग मैंने बुला ली। मामला छोटा तो था नहीं, सो चर्चा जरूरी थी। आख़‍िर ख़तरे से पहले कुत्तों की नाक न फड़के और कान न खड़े हों, तो फिर उसका कुकुर बिरादरी में रहना किस काम का। ये कौनो मजाक तो है नहीं कि दूसरा मुलुक से कोई दस आकर सौ ठो की लाश बिछा जाए और कुकुर बिरादरी मुंह फाड़े देखता रहे। (माफ कीजिएगा, दरअसल गुस्से में ज़बान से देसी बोली फूटने लगती है…) खैर, मीटिंग में दिल्ली के चारों कोने से कुत्ते पहुंचे। भाईचारे के नाते एनसीआर के गुड़गांव और नोएडा से भी कुछ कुत्ते आ पहुंचे थे। मुद्दा तो बस एक ही था – बंबइया कुत्तों का ग़ैर-ज़‍िम्मेदाराना रवैया। तय हुआ कि दिल्ली से कुत्तों का एक शिष्टमंडल मुंबई जाएगा और वहां का जायज़ा लेगा। अगर सचमुच वहां के कुत्तों से चूक हुई होगी, तो उन पर तत्काल कार्रवाई भी की जाएगी ताकि एक सबक मिले और एक मिसाल भी कायम हो। हमने तय किया कि इस मामले में आदमियों की तरह कोई जांच कमिटी बिठाकर बरसों का इंतज़ार नहीं किया जाएगा। फ़ैसला तुरत-फुरत किया जाएगा। अभी हमारी मीटिंग ख़त्म भी नहीं हुई कि एक कुत्ता हांफता-हांफता पहुंचा और उसने मेरे कान में कुछ फुसफुसाया। सुनते ही मेरा पारा सौ के पार चला गया। उसने जो कहा उसका लब्‍बोलुआब ये था कि साउथ में कौनो कम्युनिस्ट चीफ मिनिस्टर हैं जो कहते हैं कि शहीदों के घर कुत्ता भी नहीं जाता। बस फिर क्या था, मीटिंग का टॉपिक चेंज। बैंगलोर के संदीप उन्नीकृष्णन सा’ब ने मुंबई में लोगों की जान बचाने में अपनी जान झोंक दी और ये नेताजी बजाय सहानुभूति जताने के कुत्तों का चरितर बांच रहे हैं। खबरदार, एक शहीद की इज़्ज़त करना नहीं जानते हो तो मत करो पर कुत्तों की बेइज़्ज़ती मत करो नेताजी। (हमारी बिरादरी वाले ठीक ही कहते हैं कि आदमियों को ठीक तरह से अपना नेता चुनना आता ही नहीं…) आख़‍िर शहीदों के घर कुत्ते क्यों न जाएं? आदमियों के नेता से कुत्तों को देशभक्ति का कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। कौन माई का लाल है हमें रोकने वाला। मीटिंग में तय हुआ कि मुंबई दौरा कैंसिल किया जाए। तुरंत हम कुत्तों ने तय किया कि बैंगलोर कूच किया जाएगा। कोई शिष्टमंडल नहीं बल्कि पूरी जमात जाएगी और बैंगलोर जाकर संदीप भइया को सैल्यूट मारेगी। उसके बाद लगे हाथ केरल भी हो लेने का हमारा इरादा है।

(लेखक आईआईएमसी के पासआउट हैं और दिल्ली में टीवी पत्रकार हैं। इनसे sandybaba81@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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