वो तो एक क़ातिल रात थी…
♦ परशुराम नागर
(भोपाल गैस कांड की यह कहानी 25 साल पहले उस हादसे का शिकार बने परशुराम नागर ने बयान की है। गैस का असर अब तक उनके शरीर पर है। उसकी वजह से वे बोल नहीं पाते सिर्फ इशारों से ही अपनी बात बयां करते हैं। उनकी पत्नी ने इशारों को समझकर यह कहानी सुनाई है।)

दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से पीटने की आवाज़ सुनकर मेरी नींद खुली। रात के लगभग तीन बज रहे थे। समझ में नहीं आया इतनी रात कौन दरवाजा पीट रहा है? क्या आफत आ गयी? डरते, सहमते दरवाजा खोला तो सामने वाले बद्रीप्रसाद की मां को खड़ा पाया। ‘जल्दी घर से निकलो किसी ने मिर्ची जला दी है, आंखें जल रहीं हैं।’ माजरा समझ नहीं आया, बाहर सैकड़ों लोग सड़क पर नज़र आये। कोई इधर भाग रहा था, कोई उधर। आवाज़ सुनकर गंगा बाई जाग गयी। बगैर कुछ सोचे हमने चारों बच्चों को लिया और भीड़ के साथ चलने लगे। घर में ताला लगाने की भी सुध नहीं रही। भाई का परिवार भी साथ हो लिया।
सड़क पर आदमी, औरत और बच्चों के काफिले थे। कोई अपने बच्चे को संभाल रहा था, तो कोई अपने बूढ़े मां-बाप। मेरा घर कार्बाइड कारखाने के ठीक सामने ही है। पर पता नहीं था कि कारखाने की गैस रिस गयी है। लोग भागे चले जा रहे थे। सड़कों पर उल्टियां करते लोग। हर किसी को अपनी जान बचाने की पड़ी हुई थी। भागदौड़ में मेरा साथ गंगा से कब छूट गया, पता ही नहीं चला। मुझे लगा कि मेरे भाई का बेटा संतोष सड़क पर गिर गया है। भगदड़ में कहीं वह दब न जाए, यह सोच कर मैं उसके ऊपर लेट गया।
पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य मेरे चारों बच्चों शोभा, संगीता, दीपक और सरिता को लेकर आगे निकल गये। भाई का बेटा संतोष कब बिछड़ गया पता ही नहीं चला। भाभी गोमती बाई शौच के लिए रुक गयी थीं, वहीं शायद साथ छूट गया। बाद में जब संतोष को तलाश किया तो मिट्टी में दबी उसकी गरदन ही दिखाई दी। संतोष सदा के लिए चला गया था। हम संतोष को उसी हालत में छोड़ कर आगे बढ़ गये। लक्ष्मी टाकीज के पास हमारे कुछ परिचित रिश्तेदार रहते थे। उनके पास पहुंचे, तो वे भी घर छोड़कर जा चुके थे। भाई की बेटी सारिका भी मरणासन्न हो गयी। एक घंटे बाद उसे होश आया। हम आगे बढ़े। नये भोपाल की तरफ।
लोग सड़क पर चलते किसी वाहन को देखते तो अपनी जान बचाने के लिए उस पर लटक जाते। भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि वाहन सड़क पर चलाना भी मुश्किल था। भीड़ देखकर लोग अपने वाहन छोड़कर ही सड़कों पर दौड़ने लगते। कोई बैरागढ़ की तरफ भाग रहा था, तो कोई टीटी नगर की तरफ। समझ में किसी को नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है? किसी ने कहा हिंदू-मुस्लिम दंगा हो गया है। कोई कुछ कहता। हमेशा पर्दे में रहने वालीं मुस्लिम समुदाय की महिलाएं भी अपनी इस प्रथा को भूलकर भाग रहीं थीं। आंखें इतनी तेज़ जल रही थीं कि रास्ते पर एक क़दम चलना मुश्किल था। जहां भी पानी दिखता, लोग आंखें धोने लगते।
मुझे पता ही नहीं चला – मैं कब बेहोश होकर सड़क पर गिर गया। नाते-रिश्ते सभी कुछ छूट गये थे। नूर मियां के कारण मेरी जान बच गयी। सुबह आंख खुली तो अस्पताल में था। चारों तरफ लोग पड़े तड़प रहे थे। एक-एक पलंग पर दो-दो लोगों को लिटाने के बाद भी जगह कम पड़ रहा थी। लोग ज़मीन पर लेट गये। जिनके नाते-रिश्तेदार साथ थे, वे डॉक्टरों के पीछे भाग रहे थे। ‘डॉक्टर साहब मेरे भाई को देख लो, मर जाएगा’। मैंने देखा एक महिला अपने दुधमुंहे बच्चे को गोद में लेकर डॉक्टर से उसे बचाने की मिन्नतें कर रही थीं। यहीं मुझे पता चला कि रात को कार्बाइड कारखाने से गैस रिस गयी थी।
कार्बाइड कारखाने की गैस के बारे में हमने पहले भी सुना था। मोहल्ले के कई लोग इस गैस के कारण बीमार रहते थे। इस गैस के कारण लोगों के मरने की ख़बरें भी चलतीं रहती थीं। मुझे लगा कि कार्बाइड कारखाने के आसपास छोला रोड पर शायद ही कोई बचा होगा। पत्नी और बच्चों को लेकर चिंता थी। संतोष तो हादसे का शिकार पहले ही हो गया था। रात का मंज़र याद आते ही आंखों से आंसू निकल पड़े। जो भी परिचित दिखता, उससे अपने परिवार के बारे में जानने की कोशिश करता।
पत्नी गंगा खुद ही ढूंढते हुए अस्पताल पहुंच गयी। उसे अपनी आंखों से देख लिया तो सुकून मिला। बच्चे भी सलामत थे। पूरे अस्पताल में रोने और चीखने की आवाज़ें आ रही थीं। दवाइयां थी नहीं। सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। अस्पताल में ऑक्सीजन गैस के सिलेंडर नहीं थे। कई लोग अस्पताल में खाना और कपड़े बांट रहे थे। हमने घर जाना ही बेहतर समझा। संतोष की अंत्येष्टि भी करनी थी।
छोला विश्राम घाट का नज़ारा तो दिल दहलाने वाला था। परिवार के लोग मुझे सहारा देकर यहां तक लाये थे। सांस लेने में अब भी तक़लीफ़ हो रही थी। डॉक्टर ने जो दवा दी, उसका कोई असर नहीं हुआ था। विश्राम घाट पूरी तरह से लाशों से पटा हुआ था। चिता जलाने और संस्कार करने लायक जगह भी वहां नहीं थी। लाशों की ढेर लगाकर उन्हें जलाया जा रहा था। विश्राम घाट पर कोई कर्मचारी भी मौजूद नहीं था, जो लकड़ी की व्यवस्था करता। विश्रामघाट पर भी रिकार्ड रखने की व्यवस्था नहीं थी। बच्चों को छोटा सा गड्ढा खोद कर ज़मीन में गाड़ दिया गया। सिर जमीन के ऊपर साफ दिख रहे थे।
मैं मलेरिया विभाग में चपरासी की नौकरी करता था। कुछ दिनों ठीक चला, फिर गैस ने अपना असर दिखाना चालू कर दिया। चंद क़दम पैदल भी चलो तो सांस भरने लगती। यही समस्या बच्चों को भी है। वे अब बड़े हो गये हैं। तीन साल तक तो मैं ऑफिस जाता रहा। काम करना मुश्किल है। लकवा भी लग गया है। बगैर सहारे के ज़िंदगी नहीं जी सकता। अब तो ज़िंदगी बोझ लगने लगी है।
दैनिक निवृति के कार्य भी बिस्तर पर होते हैं। वो तो कातिल रात थी, जिसने लोगों की ज़िंदगी को जीती-जागती लाशों में बदल दिया है। बेटा भी हमेशा बीमार रहता है। आमदनी का कोई जरिया नहीं है। मुआवज़े के पैसे से पक्का मकान क्या बनाया, गरीबी रेखा के नीचे वाली सूची से भी नाम कट गया। न जाने गैस से आयी इन मुसीबतों का अंत कब होगा?
(दैनिक हिंदुस्तान के लिए दिनेश गुप्ता की प्रस्तुति)













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