कलाओं पर ये कैसा पहरा…?
♦ उत्तमा दीक्षित

आर्ट और न्यूड… दोनों के रिश्ते पर तमाम बार सवाल उठते हैं और यदि फीमेल आर्टिस्ट न्यूड पेंट करे तो जैसे बवंडर ही मच जाता है। लेकिन कोई समझना नहीं चाहता की कैनवास पर कब, क्या और कैसे पेंट करना है, यह आर्टिस्टिक मूड डिसाइड करता है। कैनवास सामने आने पर कलाकार सोच-समझकर काम नहीं करता, वो तो होने लगता है। कला में दिल का प्रयोग होता है, यह दिल से निकलती है न कि दिमाग से। ज़्यादा बौद्धिकता से संवेदनाएं मर जाती हैं।
हर आर्टिस्ट के लिए यह ज़रूरी है कि वह शरीर के हर अंग की बनावट को जाने। फ्रंट, बैक, साइड पोश्चर, बैठे, खड़े और लेटे की पोजीशन की डीप स्टडी किये बिना फिगरेटिव पेंटिंग की कल्पना मेरी समझ से परे है। एनाटॉमी स्टडी करने के लिए स्टूडेंट्स को किताबों का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि इंडिया में न्यूड मॉडल उपलब्ध नहीं हो पाते। आर्टिस्ट का फंडामेंटल बेस ही यही है कि जैसे वह नेचर की प्रत्येक चीज़ को आब्ज़र्व करता है, वैसे ही नेचर के ही पार्ट मेल-फीमेल को बनाना सीखे। स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे। हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा। न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से। स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं। डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो। मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। उसी तरह जैसे सामने कोई चीज़ रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो।
प्रसव के समय छटपटाती स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका डॉक्टर मेल है या फीमेल। इस अर्द्धनग्न अवस्था में उसे तमाम लोग देखते हैं। यह नये सृजन के लिए होता है इसलिए उसमें कहीं वल्गैरिटी नहीं मानी जाती। नवजात का स्वागत उल्लास और उमंग से किया जाता है लेकिन जब यही सृजन एक आर्टिस्ट करता है, जिसमें उसकी कलाकृति का फिगर यदि न्यूड है, तो विवाद शुरू हो जाता है। कला के क़द्रदान तो एप्रीशिएट करते हैं, लेकिन सवाल उनमें से भी कुछ के होते हैं। अलग बात है कि पेंटिंग देखने वाले की मानसिकता कैसी है। कुछ लोग तो बुर्के में पूरी तरह से ढंकी महिला को भी जैसे किसी अलग किस्म की अपनी पारदर्शी आंखों से न्यूड देख लेते हैं। कलाकारों के बारे में एक आम टेंडेंसी है कि यदि मेल आर्टिस्ट कोई फीमेल न्यूड बना रहा है तो ज़रूर अपनी पत्नी या प्रेमिका को मॉडल के रूप में यूज कर रहा होगा और फीमेल आर्टिस्ट ऐसा न्यूड़ फिगर बना रही है तो वह अपना ही फिगर बना रही होगी। फिर उस फीमेल आर्टिस्ट को देखने का नज़रिया ही बदल जाता है।
उन्हें इस तरह के कमेंट्स का सामना करना पड़ता है। कुछ तो दबे-छिपे पूछ भी लेते हैं कि क्या आपने खुद को पेंट किया है। जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवास पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज़्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। ग्वालियर में इस सीरीज़ की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला। स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझसे पूछा गया। मैं परेशान और दुखी थी। एक कट्टरपंथी संगठन के लोग इन्हें नष्ट करने की धमकी दे रहे थे। हज़ारों-लाखों आर्टिस्ट न्यूड पेंटिंग करते हैं, मैंने कुछ नया नहीं किया था। कला हो या साहित्य या कोई और फील्ड, महिलाओं का हाल एक ही है। वो कुछ अलग करेंगी तो निश्चित रूप से आलोचनाओं में घेरी जाएंगी। और शायद यही वजह है कि महिला कलाकार पुरुषों से आगे नहीं निकल पातीं। यहां मैं यह भी बताना ज़रूरी समझती हूं कि कला की शिक्षा लेने वालों में लड़कों से ज्यादा लड़कियां होती हैं। यह मुद्दा इतना आसान नहीं कि जल्दी सिमट जाए लेकिन विरोध की परवाह किये बगैर महिला कलाकार अपने रास्ते पर चलती रहीं तो सफलता मिलना तय है। साथ ही मुझे लगता है कि आर्ट एंड लिट्रेचर के प्रति समझ, संवेदना और खुले दिमाग की ज़रूरत भी है। (कला जगत से साभार)
(उत्तमा दीक्षित। काशी में जन्म। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई। बचपन से पेंटिंग का पैशन। करियर की शुरुआत आगरा कॉलेज में अध्यापन से। फिलहाल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर। उनसे uttama.dixit@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
मोहल्ला लाइव पर उत्तमा की एक और पोस्ट : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग









आप आर्टिस्ट हैं… नजरिया आज लोगों जैसा भी होगा और ज्यादा नहीं भी होगा… जाहिर हैं साधारण होकर भी दृष्टि आसाधारण होगी… इससे पहले भी आपका लेख शायद मोहल्ला पर ही पढ़ा था या फिर बटुकनाथ-जूली के ब्लॉग पर… वहां भी हिम्मत भरे इस नज़रिए का सम्मान किया था यहाँ भी करता हूँ… अच्छी सोच, मुह बंद करने वाले तर्क और परिपक्व दृष्टि…
najariya dekhne walo ka hota hai sab kalatmak rup se kabhi bhi nahi soch sakte hai…. sabse bada sawal ye peda hota hai ki agar 1 artist apne dimag ki aakriti canvas par nahi utar sakta hai to kon utarega aap ya hum…. mai nahi sanjta hu ki agar mere haath mai brush aur canvas aa jata hai to mai painting kar sakta hu…. ye kaam 1 artist ka hai aur use hi karna chahiye….
uttma ji jindgi mai to aise batoh se utaar chadaaw ayenge. aur is tarah ki baaton par sawal par shayad hi in sawalo ka koi jawab hai. aap ek kalakaar hai aur aapko in sab baato se koi fark nahi hona chahiye
आपने, हमने और बहुत सारी ने लडकी के रूप में जन्म लिया उअर ज़ाहिर है कि यह न हमारी च्वायस थी न उनकी ही जो लडके के रूप एं पैदा हुए. मगर स्त्री पर सवाल के नंगे तीर सदा से छोडे जाते रहे हैं. स्त्री हो कर स्त्री के लिए? यह बहुत सामान्य कमेंट हैं. मतलब सीधा है, तब नारी देह के आकेरण, उद्वेलन, आरोहण, अवरोहण का एकाधिकार छिन जाता है ना. स्त्रियों को हतोत्साहित करने का मौका क्यों छोडा जाए. मेरी भी कहानियों पर यही उद्गार मिले हैं- स्त्री होकर ऐसा वर्णन?’ तो इसके लिए घबडाना या दुखी होना ऐसे लोगों के उत्साह को और बढायेगा. उन्हें देखिए, जो आपके और आपकी कल के साथ हैं. सभी पुरुष बुरे नहीं होते, यह आप लोगों की प्रतिक्रियाओं से समझ गई होंगी. उनकी बातों को एंजॉय कीजिए और अपने काम में मस्त हो कर लगे रहिए.
आपके विचार से सहमति है मेरी। पुरुष मानसिकता है ही इस तरह की। आपकी कला बताती है कि आपने अच्छे प्रयोग किए हैं। लेखन और उसकी शैली भी उम्दा है।
मुझे अच्छा लगता है जब कोई स्त्री दबंगई से अपने विचार रखती है। निश्चित ही महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ है और महिलाओं ने अपने विचारों में क्रांति भी लाई हैं। बेशक, आप कलाकारों को सृजन करते वक्त तमाम बातों का ख्याल रखना होता है लेकिन कला पर इसका असर न हो, यह बहुत जरूरी है। आपकी कामायनी सीरीज भी मैंने देखी और पाया कि आप बेहतरीन सृजन कर रही हैं।
आपके विचार बेहतरीन हैं। मेरी शत-प्रतिशत सहमति है। कलाकार पर किसी तरह की इच्छा थोपना गलत है।
good, i agreed with your thoughts. keep it up.
कलाकार के दिल की बात अच्छी लगी। बिल्कुल सटीक कहा गया है इसमें। हिंदुस्तान चाहें कितना ही आगे बढ़ ले, कुछ पोगापंथी पसंद नहीं करते यह सब। पर कला पर तो पहरे लगने नहीं चाहिये बिल्कुल।
जल्द ही आप चर्चित होने जा रही हैं, वैसे शुरुआत आपने कर दी है। आपकी हर टिप्पणी पर गरम-गरम बहस होने लगी है। मोहल्ला के साथ सरस पायस, ताना-बाना जैसे प्रतिष्ठित ब्लाग पर आपके ब्लाग कलाजगतडॉटब्लागस्पॉट़डॉटकॉम का लिंक देखकर भी यही लगता है। लेकिन सार्थक लेखन है इसलिये यह बहस और प्रसिद्धि की पात्र नजर आ रही हैं आप। आपका ब्लाग भी उम्दा है। बेहतर लेखन और चित्रण के लिए मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें। पब्लिक सर्विस से जुड़ा रहा हूं मैं। बनारस में मेरा घर भी है।
बधाई हो उत्तमा जी, आपका यह लेख भी कम कामयाब नहीं है।
स्त्री में पुरुष…!!!
सौंदर्यबोध…!!!
और,
पितृसत्ता और पुरुषवाद (ब्राह्मणवाद…!!!) पर आधारित समाज की मनोसंरचना…!!!
-भागीदारों से विचार का आग्रह।
उत्तमाजी के समर्थन के साथ-साथ शेष जी की बात भी विचारणीय है। अभी-अभी विभारानी जी का लेख ‘नंगई को यहीं से देखो’ छपा है। मेरा सोचना था इस विचारोत्तेजक और साहसिक लेख पर बहस की सूरत में कमेंटस् की झडी लग जाएगी। मगर
पेंटिंग की समझ नहीं है पर पहले लुक में कुछ होता है जो प्रभावित कर ही लेता है. आपका काम बेहतरीन है.
मोहल्ला पर अक्सर लिखता हूँ पढ़ता हूँ। लेकिन जो आपने लिखा और जो चित्रकारी जिंदादिली से आप ने अपनी चित्रकारिता में दिखाई सचमुच काबिले तारिफ हैं। आपने समाज को ये बताया कि देखने वाले की नजर अच्छी होनी चाहिए….. मुझे आपके बनाए चित्र देख कर राम तेरी गंगा मैली का वो दृश्य याद आ गया जिसमें दुखारी महिला जो उस फिल्म की नायिका हैं अपने बच्चें को अपने स्तनों से दूध पिला रही हैं जाहिर तौर पर उस दृश्य में उस नायिका के स्तन भी साफ साफ देखे जा सकते हैं। लेकिन फिल्म का वो दृश्य जिस कलाकारी और मार्मिकता से फिल्म बनाने वाले ने फिल्माया हैं उसे देखकर आखे भर आती हैं और चाह भी उसमें आप अश्लिलता नहीं ढूढ पाएगें। आप सचमुच बहुत अच्छा लिखती हैं और जितना अच्छा लिखती हैं उतनी ही बखूवी से कोरे कागज पर जिंदगी के सच को पेंट बर्श के माध्यम से ऊकेरती हैं।
आनंद तिवारी जी की बात से शत-प्रतिशत सहमति है मेरी भी। वाकई जितना सुंदर कला सृजन का अंदाज है, वैसे ही विचार भी। निश्चित रूप से आपके विचार स्वागतयोग्य हैं।
[...] रखा, फिर उनकी ये सोच भी जाहिर हुई कि कलाओं पर पहरे क्यों लगते हैं? कुछ अरसा बाद जयपुर में हुई एक ख़ास कला [...]
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