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नंगई को यहां से देखो


♦ विभा रानी

MaqbolFidaHussainFemaleNude

क्या हो गया अगर अदालत ने नंगई के मामले में मिलिंद सोमण और मधु सप्रे को बरी कर दिया? अरे, नंगई तो कुदरती देन है। है कोई ऐसा, जो यह दावा कर ले कि वह पूरे कपड़े पहने पैदा हो गया था? ऊपरवाला तो समदर्शी है। उसने जानवरों, चिड़‍ियों को भी नंगा पैदा किया और इंसानों को भी। जानवर और पक्षी तो इसे प्रकृति की देन समझ कर चुप बैठ गये और नंगे घूमते रहे। मगर इंसान की वह फितरत ही क्या, जो दूसरों की बात मान ले? ना जी, आपने हमें नंगा पैदा किया तो किया, मगर हम तो कपड़े पहनेंगे ही पहनेंगे। और केवल पहनेंगे ही नहीं, इसे नंगई के ऐसे सवाल से जोड़ कर रख देंगे कि लगेगा कि बस देह की सार्थकता इतनी ही है कि इसे पूरे कपड़े से ढंक कर रखो। नंगा तो मन भी होता है, मगर मजाल है कि मन के नंगेपन पर कोई बोल दे या कोई विवाद खड़ा कर दे। यह मानुस देह मन से भी इतनी बड़ी हो गयी है कि सारी की सारी शुचिता का ठीकरा इसी पर फूटने लगा है।

आप कहते हैं कि इससे और भी व्यभिचार बढ़ेगा। दरअसल इससे नज़रिया और उदार हुआ है। हम बचपन में मेले ठेले में पान की दुकान पर फ्रेम मढ़ी तस्वीरें देखते थे, उन तस्वीरों में एक महिला या तो केवल ब्रा में रहती थी या उसे ब्रा का हुक लगाते हुए दिखाया जाता था। ये तस्वीरें इसलिए लगायी जाती थीं ताकि पान की दुकान पर भीड बनी रहे। लोग भी पान चबाते हुए इतनी हसरत और कामुक भरी नज़रों से उन तस्वीरों को देखते थे कि लगता था कि यदि वह महिला सामने आ जाए तो शायद वे सब उसे कच्चा ही चबा जाएं। मगर अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया या महानगरीय सभ्यता, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता। कोई देख ले तो उसे असभ्य माना जाता है। सामने दिखती चीज़ के प्रति वैसे भी आकर्षण कम या ख़त्म हो जाता है। हमारा दावा है कि नंगई खुल कर सामने आ जाए, तो लोग वितृष्णा से भर उठेंगे। अच्छा ही तो है, कम से कम इसको ले कर लोगों के मन की कुंठाएं तो निकल जाएंगी, जिसका खामियाज़ा लड़कियां, स्त्रियां यौन यातनाओं के रूप में भोगती हैं और कभी कभी लड़के और पुरुष भी।

लोग कहते हैं कि नंगई पश्चिम की देन है। तो ज़रा आप अपने महान हिंदू धर्म और उसके देवी-देवताओं को देख लें। पता नहीं, सभी देवताओं को कितनी गर्मी लगी रहती है कि देह पर तो महिलाओं की तरह हज़ारों ज़ेवर चढ़ाये रहेंगे मगर यह नहीं हुआ कि देह पर एक कमीज़ ही डाल लें। उत्तरीय भी ऐसे डालेंगे कि उसमें पूरी की पूरी देह दिखती रहे। देवताओं की इस परंपरा का पालन केवल सलमान खान ही कर रहे हैं। देवियां कंचुकी धारण किये रहती हैं। लेकिन कोई भी हीरोइन देवी की बराबरी आज तक नहीं कर सकी हैं। शायद करने की हिम्मत भी नहीं है। भगवान शंकर या तो नंगे रहते हैं या एक मृगछाला धारण किये रहते हैं। भगवान महावीर तो दिगंबर रहकर दिगंबर संप्रदाय की स्थापना ही कर गये। हम सब बड़े धार्मिक और बड़े सच्चे हिंदू हैं तो क्यों नहीं पूछते इन देवी-देवताओं से कि आपके इस ताना-बाना के पीछे कौन-से जन कल्याण का भाव छुपा था? आज लोग कम कपड़े पहनने लगे तो बुरे हो गये?

इससे अच्छे मर्द तो आज के हैं कि वे पूरे कपड़े तो पहने रहते हैं। अब कोई फिल्मवाला कभी किसी हीरो या हीरोइन को नंगा दिखा देता है तो इसका यह मतलब थोड़े ही न होता है कि वह नंगई का समर्थन कर रहा है। फिल्मवाले तो वैसे भी समय से आगे रहे हैं। वे जान जाते हैं कि लोग क्या चाहते हैं? औरत की नंगई देखते देखते लोग थक गये। फिर दर्शक में महिलाएं भी तो हैं। क्या उनके मन में इच्छाएं नहीं होतीं? तो फिल्मवाले अपना दर्शक वर्ग क्यों खोएं?

आप पोर्न की बात करते हैं तो यह तो भैया शुद्ध व्यवसाय है। बाज़ार का सिद्धांत है कि जिस चीज़ की खपत अधिक होती है, उसकी मांग अधिक होती है। पोर्न साहित्य का धंधा फूल फल रहा है तो हमारी ही बदौलत न? उस नंगई को, जिसे हम सरेआम नहीं देख पाते, अपने एकांत में देख कर अपनी हिरिस बुझा लेते हैं। यह देह व्यवसाय जैसा ही है। अगर लोग इसकी मांग नहीं करेंगे तो क्या यह धंधा चलेगा? लेकिन सवाल तो यह है कि हम अपने को दोष कैसे दें?

रह गयी बात नंगई और कलात्मकता की, तो माफ कीजिए, कितनी भी कलात्मक कृति क्यों न हो, लोगों को उसमें नंगई नज़र आती ही आती है। अगर नहीं आती तो क्या हुसैन की कलाकृति को लोग यूं जला डालते और उन्‍हें इस क़दर बिना सज़ा के ही देशनिकाला की सज़ा दे दी गयी होती? सच तो यह है कि हम सभी के मन में एक नंगापन छुपा हुआ है, जो गाहे बगाहे निकलता रहता है। हम अपनी कुंठा में इस पर तवज्जो दे कर इसे ज़रूरत से ज्यादा महत्व देने लगे हैं। अरे, जब कोई पागल हो कर कपड़े फाड़कर निकल जाता है, तब आप उस पर कोई ध्यान नहीं देते, तो इस पर क्यों दे रहे हैं?

और एक बात बताऊं? अपना नंगापन भले अच्छा न लगे, दूसरों की नंगई बड़ी भली लगती है। चाहे वह मन की हो या तन की। अब आप ही देखिए न, मिलिंद सोमण और मधु सप्रे के मुक़दमे के फैसले की आड़ में अपने मोहल्‍ले में क्या सुंदर सुंदर तस्वीरें चिपका दी गयी हैं कि मन में आह और वाह दोनों की जुगलबंदी चलने लगे। कोई मोहल्‍लेवाले से पूछे कि क्या आप अपनी ऐसी नंगी तस्वीरें इस पर चिपका सकते हैं? दूसरों का नंगापन है न, तो देखो, मज़े ले ले कर देखो, सिसकारी भर भर कर देखो, आत्ममंथन से मिथुन तक पहुंच गये, तो इसमें न तो तस्वीर खींचने या खिंचानेवाले का दोष है न इन तस्वीरों को इस पोस्ट के साथ लगाने वाले का। लोग भी खूब-खूब इस साइट पर पहुंच रहे हैं, इसे देख रहे हैं, जहां से इस लेख को लिया गया है, उस तक पहुंच रहे हैं। और हम नंगई के खिलाफ हैं। जय हो, तेरी जय हो।

Vibha-Rani(विभा रानी। हिंदी और मैथिली की सुपरिचित लेखिका। रंगकर्मी। नाटककार। मुंबई में रहती हैं और अवितोको नाम की एक साम‍ाजिक संस्‍था का संचालन करती हैं। मूलत: मिथिला क्षेत्र से आने वाली विभा रानी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। छम्‍मकछल्‍लो कहिस उनका मशहूर ब्‍लॉग है।)


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7 Responses

  1. Ravindra Singh 9350221551 says:

    agar gandagi hatani hi hai to aap sabse pahale tv channel ko hataiye jo ye sab dikhata hai ye to samaj ka banaya bhram hai ki kapde pahanna hi hai agar samaj ka ye niyam hota ki kapde nahi pahanna hai tab kisi ko koi dosh nahi deta hai….. ab samay badal raha hai samay ke saath chalne ki aadat agar hamare is samaj ko nahi hai to hame samaj ko bhi upgrade kar lena chahiye….. aaj hum window 95 pe kaam kyo nahi karter hai ab hum vista pe kaam karne ka sochte hai akhir kyo….. jab hum dusri chijo ko upgrade kar rahe hai to phir samaj ko kyo nahi…… aur jaha tak nangai ki baat hai to ye to dekhne ka najariya hai…. 1 kalakaar use apni kala ki nazar se dekhega aur 1 choti soch wala use sexy figure…. to ab firk aap hi sochiye

  2. औरतें ख़ुद खुलकर ऐसे ही लिखेंगी तो बात बन जाएगी। मर्द को तो ये दौड़ा-दौड़ाकर राजेंद्र यादव बना देते हैं। अपना ‘पंजाबकेसरीत्व’ दिखाई नहीं देता जिसमें बाॅक्स में जितने ज्यादा ‘ऋषितुल्य’ संपादकीय होते हैं बाॅक्स के बाहर उससे कई गुना ज्यादा नंगे फोटो लगे होते हैं। 20-25 साल से तो हमीं देख रहे हैं। हमारे दादा-नाना ने भी देखे हों तो कोई बड़ी बात नहीं। तबसे तो संस्कृति को कोई ख़तरा नहीं हुआ। असल बात यह है कि जैसे ही कोई चीज़ विचार और तर्क के साथ आती है, इनकी ‘सभ्यता’ कांपने लगती है।

  3. narendra says:

    kathni or karni me bohot anter hai,milind ko 1k brand ka parchar karna tha or wo model hai……sare samajh pr ye lagu nahi ho sakta,

  4. naresh mittal says:

    nice article., ye such hai ki agar koi nanga aadmi ya ladki sadak per dikh jay to koi notice bhi nahi karta. ladkiyoa dwara kum kapde pahanena ka ye achha sar hai ki logo ne notice karna band kar diya ya kum kar diya.

  5. aarushi singh says:

    mahilaon ne to khulkar likha hi hai lekin ise banane wale to porosh hain chahe baat is tasvir ki ho ya baat ajanta alora ki ho, is tarah ke sonch ki utpatti to poroshon ke dimaag se hi ho rahi hai,… jin batoon ko porsoon ne badhawa diya,.., agar aaj mahilaye wo kar rahin hai,to kis baat ki sharmindgi ??/ owr kis baat ki chhinta kashi,

  6. rohit says:

    i am fully agree with vibha’ post and sanjay grover’s comment.things are not vulger its our brain our eyes who seek vulgerity in everything where we want to c it.
    have u ever feel that we dont c nudity or vulgerity in our people who we love i mean our sister, bhabhi, mom etc. but when we c others sister, bhabhi etc we try to c nudity or vulgerity to satisfy our lust.
    these r people who praise krishna and radha but cant c /tolerate a couple decently loving eachother.
    this is double mentility of our indian. we cant c other happy. we find joy in others sorrow.
    we try to enter others bedroom. but want to keep our safe.

  7. MUKESH KUMAR says:

    09899973751 (Mukesh kumar)
    maine aaj ye article pada aur kar khushi bhi hui ki logon ne kuchh different sochna shuru kar diya hai lekin us khushi se bhi jyada mujhe herani hui wo bhi in maidum ke bare mein jo insanon ki tulna janwaron se aur panchhiyon se kar rahi hein are maidum shayad is baat ko aap bhi maanti hongi ki bhagwan ne insaan ko sabse se baad mein banaya tha ye soch kar ki ye mere dwara banayi gayi sabse khoobsurat krati hogi. Bhagwan ne ye isliye socha tha ki insan ko bhagwan ne dimag diya acchhe bure ki pahchan di, insan ne samaj banaya, sabhyata banayi, rishtey natey banaye,aur maidum ye sari baatein insaan hi kar sakta tha na ki jaanwar to aap insano ki tulna jaanwaron se nahin kar sakti hein.
    mana ki bhahut si buraiyan bhi hein yahan par to usmein aap bhagwan ko dosh nahin de sakti hein ismein galti humari hi hai humari soch ki hai. mein aap ki hi baat karta hoon aap jaanti hein ye sari baatein aur shayad aap ke alawa bahut se logon ki bhi ye soch hogi to use thik karne ke liye aap kya kard rahi hein mera to ye manana hai ki agar mujhe koi system pasand nahin hai to ya to mein khul kar us system ke samne aa jaun system se ladne ke liye ya phir mein bhi us system ka hi hissa ban jaaun aur mein aur aap us system ka hissa hi hein ye 2-4 baatein website par dal dene se system nahin badalta hai aur kitne log hein jinhone ye baat padi hogi shayad 100-200 log bhi mushkil se honge baat unlogon ki nahin hai jo net par baith kar apni marji se nude photo ya kuchh bhi dekh lete hein ya phir kisi bade city mein rahte hein, maidum baat aati hai un around 65-70% villagers ki jahaan par aaj bhi koi ladki jeans – top pahan kar chali jaaye to ladke kya unke apne hi taane marne lag jaate hein, maidum baat karni hai to un logon ki kariye jo Delhi jaise matro city mein bhi kisi bus mein kisi bhi ladki ko chhedne lag jaate hein aur maidum wo log ye nahin dekhte hein ki is ladki ne kya pahan rakha hai, kyon ki unka roop rang bhale hi insano jaisa ho lekin wastav mein wo log asli jaanwar hein haaan agar aise system ke khilaf agar aapko ladna hai to mein aap ke sath hoon (my no. is also there) naa ki in fijul ki baaton par bahas karne ke liye ki kisne kya pahna hai, bhagwan kya pahante the, ya wo kapde kyon pahane hue hai… ha ha haa haaa. baat aaj ki ki jaaye ki aaj kya hai.

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