भोपाल गैस त्रासदी : जनविज्ञान के सवाल
♦ दीपाली शुक्ला
1984 की अंतिम घड़ी में भोपालवासियों पर गैस की मार साबित कर गयी है कि हम अपने आस्तीनों में सांप पालते रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ठेकेदारों ने मौत का तांडव रचा – हो सकता है यह केवल पूर्व अभ्यास हो। मानव जीवन को कुछ ही क्षणों में किस प्रकार मौत की खाई में ढकेला जा सकता है, इसका पूर्व परीक्षण किया गया हो।
एक भुक्तभोगी भोपालवासी
रविवार की रात खासी ठंड थी और राजधानी भोपाल के लोग रजाइयों में दुबके थे। आधी रात के एक घंटे के बाद जो जागे, उन्होंने घुटन-सी महसूस की। आंखों में चुभन-सी हो रही थी। सोमवार की सुबह मनहूस दिन लेकर आयी। यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारखाने के एक टैंक में रिसाव होने से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक ज़हरीली गैस शहर की हवा में फैल गयी थी और नींद से जागा शहर यातनाओं के तहखाने में था।इस कारखाने में पहली बार ऐसी दुर्घटना नहीं हुई थी। 1982 के अक्तूबर माह में भी मिथाइल आइसोसायनेट का रिसाव हुआ था, जिससे आसपास के इलाक़े के लोग प्रभावित हुए थे। इस पूरी घटना को कंपनी के वफादार अधिकारियों ने दबा दिया। इसी साल के फरवरी माह में भी हादसा हुआ था। तब इस पूरे हादसे के बारे में साप्ताहिक अखबार रपट में पर्दाफाश किया गया था।
मिथाइल आइसोसायनेट गैस क्या है? कितनी घातक है? इसके बारे में बताने के साथ ही इस पर भी चर्चा की गयी है कि यूनियन कार्बाइड में किस तरह से ज़हर बनाया जाता था। कीटनाशक संयंत्र में सुरक्षा साधन क्या थे? 1984 में जो दुर्घटना हुई, उसके संभावित कारण क्या थे? सुरक्षा में लापरवाही को लेकर चर्चा की गयी है। महत्वपूर्ण है कि भोपाल के कारखाने में बन रहे सेविन कीटनाशक की मांग लगातार घट रही थी, जिसके कारण कंपनी ने सुरक्षा में घोर लापरवाही बरती और आवश्यक सुरक्षा उपायों को नहीं अपनाया।
यूनियन कार्बाइड के इतिहास, भारत में और भोपाल में इसकी स्थिति को भी तवज्जो दी गयी है। गैस पीड़ितों की मौजूदा स्थिति के साथ-साथ विभिन्न योजनाओं और रोज़गार की हालत क्या है – इस पर भी संक्षिप्त चर्चा की गयी है। जो लोग इस हादसे का शिकार हुए और जीवित बचे, उनके अनुभवों को भी स्थान दिया गया है।
(दीपाली एकलव्य से जुड़ी हैं)













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