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वाक् का नया अंक बाज़ार में, गुलज़ार पर ललित लेख

8 December 2009 9 Comments

♦ मिहिर पंड्या

वाक् का नया अंक बाज़ार में है और मिहिर का यह आलेख वाक् में ही छपा है। लंबा है, ललित है। आत्‍मीय शैली है। सुघड़ बयान हैं, सही विश्‍लेषण है। हमें अच्‍छा लगा, इसलिए मोहल्‍ला लाइव के पाठकों को फॉरवार्ड कर रहे हैं। मुलाहिज़ा फ़रमाएं : मॉडरेटर

वो मेरी जवानी का पहला प्रेम था। मैं उसे आज भी मेरी ज़‍िंदगी की हेट्टी केली (1) कहकर याद करता हूं। उस रोज़ उसका जन्मदिन था। मैं उसे कुछ ख़ास देना चाहता था। लेकिन अभी कहानी अपनी शुरुआती अवस्था में थी और मेरे भीतर भी पहली बार वाली हिचक थी इसलिए कुछ समझ न आता था। आख़िर कई दिनों की गहरी उधेड़बुन के बाद मैं तोहफ़ा ख़रीद पाया। लेकिन अब एक और बड़ा सवाल सामने था। तोहफ़ा तो मेरे मन की बात कहेगा नहीं, तो उसके लिए कोई अलग जुगत भिड़ानी होगी।

बस यही वो निर्णायक क्षण है जहां मेरी इस नितांत व्यक्तिगत कहानी का साधारणीकरण हो जाता है और मैं अलग-थलग, इतिहास के किसी कोने में पड़े और अपने में ही खोये एक लड़के मिहिर से अचानक नब्बे के दशक के प्रतिनिधि युवा चरित्र में बदल जाता हूं। अब मैं श्रीलाल शुक्ल से विक्रम सेठ तक लेखकों के उपन्यासों का विषय हूं और आशीष नंदी से सुकेतू मेहता तक विचारकों के अध्ययन का कच्चा माल। उस निर्णायक क्षण में अपने एक फैसले के साथ मैं अपना ख़ास का बाना छोड़ता हूं और अपनी हमउमर पीढ़ी की नियति के साथ एकाकार हो जाता हूं। एक शुद्ध साहित्य का विद्यार्थी अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में उसके दौर के सबसे लोकप्रिय और जनसुलभ माध्यम की ओर मुड़ता है। वही करता है, जो उसके दौर में जवान हो रहे किसी भी लड़के या लड़की को करना चाहिए।

मैं ख़ाली काग़ज़ पर मेरे दौर का एक फ़िल्मी गीत उकेरता हूं और तोहफ़े को उसमें लपेटकर दूर देस की यात्रा पर भेज देता हूं।

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जैसा हरीश त्रिवेदी हिंदी फ़िल्मी गीतों के सार्वजनिक महत्व पर बात करते हुए लिखते हैं, पश्चिम में मौजूद लोकप्रिय संगीत की किसी भी धारा से ज़्यादा व्यापक और असरदार तरीके से, हिंदी फ़िल्मी गीत मुख्यधारा के भारतीय जनमानस का भावनात्मक कल्पनालोक गढ़ते हैं। और यह प्रभाव वर्ग तथा बौद्धिक भद्रलोक के दायरे के पार जाता है। (2) त्रिवेदी विक्रम सेठ के ए सूटेबल बॉय का ज़िक्र करते हैं, जहां ब्रह्मपुर में एक शाम एक सुनसान सड़क पर सवारियां ले जाते हुए तांगेवाला एक फ़िल्मी गीत गाने लगता है, दिल के टुकड़े हज़ार हुए… और अचानक अपनी वर्ग-चेतना भूल कर सवारियों में से भी एक व्यक्ति उस गुनगुनाहट में शामिल हो जाता है। (3) मज़ेदार बात है कि जहां उपन्यास के अंग्रेज़ी संस्करण में इस गीत के गीतकार-गायक का कोई उल्लेख नहीं मिलता, वहीं वाणी से प्रकाशित इसके हिंदी अनुवाद कोई अच्छा सा लड़का में अनुवादक गोपाल गांधी हिंदी पाठक समाज से उसकी साझा स्मृतियां बांटते हुए फ़िल्म के नाम के साथ-साथ उसके गायक और गीतकार का उल्लेख भी करते हैं। फ़िल्म – प्यार की जीत, गीतकार – क़मर जलालाबादी, गायक – मोहम्मद रफ़ी। (4)

खुद हमारे समय के स्थापित गीतकार जावेद अख़्तर नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत में अपने लड़कपन के दौर के गीतों पर बात करते हुए नॉस्टेल्जिक हो जाते हैं और उन्हें अपनी निजी ज़‍िंदगी का हिस्सा बताते हैं, पचास और साठ के दशक के गीत मेरे लिए सिर्फ़ गीत भर नहीं – उससे बहुत बढ़ कर हैं। ये गीत न जाने कितनी यादें जगाते हैं। मुनीमजी का गीत जीवन के सफर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को सुनता हूं तो ये मेरे लिए सिर्फ़ एक गीत भर नहीं है – ये किसी बचपन के दोस्त से मुलाकात जैसा है। जब भी मैं ये गाना सुनता हूं, मुझे मेरे स्कूल के दिन याद आते हैं, मेरे पुराने दोस्त याद आते हैं, मेरी पहली प्रेमिका याद आती है। यह गीत मुझे यादों से भर देता है। (5) अचानक मेरे मन में ख़्याल आता है कि क्या आज भी कहीं कोई जान तेरे नाम का <(b>ये आक्खा इंडिया जानता है सुनकर अपना नटखट बचपन याद करता होगा?

श्रीलाल शुक्ल के क्लासिक उपन्यास राग-दरबारी में एक लड़की फ़िल्मी गीतों को जोड़-जोड़कर ही पूरा प्रेम-पत्र लिखती है। हिंदी सिनेमा के गीतों के आम भारतीय जनमानस पर पड़े गहरे प्रभाव का यह प्रेम-पत्र एक ऐसा अमर दस्तावेज है, जिसका उल्लेख न सिर्फ़ हरीश त्रिवेदी ने किया है (6) बल्कि फ़्रैंचेस्का ऑरसीनी ने भी अपने बहुत ही रोचक लेख लव लैटर्स की शुरुआत इसी ख़त के उल्लेख से की है। (7) और देखें तो वहीं शिवपालगंज में अड़तालीस घंटे के नान-स्टॉप जागरण में सबसे लोकप्रिय भजनों के प्रेरणास्रोत भी फ़िल्मी गीत ही हैं,

बाबाजी के दरबार में अड़तालीस घंटे तक अखंड कीर्तन चलता रहा। जो गांजा नहीं पीते थे उनके लिए बराबर भंग का इंतज़ाम हुआ और जब तक कीर्तन चला तब तक सिल पर लोढ़ा भी चलता रहा। हारमोनियम बजता रहा और राधाकृष्ण और सीताराम की खुशामद में ऐसी-ऐसी धुनें गायी गयीं जिनके सामने सिनेमा के बड़े-बड़े गाने पस्त हो गये, जैसे :

लेके पहला-पहला प्यार, भरके आंखों में ख़ुमार
जादू नगरी से आया है कोई जादूगर।

के मुकाबले

लेके पहला-पहला प्यार, तजके ग्वालों का संसार
मथुरा नगरी से आया है कोई वंशीधर।

ने मैदान मार लिया। (8)

यह साठ के दशक का हिंदुस्तानी देहात है। लेकिन जैसा त्रिवेदी लिखते हैं, हिंदी सिनेमा के गीतों से भारतीय जनमानस का यह अंतरंग जुड़ाव वर्ग, काल और क्षेत्र की सीमाओं के पार जाता है। अपनी गैर-कथात्मक पुस्तक मैक्सिमम सिटी : बांबे लॉस्ट एंड फाउंड के आत्मकथात्मक अंश में सुकेतू मेहता उनके लड़कपन के उस दौर का ज़िक्र करते हैं, जब वे और उनके दोस्त मिलकर जैक्सन हाइट्स (न्यू यॉर्क) की सड़कों सत्तर के दशक की हिंदी फ़िल्मों के गीत गाते हुए घूमते थे और अपनी अन्य पहचान स्थापित करते थे। (9) दो बिलकुल उलट परिवेश में हिंदी सिनेमा के गीत आते हैं और उस निर्णायक क्षण को पूरा करते हैं। यही गीत हैं, जो कई बार हमारे सिनेमा को विश्व सिनेमा के मंच पर एक अजायबघर से आयी चीज़ बना डालते हैं। (10) हमारे सिनेमा पर यथार्थवाद से दूर जाने का आरोप लगता है। लेकिन यही गीत हैं, जो मेरी तमाम अधूरी कहानियों में आते हैं और उन्हें पूरा करते हैं।

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gulzar

मुझको भी तरकीब सिखा कोई, यार जुलाहे!

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई धागा टूट गया या ख़त्म हुआ
फ़िर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई।

मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं, मेरे यार जुलाहे!

मैंने झूठ कहा कि तोहफा मेरी बात नहीं कहेगा। उस काग़ज़ के भीतर एक ऑडियो कैसेट थी। मैंने जगजीत सिंह की आवाज़ में गुलज़ार को लपेटकर भेजा था उस चिठ्ठी के साथ। मरासिम! उन दिनों मैं इसे रोज़ सुना करता था। चाहता था कि वो भी इसे सुना करे। हम दोनों एक ही वक़्त अलग-अलग जगहों में रहकर भी एक ही गाना सुन रहे हों,

शाम से आंख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है।

क्या यही वजह है कि गुलज़ार पर लिखने की मेरी कोई भी शुरुआती कोशिश सिरे से ख़ारिज़ हो जाती है? थोड़े से गुलज़ार मैंने अपनी ज़‍िंदगी के लिए रख छोड़े हैं। ग़म में या खुशी में मैं उन्हें ही निकालता हूं और पहन लेता हूं। मेरे लिए गुलज़ार पर कुछ भी लिखना दरअसल अपनी ज़‍िंदगी पर टिप्पणी करना है। और अपनी ज़‍िंदगी पर निरपेक्ष भाव से लिखना क्या संभव है? जैसे ही आप कोई विमर्श पकड़ने के लिए प्राथमिक स्रोत की तरफ़ जाते हैं वो प्राथमिक स्रोत आपको अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। इन गीतों से निरपेक्ष रह पाना असंभव है।

मैं अपने अकादमिक काम को इन एब्सर्ड यादों से बचाना चाहता हूं और हर बार खुद को इस प्रयास में असफ़ल पाता हूं। इन गीतों को सुनते हुए मुझे अपनी ज़‍िंदगी के कुछ नितांत निजी पल फिर से जीने पड़ते हैं। ये इतना आसान नहीं। कभी वो खुशी के पल हैं और कई बार उनमें कुछ बेहद उदास शामें शामिल हैं। अमलतास के फूलों का पीलापन है और मोगरे के गुच्छे की खुशबू।

गुलज़ार पर लिखना डायरी लिखने जैसा है। दुनिया का सबसे ईमानदार काम। और मैं इतना ईमानदार नहीं होना चाहता। सुधीश सर मुझसे लेख चाहते हैं। मैं उन्हें निराश करता हूं। क्या मैं उन्हें कभी बता पाऊंगा कि गुलज़ार की ही लिखी चार अशर्फ़ियों के साथ मैंने अपना आख़िरी प्रेम-पत्र ख़त्म किया था और उसके बाद मैं आज तक उस जैसा कुछ नहीं लिख पाया :

तेरे ग़म की डली उठाकर
ज़बां पे रख ली है मैंने देखो
ये क़तरा-क़तरा पिघल रही है
मैं क़तरा-क़तरा ही जी रहा हूं।

♦♦♦

लोकप्रिय सिनेमा के बारे में एक स्थापित विचार यह है कि मूलत: सत्ताशील पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की परियोजना होने के कारण लोकप्रिय सिनेमा यथास्थितिवाद का पोषक रहा है। उदाहरण के लिए महानायक अमिताभ की फ़िल्मों पर ग़ौर करें तो आमतौर पर इनका अंत या तो सामाजिक समस्या के महानायक द्वारा नाटकीय समाधान द्वारा (देखें – ज़ंजीर, कुली, अमर-अकबर-एंथॉनी) या नैतिकता और आदर्श की पुन: स्थापना द्वारा (देखें – दीवार, शक्ति, त्रिशूल) होता है।

लेकिन यहां एक पेंच है। क्योंकि सिनेमा एक मास मीडियम है, इसलिए इसके लोकप्रिय होने के लिए ज़रूरी है कि जन-आकांक्षाओं को वह अपने भीतर शामिल करे। और जन-आकांक्षाएं स्वभाव से ही सत्ता-विरोधी होती हैं। अमिताभ की यही नाटकीय समाधान और आदर्श की पुन:स्थापना वाली फ़िल्में सत्तर के दशक के असंतोष की एक प्रामाणिक तस्वीर भी अपने भीतर समेटे हैं। जैसा मैथिली राव लिखती है, सलीम जावेद की पटकथाओं में उन गुमसुम उलझनों के ग़ुस्से की झलक होती थी, जो नेहरूवादी सपनों के छले जाने और ग़रीबी हटाओ के खोखले नारे से पैदा हुई थी। (11) चाहे फ़िल्म अपने आदर्श अंत में शशि कपूर के नैतिक चरित्र की जीत द्वारा व्यवस्था की पुन:स्थापना करे लेकिन यह साफ़ है कि उन तमाम फ़िल्मों का नायक हमेशा विजय ही था।

यही वह मूल द्वैध है, जिनसे मिल कर लोकप्रिय हिंदी सिनेमा का ताना-बाना रचा गया है। व्यवस्था का तरफ़दार होने के बावजूद इसे आम आदमी की बोली बोलनी पड़ती है, लोकप्रिय सिनेमा दो विरुद्धों के साथ सफ़र करता है। उसकी दिलचस्पी यथास्थिति को बनाये रखने में होती है, और इस क्रम में वह बहुसंख्य नैतिकता की व्यवस्था को भी नहीं छेड़ना चाहता है। लोकप्रिय सिनेमा अपनी युग चेतना के अनुरूप होता है, वह सामूहिक इच्छा को इस प्रकार अपने अंदर प्रतिबिंबित करता है कि उसके माध्यम से वह अधिक से अधिक लाभ कमा सके। (12) व्यवस्था बनाये भी रखनी है लेकिन जनता की बानी भी बोलनी है क्योंकि वही अपील करती है। मैथिली राव की इस स्थापना में इस द्वैध के दोनों सिरे शामिल हैं। इस द्वैध की आलोचकों ने अलग-अलग वजहें देखीं हैं। एम माधव प्रसाद इसकी वजह का विश्लेषण कुछ यूं करते हैं, लोकप्रिय सिनेमा परंपरा और आधुनिकता के मध्य परंपरागत मूल्यों का पक्ष नहीं लेता। इसका एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा निर्धारित सामाजिक बंधनों के मध्य एक उपभोक्ता संस्कृति को खपाना है। इस प्रक्रिया में यह कई बार सामाजिक संरचना को बदलने के उस यूटोपियाई विचार का प्रतिनिधित्व करने लगता है जिसका वादा एक आधुनिक-पूंजीवादी राज्य ने किया था। (13)

मैं अगर शुद्ध फ़िल्मी फॉर्मूले में बात करूं तो इस द्वैध के एक सिरे का सच्चा प्रतिनिधि है लोकप्रिय सिनेमा का क्लाइमैक्स, वहीं दूसरे सिरे के सच्चे प्रतिनिधि हैं हिंदी सिनेमा के गीत। आदर्श की पुन:स्थापना करने वाला क्लाइमैक्स यथास्थिति का पोषक बनकर उभरता है, वहीं हिंदी सिनेमा के गीत आम जनमानस की उन आकांक्षाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं जिन्हें इस अर्ध सामंती – अर्ध पूंजीवादी समाज व्यवस्था में हमेशा दबाकर रखा गया। प्रतीक रूप में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के इन दो सबसे महत्वपूर्ण अंगों में ही सिनेमा के दो भिन्न विचार जगह पाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो गीतों में आगे बढ़ता प्रगतिशील और जनतांत्रिक विचार अक्सर क्लाइमैक्स की भूल-भुलैया में जाकर दम तोड़ता नज़र आता है।

याद कीजिए हिंदी सिनेमा की ऑल टाइम क्लासिक मुग़ल-ए-आज़म को। अंत में शहंशाह अनारकली को कहता है कि हिंदुस्तान की तक़दीर के लिए तुझे मरना होगा और व्यवस्था की पुन:स्थापना होती है। अकबर का मानवीय चेहरा दिखाते हुए उसे एक प्रजापालक राजा के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन क्या यही तसवीर है, जिसे हिंदुस्तानी जनमानस मुग़ल-ए-आज़म की पहचान के तौर पर याद रखता है? सच यह है कि हिंदुस्तान का जनमानस आज भी मुग़ल-ए-आज़म का ज़िक्र आने पर सामंती सत्ता के सामने तनकर खड़ी और प्यार किया तो डरना क्या गाती अनारकली को ही याद करता है। सर्वशक्तिशाली राजा को अचानक अपने चारों ओर एक ही छवि नज़र आने लगती है। शकील बदायूंनी का यह अमर गीत सामान्य से तत्व प्रेम के भीतर छिपी क्रांतिकारिता को सामने ले आता है। एक सामंती समाज में शुद्ध प्रेम कभी भी सामान्य तत्व नहीं हो सकता। इसमें हमेशा सत्ता द्वारा निर्धारित ढांचों को हिलाने की क्षमता होती है, हमेशा। सिनेमा या साहित्य के बारे में हमेशा इस प्रश्न पर बात की जाती है कि आख़िर कृति का वो कौन सा मूलभाव है, जिससे जनता अपना जुड़ाव महसूस करती है? जनता वहां जुड़ती है, जहां मौहम्मद रफ़ी के साथ मिलकर सौ गायक कोरस में गाते हैं,

ज़‍िंदाबाद, ज़‍िंदाबाद,
ऎ मौहब्बत ज़‍िंदाबाद।
(14)

आरोप लगाया जाता है कि हिंदी सिनेमा का यही अनोखा पहलू इसे हॉलीवुड के यथार्थ चित्रण के समक्ष गैर-यथार्थवादी बनाता है। (15)

बेशक लगाया जाए। क्या अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में एक कवि यथार्थ के ढांचे को नहीं तोड़ता? जिस तरह हमारा समाज सामाजिक मान्यताओं और चले आ रहे रीति-रिवाजों में जकड़ा है, उसी तरह फ़िल्म भी व्यवस्था की स्थापना अर्थात यथास्थितिवाद की जकड़न में बंधी होती है। उसे कैसे भी कोशिश करके उस सुविधाजनक अंत तक पहुंचना है। हिंदी सिनेमा का गीत उसी जकड़बंदी से मुक्ति पाने की कोशिश है। यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो व्यवस्था पर आधारित फ़िल्मी ढांचे के मध्य वायवीय लगती है। उतनी ही वायवीय जितनी मुझे राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में अपने साथ आठवें दर्जे में पढ़ने वाली उस लड़की की मौत लगी थी, जिसके बारे में कहा गया कि वो हमारे मौहल्ले के नाई के लड़के के साथ प्रेम करती थी और उसके ही साथ ज़हर खाकर मर गयी… (या मार दी गयी)…

कुछ रुक कर जावेद अख़्तर को सुनते हैं, मुझे लगता है कि गीत एक तरह की जकड़न से मुक्ति हैं। जब आप गीत गाते हैं तो अपने भीतर किसी दबाये गये भाव, चाहत या विचार को मुक्त करते हैं। गद्य में आप उत्तरदायी होते हैं लेकिन गीत में आप बिना परवाह खुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं। अगर आप पूछें, कौन जाने ये लोग प्यार क्यों करते हैं? तो ज़रूर कोई जवाब में पूछेगा, आप प्यार के इतना खिलाफ़ क्यों हैं? लेकिन अगर आप यूं एक गाना गाएं, जाने क्यों लोग प्यार करते हैं? तो कोई भी आपसे इसका स्पष्टीकरण नहीं मांगेगा। लोग गीत मे अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। मुझे लगता है कि जो जितना ज़्यादा दमित होगा वो उतना ही ज़्यादा गीतों में अपनी अभिव्यक्ति पाएगा।

किसी भी समाज में जितना ज़्यादा दमन होगा वहां उतने ही ज़्यादा गीत मिलेंगे। यह आश्चर्य नहीं है कि हिंदुस्तानी समाज में जहां औरतों पर दमन ज़्यादा है वहां उनके हिस्से गीत भी पुरुषों से ज़्यादा हैं। ग़रीब के हिस्से अमीर से ज़्यादा गीत हैं। लोक संगीत आख़िर निर्माण से लेकर संरक्षण तक आम आदमी का ही तो है। अगर गीत सिर्फ़ आनंद और आराम के प्रतीक भर हैं, तो फिर इन्हें समृद्ध समाजों में अधिक मात्रा में मिलना चाहिए था लेकिन इनकी बहुतायत मिलती है श्रमिक और वंचित वर्ग के बीच। मुझे लगता है कि गाना एक तरह से आपकी सेक्सुअलिटी का प्रतीक है और अगर यह माना जाए तो समाज में जितना इंसान की सेक्सुअलिटी को दबाया जाएगा, दमित किया जाएगा, वहां उतने ही ज़्यादा गीत और उन्हें गानेवाले मिलेंगे। (16)

दमित इच्छाएं। यहीं से गीतकार गुलज़ार की कहानी शुरू होती है। कल्याणी के मन की उलझन, मोह बांह पकड़कर खींच रहा है और लाज पांव पकड़कर रोक रही है। एक निहायत ही दिलचस्प प्रसंग में गुलज़ार हमें उस पहले गीत की कहानी सुनाते हैं :

मोरा गोरा अंग लेई ले
मोहे श्याम रंग देई दे

यह एक बंद दरवाज़ों वाले समाज का गीत है। चौखट के उस पार का गीत। सामाजिक रूढ़ियों में जकड़े समाज से निकला गीत। और इस समाज की जकड़न सबसे अधिक तथा सबसे दूर तक स्त्री ही महसूस करती है। ऐसा बंधन जिसमें चांद भी बैरी लगने लगता है।

बदरी हटा के चंदा
चुपके से झांके चंदा
तोहे राहू लागे बैरी
मुसकाये जी जलाई के

यही गुलज़ार मेरा कुछ सामान लिखते हुए अक्स के इस गीत तक पहुंचते हैं :

रात आती है चली जाती है हरजाई है
फिर मेरे घर में दबे पांव चली आयी है

शाम होते ही जला देती है पलकों के दिये
रात से पूछे कोई किसके लिए किसके लिए
कोई आहट भी नहीं और कोई आता भी नहीं
रक़्स करती है जो शब-भर मेरी तनहाई है

रात से पूछे कोई इसकी भी कहानी होगी
ज़ख़्म भरते ही नहीं चोट पुरानी होगी
दर्द सीने में छिपा रखा है शायद कोई
कोई ज़ेवर है किसी ग़म का चुरा लायी है

एक ही दौर के गीतकार अक्सर आपस में पूरक का काम करते हैं। और गुलज़ार तो समकालीनता के कई दौर पार करते हुए यहां तक पहुंचे हैं। आपको आद होगा कि जिस चांद से पल भर उधर मुंह फेरने की गुज़ारिश शैलेंद्र की नायिका ने की थी उसी चांद से चिढ़कर गुलज़ार की कल्याणी ने उसे राहू लग जाने का ताना दिया। और इन्हीं गुलज़ार की नायिका जब अक़्स में रात से उसकी कहानी पूछती है तो कोई और गीतकार इस सवाल के आगे की बात कहीं और लिख रहा होता है। स्वानंद किरकिरे परिणीता में लिखते हैं :

रात हमारी तो चांद की सहेली है
कितने दिनों के बाद आयी अकेली है
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज

अंधेरा पागल है, कितना घनेरा है
चुभता है, डसता है, फिर भी वो मेरा है
उसकी ही गोदी में सर रखके सोना है
उसकी ही बांहों में चुपके से रोना है
आंखों से काजल बन, बहता अंधेरा

ये स्त्री के अकेलेपन के गीत नहीं, स्त्री के स्व की पहचान के गीत हैं। उमंग या अंधेरा तो सिर्फ़ सिक्के के दो पहलू हैं। आख़िर पहचान तो खुद से ही होती है। आत्म की पहचान के गीत। मेरे लिए इसी क्रम में यह उमंग से भरा गीत भी आता है क्योंकि यहां भी स्त्री का साक्षात्कार आत्म से है :

हम तो चले सर पे लिये
अंबर की ठंडी फुलकारियां
हम ही ज़मीं, हम आसमां
खसमाणूं खाये बाक़ी ज़हां

यहां हिंदी सिनेमा के गीतों के एक और पहलू पर गौर करना मज़ेदार होगा। अगर आप उस दौर में चल रही हिंदी भाषा से जुड़ी बहसों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जिस दौर में हिंदुस्तान में सिनेमा बोलना सीख रहा था तो एक और मज़ेदार चीज़ उभरकर हमारे सामने आती है। भाषा की बहसों में यह वही दौर है, जब हिंदी को अकादमिक हलकों में और ज़्यादा शुद्धतावाद की ओर ढकेला जा रहा था। ऐसे में आम बोलचाल की हिंदी (या जिसे उस वक़्त हिंदुस्तानी कहा करते थे) को नये ठिकाने तलाशने की ज़रूरत आन पड़ी थी। उस दौर पर लिखने वाले आलोचकों में से बहुत ने इस बात की ओर इशारा किया है कि यह नये ठिकाने आमतौर पर लोकप्रिय माध्यम थे जिनमें सिनेमा सबसे प्रमुख माध्यम था।

शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार लिखते हैं, पुरानी हिंदी जिसमें उर्दू की शब्दावली तथा मुहावरेदानी मौजूद थी, शैक्षिक उपयोग में लाने योग्य नहीं समझी गयी पर वह नष्ट नहीं हुई। उसे एक नये प्रसार माध्यम में जगह मिली। यह माध्यम था सिनेमा, जिसका विकास तीस के दशक में आरंभ हो चुका था। सिनेमा का दर्शक वर्ग हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं था और फ़िल्म उद्योग का केंद्र मुंबई हिंदी क्षेत्र का नहीं। यह माध्यम साक्षरता पर भी निर्भर नहीं था, इसलिए शिक्षित समूह उसके दर्शक वर्ग में विशेष महत्व नहीं रखते थे। भाषा के संदर्भ में इस नये माध्यम ने हिंदी-उर्दू की संयुक्त परंपरा को अक्षुण्ण रखने का मौका दिया। फ़िल्म ने लोकसंवाद की भाषा का अधिग्रहण कर लिया (17) दरअसल भाषा को लेकर यह लचीलापन भी लोकप्रियता के दबाव के चलते ही आता है। वही इसे और ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाता है शायद। जैसा जवरीमल्ल पारख लिखते हैं, ख़ास बात जो ध्यान देने की है वह यह है कि समय, स्थान और पात्र के अनुसार संवादों की भाषा में परिवर्तन किया गया है लेकिन इसके बावजूद सभी की भाषा को हिंदी या हिंदुस्तानी के दायरे से बाहर नहीं जाने दिया गया। जाहिर है कि यथार्थवाद के नाम पर फ़िल्मकार ऐसा कोई प्रयोग नहीं करना चाहता जिससे उसके दर्शकों का दायरा सीमित हो जाए। (18) यही वो लचीलापन है, जो गुलज़ार को लोकप्रियता के इस शिखर तक पहुंचाता है। और मैं यहां सिर्फ़ यह जोड़ना चाहता हूं कि भाषा में यह लचीलापन गुलज़ार को पीछे से चली आती गीत लेखन की परंपरा से विरासत में मिलता है।

यतींद्र मिश्र गुलज़ार पर संपादित पुस्तक यार जुलाहे की भूमिका में गुलज़ार की कविता में पाये जाने वाले प्रेम के स्वरूप को कुछ यूं विश्लेषित करते हैं, गुलज़ार के रचना कर्म में, विशेषकर उनकी कविता और गज़लों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रतीति यह भी है कि उनके यहां प्रेम बहुत गरिमा के साथ प्रतिष्ठित हुआ है। यह जानना दिलचस्प है कि सूफ़ी कविता और सूफ़ी संगीत में भी प्रेम की उपस्थिति लगभग एक अनिवर्चनीय सत्य के रूप में उजागर होती रही है। फिर बात जब गुलज़ार की हो रही हो, जो स्वयं अपनी अभिव्यक्ति की सहज छायाएं बुल्लेशाह, बाबा फ़रीद, कुली कुतुबशाह, शम्स तबरेज़ी और नानक में ढूंढते हों, तब यह बात आसानी से स्थापित हो जाती है कि प्रेम में इतनी उदात्त भावना की प्रतिष्ठा किस तरह उनके शायर को उपलब्ध हो सकी है। (19)

लेकिन यह अनिवर्चनीय प्रेम कोई अलौकिक प्रेम नहीं। यह पूर्णत: लौकिक प्रेम है, मांसल प्रेम। दरअसल यह हिंदी की आलोचना की दिक्कत है। हिंदी आलोचना एक ऐसे शुद्धतावादी दौर में अपना आकार ग्रहण करती है कि इसे जायसी के अवध की मिट्टी से उपजे और उसमें ही गहरे रचे-बसे काव्य में इश्क़-हक़ीक़ी नज़र आता है और वह कभी यह नहीं समझ पाती कि क्यों मीरा निर्गुण काव्य से सीधे जुड़े होने के बावजूद साकार कृष्ण की भक्ति करती हैं? गुलज़ार के यहां प्रेम कोई अशरीरी प्रेम नहीं है। (और उसे होना भी क्यों चाहिए?) यहां पड़ोसी के चूल्हे से आग लेने और जिगर से बीड़ी जलाने की चाहत भी है तो यहीं कहीं शब काटेंगे / चिलम-चटाई बांटेंगे की ऐंद्रिक ख्वाहिश भी। गुलज़ार की कविता पवित्रताबोध के बोझ से दबी और कुंठाग्रस्त कविता नहीं है। वह हर नये दौर की कविता है। वह मेरे दौर की कविता है, हमारा पाठ। गुलज़ार की यह कविता अलाव मुझे ख़ास पसंद है :

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क-सी शाख़ें काटीं
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फैंकीं
तुमने पलकों पे नमी सूख गयी थी सो गिरा दी
रात भर जो मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे

रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

यह इच्छाओं का स्वीकार है। जिसे द्विवेदी जी कहते हैं, प्रवृतियों का स्वीकार। द्विवेदी जी की सुचरिता बाणभट्ट से कहती है, मानव देह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है, आर्य। यह विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है। यह नारायण का पवित्र मंदिर है। मैं जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा कलुष समझती थी, वही मेरा सबसे बड़ा सत्य है। क्यों नहीं मनुष्य अपने सत्य को देवता समझ लेता आर्य? (20)

यह एक ही तार है जो सूर, मीरा और जायसी की प्रेम की पीर से होता हिंदी सिनेमा के गीतों तक आता है, गुलज़ार के काव्य तक आता है। एम माधव प्रसाद इस बारे में लिखते हैं, हिंदुस्तान में यह मध्यकालीन भक्ति आंदोलन ही था जिसने आध्यात्मिक प्रेम में रोमांटिक शैली को शामिल किया। मीराबाई, स्वयं को श्रीकृष्ण की दुल्हन मानने वाली सोलहवीं सदी की भक्त कवियित्री, ने अपने आध्यात्मिक प्रेम का प्रगटीकरण सेक्सुअलिटी की भाषा : कोर्टशिप औए विवाह जैसी संस्थाओं के माध्यम से किया। लेकिन एक सामाजिक चलन के रूप में रोमांटिक शैली का काव्य सीधा इन आंदोलनों से नहीं पैदा हुआ। हिंदुस्तान के मुस्लिम समाज में पायी जाने वाली पर्शियन और उर्दू शायरी ने प्रेम का वो विमर्श पैदा किया, जिसे हिंदी सिनेमा ने पूरा का पूरा अपना लिया। इस असीम प्रेम की भाषा और बिंब भी आम बोलचाल के न होकर कविता के ज़्यादा थे और ज़्यादातर इन्होंने सिनेमा के गीतों में स्थान पाया। (21)

यही वो तार है जो एक ओर गुलज़ार को कबीर से जोड़ता है तो दूसरी ओर ग़ालिब से। कभी वो यार जुलाहे से कोई तरकीब सुझाने की बात करते हैं तो कभी बल्लीमारान के मौहल्ले में ग़ालिब का पता खोजते हैं :

बल्लीमारां के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के क़सीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वह दाद, वह वाह-वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलायी हुई शाम के बेनूर अंधेरे
ऎसे दीवारों से मुंह जोड़कर चलते हैं यहां
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अंधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
एक क़ुरान-ए-सुख़न का सफ़ा खुलता है
असद उल्लाह ख़ां ग़ालिब का पता मिलता है

मुझ से बहुत जो वो एचएमवी की गुलज़ार के दस्तख़त वाली मिर्ज़ा ग़ालिब की दो हिस्सों में बंटी ऑडियो कैसेट अपने बचपन से सुनते बड़े हुए हैं, उन्हें गुलज़ार की आवाज़ आज भी इसी कविता की शक्ल में याद है। मैं अभिशप्त हूं अपने हर लिखे में खु़द को पाने के लिए, अपने बचपन को पाने के लिए। गुलज़ार पर निरपेक्ष भाव से कुछ भी लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं, अपने बचपन पर निरपेक्ष भाव से कुछ भी लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं। गुलज़ार मेरे बचपन का हिस्सा हैं, गुलज़ार मेरी जवानी का हिस्सा हैं। और यहां फिर एक बार मेरा साधारणीकरण होता है और मैं प्रतीक हूं एक पूरी पीढ़ी का, मेरी हमउमर पीढ़ी। गुलज़ार हमारे प्रेम के राज़दार हैं, हमारे ग़म के साथी हैं। जब हम किसी रात अकेले में पिछला बीता याद करते हैं तो हमारे कमरे में रखे एफएम प्लेयर पर धीमी आवाज़ में गुलज़ार आते हैं, और हमारा अकेलापन तोड़े बिना उसे बांट लेते हैं।

मैं अभिशप्त हूं अपने हर लिखे में खुद को पाने के लिए। गुलज़ार आते हैं और रास्ता सुझाते हैं :

आओ सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा

गुलज़ार के गीत मेरा आईना हैं जिनमें मैं खुद को देखता हूं और पहचान पाता हूं।

gul-e-gulzar

संदर्भ

1) हेट्टी केली चार्ली चैप्लिन के जीवन में आयी पहली प्रेमिका थीं, उस वक़्त वे केवल सोलह-सत्रह साल के थे। बेशक उनका साथ दो-तीन मुलाकातों का ही था लेकिन चार्ली की आत्मकथा में हेट्टी का उल्लेख सबसे ज़्यादा रोमांस और प्रेम के साथ आता है। देखें, चार्ली चैप्लिन, मेरा जीवन (आत्मकथा), अनुवाद – सूरज प्रकाश, आधार प्रकाशन, पंचकुला (हरियाणा), पृष्ठ – 131

2) हरीश त्रिवेदी, आल काइंड्स ऑफ़ हिंदी : दि इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑफ़ हिंदी सिनेमा (लेख), फ़िंगरप्रिंटिग पॉपुलर कल्चर : दि मिथिक एंड दि आइकॉनिक इन इंडियन सिनेमा, संपादक – विनय लाल एवं आशीष नंदी, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 62

3) विक्रम सेठ, ए सूटेबल बॉय, हरीश त्रिवेदी द्वारा उद्धत, वही, पृष्ठ – 62

4) विक्रम सेठ, कोई अच्छा सा लड़का, अनुवाद गोपाल गांधी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 45-46, हरीश त्रिवेदी द्वारा उद्धत, वही, पृष्ठ – 84

5) जावेद अख़्तर, टाकिंग सांग्स : जावेद अख़्तर इन कनवरसेशन विथ नसरीन मुन्नी कबीर, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 21

6) हरीश त्रिवेदी, वही, पृष्ठ – 62

7) फ़्रैंचेस्का ऑरसीनी, लव लैटर्स (लेख), लव इन साउथ एशिया : ए कल्चरल स्टडी, संपादक – फ़्रैंचेस्का ऑरसीनी, कैंब्रिज युनिवरसिटी प्रेस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 228

8) श्रीलाल शुक्ल, राग-दरबारी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 206

9) सुकेतू मेहता, मैक्सिमम सिटी : बांबे लॉस्ट एंड फाउंड, पेंग्विन बुक्स, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 9

10) स्टीफ़न ऑल्टर, फ़ैन्टेसीस ऑफ़ ए बॉलीवुड लव थीफ़ : इनसाइड दि वर्ल्ड ऑफ़ इन्डियन मूवीमेकिंग, हरपर कॉलिंस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 10

11) मैथिली राव, संघ परिवार को यश चोपड़ा की फ़िल्में क्यों सुहाती हैं? (लेख), हॉलीवुड-बॉलीवुड, संपादक – अनवर जमाल और सैबल चटर्जी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 81

12) वही, पृष्ठ – 77

13) एम माधव प्रसाद, आइडिओलाजी ऑफ़ दि हिंदी फ़िल्म : ए हिस्टोरिकल कंस्ट्रक्शन, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ – 113

14) http://en.wikipedia.org/wiki/mughal-e-azam (25/06/09)

15) हरीश त्रिवेदी, आल काइंड्स ऑफ़ हिंदी : दि इवॉल्विंग लैंग्वेज ऑफ़ हिंदी सिनेमा (लेख), फ़िंगरप्रिंटिग पॉपुलर कल्चर : दि मिथिक एंड दि आइकॉनिक इन इन्डियन सिनेमा, संपादक – विनय लाल एवं आशीष नंदी, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 61

16) जावेद अख़्तर, टाकिंग सांग्स : जावेद अख़्तर इन कनवरसेशन विथ नसरीन मुन्नी कबीर, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 21-22

17) कृष्ण कुमार, हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान, विंध्य-गांगेय क्षेत्र में शिक्षा, भाषा और पुनरुत्थानवाद, साम्प्रदायिकता के स्रोत, संपादक – अभय कुमार दुबे, विनय प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 44

18) जवरीमल्ल पारख, हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथशिल्पी, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 83

19) यतींद्र मिश्र, यार जुलाहे : गुलज़ार की भूमिका से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 31

20) आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, बाणभट्ट की आत्मकथा, नामवर सिंह द्वारा दूसरी परंपरा की खोज में उद्धत, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली – 59

21) एम माधव प्रसाद, आइडिओलाजी ऑफ़ दि हिंदी फ़िल्म : ए हिस्टोरिकल कंस्ट्रक्शन, ऑक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ – 111

mihir pandya(मिहिर पंड्या। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में रिसर्च फेलो। सिनेमा के शौक़ीन। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्‍ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्‍लॉग। मोहल्‍ला लाइव के लिए सिनेमा और क्रिकेट पर लगातार लिखते रहे हैं। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

9 Comments »

  • शशिभूषण said:

    सुंदर लेख.वाक़ई फ़िल्म संगीत हमारे सब में शामिल है.थोड़ा बदलकर गुनगुना सकते हैं- तू इस तरह से हमारी ज़िंदगी में शामिल है.जहाँ भी जाऊँ ये लगता है तेरी महफ़िल है….गुलज़ार की यह याद क़ाबिले ग़ौर है.बधाई.

  • Ashish said:

    PC ke saamane baithakar ek sans me itane lambe lekh ko padha le jaane kaa kaam, koi Mihir hee kar sakata hai. Ek achhe lekh ke liy badhai Mihir…

  • Prashant (PD) said:

    bahut lamba hai.. bad me padhenge..

  • Santosh Kumar said:

    उम्दा!!!

    जिंदगी के जंगल में, हरे-भरे और महकते पौधों के पत्तियों की सरसराहट को यूं शब्दमय संगीत में पिरोने के लिए धन्यवाद.

  • विनीत कुमार said:

    मिहिर का लिखा पढ़कर कई बार मुझे लगता है मैं एहसास और संवेदना के स्तर पर थोड़ा थोथा किस्म का आदमी लेकिन पढ़ते हुए तय नहीं कर पाता कि इसके लिए अपने दिल को बड़ा करुं या दिमाग को।.

  • oma sharma said:

    bahut achchha laga mihirbhai ke is lekh ko padhkar.aatmiyta aur eemandari se likh sunder pathniya lekh. badhai mihirmiyaan!

  • समरेंद्र said:

    “मैं अभिशप्त हूं अपने हर लिखे में खु़द को पाने के लिए, अपने बचपन को पाने के लिए। गुलज़ार पर निरपेक्ष भाव से कुछ भी लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं, अपने बचपन पर निरपेक्ष भाव से कुछ भी लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं। गुलज़ार मेरे बचपन का हिस्सा हैं, गुलज़ार मेरी जवानी का हिस्सा हैं। और यहां फिर एक बार मेरा साधारणीकरण होता है और मैं प्रतीक हूं एक पूरी पीढ़ी का, मेरी हमउमर पीढ़ी। गुलज़ार हमारे प्रेम के राज़दार हैं, हमारे ग़म के साथी हैं।” ….

    बेहतरीन। कुछ समय पहले गीतों पर कृष्ण कुमार का एक लेख पढ़ा था (शायद उनकी किताब विचार का डर में वो दर्ज है)। उसके बाद वैसा कुछ पढ़ने को नहीं मिला। आज गुलजार और हिंदी फिल्मों पर लिखा यह विचार कुछ वैसा ही है।

  • miHir said:

    @ ओमा शर्मा
    सही कहा आपने. ’ईमानदारी’ मेरे लिए सबसे ख़ास शब्द है. लेखन में भी और ज़िन्दगी में भी.

    @ शशिभूषण
    वाक़ई! अभी कल ही रवीश के ब्लॉग पर उनके ’वन-रूम-सेट रोमांस’ के किस्से पढ़ रहा था और देखा कि कैसे दूसरे की मुंडेरों पर से तैरते हिन्दी सिनेमा के गीत चले आ रहे थे इस कंक्रीट के बियाबान में.
    फ़ेसबुक पर विनय ने एक बहुत ही सुन्दर टिप्पणी की है, मैं उसका कुछ हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ, “कितने ही अनुभव ऐसे होते हैं जो इतने नितांत निजी होते हैं कि उनपर अपना अधिकार-सा लगता है. ऐसे में ये जानना अचरज भरा होता है कि “तुम अकेले ही नहीं हो, सभी अकेले हैं” :) . ग़ुलज़ार की एक बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने कितने ही ऐसे अनुभवों को बड़ी खूबसूरती और सहजता से शब्दों में लपेटकर फिर हमें लौटाया है.” वाक़ई!

    @ विनीत
    बात से असहमत. कोई भी अहसास और संवेदना के स्तर पर थोथा या कमतर नहीं होता. सिर्फ़ अभिव्यक्ति का तरीका अपना-अपना होता है. मेरा अपना अनुभव है कि भावनात्मक रूप से मुश्किल वक़्तों में तार्किक बुद्धि अमल में लानेवालों के लिए आमतौर पर उनके आस-पास के लोग इस तरह की धारणाएं बना लेते हैं. लेकिन ऐसे वक़्तों में ही तो हमारे भीतर की ’सैनिटी’ की असल परीक्षा होती है. यहाँ मैं याद करता हूँ हिन्दी सिनेमा में आए मेरे दो सबसे पसंदीदा किरदारों को, ‘ज़ख़्म’ के अजय को और ’हे राम’ के आख़िर में वापस आए अमजद ख़ान को.

    फिर दोहराऊँगा, ’ईमानदारी’ सबसे बड़ा मूल्य है.

    @ समरेंद्र
    कृष्ण कुमार मेरे भी पसंदीदा लेखक हैं. उनके लेख नब्ज़ पकड़ते हैं.

  • ashutosh kumar said:

    wonderful, miya, wonderful.

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