“बचाने वाले, गिराने वाले, सब एक निकले”
बिहार से राज्यसभा सांसद अली अनवर ने लिब्रहान आयोग रिपोर्ट पर राज्य सभा में चल रही बहस में हिस्सा लिया। बहस में ज़्यादातर सांसद एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे थे। कोई 500 बरस पहले बाबर की नज़ीर दे रहा था, तो कोई 25 साल पहले सिख दंगों की, तो कोई कुछ साल पहले नंदीग्राम की। अली अनवर ने कहा कि देश किसी के पर्सनल लॉ से नहीं चलेगा। देश चलेगा संविधान से, क़ानून से। कार्यवाही का अली अनवर के भाषण वाला हिस्सा ज्यों का त्यों : मॉडरेटर
श्री उपसभापति : श्री अली अनवर अंसारी। अंसारी जी, आपके पास दस मिनट हैं।
श्री अली अनवर अंसारी : सर, जितना समय उनको दिया है, उतना ही मुझे भी दिया जाए।
श्री उपसभापति : नहीं। ऐसे नहीं होता है। उनकी पार्टी की strength अलग है, आपकी पार्टी की strength अलग है। मेहरबानी करके यह तुलना मत कीजिए।
श्री अली अनवर अंसारी (बिहार) : महोदय, पक्ष और विपक्ष के दो दिग्गज वकीलों (अभिषेक मनु सिंघवी और अरुण जेटली) ने अपनी राय जाहिर की है। माननीय वकीलों के बारे में कहा जाता है कि बाल की खाल निकालते हैं। मैं बड़े ध्यान से सुन रहा था और मुझे हैरत हुई कि दोनों माननीय वकील, माननीय सदस्यों ने बड़ी सफाई से जो मूल बात है, उसको गोल कर दिया। हम कहना चाहेंगे कि दोनों ने आधा सच कहा है। पूरा सच क्या है, मैं आपसे एक शायर की जुबानी अर्ज करना चाहता हूं। वह शायर कोई दूसरी जगह का नहीं है, वह फैजाबाद का है, अयोध्या का है। जिसने एक तरह से अपने दिल और अपनी आंखों से देखा है छह दिसंबर की घटनाओं को, वह है मिराज फैजाबादी। वह क्या लिखते हैं,
“हमारे माज़ी की एक इमारत यह कह रही है…
(माज़ी का मतलब होता है भूत का, पीछे का।)
हमारे माज़ी की एक इमारत यह कह रही है,
बचाने वाले, गिराने वाले, सब एक निकले।”
महोदय, इसीलिए मैं कह रहा हूं कि दो पक्ष और विपक्ष के माननीय सदस्यों ने आधे सच का बयान किया है। महोदय, हमारी पार्टी का मानना है कि जो भी दोषी है, जिसने इतना बड़ा अपराध किया है, उनको सज़ा मिलनी चाहिए, फांसी की सज़ा भी कम होगी, सज़ा मिलनी चाहिए। यहां किसी के पर्सनल लॉ से देश नहीं चलेगा, किसी की आस्था से देश नहीं चलेगा। देश चलता है संविधान से, कानून के राज से, रूल ऑफ लॉ से। इस मुल्क में जम्हूरियत है, प्रजातंत्र है। छह दिसंबर का जो हमला है, वह एक पुरानी मस्जिद कहाये जाने का मामला नहीं है, वह हमारी जो जम्हूरियत है, हमारा जो संविधान है, हमारे मुल्क की जो आत्मा है, उस पर यह हमला है। इसलिए हम कहते हैं कि कोई भी सज़ा हो, उसके लिए कम है। हम चाहते हैं, हमारी पार्टी की नीति है कि इस मसले का हल आज भी किसी की आस्था से, किसी के विश्वास से नहीं होने वाला है। या तो यह मामला आपस में जो पक्षकार हैं, वह बैठ करके तय करेंगे और नहीं तो कोर्ट तय करेगा और कोर्ट से भी हम चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द तय करे। जिस तरह से हमारी सरकार ने बिहार में स्पीडी ट्रॉयल करके जो बाहुबली हैं, जो अपराधकर्मी हैं, उन लोगों को शिकंजे में लिया है। पहले होता क्या था कि मुक़दमे चलते रहते थे और अपराधकर्मी, बाहुबली एमएलए और एमपी भी बने रहते थे। लेकिन आज वे शिकंजे के पीछे हैं, सलाखों के पीछे हैं। इसलिए उस तरह से स्पीडी ट्रॉयल करके इस मामले का निष्पादन भी होना चाहिए। लेकिन महोदय, बड़े अफ़सोस के साथ हम कहना चाहते हैं कि जो लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट है और जिस तरह से वह तैयार की गयी है तथा उस पर जो एटीआर आयी है, उसमें से कहीं यह मंशा नहीं झलकती है कि अपराधियों को सज़ा मिलेगी? कही भी यह मंशा नहीं झलकती है और संदेह होता है कि अपराधियों को सज़ा मिलेगी भी या नहीं मिलेगी।
17 साल बाद यह रिपोर्ट आयी है। महोदय, मैं सज़ा के बिंदु से भी आगे जाकर कहना चाहता हूं, सभी पक्ष के लोगों से मैं गुज़ारिश करना चाहता हूं, अभी माननीय कांग्रेस के नेता सिंघवी साहब बीजेपी पर आरोप लगा रहे थे कि वह रिग्रेट नहीं कर रही है। महोदय, हम कहना चाहते हैं कि यह पश्चाताप का मामला नहीं है। इतना बड़ा पाप है और दोनों पक्ष उसके दोषी हैं, जो उस समय स्टेट में हुकूमत में थे और सेंटर में हुकूमत में थे। इसके लिए प्रायश्चित होना चाहिए। पछतावा को पश्चाताप कहते हैं… और प्रायश्चित जो है खुद को सज़ा देना, प्रायश्चित का मतलब होता है खुद को सज़ा देना और ऐसी सज़ा देना, जिसको दुनिया देखे और जनता समझे। उस पक्ष के लोगों को भी और इस पक्ष के लोगों को भी अगर सही मायने में इस मुल्क से मुहब्बत है। वे चाहते हैं कि यह बद-अमनी ख़त्म हो, इस मसले का हल हो, तो उनको प्रायश्चित करना चाहिए, खुद को सज़ा देकर के उनको दिखाना चाहिए, साबित करना चाहिए।
महोदय, हम कहना चाहते हैं कि हमें सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है। हम सहानुभूति नहीं मांग रहे हैं, न इस सदन से मांग रहे हैं, न इस सरकार से मांग रहे हैं। बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद हम चाहते हैं कि सहानुभूति नहीं, हम समान अनुभूति की बात कर रहे हैं। हम सहानुभूति नहीं चाहते हैं, हम समान अनुभूति चाहते हैं। समान अनुभूति का मतलब है कि हम और आप एक जैसे अनुभव से गुज़रें, इसी को समान अनुभूति कहते हैं।
महोदय, हम कहना चाहते हैं कि जब जनता को बांटकर के कोई राजनीति होगी, कोई भी करेगा, अगर कोई जनता को बांटकर राजनीति करेगा, मज़हब की बुनियाद पर करेगा, जाति की बुनियाद पर करेगा, इलाके की बुनियाद पर करेगा, ज़ुबान की बुनियाद पर करेगा, तो इसी तरह के नतीजे आएंगे। हमें आज की बहस से अफ़सोस हुआ कि 17 साल के बाद भी हमने सबक नहीं सीखा है, लेकिन जनता ने कुछ-कुछ सबक सीखा है। जनता ने हम लोगों को पहचाना है कि जो हमारा नेतृत्व है, वह कितना बौना है। हम बड़े-बड़े राजनेता तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन हम राष्ट्र नेता पैदा नहीं कर सकते हैं। हमारे अंदर स्टेटमनशिप नहीं है, आज भी आरोप और प्रत्यारोप का जो दौर चल रहा है, हमने अपने हृदय के अंदर झांककर देखने की कोशिश नहीं की है। महोदय, यह बड़े अफ़सोस का मुकाम है। हम कहना चाहते हैं कि मज़हब की बुनियाद पर और दूसरी बुनियाद पर बांटने की जो राजनीति है, वह कहां से शुरू हुई? महोदय, हमको यह कहने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं है।
उपसभापति महोदय, आप भी सुनिए। हम अपने जातीय तज़ुर्बे के आधार पर कह रहे हैं। मैं उन दिनों पत्रकार हुआ करता था। शाहबानो का मामला चल रहा था, हमने न जाने कितने अख़बारों को काला किया है, हमने कितने अख़बारों को काला किया कि यह ग़लत नज़ीर पेश की जा रही है, किसी की आस्था की बुनियाद पर, किसी के पर्सनल लॉ की बुनियाद पर, बल्कि हमने तो यह कहा था कि इस्लाम के कंसेप्ट के ख़िलाफ़ बात है। एक बेवा औरत के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला देता है, उस फ़ैसले को बदल कर के, संविधान में संशोधन करके एक ग़लत नज़ीर पेश कर रहे हैं। बाबरी मस्जिद को ढहाने वाले जो लोग हैं, आज वही उसको आधार बनाते हैं कि आपकी आस्था का सवाल था, तो हमारी भी आस्था का सवाल है, हम कोर्ट के फ़ैसले को नहीं मानेंगे।
…(समय की घंटी)…
महोदय, हम कहना चाहते हैं कि चाहे शाहबानो का मामला है या बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का मामला है, किसने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया, किसने शिला पूजन की इजाज़त दी, कौन इस बंडी के ऊपर जनेऊ लगा कर के कौन दूरदर्शन पर और टीवी पर पूरे मुल्क को दिखा रहे थे कि हम हिंदू हैं, यह क्या संकेत देना है? आज सियासत में जिस तरह से धर्म का इस्तेमाल करते हैं, इस पक्ष के लोगों ने समझा कि यह कॉपीराइट तो हमारे पास है। इधर के लोग इसको भुनाने के लिए चले, तो ये भी उससे कड़ा रुख अख्तियार करके, उसी रास्ते पर गामजन हो जाते हैं, चल निकलते हैं। वे सोचते हैं कि एक्सपर्टीज तो हमारे पास हैं, आप क्यों प्रयोग करने लगे?
…(समय की घंटी)…
महोदय, ऐसा मत कीजिए। मुझे पांच मिनट का समय और दे दीजिए।
श्री उपसभापति : देखिए, इस विषय पर बोलने के लिए जो आपकी पार्टी का समय है, आप उससे ज़्यादा समय ले रहे हैं।
…(व्यवधान)…
श्री अली अनवर अंसारी : हम बैठ जाते हैं, हुजूर।
श्री उपसभापति : मैं आपको बैठने के लिए नहीं कहूंगा, बल्कि मैं तो कहूंगा कि आप अपना समय लीजिए और समाप्त कीजिए।
श्री अली अनवर अंसारी : महोदय, हम आपकी बात का उल्लंघन नहीं करेंगे। हुजूर, हम एक बात कहकर बैठ जाते हैं। आज भी कुछ लोग यह कहते हैं कि तैयारियां भी चल रही हैं और पत्थर भी तराशे जा रहे हैं, नक्शे भी बनाकर दिखाये जा रहे हैं तथा उनकी बुनियाद पर पैसे भी वसूले जा रहे हैं। लोगों की टेक है कि हमारा मंदिर यहीं बनेगा। दूसरी तरफ दूसरे पक्ष के लोगों की भी टेक है कि हम उसी जगह पर मस्जि़द भी बनाएंगे। महोदय, चाहे वह सिंघल हो, तोगड़िया हो, बुखारी हो या शहाबुद्दीन हो अथवा जो भी ऐसी दिमागी सोच के लोग हैं, जो मस्जि़द बनाना चाहते हैं, जो मंदिर बनाना चाहते हैं, उन तमाम लोगों से हम हाथ जोड़कर यह कहना चाहते हैं कि आप नक्शे पर न जाएं। इस नक्शे से और इस ज़मीन के टुकड़े से मुल्क नहीं चलता है, कौमें नहीं चल सकती हैं। हम इसकी त्रासदी को आज तक भुगत रहे हैं, झेल रहे हैं। महोदय, हम एक शेर कह कर अपनी बात समाप्त करना चाहते हैं,
नक्शे तो तुम न जांचो, लोगों से मिलके देखो।
क्या चीज जी रही है, क्या चीज मर रही है।









ali anwar biahr ke hai, aur bihar ne hamesha se desh aur duniya ko rah dikhaee hai.unki chinta aur unke sarokar ka samman kiya jana chahiye aur aisi awazq desh ke jis kone se aaye auke sath khara hona chahiye.ye ek jawabdeh hastakshep tha, chandrashekhar sayad antim rashtraneta the jinse aisi awaze sunne ko milti thi jisme apna swarth gaun hota tha.
what kind of consitution are we talking about here? the constitution that can not resolve an issue for more then 80 years? The constitution that has become playground of some politicians. If you are really honest then raise the issue of modifiction in consitution that helps resolve such issue. Unfortunaltley everybody (and that includes Mr. Ansari too) just trying to a) see how can they be benifited by the issue b) by giving lectures trying to get popularity
Manniy sansad Ali Anvar jee,
Apne jo sawal sansad men uthaya uska aitihasik mahatwa hai.Darasal, secularism ke nam par political parties ne jo communalism machaya wah note karne layak hai. Iska yah bhi mani nahin ki communal parties achchhi hai.Bharat ko yadi jamhuriyat par lana hai to samvidhan, qanoon aur lokshahi ko swikar karna hi hoga.Avam Hindu -Muslim nahin karta, hamare siyasatdan aur daniswaron ne apne dayitwon ka thik se nirvah nahin kiya .Chaliye ,der se sahi is or aapka dhyan to gaya.Aise udbodhan ke liye aapko dili mubarakbad deta hoon.
Prem Prabhakar
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