क्यों छुपायी जा रही है “पा” की असली कहानी?
♦ रवीश कुमार

पा अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नहीं है। न औरो की है। असाधारण बीमारी को साधारण बनाकर यह फिल्म कुछ और हो जाती है। फ़िल्म के छोटे-छोटे किस्से अपनी मूल कहानी से छिटक कर अलग दुनिया रचते हैं, जो ज़्यादा गंभीर और असाधारण है। बहुत ज़्यादा इमोशनल लोड नहीं डालती है यह फ़िल्म बल्कि गहन भावुक क्षणों में सामान्य होने की सीख देती है। साफ़-सुथरी फ़िल्म है पा। लेकिन सिर्फ पा की नहीं है।
किसी ने नोटिस क्यों नहीं किया? यह फ़िल्म राजनेता की छवि को बेहतर तरीके से गढ़ती है और राजनेता के जरिये मीडिया को आईना दिखलाती है। अच्छा-सा नेता, कांग्रेस के युवा ब्रिगेड की तरह खादी का कुर्ता-पायजामा पहनने वाला नेता, जो राजनीति में शतरंजी चाल की परवाह किये बिना काम करना चाहता है। इससे पहले की किस फ़िल्म ने राजनेताओं में इतना भरोसा पैदा करने की कोशिश की है, याद नहीं है। हो सकता है, मुझसे छूट गयी हो। एक ऐसा नेता, जो सरकारी मीडिया पर भरोसा करता है। दूरदर्शन पर। उसका इस्तेमाल करता है। दूरदर्शन की पहुंच का इस्तमाल करता है और हम प्राइवेट न्यूज़ चैनल के पत्रकारों के मुंह पर गोबर फेंक देता है। तभी किसी पत्रकार ने फ़िल्म के इस पहलू की चर्चा नहीं की, या फिर मुझी से वैसी समीक्षा छूट गयी होगी।
अब वाकई डर लगता है। हमारी साख क्या इतनी खतम हो गयी है कि कोई नेता हमारे घर अपने लोगों को भिजवा देगा और हमारे घरों पर धावा बोल दिया जाएगा? शैंपेन के नशे में धुत पत्रकारों की लाइव तस्वीर दूरदर्शन से लाखों घरों में पहुंचेगी और फिर पत्रकारिता की तमाम बहसों के बीच हम भस्म कर दिये जाएंगे। मैं कांप रहा था। अब तक आदत पड़ जानी चाहिए थी। लेकिन मेरी आंखों के सामने दीवाली पर गिफ्ट लेने वाले और दलाली करने वाले पत्रकारों की शक्लें साबुत खड़ी हो गयीं। बहुत दिनों से इस तरह की छवियां कई फिल्मों में देख रहा था। किसी घटना के संदर्भ में मीडिया के आगमन को हास्यास्पद बनाने की कोशिश की जाने लगी है। हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञापन में ‘कैसा लग रहा है’ टाइप सवाल पूछती एक पत्रकार के सिर पर अख़बार का बंडल फेंक दिया जाता है। पा में बाल्की जी ने तो ग़रीबों का हमला करवा दिया है पत्रकारों पर। एक टीवी चैनल के मालिक के घर में भी लोग धावा बोल देते हैं। दूरदर्शन और प्राइवेट न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टर में बहस होती है। उसका लाइव प्रसारण होता है। दूरदर्शन के स्टूडियो से, जिसकी कमज़ोर साख के बदले प्राइवेट मीडिया का जन्म हुआ। आज प्राइवेट चैनलों की साख की ये हालत हो गयी कि दूरदर्शन की साख बेहतर बतायी जाने लगी है। जाने कितने पत्रकारों का पसीना पानी हो रहा है। मै भी कभी-कभार कहता रहता था कि एक दिन पब्लिक हमें मारेगी। लेकिन अंदाज़ा नहीं था कि हम इस तरह कहानियों के क्रूर पात्र हो जाएंगे। कुपात्र हो जाएंगे।
युवा नेता अभिषेक बच्चन। एक अच्छा-सा नेता। इसके जरिये घटिया स्तर से नीचे चल रही मीडिया पर लात-जूते बरसवाती है ये फ़िल्म। बाहर की असली मीडिया में इस पर सन्नाटा। फ़िल्म की कहानी से घोर सहमति बता रही है क्या? हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।
अब डरना चाहिए। इतनी बेबस मीडिया न तो पत्रकारों के लिए ठीक है न समाज के लिए। पत्रकारों के बिकने की ख़बर आउटलुक जैसी पत्रिका की कवर बनती है। प्रभाष जोशी अख़बारों का नाम अपने कॉलम में लिख विदा हो गये। सन्नाटा। चुप्पी। अपने भीतर आंदोलन कैसे हो? चलो इग्नोर कर दो। इसमें कोई बुराई नहीं। बुराई तो इसमें है कि चुप्पी का फ़ायदा उठाकर फिर से वही करने लग जाते हैं। सुधरते नहीं हैं। टीवी की आलोचना अपने माध्यम के लोगों के साथ करना मुश्किल है। सब स्वार्थों से एक दूसरे पर साधने लगते हैं। बोलने का अधिकार सबको होना चाहिए। कैसे रोका जाए। लेकिन जो फिल्म जिसकी नहीं है, उसकी तो मत कहो। एक पुलिस अधीक्षक हाल ही में फोन कर रोने लगे कि स्ट्रिंगर लोग दारोगा की बदली के लिए दबाव डालते हैं। उनसे महीने की दलाली लेते हैं। इनसे कैसे निबटें। बहुत सुनने के बाद उनसे यही कहा कि अगर आप के पास सबूत है और यकीन है तो पकड़ कर टांग तोड़ दीजिए। क्या यही छवि है हमारी पब्लिक में। फिर हम किस पब्लिक के नाम पर दुनिया के खात्मे वाले कार्यक्रमों को संवारेंगे। एक दिन वो भी फेल कर जाएगा।
पा अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नहीं है। एक अच्छे राजनेता की है, जो काम करते करते थका जा रहा है। जिसका कुर्ता सचिन पायलय से मिलता है। जो राहुल गांधी की तरह अंबेडकर बस्ती में जाकर हरिजनों को गंदगी से निजात दिलाने के लिए योजनाएं बनवाता है। सैकड़ों लोगों के बीच आकर अपनी निजी ज़िंदगी की बात स्वीकार कर लेता है… ‘हां उस रात मैंने कंडोम का इस्तमाल नहीं किया’… ‘मैंने भी वही किया जो मेरी उम्र का लड़का कर जाता है’… ‘लेकिन अच्छा हुआ कि उस रात कंडोम नहीं था’… ‘वर्ना औरो जैसा बेटा कहां मिलता।’ अमोल अर्ते की साफगोई ने सियासी साज़िशों को उलट दिया। वह एक ज़िम्मेदार नेता है। अपनी सुरक्षा को लेकर ज़िम्मेदार है। लोगों को सड़क पर पॉटी करते हुए नाराज़ होता है। कहता है सरकार ने शौचालय बनवा रखे हैं। अब यहां बाल्की को मीडिया की मदद लेनी चाहिए थी। जो दिखाता कि सरकारी शौचालयों की क्या हालत है। हम भी यही कर देते हैं कभी-कभी। इकतरफा हो जाते हैं।
लेकिन बाल्की ने फिल्म मीडिया की छवि बनाने के लिए नहीं बनायी है। बल्कि छवियों को गढ़ने वाली मीडिया को गर्त में फेंक देने के लिए बनायी है। दूरदर्शन की महिमा है। फिल्मकार की आलोचना सही है। लेकिन इकतरफा है। मीडिया की तरफ से वकालत करने का कोई फायदा नहीं है। हमारे इतिहास और वर्तमान में बहुत कुछ अच्छा है। बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है। लेकिन जो बुरा है वो ज़्यादा हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि न्यूज़ चैनलों को प्रोजेरिया हो गया है। इतने कम समय में इतनी तेज़ी से बढ़ गये कि हांफने लगे हैं। दम तोड़ते से लगते हैं। उन्हीं की इस बीमारी की कहानी है पा। कोई शोध करेगा कि इक्कीसवीं सदी की हिंदी फिल्मों में मीडिया के फटीचर काल का चित्रण।
नोट – पा एक मां और उसकी अनब्याही बेटी की भी कहानी है, जो मां बनना चाहती है। दोनों के रिश्तों में आज के समय के हालात की चुनौतियों को परिपक्वता से गढ़ने की कोशिश है। ये वो मां है जो अपनी अनब्याही बेटी के मां बनने पर उसे कलमुंही और कुलबोरनी नहीं कहती है। पूर्वजों को याद कर माथा नहीं पीटती कि इसने आपका सत्यानाश कर दिया है। बल्कि मां अपनी बेटी से सवाल करती है कि ये बच्चा चाहिए या नहीं। उसके बाद पूरी ज़िंदगी अपनी बेटी का साथ देती है। पा दो मांओं की भी कहानी है।
(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर। नामी ब्लॉगर। कस्बा नाम से मशहूर ब्लॉग। दैनिक हिंदुस्तान में ब्लॉगिंग पर एक साप्ताहिक कॉलम। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। उनसे ravish@ndtv.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









ठीक कहा रवीश सर आपने, मीडिया के सामने दिक्कत यही है कि वो हर उस चीज को दिखाता है, जो बिकती है…पा के सबसे बड़े प्रीमियर की बात सबने कही…सभी चैनलों ने पा की तारीफ के कसीदे पढ़ने में एक दूसरे को पीछे पड़ गए…सबको पता है अमिताभ बिकते हैं, उपर से अगर शाहरूख भी पार्टी में पहुंचे, तो क्या कहने…सारे फिल्म स्टार एक साथ कहां दिखते हैं…मीडिया भाव विभोर हो गया..ऐसे में फिल्म की आलोचना करने की बात कहां उठती है…अमिताभ ने मीडियाकर्मियों की जो आवभगत की…उसके बाद फिल्म के खिलाफ कुछ भी कहना पाप है…रही बात मीडिया की खराब छवि की…तो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार मीडिया ही है..नाम नहीं लेना चाहूंगा…लेकिन कहीं न कहीं हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं..
R Balki and paa has just showed mirror to many people who called thmselves journalists and think they can get away with running one sided stories without checking the facts. It might look one sided and biased but journalists are themselves to blame for this as most of the times they end up giving sermon to others . I think films like paa and rann ( upcoming film on braodcast media by ramgopal verma ) are like wake up call for tv journalists otherwise the way we are losing our credibility we will be always at receiving end.
रवीशजी,
आपके ‘मीडियावी दर्द’ को समझ सकता हूं। अगर कहीं कोई सीधे मीडिया पर सवाल उठाएगा तो भला दर्द आपको कैसे नहीं होगा? आखिर आप इससे जुड़े हैं। यानी मीडिया को हक है, सबके गिरेबानों में झांकने का अगर कहीं किसी और ने यह कर दिया तो ‘मीडियावी दर्द’ गुस्से के रूप में उभर आएगा, ठीक इस लेख की तरह।
आज पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन का पर्याय है
अविनाश जी के माध्यम से कस्बा पहले भी पढता रहा हूँ लेकिन दिल्ली मैं सूचना के अधिकार अवार्ड मैं रवीश जी से मुखातिब भी हुआ | पा को लेकर उनका विश्लेषण सटीक लगता है लेकिन यह भी है कि ये बदलाव आज के दौर मैं संभव नहीं जान पड़ता है | आज पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन का पर्याय है | नितांत चिंताजनक प्रसंग बांटता हूँ | मैं अवार्ड लेकर मेरे गाँव आया और मीडिया के साथियों के साथ चर्चा कर रहा था | वार्ता ख़तम होने के बाद मेरे यहाँ के एक पत्रकार साथी का फ़ोन आया कि हम फोटो के साथ बड़ी खबर दे रहे हैं, आपको तो एक लाख मिल गए, हमें क्या ? मैंने कहा कि साहेब आप मत प्रकाशित करिए तो दूसरे दिन मेरी खबर नदारद थी | दरअसल ये कहने का मतलब यह है कि जो बात रवीश जी कस्बा पर लिख रहे हैं वो गाँव मैं भी पहुँच गयी है | पा तो आइना दिखता है | बहरहाल मीडिया के भीतर के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए रवीश जी साधुवाद |
प्रशांत दुबे
भोपाल
atmadarpan.blogspot.com
ravish ji artical thoda chota likha karo jo hume padne me boriyat mahsush na ho, plz
सूरज जी
आपकी बात का ध्यान रखूंगा।
Ravish
Media ki vishwasneeyta jitni giri hai uski khabar media-karmiyon ko nahin hai shayad, warna ndtv apne ‘manoranjan-cum-news channelon’ par jo pesh kar raha thoda us’hi par nigah daal le to kuchh self-auditing ki shuruaat ho…!
पत्रकार, पुलिस, नेता या किसी को भी अलग से चांटे मारने की कोई तुक दिखाई नहीं पड़ती। इनमें से कोई भी आसमान से नहीं टपका। ये भी उसी समाज से आए हैं जहां से हम। हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम भी किसी से कम नहीं। पश्चिम में भी स्त्री की दशा वहां के पुरुष की तुलना में खराब है लेकिन यहां की स्त्री से बेहतर है। शायद यह इस पर निर्भर करता है कि हम कैसे समाज का हिस्सा हैं। कहीं एक समाज के रुप में हम पाखण्ड, कर्मकाण्ड और इमेज को वास्तविकता पर तरजीह तो नहीं देते ! इतने अवतारों, गुरुओं, ग्रंथों और महापुरुषों के बावजूद हम पश्चिम जैसा आत्मानुशासन और ई्रमानदारी क्यों नहीं पैदा कर सके !? हो सकता है कि हमारे यहां सीवर के ढक्कन चोरी हो जाने की वजह गरीबी और अशिक्षा हो, लेकिन तरह-तरह के टैक्सों की चोरी और पैसे और जाति-लिंग से जुड़ी कुप्रथाओं के बने रहने की वजह गरीबी और अशिक्षा भी नहीं हो सकतीं। इन्हें अमीर और पढ़े-लिखे भी छोड़ने को तैयार नहीं।
‘पा’ अभी देखी नहीं।
एक प्रश्न और उठने लगा है आजकल मन में। यह ‘साफ-सुथरी’ फ़िल्म क्या होती है !?
“paa” is an excellent movie ravish, yes u pointed the right things here which the director wants to showcase….i salute the creative work of the team behind the moovie…and u to highlight these important things here…thanks
रवीश जी…ये तीन बिंदु मेरी स्तब्धता के लिए हैं। जब पूरा हिंदुस्तान इसे अमिताभ के अभिनय का पुर्नजन्म, बेमिसाल अभिनय आदि आदि के लिए चीख चिल्ला रहा है, तब इस अलग सी सोच के लिए सिर्फ अच्छा है या बहुत अच्छा लिखा या वाह कमाल हो गया लिख कर कैसे निपटाया जा सकता है। पर इतने अच्छे शब्द और उससे भी अच्छे ऐसे तीखे विचार मेरे पास तो हैं नहीं. इस अलग सोच और अलग नजरिए के लिए आपको बधाई।
रवीश जी! प्राइवेट न्यूज़ चैनलों पर हुई बमबारी से आपकी पीडा मिश्रित सहमति जाहिर तौर पर दिख रही है। लेकिन यह हो भी क्यों ना, आखिर दूरदर्शन ने ऐसा किया और दिखाया है। बाली और अमिताभ की यह फिल्म केवल युवा राजनीति के जोश और साफगोई को ही भर स्पष्ट नहीं करती है बल्कि राजनीति में पुराने पड चुके राजनेताओं को टीवी. पर सीरीयल भी देखने का विकल्प बताती है। मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि यह फिल्म केवल प्रोजेरिया से पीडित एक औरो (AURO) की कहानी भर नहीं है बल्कि इसके पीछे की एक बहुत बडी दुनिया भी है इस फिल्म की जहां यह अपना अर्थ खोलती है। वस्तुतः यह फिल्म उस वर्जना को भी तोडने की सार्थक कोशिश करती है जिसमें ऐसा करने पर लडकी (विद्या) को घर, जाति विरादरी से अलग कर दिया जाता है। फिल्म की शुरूआत जया बच्चन से जिस तरह से होती है कि वें प्रमुख-प्रमुख पात्रों-सहकर्मियों का परिचय देती हैं, वह प्रयोग भी बहुत प्यारा और इसीलिए सार्थक लगता है क्योंकि सिनेमा अंततः देखने के लिय ही होता है। सच कहूं तो यह फिल्म बहुत ही मस्त है और देखी ही जानी चाहिय…
[...] की फिल्म है? 22 December 2009 No Comment पिछले दिनों रवीश कुमार ने पा को अलग ढंग से देखा था और मीडिया [...]
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