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	<title>Comments on: क्‍यों छुपायी जा रही है &#8220;पा&#8221; की असली कहानी?</title>
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		<title>By: Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; कौन कहता है कि &#8220;पा&#8221; अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है?</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/12/16/ravish-kumar-on-hindi-movie-paa/comment-page-1/#comment-4961</link>
		<dc:creator>Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; कौन कहता है कि &#8220;पा&#8221; अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है?</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Dec 2009 20:26:30 +0000</pubDate>
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		<description>[...] की फिल्‍म है?  22 December 2009  No Comment  पिछले दिनों रवीश कुमार ने पा को अलग ढंग से देखा था और मीडिया [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] की फिल्‍म है?  22 December 2009  No Comment  पिछले दिनों रवीश कुमार ने पा को अलग ढंग से देखा था और मीडिया [...]</p>
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		<title>By: धर्मेन्द्र प्रताप सिंह,एम.फिल.(हिंदी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-07</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/12/16/ravish-kumar-on-hindi-movie-paa/comment-page-1/#comment-4958</link>
		<dc:creator>धर्मेन्द्र प्रताप सिंह,एम.फिल.(हिंदी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-07</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Dec 2009 15:22:37 +0000</pubDate>
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		<description>रवीश जी! प्राइवेट न्यूज़ चैनलों पर हुई बमबारी से आपकी पीडा मिश्रित सहमति जाहिर तौर पर दिख रही है। लेकिन यह हो भी क्यों ना, आखिर दूरदर्शन ने ऐसा किया और दिखाया है। बाली और अमिताभ की यह फिल्म केवल युवा राजनीति के जोश और साफगोई को ही भर स्पष्ट नहीं करती है बल्कि राजनीति में पुराने पड चुके राजनेताओं को टीवी. पर सीरीयल भी देखने का विकल्प बताती है। मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि यह फिल्म केवल प्रोजेरिया से पीडित एक औरो (AURO) की कहानी भर नहीं है बल्कि इसके पीछे की एक बहुत बडी दुनिया भी है इस फिल्म की जहां यह अपना अर्थ खोलती है। वस्तुतः यह फिल्म उस वर्जना को भी तोडने की सार्थक कोशिश करती है जिसमें ऐसा करने पर लडकी (विद्या) को घर, जाति विरादरी से अलग कर दिया जाता है। फिल्म की शुरूआत जया बच्चन से जिस तरह से होती है कि वें प्रमुख-प्रमुख पात्रों-सहकर्मियों का परिचय देती हैं, वह प्रयोग भी बहुत प्यारा और इसीलिए सार्थक लगता है क्योंकि सिनेमा अंततः देखने के लिय ही होता है। सच कहूं तो यह फिल्म बहुत ही मस्त है और देखी ही जानी चाहिय...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रवीश जी! प्राइवेट न्यूज़ चैनलों पर हुई बमबारी से आपकी पीडा मिश्रित सहमति जाहिर तौर पर दिख रही है। लेकिन यह हो भी क्यों ना, आखिर दूरदर्शन ने ऐसा किया और दिखाया है। बाली और अमिताभ की यह फिल्म केवल युवा राजनीति के जोश और साफगोई को ही भर स्पष्ट नहीं करती है बल्कि राजनीति में पुराने पड चुके राजनेताओं को टीवी. पर सीरीयल भी देखने का विकल्प बताती है। मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि यह फिल्म केवल प्रोजेरिया से पीडित एक औरो (AURO) की कहानी भर नहीं है बल्कि इसके पीछे की एक बहुत बडी दुनिया भी है इस फिल्म की जहां यह अपना अर्थ खोलती है। वस्तुतः यह फिल्म उस वर्जना को भी तोडने की सार्थक कोशिश करती है जिसमें ऐसा करने पर लडकी (विद्या) को घर, जाति विरादरी से अलग कर दिया जाता है। फिल्म की शुरूआत जया बच्चन से जिस तरह से होती है कि वें प्रमुख-प्रमुख पात्रों-सहकर्मियों का परिचय देती हैं, वह प्रयोग भी बहुत प्यारा और इसीलिए सार्थक लगता है क्योंकि सिनेमा अंततः देखने के लिय ही होता है। सच कहूं तो यह फिल्म बहुत ही मस्त है और देखी ही जानी चाहिय&#8230;</p>
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		<title>By: आकांक्षा पारे</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/12/16/ravish-kumar-on-hindi-movie-paa/comment-page-1/#comment-4886</link>
		<dc:creator>आकांक्षा पारे</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Dec 2009 12:16:20 +0000</pubDate>
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		<description>रवीश जी...ये तीन बिंदु मेरी स्तब्धता के लिए हैं। जब पूरा हिंदुस्तान इसे अमिताभ के अभिनय का पुर्नजन्म, बेमिसाल अभिनय आदि आदि के लिए चीख चिल्ला रहा है, तब इस अलग सी सोच के लिए सिर्फ अच्छा है या बहुत अच्छा लिखा या वाह कमाल हो गया लिख कर कैसे निपटाया जा सकता है। पर इतने अच्छे शब्द और उससे भी अच्छे ऐसे तीखे विचार मेरे पास तो हैं नहीं. इस अलग सोच और अलग नजरिए के लिए आपको बधाई।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रवीश जी&#8230;ये तीन बिंदु मेरी स्तब्धता के लिए हैं। जब पूरा हिंदुस्तान इसे अमिताभ के अभिनय का पुर्नजन्म, बेमिसाल अभिनय आदि आदि के लिए चीख चिल्ला रहा है, तब इस अलग सी सोच के लिए सिर्फ अच्छा है या बहुत अच्छा लिखा या वाह कमाल हो गया लिख कर कैसे निपटाया जा सकता है। पर इतने अच्छे शब्द और उससे भी अच्छे ऐसे तीखे विचार मेरे पास तो हैं नहीं. इस अलग सोच और अलग नजरिए के लिए आपको बधाई।</p>
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		<title>By: sajeev</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/12/16/ravish-kumar-on-hindi-movie-paa/comment-page-1/#comment-4880</link>
		<dc:creator>sajeev</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Dec 2009 05:20:36 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;paa&quot; is an excellent movie ravish, yes u pointed the right things here which the director wants to showcase....i salute the creative work of the team behind the moovie...and u to highlight these important things here...thanks</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;paa&#8221; is an excellent movie ravish, yes u pointed the right things here which the director wants to showcase&#8230;.i salute the creative work of the team behind the moovie&#8230;and u to highlight these important things here&#8230;thanks</p>
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		<title>By: संजय ग्रोवर</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/12/16/ravish-kumar-on-hindi-movie-paa/comment-page-1/#comment-4878</link>
		<dc:creator>संजय ग्रोवर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Dec 2009 13:29:50 +0000</pubDate>
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		<description>पत्रकार, पुलिस, नेता या किसी को भी अलग से चांटे मारने की कोई तुक दिखाई नहीं पड़ती। इनमें से कोई भी आसमान से नहीं टपका। ये भी उसी समाज से आए हैं जहां से हम। हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम भी किसी से कम नहीं। पश्चिम में भी स्त्री की दशा वहां के पुरुष की तुलना में खराब है लेकिन यहां की स्त्री से बेहतर है। शायद यह इस पर निर्भर करता है कि हम कैसे समाज का हिस्सा हैं। कहीं एक समाज के रुप में हम पाखण्ड, कर्मकाण्ड और इमेज को वास्तविकता पर तरजीह तो नहीं देते ! इतने अवतारों, गुरुओं, ग्रंथों और महापुरुषों के बावजूद हम पश्चिम जैसा आत्मानुशासन और ई्रमानदारी क्यों नहीं पैदा कर सके !? हो सकता है कि हमारे यहां सीवर के ढक्कन चोरी हो जाने की वजह गरीबी और अशिक्षा हो, लेकिन तरह-तरह के टैक्सों की चोरी और पैसे और जाति-लिंग से जुड़ी कुप्रथाओं के बने रहने की वजह गरीबी और अशिक्षा भी नहीं हो सकतीं। इन्हें अमीर और पढ़े-लिखे भी छोड़ने को तैयार नहीं। 
‘पा’ अभी देखी नहीं।
एक प्रश्न और उठने लगा है आजकल मन में। यह ‘साफ-सुथरी’ फ़िल्म क्या होती है !?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पत्रकार, पुलिस, नेता या किसी को भी अलग से चांटे मारने की कोई तुक दिखाई नहीं पड़ती। इनमें से कोई भी आसमान से नहीं टपका। ये भी उसी समाज से आए हैं जहां से हम। हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम भी किसी से कम नहीं। पश्चिम में भी स्त्री की दशा वहां के पुरुष की तुलना में खराब है लेकिन यहां की स्त्री से बेहतर है। शायद यह इस पर निर्भर करता है कि हम कैसे समाज का हिस्सा हैं। कहीं एक समाज के रुप में हम पाखण्ड, कर्मकाण्ड और इमेज को वास्तविकता पर तरजीह तो नहीं देते ! इतने अवतारों, गुरुओं, ग्रंथों और महापुरुषों के बावजूद हम पश्चिम जैसा आत्मानुशासन और ई्रमानदारी क्यों नहीं पैदा कर सके !? हो सकता है कि हमारे यहां सीवर के ढक्कन चोरी हो जाने की वजह गरीबी और अशिक्षा हो, लेकिन तरह-तरह के टैक्सों की चोरी और पैसे और जाति-लिंग से जुड़ी कुप्रथाओं के बने रहने की वजह गरीबी और अशिक्षा भी नहीं हो सकतीं। इन्हें अमीर और पढ़े-लिखे भी छोड़ने को तैयार नहीं।<br />
‘पा’ अभी देखी नहीं।<br />
एक प्रश्न और उठने लगा है आजकल मन में। यह ‘साफ-सुथरी’ फ़िल्म क्या होती है !?</p>
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