अशोक जी चले गये, इस मातम का कोई नाम नहीं!

♦ आशीष जैन

वॉयस ऑफ इंडिया के वरिष्‍ठ पत्रकार अशोक उपाध्‍याय का कल तड़के अपने ही दफ्तर में निधन हो गया। पूरे दिन ये ख़बर कई तरह की अफवाहों की शक्‍ल में मीडियाकर्मियों के बीच घूमती रही। टेलीविज़न में काम का दबाव और रूटीन के साथ ज़्यादती को इस मौत के पीछे देखा गया। लेकिन उस पूरी रात अशोक उपाध्‍याय के साथ मौजूद रहे उनके सहयोगी पत्रकार आशीष जैन के इस स्‍मृति लेख से मालूम पड़ता है कि वे धीर-गंभीर, शांत थे : मॉडरेटर

Ashok Upadhyay 1

मैं नहीं जानता कि उस वक्त क्या हुआ था, क्यों हुआ था। बस इतना जानता हूं कि एक पत्नी ने अपने पति को खोया है। एक बच्चे ने अपने पापा को खोया है। बस इतना जानता हूं कि खबरों की आपाधापी में अपना भी कोई खबर बन गया। एक सितारा जो अब कभी नहीं चमकेगा। बस इतना जानता हूं कि 11 साल के बेटे के हाथ में भी वो जादू नहीं जो वो अपने पापा को जगा दे…

मेरे पूछने पर वो कुछ सोचने लग जाते, फिर उदासी से भरी मुस्‍कुराहट। मानो वो कहते दिख जाते… हां, मैं उदास हूं। मेरे शांत होने में दरअसल कई लोगों का भला है। इसलिए मैं अब शांत रहता हूं ताकि किसी को दर्द न हो। कहीं हम लोग गुनहगार तो नहीं? जो हुआ, वो शायद किसी गुनहगार के साथ ही होता है! आज वो हमारे बीच नहीं हैं। यक़ीन नहीं हो रहा कि कुछ मिनटों पहले जो शख्‍स हमसे मुस्करा कर बातें कर रहा था, वो कुछ ही देर में मिट्टी में तब्दील हो जाएगा। उनकी मौत पर हम सब सदमे में हैं। कई ज़‍िंदगियां बिलखती रहीं, हम सब शांत खड़े रहे। सच यही है वो ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी कमी हम हर क़दम पर महसूस करेंगे…

मरनेवाले तो बेबस हैं लेकिन जीनेवाले कमाल करते हैं। मैं नहीं जानता था कि उस औरत को हम क्या जवाब देंगे जो अपने पति का सुबह दरवाज़ा खोलने के लिए इंतज़ार कर रही थी, जिसके दरवाज़े पर उसका पति तो आया पर वो अब बोलता नहीं। बेटे की ज़‍िद पर भी वो पिता अब मुस्कराएगा नहीं, और अगर ज़‍िद छोड़ भी दी तो मानो अशोक जी कह रहे हों… बेटा मुझे माफ़ कर देना, मैं चाह कर भी जाग न पाऊंगा… बेशक तू मेरे गालों को खींच कर मुझे चीटर भी कह देना…

इसलिए, एक नज़र उस रात पर जो कई दर्द सबको देकर चली गयी…

Ashok Upadhyay on Screen

रात के 12 बजे मेरी शिफ्ट शुरू होती है। मैं रात को उनके साथ काम करने वाली टीम में था। नाइट शिफ्ट लगभग किसी वनवास जैसी ही होती है। जहां खामोशी और आप अक्सर बातें करतें हैं। ख़बरों के लिए बेशक हम जूझते न हों, पर अलसाई सुबह की ख़बरें अक्सर रात में जाग कर ही तैयार होती हैं। ख़बरों से लड़ने का सिलसिला चलता रहता है। कल की रात भी लगभग हर रात जैसी ही थी। हर बार की तरह ख़बरों के लिए बदहवासी में यहां से वहां… और एक चुभन… नाइट शिफ्ट होने से 1/2 घंटे पहले मैं ऑफिस पंहुचा। शाम या यूं कहें की प्राइम टाइम की थकान उतारते लोग, अशोक उपाध्‍याय हमारी नाइट शिफ्ट के इंचार्ज थे। स्वभाव से बेहद शांत और मेहनती इंसान। जिनसे आप कुछ सीख सकते हों। लंबा क़द, शानदार वॉयस ओवर और स्क्रिप्ट में महारथ…

वीओआई के साथ अशोक जी उस वक्त से जुड़े हुए थे, जब वो शुरुआती दौर में था। जब त्रिवेणी मीडिया लिमिटेड का वीओआई बंद हुआ, तो अपने इस किले से लिपट कर सुबकने वालों में वो भी थे पर वो शांत खड़े रहे। नाइट शिफ्ट में उनके साथ रहा। उनकी बातों को महसूस किया। ख़बरों से लड़ते हुए जब कोई चैनल आपस में लड़ता हुआ, किसी जूम जाम वाले कार्यक्रम पर चले जाते, तो मुस्‍करा कर कर रह जाते। रात को कितने पैकेज हैं, जो एडिट होने हैं, एडिटिंग टेबल और उसकी कला का क्या मतलब होता है, बखूबी वो जानते थे। शायद जब बाइट के लिए हम किसी को बुलाते और कोई न आता तो वो अपना काम बीच में छोड़ कर आ जाते थे। और यह सच है, उनमें हमेशा एक संयम देखा। वो चीज़ देखी, जो निश्चित रूप से भटकी हुई नहीं है। हमेशा शांत रहनेवाले और सबको प्यार करनेवाले हमारे अशोक सर अब हमेशा के लिए शांत हो गये हैं… यक़ीन नहीं होता…

उनको याद कर के आंखें नम हो रही हैं। बार-बार उनका चेहरा आंखों के सामने आ रहा है। उनकी मीठी आवाज़ सुनाई दे रही है। अगर हमसे कोई ग़लती हो भी जाए, तो कभी भी उन्होंने हमें ज़ोर से नहीं बोला। हमेशा समझाते, बच्चे ऐसा नहीं, ऐसा करो। हम उनसे अपने करियर से लेकर अपने परिवार तक की बातें शेयर करते थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कुराहट रहती थी जो दूसरों को भी मुस्कराने के लिए मजबूर करती थी। अपना सार काम ख़त्म होने के बाद वो तुरंत सीट पर बैठ जाते और अपना बनाया हुआ बुलेटिन देखते। शायद कुछ रह गया हो, मुझसे कहते रहे कि बेटा वाजपेयी जी का जन्मदिन है, उस पर एक वीओ ले लेना। मैं अभी आता हूं ना!

जाने कहां चले गये?

फोन किया तो पता चला कि फोन नहीं उठा रहे थे। तबीयत ख़राब थी। शायद दवा लेने गये हों। आवाज़ आयी… यह आवाज़ एक लड़की की थी, जो डेस्क पर थी… जबकि कुर्सी पर उनकी जेकेट रखी हुई थी… वक्त बीतता रहा, वक्त अब घर जाने का था… हम निकलने लगे… अशोक सर की कार से गुज़र रहे थे तो यह क्या… सर कार में बेहोशी की हालत में लेटे हुए थे। मैंने उनके सीने को देखा और मेरे साथी विपिन ने उनकी नब्ज़ देखी… एक गहरी ख़ामोशी… और कुछ नहीं… हमने तुरंत ऑफिस में जाकर कहा… तुरंत उनको मेट्रो में ले जाया गया… जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया…

घर से मोहित सर उनकी पत्नी और उनके बेटे को लेने गये। जैसे ही ऑफिस की गाड़ी अस्पताल पहुंची… लोगों की आंखों से आंसू बरस पड़े। वो वो व्यक्ति रोते हुए दिखा जो अपने आप को बेहद सख़्त दिखाने की कोशिश करता है। हर तरफ मातम और कुछ नहीं… लेकिन मुझसे सिर्फ इतना मालूम है कि इस मातम का कोई नाम नहीं…

मुझे तो बस इतना मालूम है कि बड़ी ही मेहनत से ऑफिस में रात को एक परिवार सजाया था, न जाने क्या हुआ, किसी ने पूरा परिवार उजाड़ दिया, दीवार रह गयी। अभी तक़रीबन चार बजे हैं। कुछ देर बाद मुझे फिर से ऑफिस जाना है। अपने उसी परिवार को फिर सजाना है। मैं नहीं जानता कि सब कैसे हो पाएगा। मेरी आंखें उन्हें ज़रूर ढूंढेंगी। उनके बिना जाने कैसे फिर वो शुरुआत होगी। (सलाम ज़‍िंदगी में छपे स्‍मृति लेख की संपादित प्रस्‍तुति)

Ashish Jain(आशीष जैन। वीओआई से जुड़े युवा पत्रकार। आजतक में ट्रेनिंग ली, जनसत्ता से करियर शुरू किया। लिखने का शौक है, कुछ अखबारों में संपादकीय भी लिखे। सलाम ज़‍िंदगी के कुछ सदस्‍यों में से एक। उनसे sweetcareashu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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