छाने का संदेश दे कर खुद चले गये अशोक सर

♦ प्रभात पांडेय

Ashok Upadhyay Image 2जाओ बेटा… छा जाओ। 29 नवंबर को अशोक सर की ज़ुबान से मेरे लिए ये आखिरी संबोधन था। मुझे याद है, वीओआई के न्यूज़रूम में ये शब्द कहते हुए उनके चेहरे पर मुस्कान का स्थायी भाव कायम था। दोनों हाथ पैंट की पॉकेट में डाल कर खड़े-खड़े वो अपने पैरों को हिला रहे थे। मेरा तबादला आउटपुट से रांची ब्यूरो में कर दिया गया था। इसलिए मैं अपने सभी सहकर्मियों से मुलाकात करने गया था। पता नहीं था कि ये अशोक सर से ज़‍िंदगी की आख़‍िरी मुलाक़ात होगी। अशोक सर ऐसी शख्सियत के मालिक थे जैसा हर पत्रकार बनना चाहता है.. लेकिन नहीं बन पाता। क्योंकि हर किसी के कूवत की बात नहीं कि वो खबरों की आपाधापी और फुल प्रेशर के बीच बिना चीखे चिल्लाए, सिर्फ मुस्कुराते हुए अपने काम को अंदाम दे डाले। मेरे लिहाज से अशोक सर मीडिया के महात्मा थे। क्योंकि प्रोफेशनल लाइफ में वे काम, क्रोध, मद और लोभ से ऊपर उठ चुके थे।

उनसे मेरा परिचय साल 2008 के अप्रैल माह में हुआ था। तब वो वीओआई में आउटपुट के शिफ्ट इंचार्ज थे। पहले दिन की मुलाकात में ही अशोक सर मेरे आदर्श बन गये। उन्हें लोगों की बड़ी अच्छी समझ थी। वो हुनर को परखना और उसे निखारने की कला जानते थे। टीवी की कॉपी कैसे लिखी जाती है, ये मुझे उन्होंने ही सिखाया। अशोक सर मुझे मेरे बॉस कम और पिता तुल्य दोस्त ज़्यादा लगते थे। वीओआई ज्वाइन करने के बाद जब वो अपनी फैमिली को लाने हैदराबाद गये थे, तो आते वक्त वहां से मिठाई लेकर आये थे। सबको एक-एक मिठाई देने के बाद मुझे पूरा पैकेट ही दे दिया और कहा कि बेटा खाते रहो और लिखते रहो। मेरे प्रति उनका व्यवहार वैसा ही था… जैसा एक पिता का अपने बेटे के साथ होता है।

एक बार की बात है। गर्मी के दिन में पसीने से लथपथ मैं पैदल ही अपने साथी के साथ ऑफिस की ओर बढ़ा जा रहा था। तभी पीछे से किसी ने मुझे आवाज लगायी। मुड़कर देखा तो अशोक सर अपनी कार का शीशा खोलकर मुझे बुला रहे थे। पास गया तो बोले कि बैठ जाओ, मैं भी ऑफिस ही जा रहा हूं। मेरी अक्सर काम के मामले में लोगों से लड़ाई हो जाया करती थी। न्यूज़रूम में कई बार जब मैं गुस्से में आ जाता था, तो वो पास आकर मुझे शांत कराते थे। समझाते थे, बेटा कूल रहो। अशोक सर मीडिया की गंदी राजनीति से हमेशा दूर रहते थे। यही वजह है कि उनसे नाक़ाबिल और जूनियरों को बड़ी-बड़ी पोस्‍ट मिल गयी लेकिन उन्हें नहीं मिली। एक बार तो उन्हें पंजाब-हरियाणा चैनल का हेड भी बनाया गया था। लेकिन 13 दिनों बाद ही उन्हें उस पोस्ट से हटा दिया गया।

वीओआई में अशोक सर का खूब इस्तेमाल हुआ। जब जिस डेस्क पर योग्य लोगों की कमी होती थी, उन्‍हें वहां भेज दिया जाता था। लेकिन पद और वेतन का अतिरिक्त लाभ नहीं दिया जाता था। वीओआई जब दोबारा से खुला तो पहले उन्हें मना कर दिया गया था। वो ऑफिस के बाहर चाय की दुकान पर तनाव में बैठे हुए थे। मैंने कहा कि सर कहीं और बात कीजिए, तो बोले कि यार मुझे कोई नहीं जानता। न ही मेरे पास किसी का नंबर है। क्योंकि वो सिर्फ काम से ही काम रखते थे और काम की बदौलत ही अपनी पहचान चाहते थे। उन्हें वीओआई में दोबारा नहीं बुलाया गया है। ये जानकर चौथी दुनिया के डॉ मनीष कुमार स्तब्ध रह गये थे। लेकिन बाद में मैनेजमेंट को उनकी काबिलियत के चलते उन्हें बुलाना ही पड़ा।

वीओआई में मेरी सौरव कुणाल और राकेश ओझा की तिकड़ी थी। हम तीनों में बढ़िया कॉपी लिखने को लेकर रोज़ बहस होती थी। और अगर कहीं कोई उलझन आ जाती, तो हम सीधे अशोक सर के पास जाते थे। क्योंकि वहां हमारी उलझन तो सुलझती ही थी, साथ में कुछ नया भी सीखने को मिल जाता था। हम तीनों खूब सिगरेट पीते थे। बिना किसी से छिपाये दबाये धुंआ उड़ाते थे। लेकिन अशोक सर के सामने कभी भी सिगरेट पीने की हिम्मत नहीं हुई। क्योंकि हम उन्हें अपना गार्जियन मान चुके थे। लेकिन आज हमारे गार्जियन हमें छोड़कर चुपके से चले गये। जाने का अंदाज़ भी वैसा ही रहा, जैसा ऑफिस में आने का और काम करने का। बिना शोर-शराबे के मुस्कुराते हुए। उनकी मुस्कान वीओआई के तनाव भरे माहौल में लोगों को हिम्मत देने का काम करती थी, जिनके नहीं होने की कमी अब वहां हर किसी को महसूस होगी।

जिन लोगों ने भी अशोक सर के साथ एक बार भी काम किया है… मेरा दावा है कि वो उन्हें कभी नहीं भूल पाएंगे। क्योंकि इंसानों को कैसे काम करना चाहिए इसका हुनर मैंने सिर्फ उनमें देखा है। आख़‍िर में दो शब्द मेरी गुरु मां और उस भाई के बारे में, जिसके पिता क्रिस्मस गिफ्ट दिये बिना ही, हम सबको शांत रहने का मौन संदेश देकर चले गये। मैंने भी ग्यारह की उम्र में पिता को खो दिया था, इसलिए मुझे उस दर्द का एहसास है। जब भी ज़रूरत पड़े याद कीजिएगा।

Prabhat Pandey(प्रभात पांडेय। फिलहाल मौर्या टीवी, पटना में एसोसिएट प्रोड्यूसर। वीओआई से जुड़े रहे। पहले दिल्‍ली में और फिर थोड़े दिनों के लिए रांची ब्‍यूरो में। रांची और दिल्‍ली से पढ़ाई-लिखाई की। वाईएमसीए से प‍त्रकारिता का विधिवत प्रशिक्षण। छलिया उनके ब्‍लॉग का नाम है। उनसे rabhatpandey108@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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