शर्म इनको मगर नहीं आती
♦ राजीव किशोर
ग़ालिब का ये शेर ख़ुद ग़ालिब के शहर दिल्ली पर एक दिन इतना सटीक बैठेगा, शायद ग़ालिब ने सोचा भी न हो। रविवार को दिल्ली के फ़िरोजशाह कोटला की पिच पर जो कुछ हुआ, उसने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन की बेशर्मी को सरेआम जाहिर कर दिया। दुनिया के नक्शे पर दिल्ली का फिरोज़शाह कोटला एक ऐसा दाग़दार पिच बन कर उभर गया है, जिसे धोने में अब एक अर्सा लग सकता है। शर्म का ताल्लुक सिर्फ़ और सिर्फ़ डीसीए से ही नहीं, बल्कि ख़ुद बीसीसीआई से भी है। क्योंकि अगर बीसीसीआई धृतराष्ट्र है, तो दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन कौरवों की वो सेना है जिसकी ग़लती धृतराष्ट्र को दिखाई नहीं देती या यूं कहें कि बीसीसीआई वो धृतराष्ट्र है जो कौरवों की ग़लती को देखना… उसे समझना और उसे दुरुस्त करना मुनासिब ही नहीं समझता।
वरना क्या वजह हो सकती है कि डीसीए लगातार ग़लती दर ग़लती करे और उसे कोई मुकम्मल सज़ा मुकर्रर नहीं की जाती हो। पिच क्यूरेटर ने मैच पर पानी फिर जाने के बाद अपनी ज़ुबान खोली… और कहा कि उसे पिच तैयार करने के लिए पूरा वक्त नहीं दिया गया। सिर्फ तीन महीने में वो जो कुछ कर सकता था… उसने किया। लेकिन क्या दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के आला अधिकारियों ने अपनी आंख, कान और उस अनुभव पर भी पट्टी बांध ली थी? क्या उन्हें नहीं पता था कि 90 दिन 100 ओवर के मैच के पिच के लिए काफी नहीं होते? क्या उन्हें पिच की महत्ता को एक बार फिर से समझाने की ज़रूरत है? क्या वे इतने नासमझ हैं कि वे ये नहीं जानते थे कि भारत-श्रीलंका वन-डे क्रिकेट सीरीज का आख़िरी मुकाबला दिल्ली में होने वाला है। वो तो भला हो धोनी-सहवाग की सेना का, जिसने ईडेन गार्डन में ही जीत का फूल खिला दिया था। वरना आज अगर दिल्ली में ये कमाल दिखाना होता तो फिर क्या होता? क्या डीसीए के ‘व्हाइट कॉलर’ अधिकारियों के पास इसका जवाब है? यक़ीनन वे इसका भी कोई माकूल जवाब तैयार कर लेंगे। लेकिन मैच को लेकर अपने-अपने किले को मज़बूत बनाने वाले डीसीए के अधिकारियों से आज सारा मुल्क ये जवाब चाहता है कि क्या आपको कभी शर्म आती है?
(लेखक टीवी पत्रकार हैं)













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