Articles Archive for January 2010
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दिलीप मंडल ♦ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय की मानें तो प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला प्रोफेसर कृष्ण कुमार, मृणाल पांडे, गंगा प्रसाद विमल और एक्जिक्यूटिव कौंसिल के बाकी सदस्यों का था। उनका इस फैसले से कोई लेना देना नहीं है और वो तो दरअसल अनिल चमड़िया को लेकर आये थे और उनके हाथ में होता तो वो अनिल चमड़िया को कतई न हटाते। वीएन राय के इस भोलेपन पर कौन न फिदा हो जाए?
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अनिल चमड़िया ♦ कौन लोग कह रहे हैं कि दलित होने के कारण मुझे हटाया गया है। दरअसल प्रचार की इस रणनीति को समझना चाहिए। किसी भी समस्या के केंद्र में क्यों नहीं ऐसी बात ला दी जाए, जिससे की पूरी बहस उल्टे सिर खड़ी हो जाए। मेरी नियुक्ति में कहीं से भी दलित शब्द शामिल नहीं है। फिर इस दलित की बहस को यहां क्यों खड़ा किया जा रहा है। कुलपति को मुझमें इतनी दिलचस्पी रही है कि मैं कितने लोगों के लिए अपने कमरे में खाना बनाता रहा हूं। वे मेरे बारे में इस तरह की सूचनाएं प्राप्त करते रहे कि मैं किस किससे सब्जी मंगवाता हूं। फिर कुलपति की तो वर्ण व्यवस्था के विषय में काफी दिलचस्पी दिखाई देती है। यह विषय उनका एक ब्रांड है। मैं अपने स्तर पर न तो किसी को अपनी जाति बताना जरूरी समझता हूं और ना ही किसी से उसकी जाति पूछता हूं।
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चंदन पांडेय ♦ ये हर कोई जानता है कि पात्रता के बजाय संबंधों और ताकत के सहारे चल रही इस दुनिया में विभूति नारायण राय को कोई दोषी नहीं ठहराएगा। जिस एक्ज्यूटिव काउंसिल के लोगों ने इस धत-कर्म में कुलपति का साथ दिया है, उन्हें भी उनका हिस्सा दिया जाएगा। वैसे भी 1995 से अखबार देखता पढ़ता रहा हूं, पर आज तक मृणाल का कोई ऐसा आलेख या कोई ऐसी रिपोर्टिंग नहीं देखी, जिससे लगता हो कि ये पत्रकार हैं या कभी रही हैं। हां, उदय प्रकाश की एक कहानी में किसी मृणाल का जिक्र आता है, जो दिनमान या सारिका में “अचार कैसे डालें” जैसे लेख लिखती हैं।
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आवेश तिवारी ♦ ये काम सिर्फ उन वामपंथियों का है, जिन्होंने खुद की अभिव्यक्ति का जरिया अपनी बिरादरी को बना लिया है और खुद को इसी बहाने स्थापित करना चाहते हैं। वामपंथियों का ये धड़ा साहित्य और पत्रकारिता में जाति से जुडी बहस चलाकर खुद को जनवादी साबित करना चाहता है। विश्वविद्यालय के विवादित बने रहने में ही अपना हित समझता है। वहीं ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें वीएन राय के चरित्र और उनकी कार्यशैली से पूरी तौर पर सहमति है। ये वो लोग हैं जिनकी वजह से आज वामपंथ सिर्फ राजनीति का एक तरीका न होकर जीवन जीने का ढंग है। कृपाशंकर चौबे के शब्दों में कहें तो इन्हें हम विद्वतजन कहेंगे।
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अवनीश राय ♦ दलितों का पक्ष धरने का दंभ भरने वाले वीएन राय ने न छात्रों के गांव टूर में खर्च होने वाले छह हजार रुपये वाली फाइल पर साइन नहीं किये लेकिन अपने करीबी एक प्रोफेसर के साथ छात्रों को 15 दिनों तक गोवा में टूर के लिए भेज दिया। इस गोवा यात्रा का बिल लाखों में था। अब इस बात का अंदाजा लगाना कितना मुश्किल है कि वीएन राय के इरादे क्या थे। साफ है कि प्रगितिशीलता का जो लबादा उन्होंने ओढ़ रखा था, वो अब उतर चुका है। जिनकी नियुक्तियां इन्होंने की हैं, उनमें से एक प्रोफेसर पर कॉपी-पेस्ट करके अंग्रेजी में कई किताबें लिखने का आरोप है जबकि उस शख्स को अंग्रेजी आती तक नहीं है। आखिर राय साहब किसको बहकाना चाहते हैं?
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विजय प्रताप ♦ एक अनिल चमड़िया है, वह भी गुरू शिष्य-परंपरा की धज्जियां उड़ाते हुए बच्चों से हाथ मिलाता है। उनके साथ एक थाली में खाता है। उन्हें पैर छूने से मना करता है। कुल मिलाकर वह हमारी सनातन परंपरा की वाट लगा रहा है। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक विश्वविद्यालय में यह प्रोफेसर एक संक्रमण की तरह अछूत रोग फैला रहा है। दोस्तो, यह सब कुछ फिल्मों में होता, तो हम एक हद तक स्वीकार भी कर लेते। लेकिन साहब, ऐसी फिल्में हमारी असल जिंदगी में ही उतर आये, यह हमे कतई बर्दाश्त नहीं।
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एक छात्र ♦ उन्होंने अपने कई चेहरे इजाद किये, जिनकी आड़ में एक साफ़-सुथरी छवि के साथ अपनी इच्छा-कुइच्छाओं को पूरी करते रहे। गोया संस्कृति, रंगमंच और ट्रेड यूनियन से जुड़े राकेश को विशेष कर्तव्याधिकारी बनाया। अकादमिक जगत के एक नामी शख्सीयत व धर्म-निरपेक्ष नदीम हसनैन को बतौर प्रतिकुलपति मनोनीत किया। साहित्य में अपने प्रशंसा गान के लिए सूरज पालीवाल को चुना। इसी क्रम में पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने दलाल की उन्हें तलाश थी। तुक्का भिड़ाया अनिल चमड़िया पर, उन्हें नियुक्त कर लिया। बेचारे अनिल चमड़िया को पत्रकारिता के सिवा और कोई कला नहीं आती थी, सो बेचारे मिसफिट रहे। चमड़िया विभूति जी के पीआरशिप के लिए यूज़लेस थे, सो गये।
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चंद्रभूषण ♦ वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से हटाये जाने की मैं अपनी योग्यता और क्षमता भर कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करता हूं। मैं नहीं जानता कि इस विश्वविद्यालय में किसी को प्रोफेसर नियुक्त करने का क्या क्राइटेरिया है। लेकिन संसार में ऐसा कोई क्राइटेरिया हो ही नहीं सकता, जिसके आधार पर किसी को उसका सारा कामकाज छुड़ाकर शिक्षा के सर्वोच्च पद पर बिठाया जाए और इसके छह महीने बाद उसे नाकाबिल बताकर नौकरी से हटा दिया जाए। इससे संबंधित विश्वविद्यालय के सामूहिक विवेक पर भी सवाल खड़ा होता है, जो अपने लिए एक कारगर प्रोफेसर तक नियुक्त नहीं कर सकता। बतौर शिक्षक अनिल चमड़िया की योग्यताओं से मैं वाकिफ नहीं हूं लेकिन बतौर पत्रकार उनकी उपलब्धियां असाधारण हैं और अपने जैसे सैकड़ों नहीं तो दसियों लोगों को मैं जरूर जानता हूं, जो उनकी पत्रकारीय प्रतिबद्धता और उनके लिखे हुए शब्दों से प्रेरणा लेते आये हैं।
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डेस्क ♦ विभूति नारायण राय ने मं गां अं हिं विवि वर्धा के अपने अब तक कार्यकाल में जितनी भी नियुक्तियां की हैं, उनमें नब्बे फीसदी भूमिहार हैं। इस वक्त जब अनिल चमड़िया को निकाले जाने की खबर मिली है, उसी वक्त एक खबर यह भी आ रही है कि विभूति नारायण राय कवि आलोकधन्वा को विश्वविद्यालय का हिस्सा बना रहे हैं। यक़ीनन आलोकधन्वा एक बड़े और प्रभावशाली और विलक्षण कवि हैं – लेकिन विभूति नारायण राय की तरफ से उनके हिस्से का सच ये है कि आलोकधन्वा भूमिहार जाति से आते हैं। मुझे लगता है कि अनिल चमड़िया को निकाले जाने का मसला सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि न्याय से छेड़खानी का मसला है और इस एक मसले पर हिंदी समाज के सृजनधर्मियों-संस्कृतिकर्मियों को अपना प्रतिवाद दर्ज करना चाहिए। विभूति नारायण राय के प्रचारित उज्ज्वल चेहरे के पीछे छिपे जातिवादी, अन्यायी और दंभी आदमखोर को बेपर्दा करना चाहिए।
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समरेंद्र ♦ दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी पर लिखी गयी पुस्तक का लोकार्पण हुआ। इसे आप महज संयोग कहेंगे या क्या कहेंगे कि उस लोकार्पण में जितने लोगों ने प्रभाष जोशी के बारे में अपनी राय रखी, उनमें से एक को छोड़ कर कोई भी गैर ब्राह्मण नहीं था। जो अकेला शख्स गैरब्राह्मण था, वो भी एक ऐसी जाति से ताल्लुक रखता था जो खुद को ब्राह्मण होने का दावा करती रही है। यहां तक कि हद से अनहद गये का प्रकाशक भी ब्राह्मण ही है। इसे भी आप महज संयोग कहेंगे या फिर क्या कहेंगे कि मंच पर आकर प्रभाष जोशी को महान बताने वालों में एक भी महिला नहीं थी।



