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क्‍या संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है?

3 January 2010 25 Comments

♦ विनीत कुमार

Sandeep ChaudharyIBN7 के एंकर संदीप चौधरी के आक्रामक अंदाज़ का मैं कायल हूं। उनके इस अंदाज़ का असर मुझ पर कुछ इस कदर है कि अगर पहले से लेटकर टीवी देख रहा होता हूं तो उनके आते ही उठ कर सीधे बैठ जाता हूं। एक-एक वाक्य और उस हिसाब से चेहरे और नसों के खिंचाव को समझने औऱ महसूस करने की कोशिश करता हूं। लेकिन सच की आवाज़ हमेशा ऊंची होती है या फिर सच बोलने के लिए ज़रूरी है कि ऊंची आवाज़ में ही बात की जाए, इस फार्मूले पर भरोसा रखनेवाले संदीप चौधरी हमें कई बार व्‍यथित भी कर जाते हैं। कई बार महसूस होता है कि इस अंदाज़ को बरक़रार रखने में भाषाई स्तर पर वो बेहद खोखले और हल्के हो जाते हैं।

भारतीय टेलीविज़न में व्यक्ति आधारित समीक्षा या आलोचना की परंपरा विकसित नहीं हुई है। साहित्य या दूसरी विधाओं में एक कवि, कथाकार या आलोचक के ऊपर दर्जनों थीसिस लिखी जाती रही हैं। इसी अनुपात में उन पर शोध-पत्र और किताबें भी लिखी जाती रही हैं लेकिन भारतीय टेलीविज़न समीक्षा चंद मुहावरों, जार्गन और जुमले के बीच ही विश्लेषित कर दिये जाते हैं। आज संदीप चौधरी पर लिखकर टेलीविज़न के भीतर मैं व्यक्ति आधारित समीक्षा की न तो कोई शुरुआत करने जा रहा हूं और न ही साहित्यिक परंपराओं की कलम रोपने की कोशिश कर रहा हूं। मैं तो ऑडिएंस की उस समझ को सामने रख रहा हूं जो टेलीविज़न से हमेशा चैनल के नाम पर जुड़ने के बजाय उस पर आनेवाले लोगों के स्तर पर जुड़ता है। मसलन अगर IBN7 पर आशुतोष, संदीप चौधरी और ऋचा आना बंद कर दें तो मैं ख़बर देखने के लिए तो इस चैनल पर नहीं ही आऊंगा। उसी तरह प्राइम टाइम पर विनोद दुआ, अभिज्ञान और रवीश जैसे लोग आना छोड़ दें, तो एनडीटीवी इंडिया देखकर शाम ख़राब करने का कोई मतलब नहीं है। कहना सिर्फ इतना चाहता हूं कि आज न्‍यूज़ चैनलों की जो स्थिति है, उसमें लोग चैनलों के ब्रैंड से ज़्यादा व्यक्तिगत तौर पर आनेवाले एंकरों के हिसाब से जुड़ते हैं। ये बात पुण्य प्रसून जैसे एंकर के साथ आजमा कर देख लीजिए। पूरी ऑडिएंस का एक बड़ा हिस्सा है, जो कि इनके हिसाब से चैनल देखता है। ये जिस भी चैनल में जाएंगे, वो उन्हें देखेगी। वो पुण्य प्रसून को पहले देखती है, चैनल को बाद में।

muddaबहरहाल, जिस संदीप चौधरी के अंदाज़ के हम कायल होते रहे हैं, वही संदीप चौधरी ने अपने भाषाई प्रयोग के स्तर पर हमें परेशान किया। हमें इस बात को अफ़सोस रहेगा कि एक अच्छा एंकर आक्रामक दिखने के लिए लगातार अपनी भाषा खोता जा रहा है। चेतन भगत और 3 इडियट्स को लेकर क्या कुछ चल रहा है, ये दुनिया जान रही है। दो जनवरी की रात मुद्दा कार्यक्रम के अंतर्गत संदीप चौधरी ने इसी मुद्दे पर बहस चलायी। उस बहस में क्या था और कौन लोग शामिल थे, इसकी तफसील में जाने से बेहतर है कि हम जो बात करना चाहते हैं, वही करें। आगे लिखने से पहले साफ कर दूं कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे चेतन भगत की राइटिंग पसंद नहीं है। आज के हवाले से कहूं तो एक हद तक उनका अंदाज़ भी नहीं। लेकिन मेरे ऐसा कहने से चेतन भगत की हैसियत तय नहीं होती। मेरी क्या, शायद संदीप चौधरी के कहने से भी तय नहीं होती। ये अलग बात है कि मेरे कहने और संदीप चौधरी के कहने के असर में आसमान ज़मीन का फर्क है। लेकिन संदीप चौधरी के साथ देश के किसी भी मीडियाकर्मी को इस बात का एहसास होना चाहिए कि चेतन भगत का एक बड़ा पाठक वर्ग है। टेलीविज़न एंकरों को तो अपनी हार्डकोर ऑडिएंस पता करने में वक्त लग जाए लेकिन एक लेखक को मोटे तौर पर उसकी रीडरशिप की जानकारी होती है। इस हिसाब से बात करें तो चेतन भगत के पीछे रीडर्स का एक ज़बर्दस्त बैकअप है। इस हिसाब से चेतन भगत की हैसियत किसी भी मीडियाकर्मी से कम नहीं है।

chetan bhagat

चेतन भगत क्या लिख रहे हैं, उससे हमारी कितनी सहमति-असहमति है, इस बहस में न जाकर इतना मानने में क्या परेशानी है कि वो इस देश के एक सेलेब्रेटी लेखक हैं। एक ऐसे लेखक हैं, जो दुनिया के आगे साबित कर चुके हैं कि लिख कर आप कहां तक जा सकते हैं? देश का बच्चा-बच्चा (लिखने-पढ़नेवाला) उन्‍हें जानता है। आप सिर्फ कंटेट पर टिककर न बात करके ओवरऑल बात करें, तो वो एक सम्मानित और लोगों के चहेते लेखक हैं। पॉपुलरिटी के मामले में वो किसी भी पेशे के सिलेब्रेटी को टक्कर देने की हैसियत रखते हैं। पिछले साल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अमिताभ बच्चन से मिलने के बाद जिसके लिए सबसे ज़्यादा होड़ मची थी, वो यही चेतन भगत थे। इसलिए उनकी राइटिंग से मानें या न मानें, पॉपुलरिटी से तो उन्‍हें बड़ा लेखक मान ही सकते हैं।

अब देखिए, मुद्दा में ज़ोर-शोर से बहस चल रही है। चेतन भगत नॉर्मल अंदाज़ में अपनी बात रख रहे हैं। इसी बीच संदीप चौधरी ने दूसरी ही तान छेड़ दी। हैलो फिल्म जब आयी थी तब भी आपको क्रेडिट नहीं दिया गया था, तब तो आप चुप थे लेकिन अब आप हल्ला कर रहे हैं। क्या 3 इडियट्स फिल्म अगर इतनी पॉपुलर नहीं होती तब भी आप ऐसा ही करते। मुझे याद आ रहा कि संदीप ने शायद ये भी कहा, पक्का नहीं कह सकता लेकिन भाव यही थे कि तब भी आप इसी वाल्यूम में बात करते। इसी के जवाब में चेतन ने कहा कि मैं कौन-सा छत पर जाकर चिल्ला रहा हूं। एक लेखक को अपनी बात रखने का हक़ है। लेकिन संदीप उन्‍हें सुनते ही नहीं, चिल्लाते हैं, अपनी ही रौ में बहे चले जाते हैं। सवाल ये है कि संदीप चौधरी या फिर देश का कोई भी मीडियाकर्मी जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, क्या उसमें लेखक को अपनी बात रखने की आज़ादी शामिल नहीं है। फिर वो चिल्लाना कैसे हो गया? संदीप चौधरी का ये भाषाई प्रयोग जायज़ है? इस पर बात होनी चाहिए।

चेतन भगत ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया कि उसके लिए इस तरह की भाषा इस्तेमाल की जाए? तब फिर आपके ऊपर हमले होते हैं और दिन भर स्टोरी चलती है – लोकतंत्र पर हमला तो वो चिल्लाने से किस रूप में अलग है? बेबाकी और आक्रामक अंदाज़ का मतलब ये तो बिल्कुल भी नहीं कि आपके सामने जो पड़ जाए, उसकी उतार कर रख दें। यही काम उन्होंने आगे भी किया।

चेतन भगत के ये बार-बार कहे जाने पर कि राजू (राजकुमार हीरानी, प्रोड्यूसर : 3 इडियट्स) सिर्फ इतना कह दें कि वो तीसरे नंबर पर यानी अभिजीत जोशी और स्वयं राजकुमार हीरानी के बाद मेरा नाम डाल देंगे, तो सारा झंझट ही ख़त्म हो जाएगा। संदीप चौधरी ने प्रोड्यूसर से पता करके बताया कि वो उठ कर चले गये हैं। कुछ ही देर बाद राजकुमार हीरानी का फोनो चलता है, जिसमें वो बताते हैं कि मेरी पत्नी टीवी पर ये सब देख कर शॉक्ड है। मैं घर पर टीवी देख रहा हूं और मैं भी शॉक्ड हूं कि मैं तो लाइव था ही नहीं, फिर आपने कैसे कह दिया कि मैं उठ कर चला गया? संदीप चौधरी बस इतना भर कहते हैं कि हम कोई ग़लती करते हैं तो इज़हार कर लेते हैं। अब देखिए, जब वो चेतन भगत से बात करते हैं, तो लगता है कि वो पूरी तरह से हीरानी के फेवर में बात कर रहे हैं क्योंकि चेतन के प्रति बहुत ही बेरुखी भाषा अपनाते हैं। लेकिन हीरानी की बात आने पर उठकर चले गये, फिर उनके प्रति भी यही रवैया। हीरानी अपनी पूरी बात करते, इसके पहले संदीप चौधरी शो समेट-समाट कर चल देते हैं। इसी क्रम में हीरानी बता जाते हैं कि चैनल ने उनके साथ क्या किया? मतलब ये कि अगर कोई कॉन्शस न रहे तो लाइन, दो लाइन के प्रयोग से किसी की भी बत्ती लगाने में चैनल को दो मिनट का भी समय नहीं लगता। सवाल ये कि क्या तटस्थ होने या ऑडिएंस को दिखलाने के लिए भाषाई स्तर पर अपने को ख़त्म कर लेना ज़रूरी है? ऐसा लोगों को वाजिब सम्मान देते हुए नहीं किया जा सकता क्या? ये ज़रूरी है कि एंकर हर शो में ये साबित करे कि वो एंकर है और उससे बात करनेवाले जो भी लोग हैं, उनसे नीचे की कतार में खड़े हैं। देखा-देखी में पूरी की पूरी पीढ़ी तटस्थ होने का मतलब भाषाई स्तर पर लोगों की उतार देना समझा करेगी। लोगों को सम्मान देने और भाषाई स्तर पर सभ्य होने का हुनर क्यों खत्म कर रहे हैं हमारे एंकर, जरा सोचिए।

vineet kumar(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक। ओजस्‍वी वक्‍ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्‍लॉग राइटर। कई राष्‍ट्रीय सेमिनारों में हिस्‍सेदारी, राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्‍लस नाम के दो ब्‍लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

25 Comments »

  • पोल खोल said:

    “मसलन अगर IBN7 पर आशुतोष, संदीप चौधरी और ऋचा आना बंद कर दें तो मैं ख़बर देखने के लिए तो इस चैनल पर नहीं ही आऊंगा। उसी तरह प्राइम टाइम पर विनोद दुआ, अभिज्ञान और रवीश जैसे लोग आना छोड़ दें, तो एनडीटीवी इंडिया देखकर शाम ख़राब करने का कोई मतलब नहीं है। कहना सिर्फ इतना चाहता हूं कि आज न्‍यूज़ चैनलों की जो स्थिति है, उसमें लोग चैनलों के ब्रैंड से ज़्यादा व्यक्तिगत तौर पर आनेवाले एंकरों के हिसाब से जुड़ते हैं। ये बात पुण्य प्रसून जैसे एंकर के साथ आजमा कर देख लीजिए। पूरी ऑडिएंस का एक बड़ा हिस्सा है, जो कि इनके हिसाब से चैनल देखता है। ये जिस भी चैनल में जाएंगे, वो उन्हें देखेगी। वो पुण्य प्रसून को पहले देखती है, चैनल को बाद में।”

    वाकई में आप “तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक” हैं! अब आप मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए। इन नामों में से एक भी आज तक और इंडिया टीवी के पास नहीं हैं। अंग्रेजी में तथाकथित स्थापित नामों से एक अर्णव गोस्वामी को छोड़ दें तो एक भी टाइम्स नाउ में नहीं है। फिर भी ये चैनल अपनी-अपनी भाषा में नंबर वन क्यों बने हुए हैं? अगर ऑडियंस आपकी तरह शाम ख़राब करती है (जैसा कि आपने दावा किया है) तब तो एनडीटीवी इंडिया को नंबर वन और आईबीएन को नंबर दो होना चाहिए था। सभी बताएं विनीत जी आप टीवी पर रोचक लिखते हैं और आपके पास भाषा भी है। लेकिन आपको टेलीविजन न्यूज़ का “टी” भी नहीं मालूम।

  • ajay brahmatmaj said:

    नयी कोशिश के लिए बधाई। थोड़ा और विस्‍तार में जाना चाहिए था। शब्‍दों के साथ आंगिक मुद्राओं और सवालों पर भी विस्‍तार से बात होनी चाहिए। आप कभी करण थापर को देखें। एक जिद्दी और सभ्‍य इंटरव्‍यूअर हैं करण। बात करना भी कला है। हमारे एंकर ही नहीं,हमारा समाज भी इस कला से वाकिफ नहीं है। हम सम्‍मान ही नहीं देते। फिल्‍म पत्रकार सभी फिल्‍मी हस्तियों के पीछे उनके लिए जू-तड़ाक का इस्‍तेमाल करते हैं। शाहरूख,सलमान और आमिर किस खेत की मली हैं। वे सीनियर बच्‍चन के लिए भी कहते हैं कि अरे वो क्‍या करेगा,पगला गया है। खुद का श्रेष्‍ठ समझने की ग्रंथि पत्रकारों में आ ही जाती है,जबकि समाज के हित में उनका कनवा भर कंट्रीब्‍यूशन नहीं होता। आप बाकी एंकरों की भी समीक्षा करें।फिर से बधाई।

  • पोल खोल said:

    एक बात और बता देता हूं। हो सके तो किसी से टीआरपी चार्ट मंगा कर इसकी पुष्टि कर लीजिएगा। रवीश और विनोद दुआ का कार्यक्रम टीआरपी मीटर में अपने स्लॉट में फिसड्डी माना जाता है। ऋचा के कार्यक्रम का भी वही हाल है। कभी तीन तो कभी चार प्वाइंट मिलते हैं। ये लोग अपनी अपनी जगह पर टिके हुए हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि आप और आपके गुरू पचौरी साहब जैसे विश्लेषक इन्हें महान साबित करते रहते हैं। कभी करीब से देखिए तो पाएंगे कि ये लोग बहुत खोखले हैं। ख़बरों को लेकर इनका नज़रिया उतना ही संकीर्ण है। ये देश और दुनिया की बात करते हैं लेकिन दिल और दिमाग के स्तर पर अपने गांव और कस्बे से ऊपर नहीं उठ सके हैं। वही बात इनके कार्यक्रमों में नज़र आती है।

    आपने भाषा की बात की है। आप बता सकते हैं कि पुण्य प्रसून वाजपेयी कितने शब्दों का उच्चारण शुद्ध करते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि पुण्य प्रसून वाजपेयी कितने वाक्यों को पूरा बोलते हैं? आपको अंदाजा ही नहीं। वो शख़्स एक भी वाक्य पूरा नहीं बोलता है। शब्दों का उच्चारण बहुत ख़राब तरीके से करता है। लेकिन आप लोगों के भीतर मौजूद कुंठाएं उनके इसी अंदाज़ की वजह से उन्हें खुदा बनाती हैं। आप जैसे लोगों को लगता है कि एक दाढ़ी वाला शख़्स जो देसी अंदाज में हिंदी बोलता है एक ऐंकर है। मतलब आपके बीच का कोई आदमी टेलीविजन स्क्रीन पर पकर-पकर करता है। बस आप जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के दूर दराज इलाकों से दिल्ली पहुंचे बुद्धिजीवी उसमें अपनी कुंठित अकांक्षाओं को परवान चढ़ते देखते हैं और तारीफ़ के कसीदे पढ़ने लगते हैं। तभी मनोरंजन भारती जैसे लोग भी एंकर बन जाते हैं। और रवीश कुमार भी रगिया-रगिया कर प्राइमटाइम की एंकरिंग करने लगते हैं।

    आखिर में आपको सलाह है कि टीवी पर लिखने से पहले और किसी भी बात को अंतिम सत्य की तरह स्थापित करने से पहले थोड़ा संयमित तरीके से विचार कीजिए। यह भी पता लगाने की कोशिश कीजिए कि किसी चैनल का एक सोबर एंकर दूसरे चैनल पर पहुंच कर अचानक लाउड क्यों हो जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उस चैनल पर एंकरिंग की पहली शर्त ही लाउड होना है? आप आईबीएन के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष की एंकरिंग के बारे में क्या कहेंगे? और ग्रुप के कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई की एंकरिंग के बारे में?

  • विनीत कुमार said:

    पोल खोल,रवीश की टीआरपी फिसड्डी होती है,ऋचा का भी यही हाल है। इसी बात का तो हमें दर्द है। लिखने के पहले मुझे पता था कि आप जैसे इस देश में भतेरे लोग हैं जो मामले को टीआरपी तक घसीट लाएंगे। इस मामले में कुछ और पढ़ना चाहें तो नया ज्ञानोदय का मीडिया विशेषांक देखिए। उसमें मैंने एक लेख लिखने की कोशिश की है- क्या है टेलीविजन का अर्थशास्त्र। दर्द तो इसी बात का है पोल खोल कि कोई दो-तीन दिन लगाकर एक प्रोग्राम बनाता है वो बुरी तरह पिट जाता है। जबकि कोई इन्टरटन्मेंट चैनलों से कांट-जोड़कर आधे घंटे की चिप्पी तैयार करता है,उसे चमकीले तरीके से पेश करता है औऱ टीआरपी की शाबासी पाता है। मैं टेलीविजन की इस टीआरपी के अर्थशास्त्र को नकार नहीं रहा लेकिन आप ही बताइए कि कभी आपने इस तरह के कार्यक्रम को कोई सम्मान या एवार्ड पाते देखा है। एवार्ड में तो रवीश,पुण्य प्रसून,उमाशंकर और कमाल खान जैसे लोगों को ही सराहा जाता है। इसलिए आप बात करते समय टीआरपी का गोबर थोपने के साथ ही इसे शामिल क्यों नहीं करते? आजतक का नाम नहीं लिया इसके पीछे कोई गणित नहीं है। वहां भी शम्स,अजय कुमार अभिसार शर्मा औऱ प्रतीक,श्वेता सिंह और रितुल जोशी जैसे लोग हैं जिन्हें मैं लगातार देखता-सुनता हूं। कुछ तो अच्छे लगते हैं और कुछ इस चैनल को लेकर नान्टॉल्जिक हो जाता हूं। जिनके बगल में बैठकर खाना खाया उन्हें अपने बेडरुम की स्क्रीन पर देखकर। हमारी जैसी देश में लाखों ऑडिएंस है जो टीआरपी की भाषा न समझते हुए भी पसंद औऱ नापसंद की लिस्ट लिए घुमती है। देश में चैनलों को सब्सक्रिप्शन से मिलने वाली रकम में लगातार इजाफा हो रहा है। मेरी अपनी समझ है कि अगर ग्राफ इसी तरह रहा तो विज्ञापन से कहीं ज्यादा सब्सक्रिप्शन का अर्थशास्त्र काम करेगा। तब चैनलों के हाथ चौंकाने वाले आंकड़े हाथ लगेंगे। इंतजार कीजिए। अब बात रह गयी टेलीविजन का टी आने और नहीं आने का तो इसके लिए आप जैसे किसी भी लोगों के हाथों कोई सर्टिफिकेट लेने की जरुरत नहीं है। भारस सरकार की दी हुई डिग्री और प्रमाण पत्र काफी है।…अभी इतना ही है। बातें होती रहेगी। एंकरों के अंदाज औऱ भाषा के सवाल पर बहस जारी रहे,ऐसा जरुरी है।…

  • रवींद्र रंजन said:

    सबसे पहले तो कहना चाहूंगा कि जिस शालीनता के स‌ाथ विनीत ने अपनी बात कही है, यहां पर टिप्पणी करने वालों को भी उसी शालीनता स‌े पेश आना चाहिए। विनीत ने अपनी पसंद और विचार स‌ामने रखे हैं जिनका उन्हें पूरा हक है। आलोचना स‌े बौखलाकर बेनामी टिप्पणियां करना और दूसरे की स‌मझ को छोटा आंकना निहायत ही गलत है। इलेक्ट्रानिक मीडिया स‌े जुड़े लोगों में एक बात अक्सर देखने को मिलती है कि वो अपनी आलोचना स‌े बौखला जाते हैं। ऎसा इसलिए है क्योंकि वो खुद को खुदा मान बैठते हैं। वह मानकर चलते हैं कि वो गलत हो ही नहीं स‌कते। जबकि स‌भी को आत्मविश्लेषण करना चाहिए औऱ आलोचनाओं का स्वागत करके खामियों को दूर करना चाहिए। अगर कुछ खटकता है तो आलोचना होगी है। जिस तरह स‌े पोल खोल महोदय रिएक्ट कर रहे हैं वह अनुचित है। अगर विनीत को पुण्य प्रस‌ून वाजपेयी और विनोद दुआ पसंद हैं तो जरूर उनमें कोई तो खासियत होगी। वाजपेयी और उनके जैस‌े दूसरे एंकर को गरियाने स‌े पहले ये तो स‌ोचिए कि क्यों उन्हें स‌ारा देश पसंद करता है। बेनामियों के उनकी भाषा में खामियां निकालने स‌े कोई उनकी खासियतें और लोकप्रियता कम नहीं हो जाएगी। यह स‌च है कि लोग अपने पस‌ंदीदा एंकर की वजह स‌े चैनल देखते हैं। कोई इस स‌च्चाई को न स्वीकार करे तो यह उसकी मर्जी है। मेरे खयाल स‌े आक्रामकता का मतलब बेहूदगी कतई नहीं होता। कुछ एंकर चर्चा के लिए बुलाए मेहमानों स‌े बेहूदगी करते हैं औऱ फिर खुद ही न्यूज रूम में कहते घूमते हैं कि देखा स‌ाले को कैसे धो दिया। ऎसा इसलिए होता है क्योंकि वह मान कर चलते हैं कि वह जो कर रहे हैं स‌ही है। चैनल में मौजूद उनके चेले चमचे भी वाह-वाह करके उनमें हवा भरते रहते हैं। विनीत ने जो लिखा है बिल्कुल स‌च है औऱ स‌च लिखने के लिए हिम्मत की दरकार होती है। चमचागिरी करने वाले तो मीडिया में बहुत हैं। जो स‌ज्जन उन्हें टीवी की “टी” स‌िखाना चाहते हैं वह शायद अपनी बनाई दुनिया को ही स‌ारी दुनिया स‌मझ बैठे हैं औऱ उन्हें लगता है कि टीवी की स‌ारी स‌मझ उनकी बपौती है। विनती को एक अच्छे लेख पर बधाई। ऎसे ही लिखते रहें। कीप इट अप।

  • पोल खोल said:

    चलिए यह बात आपने मानी की आप नॉस्टॉल्जिक हो जाते हैं। किसी भी लेखक का नॉस्टॉल्जिक होना अच्छा है, लेकिन आलोचक के लिए यह बुरी बात है। दूसरी बात – आप कहते हैं कि संदीप चौधरी को शऊर नहीं और कोई आपसे कह दे कि आपको टेलीविजन का टी नहीं आता तो आप भारत सरकार की दी हुई डिग्रियां गिनाने लगते हैं। गजब आदमी हैं आप। आप हल्की सी आलोचना सह नहीं पाए। तल्ख हो गए। खैर छोड़िए इस बात को… बात मुद्दे पर करते हैं।

    आपने कहा कि टीआरपी का गोबर। टीआरपी क्या है यह तो आप जानते ही होंगे। अगर यह गोबर है तो इसे तथाकथित स्वनामधन्य लोग खारिज क्यों नहीं कर देते? दरअसल टीआरपी हमारी और आपकी सोच से ऊपर की चीज है। यह बताती है कि किस प्रोग्राम को कितने लोगों ने देखा। यह एक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है। और इसे बाज़ार कबूल करता है। बाज़ार और पाठक हमारे, आपके और आपके लाड़ले पत्रकारों के पैमाने को कबूल नहीं करते। यही पीड़ा आपकी है और उन तमाम बुद्धिजीवियों और ताक़तवर लोगों की है जो देश की किस्मत अपने हिसाब से रचना चाहते हैं। उसकी जनता के हिसाब से नहीं। इसलिए हमेशा ध्यान रहिए कि अगर आपके पास टीआरपी नहीं … तो इसका मतलब हुआ कि आपके पास दर्शक नहीं हैं और आपकी आवाज़ जंगल में मोर के नाचने जैसी है।

    अब अवार्ड का गणित समझिए। अवार्ड किसे और क्यों मिलता है और इस रेस में सैकड़ों पत्रकार क्यों पिछड़ जाते हैं? दरअसल अवार्ड उन्हीं को मिलता है जिन्हें मनोनित किया जाता है। या जिनके प्रोग्राम उस कार्यक्रम में भेजे जाते हैं। हर रोज देश के तमाम अख़बारों में दर्जनों ख़बरें ब्रेक की जाती हैं दर्जनों रिपोर्टाज प्रकाशित होते हैं… कई तो लाजवाब होते हैं। लेकिन उनमें से इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो किसी को अवार्ड नहीं मिलता और ना ही वो अवार्ड मिलने की टुच्ची सी ख़बर को प्रकाशित करवाने और टिकर पर चलवाने के लिए उछलत-कूदते हैं। अवार्ड भी इस देश में भांटों को मिलता है। एक-दो अपवाद को छोड़ कर। यह हाल सिर्फ़ पत्रकारिता के पुरस्कारों का नहीं है बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कारों का भी है। भारत रत्न का भी है।

    आखिर में आपसे एक सवाल – रवीश कुमार और कमाल खान और उमाशंकर सिंह … पंद्रह-बीस साल से पत्रकारिता में हैं – मेनस्ट्रीम रिपोर्टिंग में हैं … आप यह बताने का ज़रा कष्ट करेंगे कि इन डेढ़-दो दशकों में इन तथाकथित दिग्गज और अवार्ड विनर रिपोर्टरों ने ऐसी कितनी ख़बरें की हैं जिनसे सत्ता के गलियारे में हड़कंप मचा हो? इनका किया कोई स्कूप क्या याद है आपको? आप से एक गुजारिश है… इस सवाल का जवाब देते वक्त इनके दिए भाषण मत गिनवाइयेगा। क्योंकि मै मानता हूं कि अगर विनीत जी आपको आपका बॉस मौका दे तो इनसे बेहतर भाषण दे लीजिएगा।

  • पोल खोल said:

    रवींद्र रंजन जी, आप तो बहुत बड़े कलाकार मालूम होते हैं। आपने कहा कि “अगर विनीत को पुण्य प्रस‌ून वाजपेयी और विनोद दुआ पसंद हैं तो जरूर उनमें कोई तो खासियत होगी। वाजपेयी और उनके जैस‌े दूसरे एंकर को गरियाने स‌े पहले ये तो स‌ोचिए कि क्यों उन्हें स‌ारा देश पसंद करता है। बेनामियों के उनकी भाषा में खामियां निकालने स‌े कोई उनकी खासियतें और लोकप्रियता कम नहीं हो जाएगी। यह स‌च है कि लोग अपने पस‌ंदीदा एंकर की वजह स‌े चैनल देखते हैं।”

    इसका मतलब तो यही हुआ कि विनीत को जो कुछ भी पसंद होगा उसमें कोई न कोई जरूर बात होगी और वह बात आपको भी पसंद लगेगी और इसलिए जो कुछ भी विनीत को पसंद होगा वह आपको भी पसंद होगा। आप उसे ब्रह्मवाक्य मान कर अंतिम सत्य की तरह स्थापित करने लगेंगे।

    यह तो कोई लाजवाब किस्म का दरबारी ही कह सकता है। आप बहुत बड़े दरबारी मालूम होते हैं। विनीत की दरबार के दरबारी …. हा हा हा… जिस तरह आपने कहा कि विनीत को दूसरों की परवाह किए बगैर लिखना चाहिए तो मैं विनीत या फिर आपकी परवाह क्यों करूं? आप कोई भी तुर्रम खां हो मैं आपको और आपके गुरू विनीत को सिरे से खारिज करता हूं।

    अरे नाराज़ मत होइए। मैं मजाक कर रहा था। मैं आपकी तरह नहीं हूं। आपने जो बातें कहीं हैं उन पर गौर कर रहा हूं और उनके आधार पर अपनी बात लिख रहा हूं। मेरी भाषा थोड़ी तल्ख है। लेकिन ऐसी ही है। मैं इसे बहुत सभ्य और सुसंस्कृत नहीं बना सकता। इसलिए आप सभी से गुजारिश है कि आप मेरी तल्ख भाषा को बर्दाश्त करते हुए… हो सके तो विनीत से पूछे गए मेरे सवालों का जवाब दीजिए। मेरे दिल और दिमाग पर छाए अंधेरे को दूर कीजिए।

    मुझे बताइए कि इस देश में अवार्ड की राजनीति क्या है और अर्थशास्त्र क्या है?

    इस देश में टीआरपी को अगर खारिज कर दिया जाए तो किस पैमाने पर कंपनियां न्यूज़ चैनलों को विज्ञापन देंगी? (वैसे यहां बता दें कि टीआरपी का पैमाना सरकार मानती भी है और नहीं भी मानती… शायद इसलिए अपने पसंदीदा चैनलों को अपनी पसंद के हिसाब से विज्ञापन देती है। यह एक किस्म का भ्रष्टाचार है और जैसे ही आप बाज़ार से टीआरपी को खारिज कर दीजिएगा यह भ्रष्टाचार और बढ़ेगा।))

    मुझे बताइए कि टीआरपी के अतिरिक्त वो कौन सा पैमाना हो सकता है जिसके आधार पर दर्शकों की संख्या तय होगी और बाज़ार उसे कबूल करेगा?

    मुझे बताइए कि अगर दर्शकों की पसंद-नापसंद पैमाना नहीं तो फिर किस आधार पर आपकी निजी पसंद और नापसंद को दूसरे लोग वास्तविक पैमाना मान कर उसे कबूल करें?

    मुझे यह भी बताइए कि जिन महान पत्रकारों का आप सभी ने नाम लिया है उन्होंने आज तक कितने नेताओं, कितने अधिकारियों और कितने ताक़तवर लोगों और संस्थाओं के ख़िलाफ़ कितनी और कौन से ख़बरें की हैं?

    आप इन सवालों का जवाब दीजिए तो हम और आप शालीन तरीके से बहस को आगे बढ़ाएंगे।

  • पोल खोल said:

    अरे कहां गए विनीत जी, कहीं किताबी या फिर सरकारी ज्ञान लेने तो नहीं चले गए? अरे बहस शुरू करके इस तरह लापता तो नहीं होना चाहिए?

  • Indscribe said:

    Sandeep Chaudhary is too loud, biased and even at times uncouth. Aggression is a quality but one shouldn’t get uncivilised.

  • एक और पोल खोल said:

    ये पत्रकार हैं या मदारी? और अगर ये मदारी हैं तो शोर तो मचाएंगे, मदारीपन तो दिखाएंगे।

    हे महाप्रभुओ, आप लोग भी टीवी पर आने वाली इस जमात की किन और किस मेधा की बात कर रहे हैं। इनमें से सभी को लाइन में खड़ा कर पूछ लो कि आखिरी किताब क्या पढ़ी है तो 100 में 99 बेहोश होकर गिर जाएंगे। बंदर के हाथ चैनल है भाइयों, कभी कभी इनमें से कोई शख्स हजार शब्द का कुछ लिखने की कोशिश(ज्यादातर तो ये खतरा उठाते ही नहीं)करता है तो उन्हें आप अखबार पन्नों पर हांफते दम तोड़ते देख सकते हैँ। उनके पास जीवन का अनुभव नहीं है, सरोकार शून्य हैं, ज्ञान है नहीं। जनरल नॉलेज ही इनके लिए नॉलेज है। और जनरल नॉलेज का भी कई बार इतना बुरा हाल होता है कि…

    अज्ञानी के अहंकार से भयानक और क्या होता है? तो वही अहंकार उगल देते हैं टीवी स्क्रीन पर। इसलिए भाषा में उग्रता आ जाती है। पचर-पचर बोल पाना इनकी एकमात्र खासियत है।

    क्या आपमे से कोई एक शख्स भी है जो ये कह सकता है कि वह ज्ञान के लिए टीवी पर समाचार देखता है? तो फिर बंद दिमाग खोलिए और काम पर चलिए।

    मेरी मानिए, ज्ञान जगत में हिंदी टीवी समाचार की मृत्यु हो चुकी है। इंटरनेट पर हिंदी की जय हो।

  • Prashant(PD) said:

    मैं ना तो पत्रकार हूं और ना ही उसका क ख ग घ पता है मुझे.. मैं तो बस यह जानना चाहता हूं(यहां मौजूद सभी सज्जनों से) कि टीआरपी क्या है, और उसे कैसे मापा जाता है और भारत में कितने टीवी सेट हैं और उनमें से कितने टीवी सेटों से सैंपल लेकर टीआरपी बनता है?

    मेरी भाषा थोड़ी मूर्ख जैसी है, मगर क्या करें आपको यह सब सहन करना ही होगा.. अगला सवाल मैं इस उत्तर के बाद करूंगा.. पोल-खोल जी से खास उम्मीद है क्योंकि टीआरपी का प्रश्न उन्होंने ही उठाया था..

  • mazkoor alam said:

    Bahas karne waon ki jamat mein saare log is baat par tule hain ki article ko aprasangik kaise kiya jaye. main puchhta hoon ki agar baat honi hai to is par kyon nahin hoti ki tv anchor akramak hai ki nahin. trp.. pasand napasand ka mamla kahan se aa gaya.. are ye baatein to vinit ne mudda uthane ke kram mein kahi hai. ho sakta hai ki aapki sahmati aur asahmati un naamon par ho… lekin mudda wo nahin hai.. mudda ye hai ki tv anchor akramak hai ki nahin. aur koi bhee suljha hua aadmi us par baat karega … na ki vinit ki pasand kya hai aur na hi hamein polkhol ki pasand napasand se koi lena dena hai. to bhai saheb ye to sach hai ki jyadatar patrakar khud ko khuda samjhane lage hain. issse inkar nahin kiya ja sakta…

  • विनीत कुमार said:

    पोल खोल! मैं कहीं नहीं गया हूं। आप मेरी पोस्ट में इतनी दिलचस्पी ले रहे हैं इसके लिए शुक्रिया। आपका सवाल बाकी लोगों के सवाल से अलग नहीं है और न ही उसका जबाब कोई अलग किस्म का है। ये तो मैं पिछले दो साल से लेखन के क्रम में देख रहा हूं कि टेलीविजन पर जैसे ही कोई बात कीजिए सारे मामले को टीआरपी के आसपास घसीटने में ताकत लगा दी जाती है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मैं टेलीविजन के बने रहने के लिए टीआरपी के मग्तव और उससे कहीं ज्यादा मजबूरी को नहीं समझ पा रहा हूं। यही बात तो मैं भी कह रहा हूं कि जब सारा मामला टीआरपी का है यानी अर्थशास्त्र का हिस्सा है तो फिर चैनलों पर हमला लोकतंत्र पर हमला कैसे हो जाता है? आप तमाम बिजनेस साइट में देखते हैं कि कार्पोरेट अपडेट्स में चैनलों और मीडिया संस्थानों की खबरें होती है। यानी कि शुद्ध रुप से ये बाजार का हिस्सा है तो फिर किसी भी चैनल में इतना क्षमता क्यों नहीं है कि वो लोकतंत्र पर हमला बताने के बजाय मीडिया कंपनी पर हमला लिखता है। आप ही बताइए कि ये कैसे संभव है कि जब हम चैनलों के रवैये पर बात करें तो उसे आप टीआरपी से जोड़ दें और जैसे ही हम आप ही जैसे लोगों के बताए रास्ते पर इसे मीडिया कंपनी कहें तो आप उसे लोकतंत्र की छतरी बनाकर तान दें। ये चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी वाला जो खेल चैनल कर रहे हैं वो कब तक चलेगा? जब उनसे सुधरने की बात करो तो टीआरपी का रोना लेकर बैठ जाएं और जब उसे बाजार का हिस्सा मानो तो फिर अपने को लोकतंत्र का पहरुआ साबित करने लग जाएं।
    दूसरी बात कि टेलीविजन की पूरी बहस को टीआरपी के भीतर लाने की अपनी राजनीति है। टेलीविजन में बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसका संबंध टीआरपी से नहीं है। अगर आप चैनलों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करेंगे तो आपको अंदाजा लग जाएगा। तब उसके भीतर से जाति,लिंग,अस्मिता,पहचान जैसे कई मसले उभरकर सामने आएंगे जिसका कि टीआरपी से सीधा संबंध नहीं होता। इसलिए इस बात की भी तो कोशिश होनी ही चाहिए कि टीआरपी के इतर जो खेल चलते हैं उसे भी सामने लाया जाए।
    तीसरी बात कि फिलहाल टीआरपी का हिसाब-किताब न्यायसंगत नहीं है। लेकिन कोई और पैमाना न होने तक इसे और दुरुस्त करते हुए जारी तो रखा ही जा सकता है। अभी वीओई के रिलांच होने पर अमित सिन्हा ने कहा कि वो खबर दिखाएंगे वो टीआरपी के पीछे नहीं जाएंगे। मैंने अपने टेलीविजन के अर्थशास्त्र में उन्हें उद्धृत करते हुए साफ तौर पर लिखा है कि ऐसा कहकर अमित सिन्हा या तो ऑडिएंस को भावुक कर रहे हैं या फिर किसी दूसरे अर्थशास्त्र की बात कर रहे हैं। हम सब जानते हैं कि जिस किसी को भी इन्डस्ट्री में विज्ञापन चाहिए,बिजनेस चाहिए उसे टीआरपी सिस्टम पर यकीन करना होगा।
    तीसरी बात,आपको शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि न्यूज चैनलों को लेकर लोगों के बीच किस तरह का असंतोष है। ये अलग बात है कि उनमें से अधिकांश लोग इस पर अपनी शक्ल दिखाने के लिए लालायित रहते हैं। एक औसत ऑडिएंस के बीच चैनलों के रवैये को लेकर किस तरह का एप्रोच है इसे आप समझने की कोशिश करें। अभी तो सारा खेल केबल ऑपरेटर और उसकी कृपा से पैदा होनेवाली टीआरपी पर टिका है तब ऑडिएंस का असंतोष साफ तौर पर दिखायी नहीं दे रहा। लेकिन जैसा कि मैंने पोस्ट में ही कहा है कि जैसे-जैसे सब्सक्रिप्शन के जरिए टेलीविजन का अर्थशास्त्र मजबूत होगा,कुछ नए नतीजे सामने आएंगे। तब टीआरपी की जो छतरी लगाकर चलने कि रिवायत बन गयी है उस पर नए सिरे से विचार करना होगा।
    तीसरी और आखिरी बात कि मैं आपके हिसाब से भले ही टेलीविजन के बारे में कुछ भी जानता-समझता नहीं हूं। ऐसी मुहर आपसे पहले भी अतुल अग्रवाल इस चुतिये विनीत को कुछ आता-जाता नहीं है लिखकर लगा चुके हैं। लेकिन यकीन मानिए कि मैं टेलीविजन पर लिखनेवाले उन लोगों से इस मामले में अलग हूं जो कि तमाम तरह के सामाजिक बदलाव की उम्मीद इस टेलीविजन से लगाए बैठे हैं। मैं किसी भी चैनल के बेहतर होने की मांग न तो टीवी विश्लेषक होने की हैसियत से करता हूं और न ही देश के एक नागरिक की हैसियत से। मैं खालिस तौर पर एक ऑडिएंस,आगे जाकर कहें कि एक ग्राहक की हैसियत से करता हूं कि भइया जब हम तीन-सवा तीन सौ रुपये देकर टीवी देख रहे हैं,उस पर वक्त दे रहे हैं तो हमें उस हिसाब से प्रोडक्ट भी तो मिले। मैंने IBN7 और कलर्स के लिए सौ रुपये में मिलनेवाले केबल को कटाकर टाटा स्काई लगाया है। इसलिए हमें इतना तो अधिकार है ही कि हम अपने मन का टीवी नहीं दिखने पर अपनी बात रखें। हम टीवी के कन्ज्यूमर होने के साथ-साथ प्रोज्यूमर है कि यही वो चैनल है जो हम जैसे लोगों को सिटिजन जर्नलिस्ट मानता है।

    आपने लिखा-अरे कहां गए विनीत जी, कहीं किताबी या फिर सरकारी ज्ञान लेने तो नहीं चले गए? अरे बहस शुरू करके इस तरह लापता तो नहीं होना चाहिए? अपनी तरफ एक कहावत है-लकड़ी छीले चिकना,बात छीले रुक्खा। मैं आपकी बात को छीलने लगा तो कई बातें निकल आएगी। हम आप जैसे लोगों की ललकार पर नहीं लिखते,महसूस करते हैं,तब लिखते हैं।..और जहां तक सवाल किताबी ज्ञान की है तो मीडिया में काम करनेवाले लोगों का एक बड़ा तबका है जो मुफ्त में मिलनेवाली किताबों को भी पढ़ने के लिए तरसता रह जाता है,खरीदकर पढ़ेगा,वो तो जाने ही दीजिए।..और वैसे भी किताबी ज्ञान को लेकर इतना उपहास क्यों? मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं,कहां है लेकिन घोस्ट राइटर बनकर ललकारने से कुछ नहीं होनेवाला। आप जो भी हैं,जहां भी है..आपका लाख-लाख शुक्रिया। आप मेरे लिखे का लगातार जबाब दे रहे हैं और सीरियसली ले रहे हैं।
    विनीत

  • सुशांत झा said:

    विनीत ने एंकर की भाषा और उसकी तल्खी पर एक विचार सामने रखा था, न कि चैनलों की टीआरपी या उनके नंबर-1 या 2 होने का विश्लेषण। लेकिन ऐसा लगता है कि उनके द्वारा उठाई गई बातों को ‘फास्ट फुड स्टाईल’ में निपटाने की कोशिश ज्यादा हो रही है। अब विनीत को पढ़कर जितना जान पाया हूं उससे इतना तो लगता ही है कि उसे कमसे कम टेलिविजन का टी जरुर पता है- वो टेलिविजन की भाषा पर लिखता रहा है तो उसे इस हिसाब से अपनी बात को सामने रखने का हक भी है। हां, वो इस बात के लिए मजबूर नहीं कि किसी का दिया हुआ ‘बिन मांगी मूर्खता का सर्टिफिकेट’ ग्रहण करे।
    ये ठीक है कि किसी चैनल की टीआरपी सिर्फ एंकर से तय नहीं होती-कई कारक हैं- लेकिन विनीत ने अपना उदाहरण देते हुए अगर कहा है कि खास किस्म के एंकर को ही वह टीवी पर पसंद करता है तो ये उसकी आजादी है। टीआरपी, अगर व्यापक दर्शक वर्ग (?) से तय होती है और कई चैनल कई वजहों से नंबर-1 या 2 भी हैं तो क्या बहस का मुद्दा ये नहीं होना चाहिए कि भाषा का शऊर क्या हो और उसका स्तर क्या हो? दूसरी बात ये कि टाईम्स नाऊ और इंडिया टीवी क्यों नंबर-1 हैं और एनडीटीवी इंडिया या आईबीएन-7 क्यों नहीं है ये बात सिर्फ एंकरों की मौजूदगी या उनकी मशहूरियत से तय नहीं होती-ऐसा तो विनीत ने भी दावा नहीं किया-ये पूरा का पूरा अर्थशास्त्र है जिसे विश्लेषित करना इस लेख का मकसद भी नहीं था। बात भाषा और उसके शऊर की हुई थी, न कि टीआरपी और डिस्ट्रीब्यूशन की।

  • एक और पोल खोल said:

    ज्ञान जगत में हिंदी टीवी समाचार की मृत्यु हो चुकी है। इंटरनेट पर हिंदी की जय हो

  • ANIL said:

    Be nice. Keep it clean. Stay on topic. No spam.

  • पोल खोल said:

    विनीत भाई, अच्छा लगा आपका जवाब पढ़ कर लगा। वरना हमें तो लगा कि आप आग लगा कर खुद हवा हो गए। आपसे मैंने कुछ और सवाल भी किए थे। भाषा और शऊर पर। लेकिन आपने उनका जवाब नहीं दिया या फिर आप टीआरपी के सवाल में उलझ कर उससे बच गए। यह रणनीति भी हो सकती है। मैंने आपसे पूछा था कि अवार्ड की राजनीति और अर्थशास्त्र क्या है? इसका आपने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने आपसे पूछा था कि जिन महान टेलीविजन हस्तियों के आपने नाम लिए हैं क्या कभी उन्हें किसी स्कूप या किसी नेता… अफसर या फिर व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसी बड़ी स्टोरी के लिए कोई अवार्ड मिला है क्या? आपने उसका जवाब भी नहीं दिया।

    यह विरोधाभाष है। बाज़ार और व्यवस्था के जिन पैमानों को आप खारिज करके भाषा और शऊर की बहस चला रहे हैं। उन्हीं पैमानों के आधार पर मिले अवार्ड और सम्मान का हवाला देकर आप कुछ लोगों को खुदा साबित कर रहे हैं। दोनों बातें आपके हिसाब से नहीं हो सकती। यह अवार्ड भी इसी बाज़ार का हिस्सा है और इसके तहत दी जाने वाली रकम भी इसी बाज़ार से आती है। इसलिए आप बाज़ार के एक मानक को खरा और दूसरे मानक को कूड़ा नहीं बता सकते।

    विनीत जी, भाषा और शऊर किसी चैनल के स्टाइशीट से जुड़े होते हैं। क्या कभी आपने आईबीएन ७ गौर से देखा है। आपने उसके धार्मिक कार्यक्रमों को देखा है। वहां धर्म का व्यॉसओवर भी क्रिमिनल स्टाइल में होता है। वहां इंटरटेनमेंट के एंकर भी चीखते हैं। वहां के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष और दूसरे ताक़तवर शख्स और एंकर संजीव पालिवाल इतने लाउड हैं कि ऑनएयर मेहमानों से गालीगलौज हो जाती है। और चैनल के कर्ताधर्ता राजदीप भी कम लाउड नहीं हैं। पूरे चैनल पर खेल से लेकर भूख की स्टोरी भी चीख की स्टोरी मालूम होती है। यह उस चैनल का स्टाइशीट है। वह चैनल ही लाउड है। इसे समझना चाहिए। बिना समझे बात अजीब सी और एक तरफा लगेगी।

    अब आपको एनडीटीवी का स्टाइशीट समझा देता हूं। वहां कोई भी जिसका मालिकों के दरबार में दखल हो वो एंकर बन सकता है। मनोरंजन भारती, पंकज पचौरी और आपके माननीय रवीश कुमार उसी के तहत आते हैं। पहले को हिंदी बोलनी नहीं आती। दूसरे अटक-अटक कर हिंदी बोलते हैं और तीसरे टेलीविजन पर रगियाते हैं। इनमें से किसी से आप फीचर की एंकरिंग तो करा सकते हैं लेकिन न्यूज़ की लाइव एंकरिंग इनमें से किसी के बस की बात नहीं। लेकिन तीनों एंकर हैं और कुछ लोगों के मुताबिक महान एंकर हैं। वहां का एक किस्सा बताऊं कि एक एंकर जिसकी आवाज़ लाजवाब है और बहुत सारे मामलों में ज्ञान की भी कमी नहीं थी। चेहरा भी शानदार था लेकिन उसे प्राइम टाइम की एंकरिंग नहीं मिली। इसी दुख में वो दूसरे चैनल में चला गया। इसलिए भाषा और शऊर की बात करते वक़्त चैनल की नीतियों और वहां की सियासी उठापटक का ख्याल रखना चाहिए।

    यहां यह ध्यान रखिएगा कि आप चैनल पर बात नहीं कर रहे थे। आप व्यक्ति पर बात कर रहे थे। और आपने अपने लेख में आग्रह और दुराग्रह दोनों का प्रदर्शन किया है। यह किसी भी आलोचक के लिए सही नहीं है। आलोचक बनना चाहते हैं तो तटस्थ रहना सीखिए। अगर आपको सिर्फ एक कार्यक्रम में एक एंकर के लाउड होने पर बहस करनी थी तो आप उसी कार्यक्रम और एंकर तक उसे सीमित रखते। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। आपने अपने लेख में चंद व्यक्तियों को महान साबित करने की कोशिश की और बाकियों को नज़रअंदाज किया। दो चैनलों को खुदा बताया बाकी चैनलों को नजरअंदाज किया। यह आलोचक धर्म की अवेहलना है और एक आसानी से मिले मंच का दुरुपयोग। इसका ख्याल रखिए। मोहल्लालाइव की गरिमा बनाए रखिए। इसने निजी कुंठाओं का अखाड़ा मत बनाइए।

    आखिर में एक बात और। आपको लगता है कि चैनल सब्सक्रिप्शन के जरिए इतना कमा लेंगे कि विज्ञापनों की दरकार नहीं होगी और टीआरपी जैसे किसी पैमाने की जरूरत नहीं होगी तो यह आपका भ्रम या फिर आपकी चाहत है। आपका यह भ्रम मैं दूर नहीं कर सकता और अगर यह चाहत है तो मेरी हैसियत इतनी नहीं कि इसे पूरी कर सकूं।

  • AWANISH said:

    विनीत तुमने बात बहुत सही लिखी है..और ऐसी बात जो जितनी प्राथमिकता के आधार पर की जाए उतनी ही बेहतर होगी . आज मीडिया में माल बेचने की जो बेचैनी है,और हर शो को एक स्टंट में तब्दील कर देने की जो हुड़क एंकरों में मची है..उससे न्यूज़ और व्यूज़ नाम की चीज का कितना नुक्सान हो रहा है ,वह चिंता का विषय है. लिहाज, शालीनता जैसे शब्द संदीप चौधरी में ना देखो तो क्या बात उनसे भी नामी गिरामी लोग ऐसा करने से परहेज नहीं कर रहे. हाँ बात गर टी आर पी की की जाए तो टी आर पी के लिए वह दिन दूर नहीं कुछ चैनल संदीप चौधरी की जगह राखी सावंत तक से न्यूज़ पढवाने में पीछे नहीं रहेंगे. तब क्या किया जाएगा?

  • रवींद्र रंजन said:

    शुक्रिया पोल खोल महोदय, आप शायद विषय से भटक गए। हम एंकर की भाषा पर बात कर रहे थे और आप टीआरपी का टंटा लेकर बैठ गए। खैर मैं बताना चाहूंगा कि अपनी बात रखने के लिए मुझे किसी ‘कलाकारी’ की जरूरत नहीं है। अगर आपकी बात सही होगी तो मुझे उसका भी समर्थन करने से कोई गुरेज नहीं हैं। मैं आपकी तरह छिपकर भी नहीं बल्कि खुलकर और अपने सही नाम और पहचान से अपनी बात कह रहा हूं। विनीत की बात का समर्थन करने का यह मतलब नहीं कि वो मेरा गुरू हो गया। आपको ये जानकर खुशी होगी कि विनीत मेरा अनुज है और ये जानकार आश्चर्य होगा कि मैं आज तक उससे मिला तक नहीं हूं। मैं उसे सिर्फ उसके लेखन की वजह से ही जानता हूं। मेरा और विनीत का परिचय किसी फायदे के लिए लिए नहीं है। अक्सर इलेक्ट्रानिक मीडिया में आप जैसे लोग फायदे के लिए संबंध बनाते हैं और फायदे के लिए एक-दूसरे की चापलूसी करते हैं। शायद इसीलिए आप मुझे भी अपनी जमात का समझ बैठे। लेकिन आप खुद सोचिए एक खालिस लेखक झूठी (ऐसा आपको लगता है) विनीत की प्रशंसा करके मुझे क्या मिलने वाला है? वह कोई टाटा-बिड़ला या फिर राजा महाराजा तो हैं नहीं कि मुझे कोई रियासत दान कर देंगे। वैसे मैं एक अच्छे संस्थान में नौकरी कर रहा हूं और अपनी नौकरी से खुश हूं। आप शायद खुश नहीं है तभी तो अपनी पहचान तक जाहिर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। खैर मैं फिर कहूंगा कि एंकर की भाषा शालीन होनी चाहिए। इसका दर्शकों पर असर पड़ता है। आप मानें या ना मांने यह आप पर निर्भर करता है और आप इसके लिए स्वतंत्र हैं। धन्यवाद

  • Rangnatn Singh said:

    ydi mai kabhi TV dekh bhi lu to in so called star presenter me se jyadatar ko kbhi nhi dekhata. sub ke sub gairjaruri rup se akramak aur abhadra najar aate hai. Ravish kumar ka Content behtarin hota hai lekin unka unghata-sustata style kbhi-kbhi bore kar deta hai. mere pasandida Rajdeep aur Kamal khan hai.Vineet bhai ne yaha vyakti pasand-napasand ko ek paksh mana hai so mai kahana chahunga Deepak chaurasiya, Punya prasoon Bajpayee.Sandeep Chudhari, Vinod duwa jaiso ko dekhte hi mai chainal badal deta hu…pasand apni-apni…

  • प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said:

    जय हो !
    मेरी बात संक्षेप में !
    १-विनीत को अपनी पसंद और दूसरे को अपनी पसंद रखने का पूरा हक है |
    २-संदीप का कार्यक्रम काफी समय से देखता रहा हूँ ……उनकी या ऐसे किसी एंकर का अचानक इतना लाउड हो जाना कभी कभी सीमा से ऊपर हो जाता है तो मुझे भी आश्चर्य होता है !
    ३- कभी कभी न्यूज़ चैनल पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं ….सो अपने गेस्ट से उसी रूप में ही , उसी भाषा में नंगा करना शुरू कर देते हैं !
    ४- हिन्दी भाषा की पत्रकारिता और पत्रकार अधिकांशतः मुझे ब्लैकमेलर समझ में आते हैं सो वही उनके व्यक्तित्व में भी दिखलाई पड़ता है ….जोकि इंग्लिश के बजाय हिन्दी में ज्यादा है !(कोई इंग्लिश का दास कहे …वह भी स्वीकार !)
    ५-टी आर पी के मामले में मैं पूरी तरह से विनीत से सहमत हूँ …..कि आखिर इसके अर्थशाश्त्र पर आधारित कोई चैनल कैसे समाज के बदलाव की बात कर सकता है ? ….सो यह असंभव ?
    ५-आई बी एन -७ के बारे में पोल-खोल की बात से सहमति ……कि यह चैनल ही है लाउड !!!
    ६= सारे पुरस्कार के तरीके ठीक नहीं …सो पत्रकारिता के कैसे पाक-साफ़ हो सकते हैं?
    ७-एन डी टी वी की चाल अलग है….पर उसके बावजूद मुझे रवीश और कुछ और एंकर पसंद हैं भाई !
    ८- समस्या की जद यही समझ आती है कि हम एक व्यक्ति की किसी बात से असहमति का स्थाई अर्थ उससे हमेशा की असहमति मान लेते हैं !!
    और इसीलिये अब तक खेमे बन चुके हैं …वही यहाँ नजर आ रहा है तो इसमें कैसा आश्चर्य?

    आज के लिए इत्ता ही !!!
    जय हो!!

  • mera naam said:

    बहस सार्थक है. इसके लिए इसमें हिस्सेदारी कर रहे सभी लोगों को साधुवाद. विनीत जी ने जो बातें कहीं हैं. वह काफी हद तक सही हैं. लेकिन एंकर विशेष को महिमा मंडित करना गलत है. एक दर्शक की हैसियत से कहूं तो आईबीएन 7 के एंकर बदतमीजों की जमात है. आशुतोष हो या संदीप चौधरी इनको जब भी सुनता हूं तो मन में एक ख्याल आता है कि काश! तकनीकी इतनी विकसित हो जाए कि अगर आपको कोई एंकर पसंद आये तो तत्काल उसकी पीठ थपथपा सकें और पसंद न आये तो दो थप्पड़ भी जड़ सकें. अगर यह तकनीकी विकसित हो जाती है तो सबसे ज्यादा थप्पड़ आशुतोष और संदीप चौधरी को पड़ेंगे. यह लोग जिस तरह से एंकरिंग करते हैं, उससे इनको यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि भई, तुम खुदा हो गये हो क्या. ऐसी बहस करवाने का क्या मतलब है, जिसका फैसला खुद पहले ही कर चुके हो और जिसे तुम पसंद नहीं करते उसको जलील करवाने के लिए उस हिसाब से पैनल बना कर उसकी भद्द उड़ाते हो. इन्हें यह तो बता दिया जाए कि भैया आप पत्रकार हैं, और इसे बुद्धिजीवियों का पेशा माना जाता है, लेकिन यह लोग जिस तरह से पेश आते हैं उससे ऐसा लगता है कि इनसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं है, जितना भी ज्ञान है वह बस सिर्फ इनके पास है. यह लोग इस बात का भी तो ख्याल रखें कि भैया आप भले पत्रकार हैं, लेकिन आपसे ज्यादा ज्ञानी लोग भी इस दुनिया में हैं, जो आपसे ज्यादा ज्ञानी और समझदार हैं. आपकी सबसे पहली बदतमीजी तो यह है कि आप स्वयं को अपने दर्शकों में सबसे सर्वश्रेष्ठ मान कर अपनी भूमिका तय करते हो. इन एंकरों के व्यवहार से यही झलकता है कि यह जो कह रहे हैं, वही अंतिम सत्य है. धन्य हो ऐसे ज्ञानी और खुदा बनने की कोशिश कर रहे एंकर्स.
    विनीत जी और पोल खोल जी जो भी हैं. चैनल का आधा सच विनीत जी ने कहा और आधा सच पोल खोल जी ने.

  • पोल खोल said:

    हिंदू के संपादक एन राम ने कल कहा है कि चैनलों के एंकर हिस्टीरिया के शिकार लगते हैं। ये तो मेडिकल केस बनता है।

  • संजय ग्रोवर said:

    बहुत दिन बाद मोहल्ला लाइव पर कोई ढंग की बहस परवान चढ़ती दिखी। सोचा मैं भी तरो-ताज़ा हो लूं। यह ठीक है कि संदीप चैधरी आक्रामक हो जाते हैं और मेहमान की बात भी कई बार बीच में काट देते हैं (यह काम मेरे पसंदीदा विनोद दुआ भी करते हैं, खैर)। मगर इसके लिए क्या ‘भाषाई शऊर’ शब्द ठीक है !? इसके लिए विनीत ने उनके सिर्फ एक शब्द ‘चिल्लाना’ का उदाहरण दिया है। यह भाषा की दिक्क्त है या व्यवहार की ? जब नीयत ही किसी की बात काटने की हो तो सभ्य भाषा में यही काम विनोद दुआ भी कर देते हैं।
    पता नहीं यह पोलखोल की विनम्रता है या हीनभावना कि वे अपने ऊपर ‘अशालीनता’ का आरोप स्वीकार कर रहे हैं। मुझे तो उनकी भाषा कहीं भी असभ्य नहीं लगी। बाकी बातें प्रवीण त्रिवेदी ने निष्पक्षता बरतते हुए कह दी हैं।
    जहां तक मुझे याद आता है इसी मोहल्लालाइव पर विनीत के ही किसी लेख के शीर्षक में ‘चूतिया’ जैसे शब्द का इस्तेमाल हो चुका है। और मोहल्लालाइव भी किसी ‘भाषाई शऊर’ के लिए नहीं जाना जाता। मगर हम सबको लगता है कि यहां एक खुलापन है इसलिए हम यहां आते हैं।

  • nikhil said:

    A is related to B….B is related to C…C is related to D…But, D is A’S Son…..D’S father is B but since C is also related to B, so C can be father too….
    now, tell me who is D’s father…
    this is indian television…..

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