दिखाने-छिपाने की नैतिकता और एनडी तिवारी कांड
ऐसे समय में प्रभाष जोशी को फिर से पढ़ना
♦ दिलीप मंडल

सदी के पहले दशक के आखिरी दिनों में नारायणदत्त तिवारी कांड ने देश की चेतना को झकझोर दिया है। इसलिए नहीं कि देश की जनता को नेताओं से नैतिक और शुचितापूर्ण जीवन की अपेक्षा है। बल्कि इसलिए कि मीडिया में ये मुद्दा क्यों और कैसे दिख गया। और क्या ऐसे मामलों में भी कोई बड़ा नेता फंस सकता है। इस मुद्दे पर मीडिया कवरेज और मीडिया के रुख को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं। दिखाने पर भी सवाल हैं और न दिखाने पर भी। ये सवाल भारतीय मीडिया में शक्ल लेते नए लोकतंत्र की आहट हैं।
आप थोड़ा जोखिम लेते हुए कह सकते हैं कि कुछ दशक में मीडिया के हालात बेहतर की ओर बदले हैं। वैसे, नेताओं के निजी जीवन के विचलन के बारे में भारतीय मीडिया बेहद उदार है। अमूमन हर राजनीतिक संवाददाता राजनेताओं के निजी जीवन के ऐसे तथ्यों को जानता है, जिनसे देश में हंगामा मच जाए, लेकिन उन्हें सार्वजनिक करने की परंपरा भारतीय मीडिया में आमतौर पर नहीं है। इस मामले में हमारे देश के नेता खुद को यूरोपीय और अमेरिकी नेताओं से ज़्यादा भाग्यशाली मान सकते हैं। पश्िचमी समाज पर हम चाहे लाख आरोप लगाएं कि वहां सेक्स को लेकर अराजकता है, लेकिन वहां के नेताओं और सार्वजनिक जीवन जी रहे लोगों के लिए सेक्स को लेकर नैतिक होने का दबाव भारत से कहीं ज़्यादा है।
वैसे भी सेक्स जब तक निजी है और सहमत वयस्कों के बीच है तब तक उसमें किसी को नाक घुसेड़ने की ज़रूरत या मोहलत नहीं होनी चाहिए, लेकिन ज़बर्दस्ती और प्रलोभन के जरिये होने वाले सेक्स को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। बहरहाल, नारायणदत्त तिवारी कांड की परतें खोलने और सच्चाई सामने लाने के लिए जिस तरह की जांच की ज़रूरत है, वो हमारे देश की मौजूदा संरचना में शायद ही संभव है। इसलिए आप ये मान ले सकते हैं कि नारायणदत्त तिवारी ने स्वास्थ्य कारणों से ही राज्यपाल पद से इस्तीफा दिया है। लेकिन ये न भूलें कि जो आरोप लगे हैं, वो लोक स्मृति से विस्मृत नहीं हो जाएंगे। इन आरोपों के बीच भी लोग अपने लिए अपने हिस्से के सच के टुकड़े चुनते हैं।
ऐसे समय में क्या हम प्रमुख पत्रकार दिवंगत प्रभाष जोशी के ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के बारे में पिछले साल व्यक्त किये गये विचारों का पुनर्पाठ कर सकते हैं? दिखाने और छिपाने की नैतिकता पर चल रही चर्चा के बीच इस बात पर भी बहस हो सकती है कि किसी व्यक्ति के कृत्य की और उसके गुण और अवगुण की क्या सामाजिक व्याख्या होनी चाहिए।
निजी कृत्यों और कुकृत्यों की सामाजिक और खासकर जातीय व्याख्या कितनी ख़तरनाक हो सकती है, उसका अंदाज़ा संभवत: आप लगा सकते हैं। किसी जाति समूह के हीरो (जैसे सचिन) के गुणों को उस जाति समूह का गुण बताएंगे या ये कहेंगे कि कोई शख्स किसी जाति समूह का होने की वजह से किसी खास गुण से लैस है तो उस जाति समूह में अगर कोई विलेन हुआ तो उसकी व्याख्या में कैसी मुश्किलें आएंगी, इसका भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जाति विशेष को खास गुणों से लैस बताने की स्थापना पर जब पिछली बार बात हुई थी तो शायद संदर्भ उतने साफ नहीं थे, लेकिन आज हैं।
प्रभाष जोशी का इंटरव्यू पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक http://raviwar.com/baatcheet/B25_interview-prabhash-joshi-alok-putul.shtml पर क्लिक करके रविवार साइट तक पहुंचें ताकि पूरी बात पूरे संदर्भ के साथ समझने में आसानी हो। वैसे कुछ टुकड़े यहां भी पेश हैं।
“मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे हैं। अगर सचिन आउट हो जाए तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जाएगा। क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीज़ों को बना कर रखने और लेकर जाने का नहीं है। वो कुछ करके दिखा देने का है। जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डाल कर खड़ा हो जाए और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला। अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते हैं। अब आप देखो, अपने समाज में, अपनी राजनीति में। अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरु ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण। क्यों? क्योंकि सब चीज़ों को संभाल कर चलाना है। इसलिए ये समझौता वो समझौता – वो सब कर सकते हैं। बेचारे अटल बिहारी वाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके हैं कि उनके घुटने ख़त्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा।”
“ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूं। एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है। उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है।”
“इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं। जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगों की फौज खड़ी की। ऐसे लोग, जो उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते थे, या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते हैं। वही एक सर्वोच्च नेता रहीं। बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औज़ार बनते हैं। जिससे हम चीज़ों को हैंडल करना सीखते हैं।”
“क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज़्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज़्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण।”
“ये जो टिके रहने की परंपरा है, वो जाति से नहीं आयी। ये आपका लगातार उस काम को करते रहने के कारण है। इस कौशल का जिस भी क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल हो सके, वहां आप सफल हो सकते हैं। अगर आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 11 खिलाड़ियों में से 5 हिंदुस्तानी निकालेंगे तो उसका कारण यह है कि हमारे यहां वो कौशल विकसित है।”
“मैं सभी विश्वकप में देखने जाता हूं, भारतीयों से अच्छी बल्लेबाज़ी कोई नहीं करता। सचिन तेंदुलकर को आगे-पीछे जाके बल्ला नहीं करना पड़ता है, जब वो गेंद को मारता है तो उसका पांव अपने आप गेंद के सामने होता है। यह कौशल है, जो अचानक नहीं आयी है। वो जो 130 मील प्रति घंटा की रफ्तार से आने वाली सर्विस को जब रिटर्न करते हैं टेनिस कोर्ट पर, तो सोच-समझ कर थोड़ी करते हैं। किसको बैकहैंड मारूंगा, किसको स्लाईस करूंगा, यह पहले से थोड़ी तय करते हैं। आपकी जो रिफ्लेक्सेस हैं, वो इतनी ट्यून्ड होते हैं कि जैसी गेंद आ रही है, आप उसे वैसा खेलते हैं। ये जो ट्रेंड करना है, यह आपके रिफ्लेक्सेस तो आपकी ट्रेनिंग से प्राप्त होती है। जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं।”
“क्रिकेट चूंकि अपने यहां अब समाज के मध्य वर्ग का खेल हो गया है तो आप देखेंगे कि कौशल का स्तर और दूसरी जगहों के स्तर से बहुत ऊंचा है। आस्ट्रेलियन गेंद को मारता है तो ऐसा लगता है कि हथौड़ा मार रहा है लेकिन जब हिंदुस्तानी मारता है तो ऐसा लगता है एक तरह की कला से उसने उसको मारा है. दुनिया के सबसे अच्छे बैट्समैन आपके पास हैं, इसलिए क्योंकि वो कला आपकी है.”
“नहीं-नहीं, मैं ब्राह्मणवाद की बात ही नहीं कर रहा हूं। मैं ब्राह्मण के कौशल की बात कर रहा हूं। वो सिलिकान वैली में, आईटी में जाकर सफल हुए, यहां सफल नहीं होते थे। क्योंकि आईटी में आपको जो अमूर्त है, उसको मूर्त करने की कला आनी चाहिए। क्योंकि ब्राह्मण का काम वही है। वो उससे पैदा हुआ है। मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं। आप इसे ब्राह्मण जाति या ब्राह्मणवाद से मत जोड़िए।”
(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्ट। अख़बारों में नियमित स्तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली में रेगुलर क्लासेज़ ले रहे हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









आपकी बात से पूरी तरह सहमति। लेकिन इस बीच एक मजेदार बात हो रही है। पिछले तीन दिनों से गूगल में जाकर इंडियन सेक्स टाइप करता हूं तो पहला लिंक एन.डी.तिवारी का आता है। क्या इसका कोई समाजशास्त्रीय विश्लेषण संभव है?
इसी तरह, हिन्दी एडिटर टाइप करने पर मनुष्य का नहीं, सॉफ्टवेयर, की बोर्ड और मशीन का हवाला मिलता है। और तो और Free jagran hindi editor Download – jagran hindi editor Files भी हैं। कुछ चर्चा इस पर भी हो जाए। हिन्दी का संपादक गूगल से तो लगता है गोल हो गया है।
राजेंद्र यादव ने भी कहीं कहा है कि ज्यादातर अच्छे कवि ब्राह्मण हुए और ज्यादातर कहानीकार अब्राह्मण। ऐसे लोगों को नए जमाने से माफी मांगनी चाहिए। ये नहीं कर सकते तो कम से कम चुप रहना ही चाहिए।
वैसे इण्टरव्यूकार ज़रा ‘इण्टीरियर’ में जाना शुरु कर दें तो उन्हें ‘अमूर्त’ चिंतन और ‘वायुवीय’ संवाद से आगे, कौन मुख से पैदा हुआ और कौन निम्नांगों से, जैसे पवित्र तर्कों का पुर्नउद्धार देखने को मिल सकता है। अब यह मत कहने लगिएगा कि मुख से तो थूका भी जाता है, वमन भी किया जाता है, झूठ भी बोला जाता है और अफ़वाहें भी फैलाई जाती हैं।
“पूजिए विप्र शील गुन हीना, शूद्र न गुन गन ज्ञान प्रबीना…” तुलसी बाबा कह गए हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर ने तुलसी बाबा की प्रशंसा ऐसे ही नहीं की है।
लेकिन चारों और इतनी भयंकर खामोशी क्यों है भाई। इस खामोशी का कोलाहल तो कान के परदे फाड़ डालेगा।
“अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरु ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण। क्यों?”
इस हिसाब से नारायण दत तिवारी के बारे में क्याकहेंगे. क्या अब कोई ये भी कहेगा कि कोई जाति ज्यादा अनैतिक होती है, कोई कम। कोई जाति ज्यादा व्यभिचारी होती है और कोई कम(<:)
यह सेक्स और जाति का मिश्रण अच्छा है दिलीपजी।
prabhash ji ke lekh par samajshastria shodh ki jarurat hai.nehru,indira,rajeev,sachin jaise brahmano kee upladhiya to unko dikhati thee(iswar unki aatma ko chain de) lekin pracheen kaal se hindu samaj me jati-paati,andhviswas aur shoshan ke liye kisko jimedaar maana jaaye.khair joshi ji aab jeevit hi nahi rahe nahi to bhala n.d.tiwari ki kartoot par kya jabab dete.
ऐसी बात नहीं, हमारे यहां आत्मा से बात-चीत के भी फार्मूले मौजूद हैं।
“कंधों को किताबों के बोझ ने झुकाया
रिश्वत देना खुद पापा ने सिखाया
99 परसेन्ट मार्क्स लाओगे तो घड़ी
वर्ना छड़ी”
(फिल्म 3 इडियट्स में स्वानंद किरकिरे का ये गीत)
उन्होंने एक बार रज्जू भइया (राजेंद्र माथुर) के साथ अनेक मित्रों को ‘बाटियां’ खाने की दावत दी। वे निहायत प्रेम और लगन के साथ आंगन में बैठे, कंडों की आग से बाटियां निकाल-निकाल कर उन्हें साफ़ गमछे से पोंछते और घी में डालते। हमारे सामने उन्होंने सुन्दर-सा गत्ते का डिब्बा रख दिया। उसमें तरह-तरह की क़ीमती शराबें थीं। तभी उन्होंने बहुत आत्मीयता से कहा: ‘‘ राजेंद्रजी अपुन के यहां तो एम्बेसियों या ऐसी जगहों से ऐसी गिटें आती ही रहती हैं। आपको ज़रुरत हो तो निस्संकोच बताईए। अपुन तो पीते नहीं हैं…….’’
-राजेंद्र यादव (संपादकीय, हंस, दिसंबर, 2009)
[...] की नैतिकता और एनडी तिवारी कांड [4 Jan 2010 | 10 Comments | ] दिलीप मंडल ♦ दिखाने और छिपाने की [...]
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