जब सब तालियां बजाने लगें तो मामला गड़बड़ समझो
दीवान पर ये एक सही बहस चल पड़ी है। हमने रवीश के ब्लॉग से उठा कर थ्री इडियट्स की समीक्षा छाप दी। इस समीक्षा को दीवान पर नयी दिल्ली फिल्म सोसाइटी के आशीष सिंह ने चढ़ाया। रवीश के लिखे पर आयी रविकांत की प्रतिक्रिया और रवीश का जवाब भी हमने छाप दिया था। अब किसी फीता राम ने कुछ कहा है। हम इंतज़ार करेंगे कि रविकांत क्या कहते हैं : मॉडरेटर
♦ फीता राम
भाई जान, जब सब लोग तालियां बजाने लगें तो मामला गड़बड़ समझो। रविकांत से मैं इस बात पर सहमत हूं कि फिल्म का नाम ‘फ़िल्मी इतिहास’ में आएगा। यह अलग बात है कि वो इतिहास कौन लिखता है। रवीश का लेख फिल्म में समस्या के दिल को टटोल लेता है, इसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। एक बदनाम साधू का कहा याद आता है, जो कहता था “हसिबा खेलिबा करीबा ध्यान”। अगर फिल्म के संदर्भ में मैं यह कहूं कि “हसिबा खेलिबा करीबा ideology” तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कॉमेडी और ideology का गहरा संबंध है। (नाम नहीं लूंगा, गेस करो) फिल्म के बारे में लोगों के विचार उन लोगों की ‘स्थिति’ के बारे में ज्यादा बताते हैं, बजाय कि फिल्म के। यह सब पर लागू होता है, मुझ पर भी। जब मुझे ‘lays चिप्स’ बहुत स्वादिष्ट लगने लगते हैं तो यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि क्यों कर यह इतने स्वादिष्ट बनाये गये है। फिर यह सोचता हूं कि स्वाद आलू में है या पैकेट में या जहां से खरीदा है, वहां या फिर सैफ अली खान के प्रोमो में – आखिर कहां? लेकिन इन सब के बावजूद ‘स्वाद’ और ‘सत्य’ में फर्क तो है। ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ मुझे स्वादिष्ट लगे वो मेरे हित में भी हो। सुना है कि बहुत से ख़तरनाक ज़हर बहुत मीठे होते हैं। जिस तरह की विषमताएं हमारे समाज में हैं यह कहना कि फिल्म ‘सबको’ पसंद आयी है क्योंकि इसने इतने दिनों में इतने करोड़ कमा लिये हैं, एक भद्दा और अश्लील व्यंग्य है – किस पर, यह सबको पता है।
फिल्म का क्रिटिक बहुआयामी होना चाहिए (यह रवीश के लिए : लोग सीधी-सीधी दो टुक बात पसंद नहीं करते। सच भी लाग लपेट कर बोलना पड़ता है। इस तरह कि लोग समझ न पाएं और प्रशंसा भी कर दें)। Ideology से लेकर एक्टिंग तक। फिल्म में आमिर की एक्टिंग प्रशंसनीय है (जैसे कि और लोगों की)। फोटोग्राफी भी बढ़िया है। lighting और sound भी (यद्यपि किन्हीं शॉट्स पर लगा कि कुछ अलग और बढिया हो सकती है)। ‘प्लॉट’ ऐसा कि लगता था जैसे लोगों पर टोटका कर दिया गया हो। सीट से ‘बांध’ दिये गये हों जैसे – और यह ख़तरनाक बात है!
रविकांत भाई, इतिहास तो लिखा जाएगा, लेकिन यह किस शक्ल में होगा और इसके व्याकरण में कौन से अलंकार होंगे, यह टाइम ही बताएगा या फिर दिल्ली की सर्दी में रात को ठिठुरते फुटपाथ के अंधेरे कोने में दुबका कुछ इंसानों का दहकता ज़लज़ला। कुछ लोग अलग विचार रखने के लिए ही अलग आलाप लगाते हैं। शायद मेरे जैसे।
वाक़ई फिल्म बहुत स्वादिष्ट थी, लेस चिप्स जैसी! ज़रा पूछना भाई आप कौन सा अख़बार चाटते हैं… रविकांत के विचारों की बाट जोहता…









“कंधों को किताबों के बोझ ने झुकाया
रिश्वत देना खुद पापा ने सिखाया
99 परसेन्ट मार्क्स लाओगे तो घड़ी
वर्ना छड़ी”
(फिल्म 3 इडियट्स में स्वानंद किरकिरे का ये गीत)
*उन्होंने एक बार रज्जू भइया (राजेंद्र माथुर) के साथ अनेक मित्रों को ‘बाटियां’ खाने की दावत दी। वे निहायत प्रेम और लगन के साथ आंगन में बैठे, कंडों की आग से बाटियां निकाल-निकाल कर उन्हें साफ़ गमछे से पोंछते और घी में डालते। हमारे सामने उन्होंने सुन्दर-सा गत्ते का डिब्बा रख दिया। उसमें तरह-तरह की क़ीमती शराबें थीं। तभी उन्होंने बहुत आत्मीयता से कहा: ‘‘ राजेंद्रजी अपुन के यहां तो एम्बेसियों या ऐसी जगहों से ऐसी गिटें आती ही रहती हैं। आपको ज़रुरत हो तो निस्संकोच बताईए। अपुन तो पीते नहीं हैं…….’’
-राजेंद्र यादव (संपादकीय, हंस, दिसंबर, 2009)
ये फ़िल्म नहीं एक सन्देश है अब ये इन्सान-इन्सान पर निर्भर करता है कि वो इसको कैसे लेता है…….
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