लेखक को हाशिये पर फेंकने की यह एक बड़ी साज़िश है!

♦ मुशर्रफ आलम ज़ौक़ी

अक्सर हमारे जीने का श्रेय भगवान और भाग्य ले जाते हैं

इस पुरानी इतावली कहावत को नज़रअंदाज़ करें तो यही बात हमारी नन्ही सी फिल्मी दुनिया यानी बॉलीवुड पर पूरी तरह लागू होती है। पीछे मुड़ कर देखें तो मंटो से कृश्‍नचंदर, इस्मत चुग़ताई, और राजेंद्र सिंह बेदी तक फिल्मी दुनिया में हाशिये पर ही रहे। बेदी निर्माता भी बने लेकिन बतौर लेखक फिल्मी दुनिया में न उनकी चल सकती थी, न चली। उनके बारे में एक घटना मशहूर है। बेदी की एक कहानी पर फिल्म बन रही थी। पटकथा लेखन भी उन्हीं के जिम्मे था। तब फिल्मों के इतने बजट नहीं हुआ करते थे। बेदी लिखते जाते और निर्देशक को दिखाते जाते। हर बार निर्देशक स्क्रिप्ट पर एक दृष्टि डालता और कहता, ‘बेदी साहब, इसे ऐसे कर दीजिए।’ बेदी का क्या था। जैसा निर्देशक कहता, बेदी करते चले गये। बेदी बड़े लेखक थे, सारी फिल्म इंडस्ट्री जानती थी। इसलिए चतुर निर्देशक अपनी ओर से पेन का इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। एक दिन स्क्रिप्ट पढ़ते हुए निर्देशक ने कहा, बेदी साहब इस ‘था’ को ‘है’ कर दीजिए। बस, इसके बाद आपको तक़लीफ नहीं दूंगा। बेदी अड़ गये। नहीं करूंगा। निर्देशक असमंजस में। तब बेदी ने कहा – ‘मियां, पूरी स्क्रिप्ट में अब यही ‘था’ मेरा रह गया है। इसे तो रहने दीजिए।’

chetan bhagats five point someoneथ्री इडियट की विवाद गाथा सुनकर बेदी की यह कहानी याद आ जाती है। फिल्मी दुनिया में लेखक आज भी हाशिये पर हैं। चेतन भगत तो फिर भी ‘भगत’ हैं। वह कैसे लेखक हैं, यह मेरा विषय नहीं हैं। बेस्ट सेलर हैं। सेमिनारों से लेकर बच्चों के स्कूलों तक उन्हें बुलाया जाता है, जहां वह अक्सर बच्चों को ‘फाइव प्वांइट समवन’ के टिप्स देते रहते हैं। विश्व की प्रत्येक भाषाओं में ‘बेस्ट सेलर राइटर’ की अपनी भूमिकाएं सदैव रही हैं। इसलिए यहां उनके लेखक होने से इनकार नहीं किया जा सकता। हां, यह अलग बात है कि बदले-बदले से बॉलीवुड में आज आम निर्देशक भी लेखक का चोला ओढ़े खड़ा है। चीनी कम और पा जैसी फिल्मों के निर्देशक ‘बाल्की’ हों, राजकुमार हीरानी, नागेश कुकनूर, अनुराग कश्यप या आमिर खान हों – इनमें से कुछ, लेखकों या पटकथा द्वारा अपने आइडियाज़ को फ्रेश कराते हैं और कुछ लेखन या पटकथा की बागडोर भी संभाले रखते हैं। यह बदली हुई बॉलीवुड या फिल्मी दुनिया का चेहरा है, जहां निर्देशक, पुराने दौर का निर्देशक नहीं रह गया। वह ‘क्रिएटिव’ है। तभी तो इंडिया टीवी पर रजत शर्मा को दिये गये साक्षात्कार में आमिर अपनी बात हंस कर पूरी करते हैं, ‘जी हां। हम क्रिएटिव हैं।’ स्‍पष्‍ट रूप से यह समस्त फौज क्रियटिव है। इसलिए यहां हमारे और आप जैसे लेखकों का गुजर कहां होगा। चेतन भगत जैसे लोग तो फिर भी एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा बन जाएंगे, मगर आम लेखक?

क्या आपको नहीं लगता कि लेखक को हाशिये पर फेंकने की यह एक बड़ी रणनीति या साज़िश है? इन महान योद्धाओं की काबिलियत से इनकार नहीं है, मगर इन योद्धाओं द्वारा साहित्य को पसंद बनाने और साहित्यकार को नकारने वाले प्रश्न पर मैं इनके साथ कदापि नहीं। भंसाली ने दोबारा देवदास बनाने की तैयारी के साथ ‘साहित्य को नमस्कार’ का फैसला सुनाया तो मंटो-इस्मत पर फिल्‍में बनाने के समाचार आने लगे। लेकिन देवदास के साथ ही अनुराग कश्यप ने ‘देव डी’ बनाकर निर्देशक के मज़बूत पक्ष की याद दिला दी। देव डी देवदास की पैरोडी नहीं थी। बदले समय और इस नयी साइबर संस्कृति में एक नया देवदास खड़ा था, जिसे एक फिल्ममेकर की आंखें नये अंदाज़ से देख रही थीं। गांधी के नये पक्ष को जिस तरह राजकुमार हिरानी ने ‘मुन्ना भाई’ सीरीज़ में पेश किया, वह काम उदय प्रकाश मोहनदास में नहीं कर सके। बाल्की ने औरा के चरित्र के जरिये 12 साल के शरीर में 80 साल के बूढ़े का दर्शन भर दिया। औरा मरने तक अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है। यथार्थवाद और वास्तविकता की ज़मीन पर खड़ा हमारा साहित्यकार क्या विदेशों से ट्रेनिंग लेकर आये इस नयी पौध के निर्देशक अथवा ‘लेखक’ की बराबरी कर सकता है? नये निर्देशीय चिंतन में एक ग्लोबल समय सांस ले रहा है और हम अभी तक उसी पुराने जनवाद की चीथड़ी बिछाये बैठे हैं। तभी तो राहुल गांधी से चीन में प्रश्न किया जाता है, ‘क्या भारत का मार्क्‍सवाद आज भी पुरानी लीक पर चल रहा है?’

विषय से थोड़ा सा भटकाव इसलिए भी ज़रूरी था कि बॉलीवुड के निर्देशकों की तीसरी आंख खुल गयी है। यहां हमारा साहित्यकार कहीं नहीं है। वो हाशिये पर भी नहीं है। इसलिए थ्री इडियट्स जैसे विवाद में चेतन भगत जैसे लेखक का नाम अंत में आता है तो हमें हैरानी नहीं होती। चेतन को भी समझना चाहिए था कि 25 लाख में एग्रीमेंट के बाद वह इसका कानूनी अधिकार गंवा चुके हैं। हां, इस पब्लिसिटी का फ़ायदा दोनों को होगा। संभव है, एक बड़े विदेशी मार्केट में चेतन के दरवाज़े और खुल जाएं। क्योंकि विवादों को शेयर बाज़ार की तरह विदेशी साहित्य मार्केट भुनाने का काम पहले भी करता आया है। सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन और बंग्लादेशी लेखक सलाम आज़ादी की तरह। यहां इस पक्ष को नहीं भूलना चाहिए कि हॉलीवुड अपनी फिल्मों के लिए एक और बड़े बाज़ार यानी भारत का रुख़ कर चुका है। अवतार जैसी 1200 करोड़ रुपये में बनायी जाने वाली फिल्में भारतीय उड़नतश्तरियों जैसी काल्पनिक गाथाओं को साकार करने में लगी हैं। कारण, भारत का बड़ा बाज़ार उनके लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए इस बड़े बाज़ार में वे अवतार जैसे नाम के साथ अपनी संवेदनाएं भारतीय दर्शकों से शेयर कर रहे हैं। 2010 जैसे फिल्में हमारी पौराणिक ज्योतिषीय भविष्‍यवाणी के आधार पर बनायी जाती हैं और कहानी की ज़मीन के लिए मुंबई के वैज्ञानिक को तरजीह दी जाती है। ट्वीलाइट न्यू मून तक साहित्य पक्ष को तरजीह दी जाती है और कहीं न कहीं वैम्पायर और नायिका के प्रेम संबंधों में हम भारतीय संबंधों का अक्स देख सकते हैं। हॉलीवुड की इस रेस में भारतीय निर्देशक भी आधुनिक विश्व की परिकल्पना को सामने लेकर आ रहे हैं और इस परिकल्पना को साकार करने के लिए उन्हें आज का भारतीय युवा भी चाहिए और भारतीय साहित्य भी। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि साहित्यकार नहीं चाहिए। हमारा साहित्यकार उनके लिए केवल एक आइडिया भर है, जिसमें बाज़ारवाद की संभावनाओं के आधार पर वे अपनी ओर से रंग भरकर अपने ‘क्रिएटिव’ होने की दुहाइयां दे रहे हैं।

विशाल भारद्वाज की अधिकतर फिल्में शेक्सपीयर के विचारों पर आधारित हैं। साहित्यकार को समझना चाहिए कि फिल्मी बाज़ार केवल उनके ‘आइडियाज़’ को बेचने भर रह गया है। इसलिए इस पूरे फिल्मी षड्यंत्र के विरुद्ध जागरूक और एकमत होने की आवश्यकता है।

वाल्टेयर की सुप्रसिद्ध रचना ‘कांडीड’ का एक चरित्र ‘पांगलूस’ बार-बार कहता है, ‘जो होता है अच्छे के लिए होता है।’ थ्री इडियट्स देखते हुए मुझे बार-बार लगा, रेंचू के चरित्र में हिरानी ने इसी पांगलूस के ‘आल इज वेल’ के दर्शन को रचने की कोशिश की है। भारतीय निर्देशकों की यह नयी पौध इस दृष्टि से ख़तरनाक है कि यह साहित्य से नयी दृष्टि तो ला रही है, लेकिन साहित्यकार को नकारते हुए। क्योंकि अर्थतंत्र की बिसात पर अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए उसे नये आइडिया की तो ज़रूरत है, लेकिन साहित्यकार की नहीं। और इस सतह पर हमें चेतन भगत का समर्थन करना चाहिए।

Mosharraf Alam Zauqui(मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी। उर्दू हिंदी के जाने माने राइटर। कई कहानी संग्रह छपे हैं। कुछ के नाम हैं, इमाम बुखारी की नैपकिन, मत रो सालिग राम, फ्रिज में औरत, फिजिक्‍स कैमिस्‍ट्री अलजिब्रा, मंडी, लैंडस्‍केप के घोड़े, सदी को अलविदा कहते हुए, शाही गुलदान, लैबोरेट्री, फरिश्‍ते भी मरते हैं, बाज़ार की रात। कुछ नॉविल भी छपे हैं, जिनके नाम हैं बयान, शहर चुप है, मुसलमान, पोकेमॉन की दुनिया, ज़‍िबह, प्रोफेसर एस की अजीब दास्‍तान।zauqui2005@gmail.com पर संपर्क।)

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