प्रभाष जी हरा सांप क़तई नहीं थे दिलीप मंडल जी!
♦ अजीत कुमार
मैंने पहले भी संदीप के ब्लॉग पर लिखा था कि सीधी रेखा खींचने और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी से समाज में कभी भी सार्थक संवाद स्थापित नहीं हो सकता। हां बतकुच्चन के शोर में विषय हमेशा की तरह पीछे छूट सकते हैं।
चलिए नारायण दत्त तिवारी के बहाने आखिर आपने फिर प्रभाष जी को याद किया। यहां पर दो चार बातें मैं आप से पूछना चाहता हूं। क्या प्रभाष जी के जाति और सत्ती प्रथा के संबंध में दिये गये विचार और उनका व्यक्तिगत ज़िंदगी में कर्मकांडी ब्राह्मण होना ही क्या हिंदी पत्रकारिता को उनकी अप्रतिम देन को मिटाने के लिए पर्याप्त है? आखिर अगर ऐसा है तो जाति के संबंध में गांधी के विचार को लेकर आप करेंगे? बाबरी मस्जिद विध्वंस पर निर्मल वर्मा के विचार को लेकर क्या उनके साहित्य में योगदान को नदारद मान लेना चाहिए? ऐसे और भी कई उदाहरण हो सकते हैं।
क्या आप नहीं मानते कि हर विधा के कुछ अपने प्रतिमान होते हैं और जो भी उन प्रतिमानों पर खरा उतरता है, उस विधा के लिए वह अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है! एक उदाहरण यहां पर और अल्लामा इकबाल का देना चाहूंगा। यह सही है कि अपने अंतिम दिनों में इकबाल का धर्म की तरफ झुकाव बढ़ा लेकिन इसको लेकर उर्दू साहित्य में शायद ही उनकी हैसियत पर कोई असर पड़ा हो। मेरे हिसाब से पड़ना भी नहीं चाहिए। विश्व साहित्य पर अगर आप एक नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि महान साहित्यकारों पर विचारधाराओं का कोई भूत सवार नहीं था। आखिर विचारधारा तो एक ऐसी चौहद्दी है जो विरोध के अस्तित्व पर ही कुठाराघात करती है।
पत्रकारिता के साथ भी ऐसी ही बातें हैं। आप ही बताएं क्या प्रभाष जी के विचार और आस्था से इतर हम सिर्फ हिंदी पत्रकारिता में उनके योगदान पर बात नहीं कर सकते हैं? हो सकता है कि आपको हिंदी पत्रकारिता में प्रभाष जी का कोई योगदान नज़र ही नहीं आता हो। तभी तो आपने कभी प्रभाष जी की लेखन शैली और भाषा पर बात नहीं की। क्या पता आपको नारेबाज़ी, कोटेशन, आंकड़ों और घिसी-पिटी अधकचरी भाषा में ही पत्रकारिता की सही तस्वीर नज़र आती हो।
आप मानें या न मानें, साहित्य और पत्रकारिता के लिए भाषा और शैली सबसे बड़ा प्रयोग है। और हिंदी पत्रकारिता में भाषा और शैली को जो जीवंतता प्रभाष जी ने प्रदान की वह अप्रतिम है।
दरअसल कला के तमाम आयामों को विचारधारा के विभ्रम में डालने का सारा जंजाल उसी मार्क्सवादी अवधारणा की देन है। जिसे आज अवधारणाओं के संकट से सबसे ज्यादा जूझना पड़ रहा है। आखिर क्रिस्टोफर काउडवेल और अंसर्ट फिशर की प्रस्थापनाओं ने ही तो कला और साहित्य को विचारधारा के यूफोरिया में डाला।
अब बात करते हैं प्रभाष जी के जाति के संबंध में आपके द्वारा उपलब्ध कराये गये विचार पर। जाति के प्रश्न पर जो विचार उन्होंने दिये हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूं। लेकिन इतना तो विचार करना ही पड़ेगा कि नस्ल, जाति को लेकर लोगों में आनुवांशिकीय समानताएं और विभिन्नताएं तो होती हैं। क्या आप नहीं मानते कि आम हिंदुस्तानी की शारीरिक बनावट पश्चिमी देशों की तुलना में कमज़ोर होती है। क्यूं दक्षिण अफ्रिकी देशों के लोग एथलेटिक्स में सबसे आगे हैं। आज क्या कृत्रिम घास के मैदान पर भारतीय हॉकी खिलाड़ी अपनी शारीरिक क्षमता को लेकर पश्चिम के प्रतिद्वंदियों से पीछे नहीं रह जाते हैं। क्यूं जब तक घास के मैदान पर कलात्मक हॉकी खेली जाती रही, भारतीय खिलाड़ियों का निर्विवाद वर्चस्व रहा।
एक बात और, प्रभाष जी ने जो बात कही, उसे मैं जातीय विशिष्टता नहीं बल्कि सामंती वर्चस्ववाद की षड्यंत्रकारी श्रेष्ठता मानता हूं। ऐसा कोई इंसान नहीं, जिसमें कुछेक विशिष्टता नहीं हो। लेकिन जब कोई वर्चस्ववादी समाज अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए अपने हिसाब से खास मानक और सौंदर्य गढ़ता है और कालांतर में उस मानक तक पहुंचने के तमाम साधनों को अपने समाज में ही विकसित होने की प्रक्रिया को रचता है, आम जनों की विशिष्टता एक षड्यंत्रकारी व्याकरण के तहत अयोग्य करार दे दी जाती है। एक समय बाद वह वर्चस्ववादी समाज अपने इसी भ्रामक विशिष्टता के बल पर वृहत्तर समाज को भी हाशिये पर रखने में सफल हो जाता है। अपने इस वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए वह हर एक षड्यंत्र करता है ताकि वृहत्तर समाज इस विशिष्टता को अंगीकार न कर सके। अगर करे भी तो दोयम दर्जे के आवरण में रह कर।
और इतना तो आप मानेंगे ही कि किसी भी काम को जब कोई खास समुदाय लगातार करता है, तो फिर आनुवांशिकीय तौर पर उस समाज में अमुक काम करने की योग्यता और प्रवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी अग्रसारित होने लगती है। येह वर्चस्व तब टूटता है, जब उस खास सौंदर्य और मानक को पूरी तरह से बदल दिया जाता है, विशिष्टता की परिभाषा तोड़ दी जाती है। बिना उस मानक व व्याकरण को बदले वर्चस्व तोड़ने की बात बेमानी है। तभी तो मुक्तिबोध ने व्याकरण तोड़ने तक की बात कही थी।
लेकिन आप जैसे दलित चिंतक आज भी ब्राह्मणवादी षड्यंत्र का शिकार हो रहे हैं। आप प्रभाष जी की स्वीकार्यता के पीछे पिलकर पड़ जाते हो। लेकिन हर दुबे, पांडे, मिश्र और शर्मा जब घोर षड्यंत्र के तहत अपने आपको जातिविरोधी, प्रगतिशील और बागी होने का आत्मालाप करता है, आप खुश हो उठते हो। मुझे तो हैरत होती है कि आज हर दुबे, पांडे, मिश्र और शर्मा होड़ लगाये हुए है अपने आपको ब्राह्मण विरोधी घोषित करने में। बरसाती मेढक की तरह कूद कूदकर दलितों की पक्षधरता की बातें कर रहा है और आप मुग्ध हो रहे हो।
अरे जनाब यही दुबे, पांडे, मिश्र और शर्माओं ने लंबे समय तक इस देश में मार्क्सवादी विचारधारा के नाम पर ब्राह्मणवाद का परचम बुलंद किया। तभी तो कांशीराम उन्हें हरे खेत का हरा सांप मानते थे। आज यही जनवादी और प्रगतिशील ब्राह्मण दलितों के पक्ष में आवाज़ बुलंद करने की बात कर रहे हैं। आप उन सबमें से किसी को उठा लो। व्यक्तिगत ज़िंदगी में उनके रग रग से सामंतवादी सोच की बू आएगी। आज भी व्यक्तित्व के स्तर पर उनके यहां सामंतवादी सोच में कोई कमी नहीं आयी है। भले दो चार पंक्तियां लिखकर ये स्वघोषित प्रगतिशील हो गये हों।
कुत्सित महत्वाकांक्षा के महल में रह रह कर, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसों पर ऐशो आराम फरमाते ये स्वघोषित प्रगतिशील, साहित्य लेखन के नाम पर अपनी प्रगतिशीलता का विजयपताका फहराते आपको बहुतेरे मिल जाएंगे। भोगवादी जीवनशैली के सांचे में पले-बढ़े ये रंगीन प्रगतिशील आखिर क्या जानें दलितों की स्वानुभूति। खैर स्वानुभूति को छोड़िए, दलितों या हाशिये के समाजों के लिए इनके पास सहानुभूति भी नहीं हो सकती। और हां, ये प्रगतिशील लेखक नारी की देह मुक्ति के भी बड़े पैरोकार हैं। लेकिन आप तो जानते होंगे, इन प्रगतिशीलों के यहां नारियां बंद कमरे में देह मुक्ति का उत्सव मनाती हैं। इन ब्राह्मणों का ब्राह्मणत्व तो असल में औरत और सेक्स को लेकर ही जागता है। आखिर इनकी पूरी प्रगतिशीलता औरतों को बिस्तर तक खींच लाने में ही तो काम आती है। फिर भी आप उन पर नहीं चिल्लाते।
आप चिल्लाते हो प्रभाष जी पर। जब हर पढ़े-लिखे ब्राह्मणों में अपने आपको जातिविरोधी, मार्क्सवादी और प्रगतिशील कहने का फैशन चल पड़ा है। क्या ज़रूरत पड़ी थी प्रभाष जी को जातीय विशिष्टता की बात करने की। लेकिन इसे मैं प्रभाष जी की निडरता और बेलागी से जोड़ कर देखता हूं। जनाब क्या प्रभाष जी को यह एहसास नहीं रहा होगा कि उनके जाति के संबंध में दिये जाने वाले बयान के बाद उन्हें पोंगापंथी, संघी और न जाने क्या क्या घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन तब भी उन्होंने अपने यहां के अंतर्विरोध को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया। आखिर प्रभाष जी का व्यवहार कभी हरे खेत के हरे सांप जैसा नहीं रहा। सीना ठोंक कर कहते रहे कि मैं कर्मकांडी ब्राह्मण हूं, हिंदू हूं। आप बताओ सार्वजनिक ज़िंदगी में कौन इतना बेबाक हो सकता है। पहले भी हुए तो कबीर, कुमार गंधर्व, गांधी।
(अजीत कुमार। बिहार के नालंदा जिले में जन्मे अजीत कुमार ने अपने करियर की शुरुआत सीएनबीसी टीवी 18 मुंबई से की। दिल्ली में आईएएनएस, ईटी हिंदी के बाद इन दिनों एक ब्रोकरेज हाउस में काम कर रहे हैं। अजीत जी से aboutajeet@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









kamaal hai ! ismeN to sawaal kam jawaab zyaada haiN. Yeh lekh to Dilip Mandal ji ki hi bat ko aage badhata lag raha hai.
हरा नहीं तो क्या रंगफेरउआ थे क्या? ये शब्द मेरा दिया हुआ नहीं है। जिस समय कयामत से कयामत तक फिल्म आयी थी उस समय दो तरह के शर्ट खूब चले थे। एक तो अंदर औऱ बाहर दोनों साइड से पहनने वाला और दूसरा कि शर्ट के मुडते ही रंग बदलने लग जाता था।..
अजीत जी मैं आपसे सहमत हूँ.
पर एक बात समझने की है.ये प्रभाष विरोधी वास्तव में अपने कुतर्कों के व्यापारी हैं.फेरी लगाकर गज ठोक ठोककर बेचनेवाले.ये बिना कुछ किए धरे ही हीरो होना चाहने का शोर है.खैर
गांधी जी की किताब हिंद स्वराज का यह सौवां साल है.सो उन्हीं के हवाले से कुछ कह रहा हूँ.गांधी एक जगह कहते हैं कोई भी पेशा हो पहले देखिए कि उसका मक़सद क्या है?लोकसेवा है या धनार्जन?अगर मक़सद धनार्जन हो तो कोई भी पेशा हो वह अपवित्र है.आज प्रभाष जोषी के अधिकांश आलोचक,दलित-स्त्री उद्धारक अपवित्र पेशों के धुरंधर लोंग हैं.इन्हें प्रभाष का ब्राह्मण होना तो दिखता है पर अपने धन का वर्ण दिखाई नहीं देता.अपने थूक कर चाटते रहने की स्थाई बौद्धिकता दिखाई नहीं देती.संयोग से ये पत्रकार हैं.इन्हें अपने मजबूर दिनों की रटी हुई सूचनाओं पर इतना गुमान है कि प्रभाष जोषी या उनके जैसे लोग अनपढ़ लगते हैं.
सो इन्हें प्रणाम ही किया जाना चाहिए.
श्री अजित जी,
प्रभाष जोशी की बौद्धिक क्षमताओं-अक्षमताओं,
पत्रकारी गुणों, भाषा की उनकी कला, उनके निजी और पेशेवार गुण-दोष की खोजबीन कोई कर भी नहीं रहा है। उनकी कामयाबियों और नाकामयाबियों पर आप अचानक बात क्यों करने लगे। उनका अखबार कितना बिका और क्यों उनके संपादक रहने के दौरान ही गिर पड़ा, इस पर बात करने की अब कोई जरूरत नहीं है। आपत्ति प्रभाष जी की इस बात पर है कि किसी जाति विशेष में कोई खास गुण होता है। ब्राह्मण, क्षत्रीय, शूद्र और दलितों में मेरिट का कोई फर्क है इसे आप मानते हैं क्या। दिलीप मंडल की बातों से मैं सिर्फ ये समझ पाया हू कि किसी आदमी की बुराइयों को उसकी को जाति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए वैसे ही जैसे किसी के अच्छे गुणों को भी जाति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। ये खतरनाक है। आपने देखा नहीं कि दिलीप मंडल ने किस तरह इशारों में बताया कि नारायणदत्त तिवारी के मामले में जाति और गुण को जोड़ने का तर्क ब्राह्मणों के खिलाफ चला जाता है। इसलिए सभी जाति के लोगों को इस विचार का विरोध करना चाहिए। अजित जी आपको भी।
मेरा मानना है कि प्रभाष जोशी बड़े पत्रकार थे। हिन्दी पत्रकारिता में बहुत उंचा दर्जा उन्हे मिलना चाहिये। उनकी भाषा कमाल थी।
पर इससे उनकी जिम्मेदारी बढ़ती है। जिम्मेदारी एक भार होती है। आम समाज में तमाम लोग बेकार की बातें करते हैं। पर एक पढ़ा लिखा आदमी जैसे राजीव गान्धी ऐसा कहते है कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। सन्दर्भ तो आप सबको याद ही होगा। या फिर महान नरेन्द्र मोदी और उनसे भी दो गज आगे बाल थाकरे या समाजवादी जॉर्ज़ फर्नांडीज(भाजपा की चापलूसी में) अगर कहते हैं कि स्त्रियों का बलात्कार जैसी बाते होती रहती हैं तो यह बेहद निन्दनीय है और ये लोग चाहे जितने महान हो इसकी निन्दा होनी चाहिये। ठीक इसी तरह अगर ब्राह्मण जाति के पक्ष में और इस जाति के कारनामों के पक्ष में कुछ भी तर्क गलत है। अगर यह आनुवांशिक है तो आनुवाशिकी भी बनते बनते, सैकड़ो साल में ही सही, पर विकासक्रम में बनती है। अगर आप इसे दैवीय मानते हैं तो मुझे कुछ नही कहना। जो तर्क आपने रखे हैं वो इत्त्फाकन फासिस्टों का मनपसन्द तर्क है। (याद करें हिटलर का मीन केम्फ पेज नम्बर 216).
हाँ ये जरूर है कि दिलीप की भाषा से उसकी कुंठा भी सामने आई।
तो अजित बाबू (आपका सवर्ण होना आपके लेखन से टपकता है, अवर्ण होंगे तो आश्चर्य होगा),आपके मुताबिक प्रभाष जोशी औरत को पति की लाश पर जिंदा जलाने का समर्थन करके भी महान थे। उन्होंने सती प्रथा के समर्थन के लिए कभी माफी नहीं मांगी। इसका बचाव ही किया। ब्राह्मणवाद का खुलेआम समर्थन करके और कांबली को जाति के आधार पर नीचा दिखाकर भी वो महान थे। खुद को ताल ठोंककर कर्मकांडी और ब्राह्मण कहने के बावजूद वो महान थे। ये महानता आपको मुबारक। हिटलर भी क्या जोरदार भाषण देता था। जर्मन समाज की उसे कितनी बेहतरीन समझ थी। वो कितना बडा़ संगठनकर्ता था। हेल हिटलर!
सिवाय शीर्षक के इस लेख का दिलीप मंडल जी के लेख से कोई भी संबंध नहीं है। फ़िर दिलीप जी जवाब किस बात का दें !?
संजय ग्रोवर जी आप तेलबाजी पर उतर आए हैं ऐसा लगता है। लगता इसलिए क्योंकि मेरी जानकारी के मुताबिक दिलीप मंडल इसके आदी नहीं हैं उन्हें जरूरत भी नहीं। आप शायद अनजाने में ऐसा कर रहे हैं। विषय की गंभीरता में गए बिना एक दो लाइन का चालू कमेंट कर के निकल लेना एक बात है। उसे पढ़ना और समझना दूसरी बात। संयज जी से अनुरोध है कि पहले चीजों को ठीक ढंग से पढ़ा करें। अजीत का लेख विषय पर नहीं है यह कहना गलती है इसे सुधारिए
*****कबीरा said:
श्री अजित जी,
प्रभाष जोशी की बौद्धिक क्षमताओं-अक्षमताओं,
पत्रकारी गुणों, भाषा की उनकी कला, उनके निजी और पेशेवार गुण-दोष की खोजबीन कोई कर भी नहीं रहा है। उनकी कामयाबियों और नाकामयाबियों पर आप अचानक बात क्यों करने लगे। उनका अखबार कितना बिका और क्यों उनके संपादक रहने के दौरान ही गिर पड़ा, इस पर बात करने की अब कोई जरूरत नहीं है। आपत्ति प्रभाष जी की इस बात पर है कि किसी जाति विशेष में कोई खास गुण होता है। ब्राह्मण, क्षत्रीय, शूद्र और दलितों में मेरिट का कोई फर्क है इसे आप मानते हैं क्या। दिलीप मंडल की बातों से मैं सिर्फ ये समझ पाया हू कि किसी आदमी की बुराइयों को उसकी को जाति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए वैसे ही जैसे किसी के अच्छे गुणों को भी जाति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। ये खतरनाक है।*****
*****anurag singh said:
सन्दर्भ तो आप सबको याद ही होगा। या फिर महान नरेन्द्र मोदी और उनसे भी दो गज आगे बाल थाकरे या समाजवादी जॉर्ज़ फर्नांडीज(भाजपा की चापलूसी में) अगर कहते हैं कि स्त्रियों का बलात्कार जैसी बाते होती रहती हैं तो यह बेहद निन्दनीय है और ये लोग चाहे जितने महान हो इसकी निन्दा होनी चाहिये। ठीक इसी तरह अगर ब्राह्मण जाति के पक्ष में और इस जाति के कारनामों के पक्ष में कुछ भी तर्क गलत है। अगर यह आनुवांशिक है तो आनुवाशिकी भी बनते बनते, सैकड़ो साल में ही सही, पर विकासक्रम में बनती है। अगर आप इसे दैवीय मानते हैं तो मुझे कुछ नही कहना।*****
आदरणीय अनिकेत जी, अनुरोध है कि लेख भी ठीक से पढ़ा करें, कमेंट भी और ज़िंदगी को भी। क्यों कि सभी जानते हैं कि आज भी अपने यहां किस वर्ण-जाति की तेलबाज़ी से फ़ायदा होता है। आपने ठीक कहा कि दिलीप जी इसके आदी नहीं पर आपके कमेंट से लगता है कि अजीत कुमार जी इसके आदी रहे हैं (मैं तो व्यक्तिगत रुप से दोनों को ही नहीं जानता aur na iski zarurat samajhta huN पर शायद आप जानते होंगे)। गांधीजी की भी जब आलोचना होती है तो कोई यह नहीं कहता कि चूंकि उन्होंने देश को आज़ाद कराया था इसलिए उनकी बाकी सब बातें भूल जाओ।
हां, यह आपने ठीक कहा कि एक-दो लाइन का कमेंट नहीं करना चाहिए था। क्यों कि यह लेख संदर्भ से इस कदर हटकर है कि कमेंट की ज़रुरत ही नहीं थी।
आप लोग यहां प्रभाष जोशी की बात क्योंकर रहे हैं।
नारायणदत्त तिवारी, वामपंथी ेखक प्रोफेसर अजय तिवारी, शिवानी भटनागर कांड के आरके शर्मा, बस्तर कांड से मशहूर हुए रामशरणजोशी आदिके कारनामों का जातीय विश्लेषण क्योंनहीं कर रहे हैँ। इन लोगों के गुणों का अनुवांशिक विश्लेषण कीजिए,तोमजा आए। अनुराग सिंह जरा इस हबारे में भी तो कुछ बोलें। आप लोग विषयसे भटक रहे हैं याभटका रहे हैं। जोशी जी को जो बोलना-लिखना था, वो तो पूरा हुआ। अब तो व्यक्ति पर नहीं, बात पर बात होनी चाहि। गांधी के भी जातिवादी बिचारों, sex संबंधों पर उनके बिचारों, उद्योगपतियों से उनके रिश्तों, सब पर बात होती है यानहीं?
भाई अजित जी,
मुझे ये शीर्षक अनुचित लग रहा है। मेरा निवेदन है कि प्रभाष जी के थॉट्स पर बात करते हुए इतना व्यक्तिगत होने की आवश्यता नहीं है। प्रभाष जी के बारे में इस तरह के स्पष्टीकरण की जरूरत क्यों है जबकि कोई इस बारे में सवाल भी नहीं उठा रहा है। उनके व्यक्तित्व की पारदर्शिता असंदिग्ध है और उस बारे में स्पष्टीकरण देकर कृपया चीजों का गैरजरूरी रूप से शक के दायरे में न लाएं। आप शायद अनजाने में यही कर रहे हैं।
साथ ही ये बात भी मेरी समझ से परे है कि जब भी किसी व्यक्ति के विचारों पर बात की जाए तो क्या उसकी अनिवार्य शर्त ये है कि बातचीत व्यक्तित्व और कृतित्व की समग्रता में ही हो। गांधी, विवेकानंद या अरबिंदो की किसी एक बात पर बात नहीं हो सकती क्या? एक सच कई बार कई सच का कोलाज होता है, ये शायद आप भी मानेंगे। वैसे ही समग्र माने गए सच को विखंडित करके भी देखा जा सकता है, देखा जाना चाहिए।
हर व्यक्ति के लिए सच का पाठ भी अलग होता है। अलग अलग समय में भी किसी विचार का पाठ अलग अलग होता है। कबीर से लेकर तुलसी तक, गांधी से लेकर अंबेडकर तक और सैमुअलसंन से लेकर हटिंगटन और फुकोयामा तक को लोग अलग अलग नजरिए से देख और पढ़ रहे हैं। विचारों के हर टुकड़े की अलग अलग स्क्रूटनी भी हो रही है। विचारों का लोकतंत्र यही तो है।
धन्यवाद और नए साल की शुभकामनाएं।
अनिकेत नाम का व्यक्ति मूर्ख है क्या…
संजय ग्रोवर के बारे में जो उसने कहा है, वह तो खुद ही अजित के लिए कर रहा है।
यानी- तेलबाजी, यानी तेल लगाना…
अब तो गलथोथई की हद हो रही है। दिलीप मंडल ने एक बेहद गंभीर बात बहस से शुरू की और आप लोग उस मुद्दे पर बहस करने की जगह उनके ही पीछे पड़ गए। यही ब्राह्मणवाद का खूंखार चेहरा है। यहां ब्राह्मणवाद का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मण से नहीं है। लेकिन ब्राह्मण उस सत्ता के शीर्ष पर जरूर हैं और सबसे अधिक इस वाद के पोषक भी हैं।
आपने कहा कि प्रभाष जोशी को बीच में घसीटने की क्या जरूरत है? और बहुत बड़ी जरूरत है। यह एक ऐसा संदर्भ है जिसका हवाला बार-बार दिया जाएगा। इससे जाहिर होता है कि प्रभाष जोशी जैसा एक बहुत बड़ा पत्रकार, जो आंदोलनों में हिस्सा लेता रहा, जो ज़िंदगी भर सत्ता के एक तबके से लड़ता रहा… वो भी भीतर से एक कर्मकांडी ब्राह्मण थे और जीवन भर ब्राह्मणों को बढ़ाते और बचाते रहे।
अजीत जी, यह व्यवस्था ऐसे ही काम करती है। आपको एक उदाहरण देते हैं जिसे कई बार दिया जा चुका है। आप नरसिम्हा राव को जानते ही होंगे और लालू यादव को भी। लालू यादव भ्रष्टाचार के एक ऐसे मामले में आरोपी रहे जिसमें फैसला आए बगैर भी उन्हें महीनों जेल में बिताने पड़े। लेकिन नरसिम्हा राव जेएमएम कांड से लेकर लखुभाई पाठक ठगी कांड तक भ्रष्टाचार के कई मामलों में आरोपी बने। जेएमएम कांड में विशेष अदालत ने सन 2000 में उन्हें दोषी भी ठहराया लेकिन एक दिन भी जेल नहीं गए और बाद में ऊपरी अदालत से बरी हो गई।
अब आप आडवाणी और वाजपेयी का उदाहरण देखिए। दोनों बीजेपी में रहे। बाबरी मस्जिद गिराए जाने में दोनों की भूमिका रही। आडवाणी की मेहनत से बीजेपी सत्ता के दरवाजे तक पहुंची, लेकिन वाजपेयी बीजेपी के युग पुरुष हो गए और आडवाणी कलंक। आप बीजेपी को गौर से देखिए… एक के बाद एक उस पार्टी में कल्याण सिंह, उमा भारती सरीखे जनाधार वाले पिछड़े नेता हाशिए पर ढकेल दिए गए। लेकिन सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे नेता जिनकी हैसियत एक पंचायत चुनाव जीतने और जिताने की नहीं है सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
यह खेल है महीन खेल है। इसके सैकड़ों उदाहरण दे सकता हूं। अब देखिए न। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी। उनके पति फिरोज खान। उनकी सन्तान राजीव गांधी। लेकिन राजीव गांधी ब्राह्मण। राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी। इटली की ईसाई। लेकिन उनकी सन्तान राहुल गांधी एक ब्राह्मण।
इसलिए दिलीप मंडल ने जो लिखा उसे समझने की कोशिश कीजिए। गलथोथई मत कीजिए। यकीन मानिए। सेक्स स्कैंडल में फंसने के बाद भी एन डी तिवारी का कुछ बिगड़ेगा नहीं। हां जिन लोगों ने तिवारी पर आरोप लगाया है वो जरूर नपेंगे। क्योंकि आज भी इस देश में तमाम कुकर्म करने के बाद ऊंची जातियों के लोग महान हैं। और सबसे अधिक महान हैं ब्राह्मण। संविधान और कानून ने भले ही इन्हें किसी कुकर्म की छूट नहीं दी है लेकिन व्यवस्था के सभी अंगों को इन्होंने अपनी जकड़न में लेकर अपने लिए सभी कुकर्मों की छूट तय की है।
और बेचारे बेंगारु लक्षमण ! दलित थे शायद ! जार्ज फर्नांडीज़। क्रिश्चियन हैं शायद ! सिकंदर बख़्त जिन्हें ऋषितुल्य वाजपेयी की सरकार में बिन मांगे पद तक नहीं मिला था, कहां हैं आजकल ? मुसलमान थे शायद ! पर मुसलमानों को तो हमने ‘धारण-क्षमता’ से ‘पचा’ लिया था ‘‘क्योंकि वे हमारी जाति-प्रथा का सम्मान करते थे’’?! ये नहीं कर पाए होंगे शायद!
[...] सांप क़तई नहीं थे दिलीप मंडल जी! [8 Jan 2010 | 14 Comments | ] अजीत कुमार ♦ क्या प्रभाष जी के जाति [...]
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