खगेंद्र ठाकुर का फसाना : झूठ पर झूठ

खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे

♦ गौरीनाथ

ये विवाद रविवार डॉट कॉम की ज़मीन से फूटा है। वहां खगेंद्र ठाकुर ने एक शिकायतनामा लिखा है – क्या यह सब सलवा जुड़ूम है ? उनका यह शिक़ायत-आलेख जब भी छपा हो, कथाकार गौरीनाथ की नज़र उस पर लोगों के बताने पर गयी। उन्‍होंने अपना जवाब हमें भेजा है, जिसे हम जस का तस छाप रहे हैं : मॉडरेटर

Gourinath VS Khagendra Thakurपठन-पाठन और ज्ञान संबंधी प्रकाशन-प्रसारण के हर माध्यम के प्रति सम्मान-भाव रखने के बावजूद अभी तक मैं इंटरनेट फ्रेंडली नहीं हो पाया हूं। यही कारण है कि खगेंद्र ठाकुर की एक पोस्ट क्या यह सब सलवा जुडूम है? नहीं देख पाया था। इस बीच कुछ मित्रों ने फोन करके बताया, तो पढ़ा। पढ़कर खगेंद्र जी के अध:पतन पर दु:ख हुआ। अपनी एक ग़लती को ढंकने के प्रयास में एक पर एक झूठ गढ़ते हुए वे इस हद तक गिर सकते हैं, यह हमारे लिए तकलीफदेह है। यूं उनकी होलटाइम राजनीति के सफेद आवरण के पीछे जो राजनीतिक लोभ-लाभ-सिद्धि की कुटनीति रही है, उसकी थोड़ी-बहुत भनक रही ही है। नामवर सिंह जैसे मठाधीशों की बात तो छोड़‍िए, अदने से अफसर साहित्यकारों की चापलूसी, झोलटंग बनने की हद तक छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए राजनीति के गलियारे में भटकना, किसी भी दर्जे के सत्ता से सटे लेखकों की चारणनुमा प्रशंसा (तथाकथित आलोचना) इनकी लेखकीय गरिमा रही है। इन सब के बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ के साथ सक्रियता के चलते इनके प्रति मेरे भीतर सम्मान-भाव रहा है। इनके आलोचक से हमलोगों की अपेक्षा भले ही धीरे-धीरे खत्म हो गयी हो और इनका निरंतर पतनशील व्यक्तित्व चाहे जितना गिर गया हो, मैं इनके प्रति (दया-भाव से ही सही) इतना उदासीन नहीं हुआ कि दुआ-सलाम की औपचारिकता भी भूल जाऊं। लेकिन इस दुआ-सलाम का प्रतिफल छींटाकशी के रूप में, इतने गर्हित स्तर पर झूठ के रूप में, मिलेगा – ऐसा मैंने नहीं सोचा था।

बहरहाल, खगेंद्र ठाकुर ने पटना के पुस्तक मेला में घटित जिस घटना का उल्लेख किया है, उसमें उन्होंने सीधे-सीधे मेरा नाम नहीं लिया है। लेकिन मेरे प्रकाशन की एक किताब का नाम लेते हुए उन्होंने लिखा है – उसके प्रकाशक जो वही कथाकार हैं। और इससे बात साफ हो जाती है। इसलिए पटना पुस्तक मेला में घटित इस प्रकरण की असलियत उजागर करना मुझे ज़रूरी लगता है।

दरअसल, 7 से 15 नवंबर, 2009 तक पटना में आयोजित नेशनल बुक ट्रस्ट के उस मेला में मेरे प्रकाशन (अंतिका प्रकाशन) का भी स्टॉल था और उस बीच मैं लगातार वहां था। 12 नवंबर की दोपहर 2 बजे के करीब मेरे प्रकाशन से प्रकाशित अभिषेक रौशन की पुस्तक बालकृष्ण भट्ट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ का विमोचन नामवर जी ने किया था। यह विमोचन कार्यक्रम अंतिका द्वारा आयोजित नहीं था, बल्कि हमारे लेखक ने इसकी व्यवस्था मेला आयोजकों से मिलकर खुद करवायी थी। फिर भी मुझे वहां उपस्थित रहना था, लेकिन स्वास्थ्यजन्य कुछ परेशानियों के कारण मैं मेला में ही देर से पहुंचा था। जब पहुंचा, तब तक पुस्तक विमोचित हो चुकी थी और चर्चा चल रही थी। तभी मेरे पास संवाद आया कि नामवर जी खोज रहे हैं। सौजन्यवश मैं मंच तक उनसे मिलने गया था। मंच पर नामवर जी की बगल में खगेंद्र जी पहले से विराजमान थे। मैंने नामवर जी और खगेंद्र जी दोनों को एक ही तरह से हाथ जोड़ प्रणाम निवेदित किया था – जिसको खगेंद्र जी ने पैर छू लिये कहा है। साहित्यकारों में जिन-जिन से मैं अब तक मिला हूं, उनमें नागार्जुन, भीष्म साहनी और अमरकांत मेरे सर्वाधिक आदरणीय रहे हैं, लेकिन उनको भी हाथ जोड़कर ही प्रणाम करता रहा। (पैर छूने की आदत खगेंद्र जी जैसों की रही है, लेकिन क्या अब भी वे इस परंपरा के पालक का बहिष्कार करेंगे?) खैर, नामवर जी से औपचारिक भेंट कर (कुछ मिनट वहां बैठकर) मैं अपने स्टॉल पर लौट आया था, क्योंकि वहां सुदूर पटना से आये कुछ लेखक-मित्र मेरा इंतज़ार कर रहे थे।

जहां तक नामवर जी के ख़‍िलाफ़ नारेबाज़ी करने की खगेंद्र जी को मुझसे अपेक्षा थी, इस पर हंसा ही जा सकता है। किसी लेखक या व्यक्ति से असहमति का अर्थ उद्दंडता नहीं है यह बात खगेंद्र जी को कौन समझाये! विश्‍वरंजन की कविता पुस्तक का लोकार्पण तो बाद में हुआ था और यह कोई बड़ी घटना भी नहीं, नामवर जी तो भाजपा के जसवंत सिंह तक की किताब विमोचित करते रहे हैं और यह पूरा हिंदी संसार जानता है। इसके लिए हम नामवर जी से असहमत हों, तो क्या उद्दंडतापूर्ण विरोध करते नारेबाज़ी करने लग जाएं? धन्य हैं ऐसी अपेक्षा करने वाले खगेंद्र जी! चूंकि खगेंद्र जी नामवर जी का झोला ढोते रहे हैं और उनके भाषणों का संपादन करने के अलावा उनकी निकटता का लाभ बटोरते रहे हैं, इसलिए इस अपेक्षा का कारण वही समझते होंगे। मैंने अपने लेखन में जहां भी नामवर जी का ज़‍िक्र किया है, प्राय: विनम्र असहमति ही रही है। लेकिन उस असहमति से जिस बात की अपेक्षा खगेंद्र जी रखते हैं, वह उन्हें ही मुबारक हो।

इस आयोजन में नामवर जी ने खगेंद्र जी के शब्दों में मेरी जो अतिरंजित तारीफ की थी, वह मैंने हिंदुस्तान अखबार और दूसरे लोगों के माध्यम से ही जाना – खुद नहीं सुना। इस बाबत इतना ही कहूंगा कि यह नामवर जी की फितरत है। मेरी तारीफ में तब जो कुछ कहा गया था, सच में वह मेरी तारीफ नहीं, उस बहाने राजेंद्र यादव और हंस के विरुद्ध टिप्पणी उनकी मंशा रही होगी। और मैं यह भी जानता हूं कि उसके ठीक उलट बात नामवर जी किसी और आयोजन में कह सकते हैं। इसलिए उस चर्चा से मेरी रुचि का सवाल ही नहीं उठता।

असल बात यह है कि इन तमाम गढ़ी हुई बातों को परोस कर खगेंद्र जी अपने विश्‍वरंजन प्रेम और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान वाले सरकारी आयोजन में अपनी सहभागिता के कारणों से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं। ऐसा ही प्रयास खगेंद्र जी और उनके कुनबे के लोग सिंगूर और नंदीग्राम मामले में भी कर चुके हैं।

असल में नामवर जी के कार्यक्रम के काफी बाद खगेंद्र जी पुस्तक मेला में अचानक मिल गये। वे मंच स्थल की तरफ बढ़ रहे थे। मैंने उनसे हाल-चाल पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका हाइड्रोसिल का ऑपरेशन हुआ है और चलने-फिरने में दिक्कत हो रही है… लेकिन विश्‍वरंजन ने गाड़ी भिजवा दी, तो आना पड़ा। इस पर मैंने इतना ही कहा, आपके लेखक संघ के सभी महत्त्वपूर्ण लोग अफसरों के पिछलग्गू ही बन जाएंगे क्या? कि वे गुस्से से बिफर पड़े, विश्वरंजन मात्र डीजीपी नहीं, हमारे पारिवारिक मित्र हैं। मैंने कहा, ठीक है, वे पारिवारिक हैं आपके…! उनके सलवा जुडूम-प्रेम की तरह इस परिवार-प्रेम को घर के भीतर निभाइए। साहित्य में क्यों यह परिवारवाद ला रहे हैं…? मैं तो नहीं जाऊंगा ऐसी चर्चा सुनने।

खगेंद्र जी गुस्से से बुरी तरह कांपने लगे। कांपते-कांपते तेज़ आवाज़ में बोले, दिल्ली जाकर तुम बड़े लेखक हो गए हो… और आगे बढ़ गये।

मैं अपने स्टॉल पर लौट आया। करीब दो घंटे बाद अचानक खगेंद्र जी मेरे स्टॉल पर आये। क्षणभर बैठने के बाद बोले, मैं थका हूं, कोई बहस नहीं करूंगा। बस इसलिए आया कि लगा, तुम नाराज़ हो गये हो।

मुझे उनकी स्थिति पर दया आयी। मैंने कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझा। चार-पांच मिनट बैठकर वे किताबें वगैरह देखते रहे फिर चले गये।

इतनी सी घटना का जो अफ़साना खगेंद्र जी ने गढ़ा है, यह उनके भीतरी खोखलेपन को ही जाहिर करता है। ऐसे में उनके जीवन की कई अकथ्य कथाएं उजागर करना ठीक नहीं लगता, मगर इतना पूछने का मन करता है कि लंबे अरसे तक वे पटना के एमएलए फ्लैट में किस तिकड़म के तहत सरकारी लाभ भोग रहे थे? और विश्‍वरंजन के प्रति प्रेम को भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंचाने का क्या राज़ है? क्या नामवर जी का आशीर्वाद अब उनके लिए पर्याप्त नहीं? खैर… इस तरह के सहारों पर चलने वाले कुछ ज़्यादा ही शंकालु हो जाते हैं। अंत में उसी पुस्तक मेला से जुड़ी युवा कवि रामाज्ञा शशिधर की कुछ काव्य पंक्तियां प्रस्तुत हैं…

पुस्तक का मेला है
हजिपुरिया केला है

लेखक जी भारी हैं
रचना अधिकारी हैं

इतने लजीज हैं
हर दिल अज़ीज हैं

आसन सिंहासन है
आसीसी भाषण है

लोकार्पण घूस है
जिल्द खोलक रूस है

भाषा दालचीनी है
खुशबू बहुत भीनी है

गांधी मैदान है
सबको क्षमादान है

Gourinath(गौरीनाथ। मैथिली-हिंदी के सुपरिचित कथाकार। नाच के बाहर और मानुस मशहूर कहानी संग्रह। हंस से लंबे समय तक जुड़े रहे। फिलहाल हिंदी में बया और मैथिली में अंतिका पत्रिका का संपादन। साथ ही अंतिका प्रकाशन के संचालक भी हैं। उनसे antika56@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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