पुरुष ने बनाये स्त्री के चित्र, स्त्री ने रखे विचार
♦ निधि सक्सेना
कला किसके लिए? इसके हज़ारों जवाब हैं, लेकिन मुकम्मल कोई नहीं, शायद इसीलिए ये सवाल अब तक मौजूं है। क्या कला इंसान के लिए, उसकी तक़लीफ़ बयां करने के लिए है? या रसना-नयन तृप्ति के लिए है… विलास का साधन है…? कला को लेकर विमर्श की ये धारा अलग-अलग तरीक़ों से परवान चढ़ती रही है। हम समय समय पर कला की ज़रूरत, मौजूदगी, कोशिशों और कामयाबियों की दास्तान मोहल्ला लाइव पर लाते रहे हैं। हमने उत्तमा दीक्षित के कामायनी प्रसंग को सामने रखा, फिर उनकी ये सोच भी जाहिर हुई कि कलाओं पर पहरे क्यों लगते हैं? कुछ अरसा बाद जयपुर में हुई एक ख़ास कला प्रदर्शनी के बहाने औरतों की नज़र में क्या है पुरुष इसकी चर्चा भी हुई। आज एक और कला-नोट आपके लिए पेश है… लेकिन इस बार कलाकार ने खुद के चित्रों के बारे में नहीं बताया, न ही कोई और उनका काम मूल्यांकित कर रहा है। विषय स्त्री पर है, चित्रकार पुरुष हैं और समीक्षा दृष्टि एक स्त्री की, एक चित्रकार की है।
रामकृष्ण अडिग। अडिग कौन हैं? युवा पत्रकार डॉ दुष्यंत के शब्दों में, `अडिग एक विचित्र जीव हैं। कभी वैश्विक सिनेमा के घोर दर्शक… कभी भारतीय शास्त्रीय और अल्पज्ञात विदेशी संगीत के गुणी रसिक। बिरले गंभीर साहित्य पाठक… और सबसे पहले तथा आखिरकार एक सजग और विशिष्ट चित्रकार। इस विचित्र से जीव का कलाकर्म अपने समय के साथ आंख मिलाने के पागलपन में रचा हुआ है…’
इन्हीं अडिग की ताज़ा चित्र प्रदर्शनी पर अपनी नज़र डाल रही हैं युवा चित्रकार निधि सक्सेना। स्त्री को पोट्रे करते अडिग और उनके काम के निकष में जुटी एक अन्य स्त्री, वो भी चित्रकार… यही इस आलेख की ख़ासियत है। एक बात और, जो उल्लेखनीय है… कुछ चीजें जब लुप्तप्राय हो जाती हैं, तो ललचाती हैं और, और ज़्यादा… काश बची रहती… तो काम आती… ऐसी ही हो गयी है ईमानदारी। आदतन हो, ज़ुबान में हो, चाहे भाषा में हो या फिर व्यवहार में…, ये दिखती नहीं। कभी दिखे भी तो नाटकीयता से लबालब लगती है। निधि सक्सेना अपने काम और लहजे के साथ आत्मिक तौर पर ईमानदार हैं। ये उनकी ताक़त है और यही उनकी भाषा में भी दिखती है। यहां बहुत-से दोहराव हैं, जो भाषा की `देह’ पर मुग्ध हो जाने वालों को अखरेंगे, लेकिन निधि के लिए ये सहज है, मौलिक है और अपनी अभिव्यक्ति का तरीका भी… भूमिका इतनी ही, अब सीधे लेख : मॉडरेटर

…और अब मोहतरमा
ज़्यादा वक्त नहीं बीता, जब रामकृष्ण अडिग के चित्रों की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में लगाई गयी। पांच पेंटिंग और 16 पेंसिल वर्क थे। अडिग ने प्रदर्शनी का नाम रखा मोहतरमा। यूं तो पढ़ने वाले मोहतरम-मोहतरमाएं आप समझदार हैं! तो शब्द समझाने की ज़रूरत नहीं, लेकिन क्या करें, भूमिकाएं हमेशा से आगे और आगे आती रही हैं। हिंदी में मेम साहब, उर्दू में मोहतरमा और अंग्रेज़ी में मैडम काफ़ी मज़ेदार शब्द हैं। यूं तो ये काफी तहज़ीब से महिला की बुलाहट का औपचारिक शब्द है, लेकिन अक्सर इसका इस्तेमाल दूसरे ही रूप में रंग देता है। व्यंग्य करने के लिए ही मोहतरमा कहा जाता है और व्यंग्य के उस स्वर में मैडम या मोहतरमा सुनने पर महिलाओं के कान से जी तक जल जाते हैं। तो चित्रकार अडिग आपकी बनायी महिलाओं की 21 आकृतियों में मोहतरमा का कौन सा स्वर है?
अडिग के सभी चित्रों में महिला अपनी ही आकृति में उलझी और बंधी हुई दिखाई देती है। हर फ्रेम में महिला की वह उलझी आकृति अकेली है! कहीं-कहीं उस उलझी आकृति में गोलाकार लय भी है और साथ में शहरी जीवन के कुछ भौतिक बिंब भी हैं। क्या अडिग की ये महिलाएं ब्यूरोक्रेट, दंभी, अति-अति आधुनिक, वाचाल, अभिमानी रूप हैं! दरअसल, महिलाओं के दो ही रूप कलाओं में अधिकतर सर्टिफाइड रहे हैं। एक तो आंख में पानी वाली मां और दूसरा अल्ट्रा मॉडर्न आज़ादी में मिनी स्कर्ट को पैराशूट बनाकर उड़ने वाली औरत… लेकिन ये दोनों ही रूप औरत के शोकेस पीस हैं।
उसका एकदम निजी रूप भी है, जो उसका खुद का, अपने लिए मैं वाला रूप है। जिसमें औरत खुद अपना खोया-पाया वाला हिसाब रखती है। अडिग की मोहतरमा दरअसल वही हैं। औरत का स्वयं वाला निजी स्वरूप।
21 कलाकृतियों में एक मध्यवर्गीय औरत के बनने और बने रहने की दौड़ है। ये सदी का अंतिम सत्य तो नहीं है, लेकिन अधिकांशतः होता यही है कि दुनिया में दफ्तर में पन्ने पर या किसी चित्र में बनने औऱ बने रहने की भागदौड़ में व्यस्त औरत आखिरकार अकेली ही होती है… और और अकेली होती जाती है।
चर्चित किताब winner stands alone के कवर पर भी औरत अकेली ही खड़ी है, यानी जीतोगी तो अकेली ही रहना होगा… औरत को साथ और जीत में से एक चीज़ चुन लेनी चाहिए। शायद इसीलिए अडिग की औरत भी एकल ही है।
कई लोग कहेंगे, ऐसा नहीं है… यह भयानक feminist approach है। नहीं… न अडिग का, न मेरा ही ये इरादा है कि मैं men verses woman वाली जंग को ज़रा और हवा दें या उसकी आग में मिट्टी का तेल डालें। लेकिन कुछ तो है। कभी फेमिनिस्ट मूवमेंट शुरू हो जाते हैं – कभी इस विचार को पूरी तरह नकारते हुए ढांपा-काटा और लुप्त ही कर दिया जाता है… फिर भी कहानियों-कविताओं और चित्रों में महिलाओं के अलग-अलग रूप और बातें होती हैं। आखिर ये क्या है… और इस पर बात होनी चाहिए। कोई साहब यह भी कहेंगे कि चित्रों के रंग, संख्या और टेक्स्चर के बारे में बात करें… लेकिन साहब अडिग ने ये चित्र बनाये क्यों हैं? कोई भी चित्र क्यों बनाता है? विचार के लिए ही न ताकि विचार पर बात हो सके और बात आगे बढ़ सके। लेकिन चित्रों के विचार पर बात करना हम भूल गये हैं। नहीं भूले नहीं हैं, तभी तो समीक्षाएं जारी हैं। लेकिन विचार हम रंगों के बीच गोल कर गये हैं। तो आइए मोहतरमाओं पर फिर वही युगों-युगों से चली आ रही और जारी रहने वाली जली-कटी-भुनी women verses men वाली बहस-बहस खेलें। शायद मोहतरमा पर बात और बहस कुछ मुकम्मिल हो और अडिग के चित्रों की मोहतरमा के जरिये औरत के निज की समझी-नासमझी वाले दरवाज़े पर खटखट कर पाएं।
(निधि सक्सेना। दिल्ली में जन्म। राजस्थान स्कूल ऑफ आट्र्स जयपुर, वनस्थली, भारतीय विद्या भवन, फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट पूना वगैरह से कला-पत्रकारिता-टीवी की पढ़ाई-लिखाई। फ़िलहाल, जयपुर में निवास। कम उम्र की समझदार और मौलिक रचनाकार हैं। स्कल्पचरिस्ट और पेंटर होने की वजह से कला की परख तो उन्हें है ही, वे दूरदर्शन-नेशनल के कला परिक्रमा कार्यक्रम से भी जुड़ी रही हैं। उनकी कलाकृतियों का बहु-बार प्रदर्शन हुआ है। नारी-विमर्श की पैरोकार निधि डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाती हैं और फ़िलहाल जयपुर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक राग रेगिस्तानी का स्वतंत्र निर्माण, लेखन और निर्देशन कर रही हैं। निधि हिंदी की महत्वपूर्ण ब्लॉगर भी हैं। उनके ब्लॉग हैं – इस मोड़ से और इंतिफादा)

रामकृष्ण अडिग। अडिग कौन हैं? युवा पत्रकार डॉ दुष्यंत के शब्दों में, `अडिग एक विचित्र जीव हैं। कभी वैश्विक सिनेमा के घोर दर्शक… कभी भारतीय शास्त्रीय और अल्पज्ञात विदेशी संगीत के गुणी रसिक। बिरले गंभीर साहित्य पाठक… और सबसे पहले तथा आखिरकार एक सजग और विशिष्ट चित्रकार। इस विचित्र से जीव का कलाकर्म अपने समय के साथ आंख मिलाने के पागलपन में रचा हुआ है…’







चित्रों की ये मीमांसा बहुत ही ईमानदारी से बिना किसी शब्दाडम्बर के सहज रूप से की गयी है…जो चित्रों को समझने में मदद भी करती है…रोजमर्रा की जद्दोजहद से जूझती नारियों को चित्रों का विषय बनाना एक नया कदम है…अक्सर दुखिया नारी,या अप्सरा जैसी सुंदरियां..या फिर कुछ कर गुजरने वाली नारियां ही चित्रकारों का मन मोहती रही हैं….अपना स्वत्व तलाश करती मध्यम वर्गीय नारियां इतनी आकर्षक नहीं लगतीं कि उनपर एक सिरीज़ ही बनायी जाए..’अडिग जी’ ने यह सराहनीय कार्य किया है…और नारी तो हमेशा अकेली ही होती है..चाहे वो शीर्ष पर हो,मध्यम वर्ग की हो या दो रोटी जुटाने में लगी…दिन-रात एक करती निम्नवर्गीय महिलायें
और मोहतरमा शब्द, मुझे नहीं लगता कि व्यंग से लिया जाता है..एक चुहल सी होती है…किसी को मोहतरमा बुलाने में.
शब्दों को अपने अलग अर्थ दे दिये हैं खुद हमने। परंतु चित्रों में ऐसा बहुत शिद्दत से होता है। चित्र बनाने वाला जिस विचार के साथ रचना करता है, वही विचार दर्शक तक पहुंचना असंभव प्राय: होता है। इसलिए ही भूमिका की जरूरत महसूस की जाती है ताकि चित्रकार के विचारों के साथ ही चित्रों से तादात्मय स्थापित हो सके। सही है कि चित्रों पर विचार करते हुये कई नये आयाम उजागर होते हैं बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार एक शब्द विशेष को किसी अर्थ विशेष में बांध दिया जाता है। जबकि ऐसा होना रचनाकार के साथ न्याय नहीं है। अर्थ सदैव खुले रहने चाहिए अपने मन माफिक रूप में, अपने चले आ रहे आशयों को उकेरते हुए। तभी सब सच सामने आ पाता है, आना भी चाहिए।
behtareen article sundar painting
अडिग जी ने निस्संदेह कार्य तो सराहनीय ही किया है | पर निधि सक्सेना ने इज्स प्रकार की है वी उससे भी अधिक सराहनीय है | हम जैसे चित्रकारी की समझ ना रखने वालों को भी इस प्रकार की समीक्षाओं से चित्रों के निहित अर्थ समझ आ जाते हैं | यह भी सत्य है की नारी हर रूप में चित्रकारों का प्रिय विषय रही है | और चित्रकारों का ही क्यों, कवियों के, लेखकों के, उपन्यासकारों के, गीतकारों के – सभी के प्रिय विषयों में नारी का स्थान प्रमुख रहा है | और यह भी उतना ही सत्य है कि अपना अस्तित्व तलाशती महिला अंत में अकेली ही पड़ जाती है | यदि किसी के साथ जुड़ना है तो अपना अस्तित्व, अपना सुनहरा अतीत, अपना समग्र व्यक्तित्व तक पर रखना होगा | जिसके साथ जुडती है नारी, यदि पूर्ण रूप से उसी के रंग में नही रंग जाती तो साथ बना रहना संभव नही हो पता | कुछ अपवाद हर जगह होते हैं | पर बहुतायत में तो स्वयं को खोना ही जुड़ने की प्रथम शर्त है | लेकिन इस बात को हम केवल नारी के ही साथ क्यों जोड़कर देखते हैं ? कोई भी दो व्यक्ति जो परस्पर जुड़ कर रहना चाहते हैं, अपना अपना व्यक्तित्व, अपनी अपनी पहचान कही ना कही खोकर ही साथ जुड़े रह सकते हैं | लेकिन ऐसा होना नही चाहिए | क्या ऐसा नही हो सकता कि अपनी अपनी पहचान बनाये रखकर भी साथ बना रहे | बहरहाल, ये एक अलग मुद्दा है, जो भावावेश में हम यहाँ लिख गए | सत्य यही है कि अपनी पहचान बनाये रखनी है तो अकेलेपन का दंश भी झेलना होगा | और नारी के साथ तो यही सत्य लागू होता है | रही मोहतरमा शब्द की बात, तो ऐसा नहीं है की मोहतरमा शब्द व्यंग्य में प्रयुक्त होता है | हम लोगों के यहाँ तो किसी महिला को सम्मान के साथ संबोधित करने के लिए मोहतरमा शब्द का प्रयोग किया जाता है |
हम पूर्णिमा जी से सहमत्…निधि जी की समीक्षा सराहनीय है।
Bahut hi sunder bhasha mein saralta se paintings ki gehraiyan samjha di hain aapne…!!!
बेहतरीन…
मैं भारत में नवभारत टाइम्स में आदरणीय मनमोहन सरल जी की कला समीक्षा पढ़ते पढ़ते बड़ा हुआ। मुझे स्वयं चित्रकारी की बहुत समझ नहीं है। मैं शब्द चित्र बनाता हूं अपनी कहानियों और कविताओं में। किन्तु निधि सक्सेना ने अपनी क़लम के ज़रिये रामकृष्ण अडिग की कूची को नये अर्थ दिये हैं। अगर कहा जाए की निधि ने मुझ जैसे साधारण बुद्धि वाले व्यक्ति को भी पेंटिग्ज़ का अर्थ समझा दिया। एक तरह से कहूं तो निधि की इस समीक्षा को मौलिक लेखन कहा जा सकता है। निधि ने रंगों और कैनवस के स्थान पर पेंटिंग्ज़ के विषय और विचार की चर्चा की है। बधाई। मैं धन्यवाद अपने मित्र चण्डीदत्त शुक्ल का भी करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे यह समीक्षा पढ़ने को प्रेरित किया। अन्यथा मैं इस सुख से वंचित रह जाता।
तेजेन्द्र शर्मा
महासचिव – कथा यू.के.
लंदन
Meri jaankari me… jo kalakar kala shetra se juda hai uski kalpana shakti bahut sashkt hoti hai.. weh vyakti apni soch, apni kalpana aivam anubhav ko canvas par jeevant karta hai… canvas par jeevant kiya gaya yeh kalpnik chitra shaant hokar bhi bahut kuchh kehta hai.. kuchh vyakti usme apna ansh dekhte hain… kuch ke liye weh keval rango ka mila-jula sansar hota hai parantu uska mehatv keval kalakar ya uski samiksha karne wala hi janta hai ki weh apne kala kaushal se kya kehna chahte hain.. adig sahab ne apne chitron ko Mohtarma ka shirshak kis sandarbh me rakha hai ye to ve swayam hi bata sakte hain.. parantu jis tarah kaha jaata hai ki heere ki kadra johri hi janta hai to aisa prateet hota hai ki nidhi saxena ji ne ek johri ki tarah heere ki chamak ko jaankar apna vaktavya diya hai, jo sashkt to hai hi sath sath bahut kuchh kehna chahta hai…
mujhe kala ka adhik gyan nahin hai aise me nidhi ji ki samiksha athwa adig ji ke chitro par tippani karna shayad anuchit hai mere liye..
poora vaktavya padne ke baad mujhe kuchh panktiya yaad aati hai jo ek sajjan ne mahilao ke ooper ki jaa rahi charcha ke dauran kahi…
“ki kitni bhi baatein ho… kitne bhi dosh hon…
kitni hi khamiyan kyu na ho ek mahila mein…
parantu hamare desh me aaj bhi jo sabse sasti cheez hai wo ‘MAHILA’ hai…”
halanki weh bazar me nahin bikti parantu phir bhi weh cheez hai.. kyuki usse aur uski bhawnao ko hamesha istemal kiya jaata hai ek cheez ki tarah… har kissi baat ke liye madh diya jaata hai dosh uske ooper… aur bhi bahut kuchh hai kehne ko, batane ko… parantu shayad anuchit hoga is swar me baat karna…
Waise dekha-socha-samjha jaaye to wakai me ek mahila bahut sasti hai.. Dr. Purnima Sharma ji ka vaktavya shayad kafi hai is kathan ko sidhh karne hetu..
ek mukhya baat kehna main bhool gaya…
Chandidutt Shukla ji ka dhanyawad… unhone mujhe is vaktavya se rubaru karwaya… saath hi… nidhi saxena ji aur dr. purnima ji ka bhi shukriya… unke shabd wakai me damdar aur prabhav shali hain…
रोचक समीक्षा , आपके प्रयास रंग ला रहे हैं ब्लॉग के जरिये कला की पहुँच जन मानस तक हो रही है
सराहनीय समीक्षा , बेहद पसंद आई बढ़िया प्रस्तुति.. बधाई !
प्रकाम्या
चित्रों की तुलना बहुत ही साफगोई किया गया है. जो चित्रों को समझने में मदद भी करती है और रोजमर्रा की जद्दोजहद से जूझती नारियों के चित्र उकेरती है. अक्सर दुखिया नारी, अथवा सुंदरियां..या कहें कि कुछ कर गुजरने वाली नारियां ही चित्रकारों का मन मोहती है. माफ़ कीजियेगा जहाँ तक मुझे लगता है कि मोहतरमा, मैडम शब्द, कहीं अब कहीं व्यंग का रूप में प्रयोग होता है. किसी को मोहतरमा बुलाने में एक चुहल सी होती है.
यह सुखद संयोग है कि आलेख एवं चित्र को हमने झारखंड की लोकप्रिय हिन्दी मासिक पत्रिका में भी सम्मानित रूप से प्रकाशित किया है, मैं निधि एवं अडिग जी का आभारी हूं,
हां यहां मैं अपनी कोई टिप्पणी नहीं अलग से नहीं करूंगा, क्योंकि जो जो कुछ मैं इस पर टिप्पणी करता वह पहले ही मेरी बात को आदरणीय श्री अविनाश वाचस्पति जी ने टिप्पणी कर कह दी है, मैं उनकी बात को ही अपनी टिप्पणी मानता हूं,
अरूण कुमार झा
प्रधान संपादक
दृष्टिपात
यह सुखद संयोग है कि आलेख एवं चित्र को हमने झारखंड की लोकप्रिय हिन्दी मासिक पत्रिका में भी सम्मानित रूप से प्रकाशित किया है, मैं निधि एवं अडिग जी का आभारी हूं,
हां यहां मैं अपनी कोई टिप्पणी नहीं अलग से नहीं करूंगा, क्योंकि जो कुछ मैं इस पर टिप्पणी करता उससे पहले ही मेरी बात को आदरणीय श्री अविनाश वाचस्पति भाई जी ने टिप्पणी कर, कह दी है, मैं उनकी बात को ही अपनी टिप्पणी मानता हूं,
अरूण कुमार झा
प्रधान संपादक
दृष्टिपात
सही कहती है निधि । औरत सदैव हर भूमिका में निहित होते हुये भी अकेली ही होती है । कई वजूद में बंटी है स्त्री इन चित्रों में। जैसे धरती कई रुपों में पोषण करती है वैसे भी स्त्री भी लेकिन रहती एक अकेली ही। हररुप में वह किसी न किसी पुरुष
का अस्तित्व रचती है। स्त्राी को ईश्वर ने भावात्मकक और बौद्धिक रुप से इतना सशक्त बनाया है कि पुरुष ने भयभीत उसे अपनी आड़ में रखा। नही तेा शायद वह अपने आपको दोयम महसूस करता। और जहां वह कुछ स्वतंत्र व्यक्तित्व होतीहै वहा वह अकेली रह जाती।
और मोहतरमा शब्द ही सही कहा जाये तो स्त्री को व्यक्त कर सकता है। जहां हिन्दी के
श्रीमती में पुरुष के पीछे जुड़ी नजर आती है वही सुश्री में पिता का साया नजर आता है।
मोहतरमा में वह मैं रुप में नजर आती है।
बहुत खूबसूरत।
bahut accha aalekh hai sir.. art ki bahut si dimensions hai aur yahan bharat me nazariye ka bahut fark hai .. bahut kam baar aisa hota hai ki , hum kisi art ko usi dimension me samajh paate hai ,m jis dimension me wo chitrit kiya gaya hota hai … mujhe ye ek imaandaari waala lekh laga . main chandi dutt ji ka shukriya karta hoon ki unhone , mujhe ye link diya ..
dhanyawad. mera bhi ek art blog hai .. kabhi dekhiyenga : http://artofvijay.blogspot.com/
aapka
vijay
चित्रकार अडिग के चित्र अच्छे हैं और निधि सक्सेना की व्याख्या भी बेहतर है. साथ ही मेरा यह भी अनुरोध है की आधुनिक युग की कुछ अच्छी कवितायेँ भी इस ब्लॉग पर प्रकाशित की जाय.
राम नयन सिंह
vichar bhi chitr hain sirf uska madhyam alag hai. koi mandir banata hai. to koi moorat, to koi ramcharit maanas likhta hai to koi fool ki mala banata hai.madhaym ki safalta is par hai ki vah kinhe jodta hai. hindi me prabhavi lekhan hona hi chahiye,
subhkamnayen.
Kiran Rajpurohit Nitila said:
और मोहतरमा शब्द ही सही कहा जाये तो स्त्री को व्यक्त कर सकता है। जहां हिन्दी के
श्रीमती में पुरुष के पीछे जुड़ी नजर आती है वही सुश्री में पिता का साया नजर आता है।
Sahi vyakhya ki hai Kiran ji ne.
अपने मित्र, सहृदय चण्डी दत्त शुक्ला जी के सुझाव से मैं इस समीक्षा तक पहुंचा और एक नई तरह की कला-समीक्षा से गुज़रने का सुख प्राप्त किया.हिंदी में सामान्यत: जो कला समीक्षा होती है वह घिसी-पिटी शब्दावली के घेरों से बाहर कम ही निकल पाती है. और इसलिए उसे पढते हुए कला से रू बरू होने का सुख कम, समीक्षक के ज्ञान से आक्रांत होने का त्रास ज़्यादा मयस्सर होता है. ऐसे में मुझे यह बात सुखद आश्चर्य का कारण लगी कि लेखिका, जो बाकायदा इस विधा की अध्येता रही हैं, उस रूढ शब्दावली से मुक्त हैं.इस स्मीक्षा के लिए वे बधाई की हक़दार हैं.
bahut khub… shabdon ne rangon ko aur nikhar diya.
Veri good Nidhi
Anil saxena
VOI Udaipur
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