बेसाख्‍ता बर्फ फाख्‍ता जलवायु

♦ ओम थानवी

यह एक अच्‍छी बात है कि लंबे समय के बाद जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने अपना स्‍तंभ अनंतर पुन: शुरू कर दिया है। इस स्‍तंभ में वे अपनी यात्राओं के बारे में पाठकों को बताते रहे हैं। आज उन्‍होंने कोपेनहेगन में बर्फबारी के बहाने राजस्‍थान की रेतीली यादों और पानी से जुड़े अपने अतीत को हम सबसे शेयर किया है। उम्‍मीद है, थानवी जी इस सिलसिले को अब निर्बाध रखेंगे : मॉडरेटर

Snow in Copenhagen, Photo Jansatta

रात भर में दुनिया बदल गयी थी। सोये तब खिड़की के पार मटमैला आलम था। थोड़ी-थोड़ी हरियाली। उठे तो आंखें चौंधिया गयीं। बाहर सब कुछ सफेद था। रात में बर्फ गिरी थी। फाहे अब भी हवा में तैर रहे थे। बिजली से अनुकूलित दीवारों के घेरे में पता कहां चलता है कि सोने-जागने के बीच क्या कुछ हो चला!

कोपेनहेगन पहुंचे तब ठंड बहुत थी। पर बर्फ नहीं थी। बर्फबारी ने शहर की रंगत बदल दी। एक बार तो लगा जैसे सब कुछ ठहर गया है। हर चीज़ को बर्फ ने ढांप लिया था। धरती सफेद थी। सड़क का नक्शा बदल चुका था। बर्फ छतों तक पर जा बैठी थी। हरे पेड़ों की जगह सफेद पेड़ों की कतार थी और हर वाहन पर मानो कोई बर्फ की खोली चढ़ा गया था।

बर्फबारी को इस तरह देखने का मेरा यह पहला अनुभव था। इससे पहले कई दफा जाड़ों में यूरोप जाना हुआ। पर बर्फ से सामना नहीं हुआ।

हमारे यहां बर्फ सिर्फ पहाड़ी इलाकों में गिरती है। गुलमर्ग में खूब बर्फ देखी। पर बर्फबारी फिर भी नहीं। चंडीगढ़ के दिनों में जाने कितनी बार दिसंबर के अंत में सिर्फ बर्फबारी के लिए शिमला में डेरा डाला। बस इंतजार करते रहे। जैसे किसी अभयारण्य में शेर की एक झलक पाने का करते हैं। हर बार हताश होकर चंडीगढ़ लौट आये। सुनने के लिए कि हमारे पीछे बर्फ आ गिरी है!

एक दफा (मिश्र) अनुपम जी के साथ शिमला कूच किया। रास्ते में खबर मिली, आगे बर्फ गिर रही है। इसी से इतना रोमांच हुआ कि मोटर की रफ्तार दुगुनी कर दी। पर शिमला की दहलीज पर पहुंचने से पहले इतनी बर्फ गिर चुकी थी कि चढ़ाई पर हर गाड़ी रपट रही थी। शिमला जाने का रास्ता बंद हो गया। उलटे पांव शोघी से गाड़ी किसी तरह चंडीगढ़ लौटा लाये।

बहरहाल, आप जानते हैं, यूरोप के उस छोर बर्फबारी देखने तो नहीं गया था। लेकिन संयुक्त राष्ट्रसंघ के सम्मेलन की गर्मागर्मी के बीच मैदानी कोपेनहेगन में बर्फबारी का वह अनुभव एक रेगिस्तान वासी के लिए निराला था। हालांकि राजस्थान से उस जगह की तुलना नहीं की जा सकती। सर्दी और गर्मी ही नहीं, यहां से वहां हर तरह के फासले हैं। मगर फिर भी रेत और बर्फ में कई चीजें बरबस नजदीक जान पड़ीं।

रेत भी कुछ इसी तरह बरसती है। कभी हलकी, कभी तेज; कभी अंधड़ और कभी तूफान की मानिंद। हवा ठहरी हो तो रेगिस्तान में आसमान बहुत चटक होता है। रात इतनी काली कि तारे गिन लें। पर आंधी चले तो थोड़ी देर में हर चीज रेत में नहा जाती है। आसमान भी। अनुकूलित वायु वाले घर नहीं होते, सो दरो-दीवार से लेकर नाक-कान जिह्वा-पलक सब जगह रेत जा बसती है। सुबह उठें तो घर के बाहर रेत का टीबा रास्ता रोके मिल सकता है। गर्मियों में सड़क पर जमा हो गयी रेत उठवाने के लिए सरकार खास बंदोबस्त करती है। बड़े वाहनों में मिट्टी हटाने वाले फावड़े-बेलचे टंगे रहते हैं।

कुछ ऐसा ही रंग कोपेनहेगन में बर्फ का दीखा। बर्फबारी थमी नहीं कि सड़क पर ट्रैक्टर बर्फ हटा रहे हैं, घरों में लोग। कार के पहियों के लिए बेलचे से सड़क तक रास्ता बना रहे हैं। सड़क के बाजू में बनी पगडंडियों पर नमक छिड़क रहे हैं, ताकि बर्फ जमे नहीं और पैदल आमदरफ्त मुमकिन हो।

बड़ों की आफत, बच्चों का खेल। रेत के ढूह में जैसे बच्चे थप-थपा कर घर बना लेते हैं, वही मस्ती बर्फ के बीच दिखाई दी। बर्फबारी में चलते हुए भी राजस्थान की रेत का खयाल आया। यहां बर्फबारी में ठीक वही मुश्किल पेश आती है। कोट पर बर्फ के फाहे जमा होते देख परेशानी हुई। किसी ने कहा, इनमें पानी नहीं है, बस झटकते रहिए। जैसे हम रेगिस्तान में रेत झटक लेते हैं।

दो-दो फुट फूली बर्फ पर चलना और भी टेढ़ा काम है। किसी ने आगाह किया – जनाब, ताजा गिरी बर्फ वाले हिस्से पर कदम रखिए। पर ताजा बर्फ में धंसे कदमों को वापस उठाना आसान काम नहीं है। रेत के टीबों पर चलने की तरह। सबसे बड़ा जोखिम तब, जब खुदा न ख्वास्ता जमी बर्फ पर पांव अचानक तेजी से फिसल जाए। सीधे हड्डी टूट सकती है। सोचकर ही सिहरन हुई। परदेस में तो बुखार तक का इलाज सस्ता नहीं।

तब अपनी रेत भली लगी। चाहे ऊंट की पीठ से आ गिरें, चोट तो नहीं लगेगी! फिर हमारी रेत के रंग में बहुत जान है। बर्फ का सफेद इतना सफेद है कि नीरस है। एक बार सुहाता है, बार-बार नहीं।

रंग न सही, बर्फ ने अंग्रेजी, डेनिश आदि यूरोपीय भाषाओं को बेहतर शब्दावली दी है। अब तक अक्सर मिसाल देता था हिंदी में पानी और जल पर्यायवाची हैं, फिर भी भिन्न अर्थ वाले शब्द हैं; गंदे नाले के पानी को हम जल नहीं कह सकते। जबकि अंग्रेजी में दोनों के लिए एक शब्द ‘वाटर’ ही है। पर बर्फबारी में लक्ष्य हुआ कि फाहों वाली ‘स्नो’ और जमने वाली ‘आइस’ के लिए हिंदी में एक ही प्रयोग है – संस्कृत से मिला हिम या फारसी मूल का बर्फ!

मेरे लिए कुतूहल का सबब बनी कोपेनहेगन की बर्फबारी शहर में चल रहे जलवायु संकट के सम्मेलन में गंभीर मंत्रणा का मुद्दा थी। दरअसल, शिमला-कश्मीर ही नहीं, दुनियाभर में यह साबित हुआ है कि अब वक्त पर पर्याप्त बर्फ नहीं गिरती, नतीजतन पानी का स्तर घट रहा है, फसलों पर उसका सीधा असर पड़ रहा है। बढ़ते तापमान की वजह से पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघल रही है। इससे समुद्र में पानी बढ़ रहा है। नीची सतह वाले इलाकों में और बाढ़ आएगी, जिसके शिकार जमीन, खेती, लोग और जीव-जंतु सब होंगे।

कोपेनहेगन सम्मेलन पर्यावरण का विराट मेला था। दुनिया जहान के शासक वहां बिगड़ते पर्यावरण से उबरने की आस लिए पहुंचे थे। लेकिन अमेरिका और दूसरे अमीर देशों ने पवित्र नहान को गंदला कर दिया। दुर्भाग्य यह रहा कि भारत भी इसमें शरीक हो गया। तीन अन्य देशों – चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका – वाले नये गठजोड़ के साथ। और अपनी समृद्धि – बल्कि विलास – के लिए बेहिसाब जहरीली गैसें छोड़कर दुनिया के पर्यावरण को ज्यादा बरबाद करने वाले विकसित देशों पर नकेल डालने के लिए बना क्योतो कानून खटाई में पड़ गया।

अमेरिका ने एक समझौते का मसविदा कोपेनहेगन में चलाया। मजा देखिए कि क्योतो करार से बारह साल भागता रहा अमेरिका सहसा कोपेनहेगन में शहसवार बन गया। दूसरी दुनिया में जिनकी वकत है, उन पर उसने कारगर दबाव डाला। दुनिया में विकसित और विकासशील देशों का वर्गीकरण नये समीकरण में अप्रासंगिक हो गया। भारत और उसके तीन नये साथियों (!) ने विकासशील खेमे को पीठ दिखाकर विकसित गुट की अंगुली पकड़ ली। मेरी समझ में गरीब और विकासमान देशों के बीच इससे हमारा भरोसा उठ गया। अब हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि कोपेनहेगन सम्मेलन ‘आंशिक’ रूप से ‘सफल’ रहा। विफलता को विशेषण लगाकर बदला नहीं जा सकता। हकीकत यह है कि मैक्सिको में साल के अंत में बर्फ-पानी-वन-धुएं पर नये सिरे से नये कायदों पर विचार होगा।

कोपेनहेगन गैर-सरकारी संगठनों के एक समूह के साथ जाना हुआ। उन्हीं के साथ रहा। पूरे सम्मेलन में कम लोग थे, जो पर्यावरण के पहले कुंभ – रियो द जनीरो के ‘पृथ्वी सम्मेलन’ – में भी मौजूद थे। टीवी वाले उन्हें ढूंढ़ते थे और तब-और-अब जैसी तुलना के लिए इंटरव्यू करते थे। वे मुझ पर भी मेहरबान हुए। दिलचस्प नजारा ही था कि एक पत्रकार दूसरे पत्रकार को इंटरव्यू कर रहा है!

अगर इसे बड़बोल न समझें तो बता दूं कि ऐसा सौभाग्य मुझे बाइस साल पहले भी मिला था! दिवंगत अनिल अग्रवाल के कहने पर राजस्थान के पारंपरिक जलस्रोतों पर कुछ काम किया था। दिल्ली में छोटे से काम का भी बड़ा हल्ला मचता है। सरकारी और गैर-सरकारी दोनों हलकों में कुएं-बावड़ियों को लेकर बड़ी जिज्ञासा जागी। उषा राय बीकानेर आयीं। जलस्रोतों की उस पड़ताल पर बात करने। हमारी लंबी बातचीत टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पेज पर छपी। बाद में अलग स्वरूप में ऊषा जी ने उसे पेनोस की फीचर सेवा से भी जारी करवाया।

फिर अनिल भाई ने कहा, जलस्रोतों पर एक परचा तैयार करो। किया। पढ़ भी दिया। पर यह तय करते हुए कि यह अब ज्यादा हो गया। तब अनुपमजी सामने थे। बोले, इस पर एक किताब लिखो। किताब की एक सुंदर-सी डमी उन्होंने हाथ से तैयार कर मुझे चंडीगढ़ भिजवा दी। उन्होंने कहा, उनका बड़प्पन। डमी मैंने अलमारी में रख दी और पानी-पुराण मेरे तईं खत्म!

वाकई खत्म? कोपेनहेगन ने अहसास कराया कि पानी और पर्यावरण के दूसरे पहलुओं के बारे में दिलचस्पी अब भी बची हुई है। कम से कम इतनी जरूर कि कोपेनहेगन सम्मेलन की चर्चाओं के चलते शहर भी ठीक से नहीं देख पाया। दस दिन रहने के बावजूद। हालांकि सर्दियों में दिन भी वहां कितना दिन होता है! ठीक-ठाक उजाले के कुल जमा तीन घंटे! (बाकी अगली बार)

om thanvi(ओम थानवी। भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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