सुनो मनीषा पांडेय, मैं मृणाल पांडे नहीं, मृणाल वल्लरी हूं!
दोपहर ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी कि मोबाइल बजा। हेलो किया और उधर से आवाज़ आयी – क्या आप मृणाल जी बोल रही हैं। मैंने कहा – हां। उधर से कहा गया – मैं दैनिक भास्कर भोपाल से फीचर संपादक मनीषा पांडेय बोल रही हूं। हम नये साल पर महिला सशक्तीकरण पर पेज बना रहे हैं। क्या आप उसके लिए लिख सकती हैं। अगर आपके पास टाइम न हो तो मैं आपसे बात कर इंटरव्यू तैयार कर लूंगी। मैंने कहा – मनीषा जी, मैं लिख कर ई-मेल कर दूंगी, मुझे अपना आईडी दें।
उसी वक्त विषय के विवरण के साथ मनीषा जी का मैसेज भी आ गया। मैंने उनके बताये विषय, शब्द सीमा और समय-सीमा के अंदर आलेख मेल कर दिया। मैंने उनसे फोन कर पूछा भी कि क्या आपको लेख मिल गया। उन्होंने कहा – हां, मिल गया।
फिर एक दोपहर दैनिक भास्कर, भोपाल के नंबर से फोन आया। मनीषा पांडेय थीं। उन्होंने कहा – मृणाल जी, आपने अपना नाम मृणाल वल्लरी क्यों लिखा है? आपका नाम तो मृणाल पांडे है। मैंने हंसते हुए कहा – जी नहीं मेरा नाम मृणाल वल्लरी है। उन्होंने कहा – आप हिंदुस्तान में हैं ना! मैंने कहा – हूं नहीं, थी। अब जनसत्ता में काम करती हूं। मनीषा जी ने आश्चर्य से कहा – क्या आप हिंदुस्तान, कादंबिनी, नंदन की संपादक नहीं हैं।
मेरे नहीं कहते ही मनीषा जी ने फोन काट दिया। या कहें कि उन्होंने फोन पटका। मैं उनके इस रवैये से हैरान थी।
मुझे नहीं मालूम कि उन्हें यह ग़लतफहमी कैसे हुई और मेरा नंबर उन्हें कैसे मिला। लेकिन मेरी इस हैरानी को दूर करने का समय मनीषा पांडेय के पास नहीं था।
यह सही है कि मैं मृणाल पांडे की कद की पत्रकार नहीं हूं। उनकी विकल्प मैं हो भी नहीं सकती। लेकिन अगर मैंने मनीषा जी के कहने पर मेहनत की, उनके लिए काम किया तो एक सॉरी सुनने की हक़दार तो थी। लेकिन मनीषा जी ने फोन ऐसे काटा जैसे किसी बहुत ही घृणित व्यक्ति से बात कर ली हो।
यक़ीन नहीं हुआ कि ये वही महिला हैं, जो पहले इतना मीठा बोल रही थीं। अगर मनीषा जी के पास सही जानकारी नहीं थी, तो अपमान मैं क्यों झेलूं। क्या एक फीचर संपादक का यही व्यवहार होता है कि उसे एक साधारण महिला से सॉरी बोलने में शर्म महसूस हुई। उन्होंने यह बताने की ज़रूरत भी नहीं समझी कि उन्होंने मुझे मृणाल पांडे क्यों समझा।
समझ नहीं आ रहा कि मनीषा के व्यवहार पर दुखी होऊं या अपने नाम के साथ मृणाल जुड़ा होने के कारण : मृणाल वल्लरी
अब फैसले मानने नहीं, लेने की बारी
♦ मृणाल वल्लरी
अभी-अभी बीता साल भारतीय गणंतत्र के इतिहास में इस लिहाज से यादगार रहा क्योंकि इस साल देश की राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सत्ता पक्ष की संसदीय दल की नेता और विपक्ष की नेता के पद पर महिलाएं काबिज हुईं। अब इन महिला प्रतिनिधियों को सिर्फ टोकन पद पर बैठी महिलाएं कह कर खारिज़ नहीं किया जा सकता। ये सभी सत्ता के गलियारों में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करा चुकी हैं। जो सोनिया गांधी कभी नेहरू-गांधी परिवार की डमी नेता कही जाती थीं, आज भारतीय राजनीति में उनकी हैसियत ‘किंग मेकर’ की है। जो महिला आरक्षण बिल कभी संसद के अंदर फाड़ दिया गया था, वह अब स्थायी समिति से पास होकर संसद में चर्चा के लिए आ गया है। यानी हो सकता है कि 2010 के संसद के सत्र में यह बहुप्रतीक्षित बिल भी पास हो जाए। ऐसा हुआ तो इसका प्रभाव आने वाले समय में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने में होगा।
जब प्रतिभा पाटील ने भारतीय गणतंत्र के कप्तान की कमान संभाली तो आलोचकों ने कहा कि ऐसे टोकन पदों से भारतीय राजनीति में महिलाओं की स्थिति मजबूत नहीं हो सकती। लेकिन आने वाले समय में यह टोकन पद ही मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। जब भारतीय वायुसेना के एक अधिकारी मीडिया के सामने लड़ाकू विमानों की कमान महिला पायलटों के हाथों में देने की मुखालफत कर रहे थे, उसी दौरान चौहत्तर साल की प्रतिभा पाटील सुखोई विमान में हाथ में साड़ी के पल्लू के बजाय हेलमेट पकड़ यह बताने की कोशिश कर रही थीं कि जल्द ही लड़ाकू विमानों की पायलट सीट पर महिलाएं भी बैठेंगी। बीते साल के अंत तक विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में महिलाओं के सशक्त दखल ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। महिलाओं की संसद में मौजूदगी की वजह से ही यह संभव हो सका कि महिला विरोधी फैसले का विरोध संसद के भीतर भी होने लगा।
बीते साल के अंत में रुचिका मामले में एक पूर्व डीजीपी राठौर को महज छह महीने की सज़ा का फ़ैसला सबको चौंका गया। लेकिन अदालत के फ़ैसले के साथ ही यह मामला ठंडा नहीं पड़ गया। इस मामले में शिक़ायत करने वाली और अपनी सहेली के लिए लंबी जंग लड़ने वाली आराधना प्रकाश ने अदालत के अंदर कहा – राठौर जैसे अपराधी को सज़ा हुई, बहुत अच्छा हुआ। हमारे संघर्ष और राठौर के अपराध का न्यायपालिका ने सही हिसाब किया, लेकिन इस अपराध को अपनी अस्मिता पर झेलने वाली रुचिका ने जान दे दी थी और उसकी कीमत महज छह महीने। मैं बहुत उदास हूं। न्यायपालिका को ऐसा करारा जवाब देकर एक महिला ने अपना फर्ज पूरा किया। वहीं एक दूसरी महिला विधायिका में अपना फर्ज पूरा कर रही थी। माकपा सांसद वृंदा करात ने फैसला आते ही राज्यसभा में यह मामला उठाया। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में सुधार के लिए संसद में आवाज़ बुलंद की तो इस मामले पर उनकी मुखालफत करने का साहस कोई नहीं कर पाया।
यह सही है कि रुचिका और मधु जैसी महिलाओं को पूरा इंसाफ नहीं मिल पाया। यों इस तरह की नाइंसाफियां हमारे लोकतंत्र में कोई नयी बात नहीं है। लेकिन इनके ख़िलाफ़ महिलाओं ने आवाज़ बुलंद कर अपनी ज़मीन जिस तरह पुख्ता कर ली है, उससे यह भरोसा ज़रूर पैदा होता है कि अब न्यायपालिका इस तरह के फ़ैसले नहीं दे पाएगी। सच तो यह है कि महिला सशक्तीकरण का रास्ता तब तक पूरी तरह साफ नहीं हो सकता, जब तक विधायी और न्यायिक प्रणालियों में उनकी दमदार पैठ नहीं होगी। आज से एक दशक पहले भी महिलाएं सारे काम करती थीं। लेकिन यह मर्दवादी समाज उन्हें एक बेगार मज़दूर की तरह देखता था। एक ऐसी मज़दूर, जो दुनिया का हर काम तो कर सकती है, लेकिन अपने फ़ैसले खुद नहीं ले सकती है। इसी तरह पूरे देश में भी महिलाओं की हैसियत घर जैसी ही बना दी गयी थी। पुरुष वर्चस्व की अर्थव्यवस्था में बांदी जैसा वजूद लेकर घर की चारदीवारी से कार्यस्थलों के घेरे में तो महिलाएं अस्सी के दशक में पहुंच गयी थीं। लेकिन फ़ैसले लेने और लागू करने वाली संस्थाओं तक महिलाओं की पहुंच नहीं थी। इस वजह से घरों की चारदीवारी के साथ कार्यस्थलों में भी उनका शोषण शुरू हुआ। लेकिन जैसे-जैसे विधायिका और कार्यपालिका में महिलाओं का दबदबा हुआ, उसका सीधा असर अर्थ और सेवा क्षेत्र में पड़ा।
शायद यह पहली बार था जब संसद में मातृत्व अवकाश और पालना घर का मुद्दा गूंज रहा था। टीवी पर चल रहा वह बजट सत्र आज भी याद किया जा सकता है। तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम साड़ियों और कॉस्मेटिक्स सस्ते होने की बाबत एलान करने के पहले एक महिला सांसद की ओर देख कर कह रह थे कि मेरी अगली घोषणा आपके चेहरे पर मुस्कान ला देगी। यह चिदंबरम का चुटीला अंदाज़ भर नहीं था। यह एक ऐसी संसद की तस्वीर थी जो महिलाओं को सिर्फ सजने-संवरने और पहनने-ओढ़ने तक ही देख रहा था। लेकिन महज पांच साल बाद तस्वीर बदल चुकी है। महिला सांसद गहने-कपड़े नहीं, सीधे न्यायपालिका में सुधार की मांग कर रही हैं। वे संसद की सामंती और पुरुषवादी वर्चस्व को तोड़ रही हैं। महिला सांसद कॉस्मेटिक्स और गहने सस्ते होने की नहीं, बल्कि कार्यस्थलों पर यौन शोषण और समान वेतन की बात कर रही हैं। राष्ट्रपति भवन में देश भर से आयीं उन महिला संरपंचों को पुरस्कृत किया जा रहा है, जिन्होंने अपने पंचायत क्षेत्र में कई तरह की सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की। ये महिला सरपंच अपने घर के मर्दों की छाया भर नहीं हैं। ये पंचायत स्तर पर राजनीति का ककहरा सीख संसद में स्त्री सशक्तीकरण का नया इतिहास लिखने की ओर क़दम बढ़ा रही हैं। इस साल तक तो महिलाओं ने नियम और कानून बनाने वाली संस्था की ओर कूच किया है।
यह तय है कि इसका असर घर में काम करने वाली, मिल में मशीन चलाने वाली, निर्माण क्षेत्र में ईंट ढोने वाली, सेवा क्षेत्र में काम करने वाली, खेल के मैदानों में मेडल जीतने वाली महिलाओं पर पड़ेगा। यहां महिला खिलाड़ियों पर आधारित फिल्म ‘चक दे इंडिया’ को याद किया जा सकता है। फिल्म में पुरुष राजनेताओं और नौकरशाहों की वर्चस्व वाली समिति महिला हॉकी खिलाड़ियों की टीम भेजने से इनकार कर देते हैं। समिति का मानना है कि महिलाओं के हाथों में हाकी की स्टिक नहीं बेलन ही ठीक है। समिति में मौजूद एकमात्र महिला का रवैया भी मर्दवादी हो जाता है।
यह तो फिल्मी कहानी है। लेकिन हमारे देश में कानून बनाने वाले भाग्यविधाता ज्यादातर इसी मानसिकता के हैं। अगर उस खेल समिति में पुरुष सदस्यों के बराबर ही महिला सदस्य भी होतीं, तो शायद उन महिला खिलाड़ियों को उतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। आज भी हमारे देश में ज़्यादातर महिला खिलाड़ी पुरुषवादी नीतियों के कारण अपना हौसला तोड़ देती हैं। उम्मीद है कि बीते साल फैसले लेने वाले जिन पदों तक महिलाओं ने अपनी पहुंच बनायी है, वह इस साल महिला सशक्तीकरण का नया इतिहास लिखने में कामयाब होगा। (मनीषा पांडेय ने मृणाल वल्लरी से यही लेख लिखवाया था।)
(मृणाल वल्लरी। जनसत्ता की युवा जुझारू पत्रकार। दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए। सामाजिक आंदोलनों से सहानुभूति। मूलत: बिहार के भागलपुर की निवासी। गांव से अभी भी जुड़ाव। उनसे mrinaal.vallari@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूं तो शायद आप वही हैं जिन्हें मैं नवभारत टाइम्स में कई बार पढ़ चुका हूं। आप अच्छा लिखती हैं। अच्छा लिखने वालों की पहचान उनके लेखन से बनती है, जो नाम देखकर तय करते हैं कि लेखन अच्छा है या कमतर, उन्हें अपनी सोच बदल लेनी चाहिए। मनीषा जी को अपने पद की गरिमा कायम रखते हुए सॉरी बोलना चाहिए था। इससे उनका कद शायद बढ़ता ही। अभी भी देर नहीं हुई है। कोई छोटा लेखक हो या बड़ा, उसका अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं हैं।
मनीषा पांडे का व्यवहार गलत है। उन्हें अपने किए व्यवहार पर अफसोस होना चाहिए।
(व्यंग्य-भाषा में ही सही) पहले भी एक लेख में मैंने लिखा था कि यहां तो लेखन छद्म नाम से ही शुरु करना चाहिए क्यों कि यहां फैसले रचना की गुणवत्ता को देखकर कम और नाम, पद, फ़ायदा आदि-आदि देखकर ज़्यादा लिए जाते हैं। परसों भी तसलीमा के लेख पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह ‘छोटे-बड़े’ की भाषा आपत्तिजनक है। मृणाल वल्लरी को ख़ुदको ‘बड़ा’ नही ंतो ‘छोटा’ भी क्यों समझना चाहिए !?
मृणाल जी,
यह है एक ‘फीचर एडिटर’ का एक और ‘फीचर’ !
भला हो ऐसे संपादक का, जिसे मृणाल पांडे द्वारा ‘हिंदुस्तान’ छोड़ने की खबर तक नहीं मालूम. मज़ा देखिये कि एक संपादक का संपर्क- सूत्र इस कदर लचर होता है कि उसे मृणाल पांडे का सही फ़ोन नंबर तक नहीं मिलता !
चौतरफा गिरावट के इस दौर में संपादक के पद पर ऐसे लोगों को देखकर हमे आश्चर्य क्यों हो?
मृणाल जी, आपकी आपत्ति पढ़ी। जिस गलत नंबर की वजह से इस सारे कनफ्यूजन की शुरुआत हुई उसका इतिहास ढाई साल पुराना है। जिन श्री दास जी की वेबसाइट पर आपने लिखा है, उन्हीं के द्वारा मृणाल पांडेय के नाम पर आपका नंबर मुझे ढाई साल पहले मिला था। उनसे मैंने नंबर मांगा, उन्होंने मुझे ये नंबर एसएमएस कर दिया। लेकिन गलती उनकी भी नहीं है। उन्होंने भी किसी और से मांगकर मुझे नंबर दिया था। किससे मुझे पता नहीं। संभवत: एक जैसे दो नाम होने और किसी जल्दबाजी की वजह से ये गलती हो गई हो। (अखबारों में हम किस तरह के दबाव और तनाव के बीच काम करते हैं, आपसे छिपा नहीं है।) ये एक मामूली सी गलती थी, जिसके लिए किसी के भी सिर दोषों का ठीकरा फोड़ना समझदारी नहीं होगी। आपको याद हो तो आपके इसी नंबर पर मैंने ढाई साल पहले उसी समय आपको मृणाल पांडेय समझकर फोन भी किया था और आपने खुद मुझसे कहा था कि मैं आपको अपना सीवी मेल कर दूं। आपने कहा था कि हिंदुस्तान के कुछ एडीशन देहरादून वगैरह से शुरू हो रहे हैं। उस बातचीत का क्या अर्थ था पता नहीं। फिलहाल आपके बताए उसी पते पर मैंने सीवी भेजा भी था। उसके बाद कभी इस बारे में बात नहीं हुई। उम्मीद है वह घटना आपको याद होगी। हो सकता है आपने मजे-मजे में मुझसे बात कर ली हो। ये भी ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है। अब कभी आपसे मिलूं तो मैं भी ताली बजाकर अपने कनफ्यूजन और आपके मजे लेने पर हंसूंगी ही। लेकिन तब ये पता नहीं था कि एक छोटा सा कनफ्यूजन, जिसकी शुरुआत दरअसल कहीं और से हुई, इतने बड़ा रूप ले लेगा। उस दिन जब आपने सच्चाई का खुलासा किया तो मैंने कहा था, सॉरी, आई गेस, कोई कनफ्यूजन हो गया है। ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच हुई। मैंने सॉरी कहा था, लेकिन कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। लेकिन मेरे मुंह से ये शब्द जरूर निकले थे। जब मैंने अपने एडीटर को सारी बात बताई तो उनका कहना था कि आपका लेख हम अलग से दूसरे पन्ने पर जरूर छापेंगे। आपके लेखकीय श्रम की गरिमा का अपमान करने का हमारा कोई इरादा नहीं है। कनफ्यूजन और गलती मेरे पार्ट पर हुई थी। उसकी सजा आपको नहीं मिलनी चाहिए। आपको बुरा लगा। मैं समझ सकती हूं। आपकी जगह मैं होती तो मुझे भी लगता। लेकिन क्या ये बेहतर नहीं कि हम पूरे मामले की एक बार पड़ताल कर लें।
हम जो विशेष पन्ने छाप रहे थे, वे कल ही खत्म हुए हैं और आज आपका ये लेख छप गया। लेकिन फिर भी मैं आपसे एक बार फिर क्षमा चाहती हूं कि ढ़ाई साल से मेरे मोबाइल में सेव एक कनफ्यूजन की वजह से आपको तकलीफ हुई। आशा है इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इसके पीछे आपको तकलीफ पहुंचाने या आपके लेखकीय श्रम का अपमान करने की मेरी कोई मंशा नहीं थी, आप मुझे माफ करेंगी।
आपको खुद को बड़ा या छोटा कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। आप अच्छा लिखती हैं। अखबार मैं क्या छपेगा ये तय करना मेरा काम नहीं है। आप खुद भी एक अखबार मैं नौकरी करती हैं। मुझसे बेहतर जानती होंगी कि हम सब एक बड़ी मशीन के मामूली पुर्जे भर हैं। अगर आप मुझे निजी तौर पर जानती होतीं या मेरी सोच से वाकिफ होतीं तो ऐसा नहीं कहतीं। मैं किसी व्यक्ति के लिखे का सम्मान उसके ब्रांड नेम से नहीं करती। सार्वजनिक तौर पर कह रही हूं कि मृणाल पांडेय का लिखा मैंने कुछ नहीं पढ़ा और पढ़ने की जरूरत भी नहीं महसूस करती। हो सकता है निजी तौर पर मुझे कोई ऐसा लेखक पसंद हो जिसके बारे में कोई नहीं जानता। लेकिन जरा सोचिए, मेरे कमरे की बुक शेल्फ पर कौन सी किताब होगी ये तो मैं तय कर सकती हूं, लेकिन जहां मैं मामूली नौकर भर हूं, वहां क्या छपेगा ये मैं कैसे तय कर सकती हूं।
रवींद्र रंजन जी, ये घटना कतई इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती कि मेरी सोच ऐसी है जो बड़े ब्रांड वालों को बड़ा लेखक मानती है। इससे ज्यादा सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी।
मनीषा जी,
अच्छा है कि आपने मृणाल से माफ़ी मांग ली.
लेकिन क्या एक फीचर एडिटर को इस कदर लापरवाह होना चाहिए? खासकर उस स्थिति में जब मीडिया की विश्वनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हों .
‘फैक्ट’ ( भले ही वह एक फ़ोन नंबर हो) को cross – check करने की जिम्मेदारी को कोई सजग पत्रकार कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है?
बिलकुल ठीक बात कहा है आम आदमी ने .
मनीषा जी, आपने लिखा है कि दासजी से आपने मृणाल पांडे का नंबर माँगा और उन्होंने कहीं से मांगकर आपको दे दिया. लेकिन आपने इसे जांचने की जहमत क्यों नहीं उठाई ? आप जिस जिम्मेदार पद पर हैं उसमे ये तो और भी जरुरी हो जाता है. अपनी गलती को एक confusion कह देने भर से बात ख़त्म नहीं हो जाती मनीषा जी. ये तो एक हास्यास्पद और लचर तर्क ही माना जायेगा. ऐसे ही हास्यास्पद और लचर तर्कों की वजह से मीडिया की भद्द हो रही है.
गलती इंसान से ही होती है, इसे सुधारता भी इंसान ही है। मृणालजी ने अपना पक्ष रखा, अच्छा लगा। बातें साफ हुईं। बात को यहां पर खत्म होकर मूलतः बात मृणाल के लेख पर होनी चाहिए, क्या नहीं?
लो साहब… मैं भी कन्फयूज हो गया। कृपया यहां मृणालजी की जगह मनीषाजी करके पढ़ें।
अंशुमाली जी से पूरी तरह सहमत.
लेकिन मृणाल ने बहुत ही सही मुद्दा उठाया है कि क्यों आज पत्र -पत्रिकाओं में लेख छपने की कसौटी गुणवत्ता के बजाय लेखक का नाम हो गया है? क्यों एक लेखक को संपादक या पेज इंचार्ज से ‘बनाकर रखने’ की नसीहत दी जाती है? इस पर भी बात होनी चाहिए.
इस मसले पर मेरा समर्थन मनीषाजी के साथ है. अगर मृनालजी अख़बार से जुडी नहीं होती तो समझा जा सकता था. मगर एक अख़बार में कम करने के बावजूद वे इस मसले पर मनीषाजी की परिस्थितियां नहीं समझ पाई. मैं मनीषाजी से मिल चुका हूँ, वाकई वे इस तरह के व्यव्हार वाली महिला नहीं हैं. मैं उनसे काफी जूनियर हूँ मगर उन्होंने मेरे साथ हमेशा समानता का व्यवहार किया. एक बार दैनिक भास्कर अख़बार के बारे में यह सोचा जा सकता है की वहां का व्यव्हार अच्छा नहीं है. मगर मनीषाजी काफी मधुर स्वभाव की हैं. अच्छा हुआ की उन्होंने अपना स्पष्टीकरण दे दिया वर्ना उन्हें जानने वाले सोच में पद जाते. मृनालजी को इस छोटी सी बात को तूल नहीं देना चाहिए था.
आपने सही कहा कि हम दोनों की बातचीत के बीच टेपरिकार्डर नहीं था। और अपनी बात को सार्वजनिक मंच पर लाने के पहले भी मेरे “जेहन” में टेपरिकार्डर होने या नहीं होने की बात बिल्कुल नहीं आई। खैर टेपरिकार्डर होता तो…।
बहरहाल, नंबर आपको कहीं से भी मिला, आपने बातों के क्रम में मुझसे कहा कि क्या आप हिंदुस्तान नंदन और कादंबिनी की संपादक नहीं हैं। जबकि मृणाल पांडेय कब की हिंदुस्तान छोड़ चुकी हैं। कोई बात नहीं।
आपने अपना यह कन्फ्यूजन दूर होते ही, जिस तरह फोन काट दिया, वहां इस बात का साफ संकेत था कि मेरे लेख का अर्थ मेरे नाम के कारण क्या हो गया है।
आपकी संस्थान के भीतर क्या बात हुई थी, यह मुझे बताना आपने जरूरी नहीं समझा, ताकि अगर कन्फ्यूजन की वजह से गड़बड़ी थी तो दूर हो जाए।
खैर, इधर मैंने एक दिन मृणाल पांडेय का लेख भास्कर के महिला पन्ने पर छपा देखा। वहां सागरिका घोष भी थीं और नीचे लिखा था कि दोनों लेख मनीषा पांडेय से बातचीत पर आधारित है। उसके बाद ही मुझे अपनी बात सामने रखना जरूरी लगा।
आपने मुझे भी फोन पर ही विषय पर बातचीत कर लेने की ही बात की थी। लेकिन मैं खुद को जानती हूं कि मैं फोन पर उतने सहज तरीके से अपनी बात नहीं कह पाती। इसलिए मैंने आपको लिख कर भेज देने की बात कही।
यह बिल्कुल सही है कि कभी आपने मुझे फोन किया था तो मैंने अपनी जानकारी में आई यह बात बताई थी कि शायद देहरादून से एडिशन शुरू हो रहा है, वहां के आप ट्राई कर सकती हैं। उस समय भर्तियां होने की सूचना थी, मैं हिंदुस्तान के एनसीआर डेस्क पर थी और बहुत सारे लोगों के फोन आते थे। मेरे दूसरी सहयोगियों के पास भी। मेरे पास जितनी जानकारी थी, मैंने आपको बता दिया था।
उस वक्त भी मैं मृणाल वल्लरी के रूप में ही बात कर रही थी…
दूसरी बात, किसी के भी नौकरी खोजने जैसी परिस्थितियों का कभी भी मैं किसी भी रूप में मजाक नहीं उड़ा सकती। मैं इतना जानती हूं कि नौकरी मिलना आज कितना मुश्किल हो गया है और आज के दौर में उसे बचाए रखना और भी मुश्किल। इसलिए मैं यह बात दोबारा जोर देकर कहना चाहूंगी कि मैं इस तरह की स्थितियों का मजाक नहीं बना सकती।
जो भी हो, यह प्रसंग निजी तौर पर मेरे लिए भी एक सबक है। पत्रकारिता के आधुनिक दौर में इस प्रवृत्ति की समस्या का विस्तार बड़ा जटिल है मनीषा जी।
अरे भाई श्री दास आप नम्बर देते हैं तो कृप्या महीने-महीने अपडेट भी करते रहा करें। खैर,मनीषा जी यदि श्री दास ने आपको ढाई साल पहले कहा हो कि मृणाल जी हिन्दुस्तान की संपादक हैं तो… अब वो नहीं रहीं…और यह खबर चार महीने पुरानी है।
मनीषा जी को गरिमा कायम रखते हुए सॉरी बोलना चाहिए। इससे उनका कद ही बढ़ता। अभी भी देर नहीं हुई है। कोई छोटा लेखक हो या बड़ा, उसका अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं हैं।
aam admi said:
अंशुमाली जी से पूरी तरह सहमत.
लेकिन मृणाल ने बहुत ही सही मुद्दा उठाया है कि क्यों आज पत्र -पत्रिकाओं में लेख छपने की कसौटी गुणवत्ता के बजाय लेखक का नाम हो गया है? क्यों एक लेखक को संपादक या पेज इंचार्ज से ‘बनाकर रखने’ की नसीहत दी जाती है? इस पर भी बात होनी चाहिए.
Lekin Anshumali ji to khud aajkal sampadko se banaane me lage hai.
मृणाल जी,
आपके और मनीषा पाण्डेय जी के बीच जो कुछ भी हुआ, पढ़कर अफ़सोस हुआ कि छोटी छोटी मानवीय गलतियों से दिल कितना ज्यादा दुःख सकता है। खैर आशा करता हूँ ये विवाद यही ख़त्म हो जायेगा।
आपका लेख पढ़ा। महिला शशक्तिकरण एवं उसे जुड़े अन्य पहलुओं को उजागर करता एक सुन्दर लेख है। पढ़कर अच्छा लगा। साथ में कुछ बातों में अस्वीकृति भी है। आपने कहा कि न्यायपालिका इस तरह के फैसले अब नहीं दे पायेगी क्यूंकि महिलाओं ने अपनी आवाज बुलंद कर ली है। अनुराधा प्रकाश की जगह अगर रुचिका के भाई आशु गिरहोत्रा ने ये आवाज उठाई होती तो क्या न्यायपालिका या इस सिस्टम पर वो प्रभाव नहीं पड़ता जो कि अभी पड़ा है?
मृणाल जी, इस प्रभाव को महिला शशक्तिकरण से जोड़ कर देखना क्या कोई अतिशयोक्ति नहीं है? मेरे हिसाब से तो ये उन सब आवाज का अपमान है जो रुचिका के लिए न्याय के लिए उठ खड़े हुए। क्या हम सिर्फ इसलिए उठ खड़े हुए कि जो हुआ वो एक महिला के साथ हुआ और जिसने आवाज उठाई वो भी एक महिला ही थी। ये हम सब का अपमान है।
अगर कुछ गलत कहा हो तो माफ़ कर दीजियेगा।
पत्रकारिता में लापरवाही की इन्तेहा है, ऊपर से प्रेसर की बात कह कर बात को हल्का करना पत्रकार की संवेदनशीलता के प्रति बेरुखी दर्शाता है.
संग ही नंबर लेने देने के प्रक्रिया पर भी नेताओं की तरह मामला दुसरे पर ठेल देना गैर जिम्मेदाराना है.
शर्म है ऐसे पत्रकार पर.
mamla itna hee sidha hai ki ek akhbar ko namcheen hasti ka alekh chahiey tha jise log lekhak ka naam dekh kar parthe or reader ship me faiyda hota, jiske jimewari manisha jee ke thee, aur woh is mein kisi galti se unsucessful rahin,jiske liye shayad uneh bahut kuch sehan karna para ho,
par yab yatharth ka pata chal toh apne junjulath ko exibit kar bethi,jo ki vyvahrik nahin hai,
app dono same industry ki hain aur industry ko behtar jante hain ,paar phir bhi courtsey jesture kehta hai ki ek soory sabhi galtiyon ko maaf kar sakt hai,lekin sorry kehne se apne bhool ko manna parta hai jo ke bare patrakar ko katai bardast nahin hot, isi liye mrinal je ke purani baat chit ka reference dekar yeh batne ke koshish ke gaye ke app ne bhee is bhool mein contribute kiya apne identity ko chipa kar,
किसी भी वैसी शख्स के लिए, जिसके लिए अस्मिता का सवाल अहम है, यह प्रसंग दुखद होना ही चाहिए। नंबर पूछना, बात करना, वहम में रहना, यहां तक किसी का धोखा हो सकता है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि जिस व्यक्ति के बारे में “वहम” टूटा, वह कोई “महान” और “चर्चित सेलिब्रेटी” नहीं है, उसके साथ इस तरह का व्यवहार करना उसे अपमानित करने की नीयत से भले नहीं किया गया हो, क्या इससे उस व्यक्ति के खोखलेपन का पता नहीं चलता कि व्यवहार के स्तर पर उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।
दैनिक भास्कर पहले ही एक ऐसा अखबार है, जिसके लिए नाम ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, काम नहीं। मृणाल वल्लरी के कई लेख हमने जनसत्ता और मोहल्ला में देखे हैं। हर लेख में अस्मिता की जंग होती है, और अगर वे इसके विस्तार के साथ अपनी अस्मिता के प्रति भी उतनी ही फिक्रमंद हैं, तो इसके लिए उन्हें बधाई देना चाहिए। यह तो नहीं हो सकता कि आप दूसरों को तो उपदेश दीजिए और खुद से जुड़े सवालों पर -ठक्या किया जाएठ- कहके चुप्पी साध लें।
इस मसले को मृणाल वल्लरी की निजी परेशानी समझ कर इसका महत्त्व कम करने की जरूरत नहीं है। दरअसल, पूरी पत्रकारिता जगत में यह प्रवृति एक आम फेनोमिना हो चुकी है। मृणाल वल्लरी ने अपनी प्रतिक्रिया में इसका उल्लेख किया भी है।
रही बात मनीषा की इस सफाई की कि उन्होंने सॉरी बोला था, तो यह समझना मुश्किल है कि फिर उन्हें टेपरिकार्डर का हवाला देने की जरूरत क्यों पड़ी। मृणाल ने संकेत में तो कह दिया है कि अगर टेपरिकार्डर होता तो…। लेकिन बात को सॉरी तक समेट कर नहीं देख कर मीडिया में पसरे सेलिब्रिटियों के संसार पर चिंता कीजिए। मनीषा (पांडेय) को माफी मांगने में इतना “उदार” नहीं होना चाहिए कि वे खुद के निर्दोष होने का दावा भी करें और माफी भी मांगें। यह कौन-सा “विकास” है…। मनीषा पांडेय इतनी “अनजान” पत्रकार तो नहीं होंगी कि मृणाल पांडेय जैसी “बड़ी पत्रकार” के बारे में इतना कम खबर रखती हों। खासकर तब तो और, जब वे किसी “बड़े” अखबार की फीचर एडिटर हों। मृणाल पांडेय ने जब हिंदुस्तान छोड़ा था, उस समय हिंदी जगत का शायद ही कोई पत्रकार इस खबर से अनजान रहा हो।
लेकिन छोड़िए। मृणाल वल्लरी ने घटनाक्रम का जैसा ब्योरा दिया है, संभव है यह मनीषा पांडेय के वहम का नतीजा हो। लेकिन क्या यह भी सच है कि अखबार की “प्रकृति” के हिसाब से मनीषा पांडेय किसी सेलिब्रेटी की तलाश में किसी “आम आदमी” से टकरा गईं और इसके घोर अफसोस में उन्हें किसी आम आदमी के व्यक्तित्व का खयाल रखना जरूरी नहीं लगा। हालांकि मैं भी शायद इस “वहम” में अपनी बात कह रहा हूं कि आम आदमी के पास भी अपने व्यक्तित्व की गरिमा होती है।
संजय ग्रोवर ने इस ओर दो बार ध्यान दिलाया है। उनकी बातों से सहमति है।
लेकिन भइया, जब आपको एक आदमी की गरिमा का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता, तो उसके परेशान होने पर क्यों चिंतित हो रहे हैं। कोई मृणाल पांडेय अपनी आपत्ति जताएं तब परेशान होइए। एक अदनी-सी मृणाल वल्लरी के अपनी बात कहने से तो बड़े लोगों को लिखने योग्य मानने वाली मनीषा जी को माफी मांगनी ही नहीं चाहिए थी। वह भी मृणाल वल्लरी पर “झूठ” बोलने का आरोप लगाने के बाद। मजेदार वाकया है।
कुछ बंधुओं का खयाल है कि वे मनीषा पांडेय को निजी रूप से जानते हैं कि वे बड़ी विनम्र महिला हैं। इससे किसी को इनकार नहीं करना चाहिए। लेकिन हममे से कौन ऐसा है, जो स्थितप्रज्ञ है, सबके साथ समान, सब जगह समान।
क्या कोई क्रांति हो गई है…।
रही बात किसी के नंबर देने या लेने की, तो हममे से कौन ऐसा है जिसका कोई नजदीकी उसके जान-पहचान का नंबर मांगे तो नहीं देता है…। अगर मुझे किसी से मनीषा का नंबर मांगने पर किसी से मनीषा यादव या मनीषा राम या मनीषा झा का नंबर मिल जाता है तो कसूर किसका है, देने वाले या लेने वाले का। खास कर जब मैं सेलिब्रिटियों का दीवाना होऊं।
यह तो मोहल्ला लाइव जैसे एक-दो मंचों की मेहरबानी है कि कोई अपनी बात कह ले पाता है, वरना यह पूरा प्रसंग मृणाल वल्लरी को अपने भीतर जज़्ब कर लेना पड़ता, ठीक वैसे ही, जैसे हजारों स्त्रियां अपने “सम्मान” के खातिर चुप रहती हैं।
नाश हो उस “सम्मान” का…।
ग़लती मनीषा जी की थी। उन्हें अपने कन्फ़्यूज़न के कारण हुई गलती की झुंझलाहट में मृणाल वल्लरी जी से बेहतर व्यहवार करना चाहिये था। पर गलती तो सबसे होती है और मनीषा जी ने माफ़ी मांग भी ली है। माफ़ी मांग लेने के बाद कोई शिकवा नहीं रह जाता।
यहां पर गलती मृणाल वल्लरी जी की भी बहुत बड़ी है कि वे इस छोटे से मसले को यहाँ पब्लिक में ले आयी। As they say in English she washed her dirty linen in public. गलती मोहल्ला के संपादक की भी है कि उन्होनें इस तरह की बचकानी और व्यक्तिगत बातों को अपने front page की प्रमुख खबर बनाया। क्या आप यह समझते हैं कि पढ़ने वाले इसी तरह की वाहियात चीज़े पढ़ने के लिये आएंगे? उसने मेरी पेन्सिल चुरा ली, फ़लां ने मेरा लंच बोक्स चोरी कर लिया, फ़लां ने आज मुझे मोटा कहा। क्षमा कीजिये, लेकिन इस तरह की बातें नर्सरी स्कूल में होती हैं। आप मोहल्ला जैसी ज़िम्मेदार साईट पर इस तरह की बातें क्यों छापते हैं? क्या मृणाल वल्लरी जी को प्रसिद्ध कराने के पीछे कोई विशेष वजह है? अपने भोलू कुम्हार का कल रात अपनी बीवी से झगड़ा हो गया। कहें तो मैं एक स्टोरी बना कर भेज दूं? लगता तो यही है कि जब मनीषा मृणाल की यह स्टोरी छप सकती है तो अपने भोलू कुम्हार का झगड़ा भी छप ही जाएंगा। कोई कहे या ना कहे लेकिन बहुत से लोग ज़रूर सोचेंगे कि मृणाल वल्लरी जी ने अपने अच्छे खासे लेख को इस मसाले के साथ इसलिये प्रस्तुत किया ताकि वे प्रसिद्धि पा सकें। आज तक चालीस लोग मृणाल वल्लरी जी को जानते थे तो अब चार सौ जानने लगेंगे। बस हो गयी उनकी चांदी। लोगो ने उनका लेख तो पढ़ा नहीं होगा बस झगड़े फ़साद की बात पढ़ ली और मृणाल वल्लरी जी प्रसिद्ध हो गयी। फ़ोटो छप जाने के कारण लोग पहचानने भी लगेंगे। भईये मोहल्ला जी कुछ काम की बातें छापो। देश विदेश में दो पत्रकारों की तू त्तू मैं मैं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे उपलब्ध हैं।
अगर कहीं यह वाकया वाशिंगटन पोस्ट या गार्डियन का होता और उस अखबार का फ़ीचर एडीटर ओबामा की जगह ओसामा को फोन कर डालता तो क्या होता? लेकिन मामला एक हिंदी के बदनाम अखबार का है, जिसे टीवी चैनलों के टी आर पी की तरह अपनी रीडर्शिप में साख बानाने की है.
मनीषा पांडे का कुछ नहीं बिगडेगा साथियो, अपनी अयोग्यता,लापरवाही और दुर्व्यवहार के बावज़ूद वे अपने ओहदे पर कायम रहेंगी. बल्कि तरक्की भी मिलेगी.
मृणाल वल्लरी को अपमानित करने के बाद भास्कर ने उनका लेख छाप कर मूंगफ़ली का दाना फेंक दिया है. चतुर्वेदी (गीत) प्रसन्न होंगे.
बनिया-ब्राह्मण युग की पत्रकारिता १९वीं सदी से हिंदी में आज तक चल रही है. इसे जलाओ, कूडे मे डालो, इन सबको जगह जगह उसी तरह अपमानित करो, जैसे ये अन्य निचली जाति के पत्रकारों, लेखकों-लेखिकाओं को करते हैं तभी ये सूरत बदलेगी.
मृणाल पाण्डे का लेख बराबर छपेगा, मनीषा पाण्डे बराबर तरक्की करेगी, गीत चतुर्वेदी ईनाम-इकराम पायेगा, मोटी तन्ख्वाह डकारेगा….
और कोई अविनाश या रमेश या प्रमोद इस एंपायर से निकाल बाहरक किया जायेगा…!
कोई हिंदी और हिंदुस्तान का ‘शुभचिंतक’ कहीं बचा है क्या ?
मनीषा जी को पत्रकारिता का नज़ला कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रहा है। एक तरफ वे मृणाल वल्लरी की बेइज्जती करने में नहीं चूक रहीं दूसरी ओर इतनी वरिष्ठ साहित्यकार मृणाल पाण्डेय को भी नीचा दिखाने की कोशिश कर रहीं हैं। कह रहीं है- “सार्वजनिक तौर पर कह रही हूं कि मृणाल पांडेय का लिखा मैंने कुछ नहीं पढ़ा और पढ़ने की जरूरत भी नहीं महसूस करती।” मैं समझता हूँ मृणाल जी वह शख्सियत हैं जिनकी आवाज़ आँख बंद करके भी पहचानी जा सकती है। फिर भी मृणाल वल्लरी जी से पहले उन्होंने सारी बातें पता नहीं बेहोशी में की थी या नशे में!! बहरहाल इतने बड़े अखबार के फीचर एडीटर को इस तरह की गैर जिम्मेदारना बातें शोभा नहीं देतीं।
नारदमुनि
भोपाल
ये मामला मान -अपमान से जुड़ा कम ग़लतफ़हमी से जुड़ा अधिक है ,मनीषा का फोन काटना स्वाभाविक था शायद खुद की झेंप मिटाने के लिए उन्होंने ऐसा किया ,ज्यादातर लोग शायद यही करते ,क्यूंकि ऐसी स्थिति का अंदाजा हमें पहले से नहीं रहता |रही बात माफ़ी मांगने की तो शायद ये ज्यादती है कि इस गलती के लिए माफ़ी मांगी जाये ,खेद प्रकट करना और फोन में गलत नंबर रखे जाने की बात बताई जानी चाहिए थी |अच्छा होता ,ये काम मनीषा उसी रोज कर दी होती |मुझे लगता है देश की मीडिया में आपसी संवाद समय के साथ साथ बेहद कम होता जा रहा है ,इसकी वजह हमारे छोटे बड़े अहंकार है ,एक दूसरे के खिलाफ हम इस कदर तलवार लेकर खड़े हैं कि क्षमा करने और क्षमा मांगने का धर्म भी हम भूल चुके हैं ,वल्लरी आम नहीं हैं और न ही मृणाल पाण्डेय ख़ास हैं ,ऐसा मेरा मानना है|awesh29@gmail.com
”देश की मीडिया में आपसी संवाद समय के साथ साथ बेहद कम होता जा रहा है ,इसकी वजह हमारे छोटे बड़े अहंकार है ,एक दूसरे के खिलाफ हम इस कदर तलवार लेकर खड़े हैं कि क्षमा करने और क्षमा मांगने का धर्म भी हम भूल चुके हैं”
why don’t you try to analyze and introspect about -what are the reasons of this ‘ahamkaar’? what are the reasons of ‘dialoguelessness’? As for as ‘dharma’is concerned, everybody knows truth about the Hindu dharma and its caste-system. I don’t know really which caste Ms. Vallarie belongs to, but one can guess Ms. Pandey is a Brahmin, a savarna. It’s not a secret and hidden thing about Hindi language journalism amd media that it’s playground of upper caste Brhamins and Baniyas.
Any doubt?
Carry on casteists…till you can…
अविनाश भाई
मैं आपके डेमोक्रेटिक अंदाज का दीवाना हूं। अपनी क्षुद्रताओं की वजह से चाहकर भी मैं ऐसा नहीं हो पाता हूं। लेकिन आपकी बात मुझे हमेशा याद रहती है कि इस मंच पर हर किसी को अपनी बात रखने का हक है। आप दोनों के पक्षों को लाने के पक्ष में होते हैं। लेकिन क्या मैं जान सकता हूं कि आपने मनीषा पांडेय की इस पोस्ट को लेकर जो वोटिंग सवाल दिए हैं,उसके ऑप्शन में अगर कोई मनीषा के पक्ष में वोट देना चाहे तो वो कहां वोट करे। आपके सवाल और ऑप्शन कुछ इस तरह है-
क्या मनीषा पांडेय के बर्ताव के लिए भास्कर समूह को मृणाल वल्लरी से माफ़ी मांगनी चाहिए?
1. हां, ये भास्कर की गरिमा के अनुकूल होगा
2. छोड़एि, ये दौर ही ऐसे दंभी पत्रकारों का है
वोटिंग होने के पहले ही आपको जजमेंट की शक्ल गढ़ लेने का ये अधिकार क्या आपके डेमोक्रेटिक चरित्र के अनुकूल है। क्या जिस तरह कमेंट में दोनों के पक्ष में बातें सामने आ रही हैं,वैसा वोटिंग ऑप्शन में भी खुला स्पेस संभव नहीं था? आपने ऑप्शन को इतने तंग ख्याल क्यों डाले कि जिसे भी वोट करना है वो मनीषा के खिलाफ ही करे।
वैसे मेरी ये बात नितांत रुप से आपके रवैये को लेकर है न तो मनीषा के पक्ष में और न ही मृणाल के विपक्ष में। ये वो रवैया है जिसका विरोध हम अक्सर अखबार और चैनलों के लिए करते आए हैं।.
वैसे तो किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने की आदत नहीं पर सभी बोल रहें हैं तो मै क्यों न बोलूं ……………….? मै खुद को पत्रकार नहीं मानता पर आदतें थोड़ी बहुत पत्रकारों से मिलती जुलती हैं ! उक्त घटना शायद मृणाल पाण्डेय के संज्ञान में भी न आयी हो परन्तु मनीषा जी अगर आज के दौर में पत्रकारिता के जिस स्वरुप को प्रमाणित (मनीषा जी के अनुसार:– अखबारों में हम किस तरह के दबाव और तनाव के बीच काम करते हैं, आपसे छिपा नहीं है।) करने का प्रयास कर रहीं हैं वह चिंता का विषय है , लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के लिए चिंता का विषय है ! शासन के तीनो अंग ( विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका ) अगर तनावयुक्त होकर काम को अंजाम देने लगें तो शायद सामाजिक स्थितियां प्रतिकूल होने लगेंगी ! ठीक उसी तरह अगर पत्रकारिता में “दबाव एवं तनाव” शब्द का लोप होने लगा तो कम चिंता कि बात नहीं है ! मै एक बार मृणाल वल्लरी जी एवं मनीषा जी दोनों लोगों से निवेदन करूंगा कि वो कभी फुरसत में इस तथ्य पर मंथन करें कि क्या आप निजी स्तर पर पत्रकारिता के वास्तविक एवं सार्थक स्वरुप को प्रस्तुत कर पा रहीं हैं ! मै मृणाल वल्लरी जी के छोभ को सही मानता हूँ और मनीषा जी के दलीलों को भी स्वीकार करता हूँ , परन्तु मनीषा जी के कुछ कथन एक सजग , जुझारू एवं कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार कि भाषा , स्वभाव एवं इच्छाशक्ति के अनुकूल नहीं हैं ! ………………………………………मै अपने छोटे से ज्ञानवृत्त के आधार पर दो शब्द लिखा , उक्त बातों से अगर किसी को ठेस पहुंची हो तो करजोर माफ़ी चाहूँगा ! ……….saharkavi111@gmail.com
Once before I came to this website. It’s actually a matter of ego. May be the caller got embarrassed and shocked, so put the phone down.
But she could have sent an SMS of apology. I think you have done good to give an opportunity to Mrinal Vallari to express her grievance. Good work.
Manisha Pandey aur Mrinal Vallari ke bayano se aisa bhi lagta hai ki Manisha ne Mrinal se us bhul ka badla liya jo ki Mrinal ke anusar unhone ki hi nahi thi.
@शबरी त्रीबे – मेरे बताये गए धर्म का आप गलत मतलब निकाल रहे हैं .पत्रकारों का सिर्फ एक धर्म होता है इमानदारी से लिखना ,जिसके लिए लिखना उसे अपनी लेखनी से कुछ देना ,और हाँ क्षमा माँगना भी पत्रकारिता का धर्म है |इसके अलावा न तो कोई धर्म होता है न कोई जात और न ही हिंदी पत्रकारिता बनियों और ब्राह्मणों की बपौती है |मेरे बताये गए धर्म का आप गलत मतलब निकाल रहे हैं| बनियोटी का काम कहाँ से शुरू हुआ ये कहने की जरुरत नहीं है ,हिंदी का पत्रकार आपस में लड़ रहा है भीड़ रहा है ,भूख से जिंदगी से और अंग्रेजी अख़बारों के आतंक से जूझ रहा है ,फिर भी देश की आबादी से सीधे संवाद कर रहा है ,अगर भाषा की बात है तो अंग्रेजी लिखने पढने वाले अखबार नवीसों में से कम ही हैं जो गाँव गिरांव और कस्बों में जाकर ख़बरें लिख रहे हों,और अंग्रेजी अख़बारों के पास न तो देश की इस ७० फीसदी आबादी को छूने का न तो साहस है न ही दम ख़म |
एक दूसरी बात वल्लरी को मनीषा की ये ग़लतफ़हमी अपमानजनक लगी उन्होंने खुलेमंच पर खुद को उड़ेल दिया ,मनीषा को अपनी ग़लतफ़हमी से अपराधबोध हुआ (ऐसा साहस कम लोग ही करते हैं )उन्होंने माफ़ी मांग ली ,हमने इस प्रकरण पर टिप्पणी कर दी ,अब सबके मन साफ़ हैं |हो सकता है कल को मनीषा ,मृणाल वल्लरी को फोन करें और दो अच्छी सहेलियों की तरह बात करें |सहमति असहमति,मान अपमान को ताक पर रखकर किसी बिंदु पर एक हो जाने की उदारता हिंदी लिखने पढने वालों में ही होती है हम इसे भाषा जनित संस्कार कहते हैं |अतएव आपसे विनम्र अनुरोध है पोस्ट पर कमेन्ट करें ,धर्म जात और हिंदी भाषी पत्रकारों के सम्बंध में अपने रवैये को अपने मन के ब्लॉग पर जगह दे |awesh29@gmail.com
विनीत, आपके सुझाव पर अमल किया। एक तीसरा ऑप्शन भी डाल दिया है।
आवेशित भाई : आप कमाल के हिंदी-हिंदूवादी हैं. दर्शनशास्त्र में एक पद है ”बर्कलेइज़्म” (बर्कलेवाद) इसे ”शुतुर्मुर्गवाद” भी कहते हैं. तुलसी दास ने इसी तरह एक चौपाई लिखी थी-”मूंदिय आंख कतहुं कछु नाहीं”। मतलब आंख मूंदिये और हिंदी भाषा का पत्रकार बन कर उस जातिवादी ‘रेत’ (बालू) में शुतुर्मुर्ग की तरह गर्दन गडा दीजिये और कहिये कि यहां कहीं जातिवाद बहीं है, कहीं ब्राह्मण-बनिया-सवर्णवाद नहीं है. हर कोई ्जात-धर्म से ऊपर खांटी चौबीस कैरेट शुद्ध कनक-कंचन सा पत्रकार है. बस. सिर्फ़ बस पत्रकार.
ये आप किसे बता रहे हैं. आंकडे क्या कहते हैं, ज़रा उन पर नज़र दौडाइये. ज़रा हिंदी की पत्रकारिता में आदिवासी, दलित, ईसाई, मुसलमान, पारसी, मोची, कुम्हार वगैरह के नाम गिनाइये. इस शहरी ट्राइब (शहरी आदिवासी)का यह विनम्र निवेदन मान लीजिये आवेश में बिना आये कि जादू-टोना, ज्योतिश-पंचांग, तीज-त्योहार, तंत्र-मंत्र, कुंभ-महाकुंभ, तीरथ-तिर्वेनी, पुरान-पूजा जो आप दे दना दन छापते हैं, वे सब प्योर ब्राह्मणवादी-हिंदूवादी मटीरियल है. हिंदी के ज़्यादातर पत्रकार के भीतर एक छुपा हुआ कट्टर नीत्शे या हेडगेवार बैठा है. वह दूसरी जाति और दूसरे धर्म के किसी को स्वीकार कर ही नहीं सकता.फिर आपने अंग्रेजी को कोसा है. अपना ही कथन देखिये :
”अगर भाषा की बात है तो अंग्रेजी लिखने पढने वाले अखबार नवीसों में से कम ही हैं जो गाँव गिरांव और कस्बों में जाकर ख़बरें लिख रहे हों,और अंग्रेजी अख़बारों के पास न तो देश की इस ७० फीसदी आबादी को छूने का न तो साहस है न ही दम ख़म |”
तो जान लीजिये कि हिंदुस्तान में गांव-गांव की धूल-मिट्टी फांकते हुए, जिस पत्रकार ने किसानों और गरीब ग्रामीण मज़दूरों की बदहाली और आत्महत्या और उत्पीडन की ओर देश और दुनिया का ध्यान खींचा है, वह अंग्रेज़ी ्या गैर हिंदी भाषा के ही पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और समाजकर्मी हैं. थोडे से नाम गिनाता हूं= पी. साईनाथ, अरुंधति राय, वंदना शिवा, सुनीता नारायण, देविंदर शर्मा,मेधा पाटकर आदि.
सच मानिये, मनीषा पांडे या कोई भी ऐसी या ऐसा पत्रकार जो भास्कर ही नहीं किसी भी दूसरे हिंदी व्यावसायिक अखबार में या मीडिया में बैठा है, वह सिर्फ़ अपनी प्रतिभा की वजह से नहीं है. एक समूचा सामंती-जातिवादी तंत्र है, जिसकी जकडबंदी भयावह है.
उम्मीद है बिना आवेश मे आये आप इस सच पर सोचेंगे..
मनीषा ने ठीक वही किया है जो निर्णय लेनेवाले पदों पर बैठे अधिकांश लोग करते हैं. यानि एक आम आदमी के प्रति ‘take for granted’ वाला रवैया रखना. आज की तारीख में कोई भी ओहदेदार एक साधारण आदमी को seriously नहीं लेता. वह मानकर चलता है कि चाहे जैसे भी पेश आओ, आम आदमी कुछ भी नहीं बोलेगा और इसे normal मानेगा. यह और कुछ नहीं बल्कि उसी आम चलन का manifestation है जिसमे तथाकथित सवर्ण तबके का एक आदमी सामाजिक वर्णक्रम में कमजोर लोगों का मान-मर्दन करने को एक स्वाभाविक कर्म समझता है.
उस तथाकथित “शुभचिंतक” की छटपटाहट या तकलीफ क्या है, इसे समझने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। उसे इस बात की परेशानी है कि मृणाल वल्लरी इस “छोटे-से” मसले को यहां पब्लिक में ले आई। अच्छा किया कि उसने एक अंग्रेजी के फ्रेज का इस्तेमाल करके अपनी मानसिकता का इजहार कर दिया। हालांकि ऐसा करते हुए शायद वह इस बात से अनजान रहा कि बिना अपनी मां के वह इस दुनिया में आ सकने की औकात नहीं रखता था। पता नहीं कि उसकी बहन है कि नहीं।
खैर, तथाकथित शुभचिंतक महोदय की छटपटाहट यह है कि यह पूरा प्रसंग मृणाल वल्लरी को प्रसिद्धि दिला जाता है। अगर कोई अपने दुख बयान करना चाहता है, तो इससे उसकी प्रसिद्धि पाने की भूख करार दो, और चुप रह जाए तो उसकी पीठ ठोंको- इस पितृसत्ता का और चरित्र क्या रहा है कि शुभचिंतक महोदय इससे कुछ अलग करेंगे। भोलू कुम्हार का अपनी बीवी से झगड़ा होना खबर होना चाहिए, लेकिन उसकी बीवी का रोते समय आवाज के साथ रोना उसकी “प्रसिद्धि” पाने की भूख…! इससे ज्यादा सोचोगे भी क्या शुभचिंतक महोदय। स्टोरी बनाने से ज्यादा की औकात नहीं रही, और यह करके भी कहीं जगह नहीं मिली, तो इस बात से परेशानी कि कोई “प्रसिद्ध” हो रहा है। काश, कि अपने दुखों का इजहार करके कोई “प्रसिद्ध” हो पाता…।
इस प्रसंग में मुद्दा क्या है, यह समझ सकने की औकात होती, तो इतना परेशान ही क्यों होते। मुद्दे के विस्तार में जाने की तो बात ही अलग…। ऐसे में लेख एक मसाला तो लगेगा ही। मसालेदार अस्तित्व को ढोते हुए इससे ज्यादा दिमाग में आएगा भी क्या…। अब दम लगाना चाहिए कि तुम्हें भी दो-चार लोग जानने लगें। इसके लिए सबसे पहले तो अपने थोबड़े के साथ सामने आने की जरूरत होगी। इस “शुभचिंतक” नाम के पर्दे के होते तो यह संभव नहीं हो सकता। तुम्हारी नियति ही यही है कि पर्दे के भीतर भी रहो और किसी के “प्रसिद्ध” होने पर छाती भी कूटो…।
सही बात तो यह है कि ब्राहमणवाद आज भी अपनी ज़रुरत पर कहीं पानी पीता है तो उस कथित निम्न जाति का उपकार मानने के बजाय वह यह कहता पाया जाता है कि पहले तो हम इन लोगों के यहां पानी भी नहीं पीते थे। यानि जहां शुक्रिया अदा करना चाहिए वहां भी वह अहसान या शहादत की मुद्रा में फोटो खिंचाने की कोशिश करता है।
वह ऐसा करे राम दुबे जी, कोई बात नहीं, लेकिन वह दूसरी नीचे वाली जाति के लोगों को भी उस कुएं का पानी पीकर जीने दे, जिस कुएं को ‘भाषा’ कहते हैं. हिंदी भाषा. सामंती जमाने के गांव में ठाकुर का कुआं होता था, आज के ज़माने की मीडिया, शिक्षा-संस्थान, संस्कृति और साहित्य में हिंदी बांम्हन का कुआं हो गयी है. हिंदुस्तान में जातिप्रथा सामाजिक बदलाव की आंधी में भले टूट रही हो, हिंदी भाषामें अपना मज़बूत दुर्ग और किला बना कर वह राजा की तरह राज कर रहा है. सारे संस्थान, लेखक संगठन और मीडिया केंद्र उसके पाहीघर या फौज़ी छावनियां हैं. हां, यह ज़रूर याद रखें कि अपनी बटालियनों में वह मुट्ठी भर अन्य जातियों और धर्मों के लोगों को भी अपने हित में जगह देता है और उन्हीं के ज़रिये, कामोफ़्लाज़ करते हुए, यानी खुद को छिपाये हुए, उन विजातीयों पर हमला करता है, जिनसे उसकी इस कट्टर जातिवादी सत्ता को सबसे बडा खतरा होता है. ईनाम-बख्शीश, वज़ीफ़े-सम्मान उसके दूसरे हथियार हैं.
मनीषा पांडे की चतुर और रणनीतिक ‘सारी’ इसी खेल का हिस्सा है. उसे कृपया ‘क्षमा याचना’ या वास्तविक पाश्चाताप न मानें. भास्कर में जातिवादी जकडन और इससे बढेगी.
मृणाल वल्लरी की हैसियत अखबारों की दुनिया में मृणाल पांडे की नहीं बनने दी जायेगी, राजकिशोर कभी प्रभाष जोशी नहीं हो पायेंगे, भले ही प्रतिभा उनमें हज़ार गुना अधिक हो.
रही बात ‘मोहल्ला’ की तो यहां सभी को अपनी अपनी ढपली बजाने की कंट्रोल्ड छूट है, सो चलिये हम भी बजा देते हैं.
पोंगल के पर्व पर पोंगा बने रहने का अंत हो, यही दुआ है.
worthless feature!
somebody’s perceived insult at a personal level; once incident; so much hallagulla
Vallari ji, deal with your personal insult at your level, gossip with your friends; nobody is interested in this mud-wrestling game other then people with vested interests.
personal in these critical times is not merely personal, it’s political and above all social. I request Vallari to make it a big social cause for justice. These insults to the lower castes must end now.
you guys are just blowing it out of proportion.
Where is it matter of upper caste vs lower caste, just because Mrinal Pande has PANDE as last name and Mrinal vallari is no PANDE or is it because Manisha wanted to make use of some big name?
Now you could argue that Mrinal Pande is a big name because of her caste but that is not being discussed here.
The real question here is -
If Manish was looking for Mrinal Pande , would she even have considered Mrinal Mishra (just a made up name)? probably not! She would have done the same thing to any other Mrinal too.
So is it a question of casteism here, the way all ‘revolutionaries’ here are making an issue of?
It is a question of totally personal matter. Please do not bring casteisn, communalism etc at the drop of a hat.
‘we guys’ are certainly holding ‘the other’ identity, than those who hold positions in Hindi media, academia and journalism. And ‘insults’ or ‘assaults’ on us are of various forms. A Tiwari in Delhi University sexually exploits a lower caste research student and gains support from a huge number of power-holders, obviously all from upper castes and now a brilliant journalist finds some one thumping telephone on her face, without any of her faults. Another writer of lower caste, who had made national and international repute through his relentless work finds more than 60 Hindi writers signing on a paper of condemnation, based on a lie originating from a most immoral upper caste den. He has been insulted, humiliated, slandered and kept out of any job for the last over 20 years.
A dalit is sitting on hunger strike in an university because he has been illegally denied admission based on the caste prejudice and thieves and ‘thugs’ are appointed en-mass by the casteist VC, who claims to be a secular and left.
Manisha Pande and Mrinal Vallari episode is not an isolated event, it’s a chunk, a slice of a big caste nexus.
DON’T YOU THINK THAT THIS IS THE RIGHT TIME WHEN LIKE ‘MAKING OF MAHATMA’ WE ALL SHOULD THINK ABOUT ‘MAKING OF MRINAL PANDEY, MANISHA PANDEY, X TIWARI, W CHATURVEDI, Y MISHRA AND Z SINGH AND SO ON? CAN WE NOT INVESTIGATE AND STUDY THE VERY GENESIS OF SUCH PEOPLE IN A DEMOCRACY RUNNING ON OUR VOTES AND THROU OUR CONSENT?
In fact, one can not wish away and put a dust over these stinking reeking realities engulfing whole media, academia etc in HINDI heart land.
Again, we are talking of a bigger issue that has to be taken care of and it certainly is good that people are aware and are fighting for the just causes.
But the personality clash of any 2 individuals should not always be looked from a chosen angle.
If you are saying that Manisha rejected Vallari because she was not Pande (or for that matter, because she did not have an upper-caste last name), then you are definitely right. But was that the case? Would she have accepted any MRINAL even if she was not PANDE but still a higher caste?
If your answer is YES, then I understand your outburst. if answer is NO, then we are diluting the real issue by giving undue importance to an incident.
I explained Ms. Indra, that ‘accidents’ happen once, unpredictably, just by chance but if they recur frequently, again and again, they are ‘syndrome’ and they do indicate some bigger thing.
Problematic in your question is essentially this – it is hypothetical based on speculation about the Vallari’s caste.
Don’t you agree? And don’t you think that these kind of behaviours should be brought to an end because they cause hurt and agony and sufferings to others?
Please read another post by Awesh Tiwari in ‘Mohalla’. Now, had the victims been not the Sahoo and Shrivastava, would have they been killed in a fake encounter? Also think about the ‘caste’ of those Hindi journalists, who ‘okeyed’ the police to shoot those two innocent boys?
In my opinion, caste conflict in Hindi-Hindu society is a truth and it’s taking an explosive form now. It would create bigger catastrophe than Haiti’s earth-quake or coastal tsunami.
Please try to understand the malaise of caste system and join us in fighting it back. Wishing a caste free new decade In Hindi belt in new decade starting from year 2010.
I do not have any problem in agreeing with the bigger issue you are drawing everybody’s attention to. Glad to know that you are working towards it.
About my question – It is only as hypothetical as everybody else’s assumption about the root cause behind Manisha’s behavior – speculation about Vallari’s caste. I do know nor am I interested.
But saying that Manisha Pandey must have rejected Vallari because some prof tiwari got away with a heinous crime and a fake encounter happened is taking it too far.
Fighting for a just cause is always welcome. But with it also comes a greater responsibility – responsibility of not becoming like the ones we should fight against – that is not crucifying anybody who comes in the way!
Two things to end our talk Ms. Indra. One, you have noticed only the angst in my arguments and not the agony.
Second, this voice is coming from a planet where many have been crucified without any faults and crime because they were born out of wombs considered ‘inferior’ in Hindi-Hindu society.
Be happy and enjoy your new year.
अविनाश बाबू, ये तीसरा ऑप्शन कोई ऑप्शन नहीं है ! जो किया, सही किया ये तो शायद मनीषा पांडेय भी नहीं कह रहीं हैं. ये ऑप्शन रखकर आप अभी भी बहस का बेवजह तीखापन बनाए तो नहीं रखना चाहते, इतनी शर्त तो मैं लगा सकता हूँ कि आप सचेत रूप से ऐसा नहीं करेंगे. जनता के मूड के माकूल ऑप्शन तो ये होता कि भूल-चूक लेनी-देनी.
मृणाल जी और मनीषा जी, मुझे लगता है कि आप दोनों के बीच एक ग़लतफहमी कायम हो गयी थी और कम से कम अब तो दूर हो ही गयी होगी….क्या इस बहस को यही विराम देना ठीक नहीं होगा!
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