कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी : मनीषा पांडेय
♦ मनीषा पांडेय
जन्म और ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई लिखाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। फिर मक्सिम गोर्की की तर्ज पर ‘जीवन की राहों पर’ निकलने की शुरुआत मुंबई आने से। मुंबई में ही आगे की पढ़ाई और अपने पैरों पर खड़े होने की जद्दोजहद। लगभग छह साल मुंबई की सड़कों पर चप्पल रगड़ने फिर इंदौर कुछ दिन बिताने के बाद झीलों के शहर भोपाल में। (अपने बारे में मनीषा पांडेय की खुद की राय)
मृणाल जी, आपकी आपत्ति पढ़ी। जिस गलत नंबर की वजह से इस सारे कनफ्यूजन की शुरुआत हुई उसका इतिहास ढाई साल पुराना है। जिन श्री दास जी की वेबसाइट पर आपने लिखा है, उन्हीं के द्वारा मृणाल पांडेय के नाम पर आपका नंबर मुझे ढाई साल पहले मिला था। उनसे मैंने नंबर मांगा, उन्होंने मुझे ये नंबर एसएमएस कर दिया। लेकिन गलती उनकी भी नहीं है। उन्होंने भी किसी और से मांगकर मुझे नंबर दिया था। किससे मुझे पता नहीं। संभवत: एक जैसे दो नाम होने और किसी जल्दबाजी की वजह से ये गलती हो गई हो। (अखबारों में हम किस तरह के दबाव और तनाव के बीच काम करते हैं, आपसे छिपा नहीं है।) ये एक मामूली सी गलती थी, जिसके लिए किसी के भी सिर दोषों का ठीकरा फोड़ना समझदारी नहीं होगी।
आपको याद हो तो आपके इसी नंबर पर मैंने ढाई साल पहले उसी समय आपको मृणाल पांडेय समझकर फोन भी किया था और आपने खुद मुझसे कहा था कि मैं आपको अपना सीवी मेल कर दूं। आपने कहा था कि हिंदुस्तान के कुछ एडिशन देहरादून वगैरह से शुरू हो रहे हैं। उस बातचीत का क्या अर्थ था, पता नहीं। फिलहाल आपके बताये उसी पते पर मैंने सीवी भेजा भी था। उसके बाद कभी इस बारे में बात नहीं हुई। उम्मीद है, वह घटना आपको याद होगी। हो सकता है, आपने मजे-मजे में मुझसे बात कर ली हो। ये भी ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है। अब कभी आपसे मिलूं, तो मैं भी ताली बजाकर अपने कनफ्यूजन और आपके मजे लेने पर हंसूंगी ही। लेकिन तब ये पता नहीं था कि एक छोटा सा कनफ्यूजन, जिसकी शुरुआत दरअसल कहीं और से हुई, इतने बड़ा रूप ले लेगा।
उस दिन जब आपने सच्चाई का खुलासा किया, तो मैंने कहा था, सॉरी, आई गेस, कोई कनफ्यूजन हो गया है। ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच हुई। मैंने सॉरी कहा था, लेकिन कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। लेकिन मेरे मुंह से ये शब्द जरूर निकले थे। जब मैंने अपने एडिटर को सारी बात बतायी तो उनका कहना था कि आपका लेख हम अलग से दूसरे पन्ने पर जरूर छापेंगे। आपके लेखकीय श्रम की गरिमा का अपमान करने का हमारा कोई इरादा नहीं है। कनफ्यूजन और गलती मेरे पार्ट पर हुई थी। उसकी सजा आपको नहीं मिलनी चाहिए। आपको बुरा लगा। मैं समझ सकती हूं। आपकी जगह मैं होती तो मुझे भी लगता। लेकिन क्या ये बेहतर नहीं कि हम पूरे मामले की एक बार पड़ताल कर लें।
हम जो विशेष पन्ने छाप रहे थे, वे कल ही खत्म हुए हैं और आज आपका ये लेख छप गया। लेकिन फिर भी मैं आपसे एक बार फिर क्षमा चाहती हूं कि ढाई साल से मेरे मोबाइल में सेव एक कनफ्यूजन की वजह से आपको तकलीफ हुई। आशा है इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इसके पीछे आपको तकलीफ पहुंचाने या आपके लेखकीय श्रम का अपमान करने की मेरी कोई मंशा नहीं थी, आप मुझे माफ करेंगी।
आपको खुद को बड़ा या छोटा कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। आप अच्छा लिखती हैं। अखबार में क्या छपेगा, ये तय करना मेरा काम नहीं है। आप खुद भी एक अखबार मैं नौकरी करती हैं। मुझसे बेहतर जानती होंगी कि हम सब एक बड़ी मशीन के मामूली पुर्जे भर हैं। अगर आप मुझे निजी तौर पर जानती होतीं या मेरी सोच से वाकिफ होतीं तो ऐसा नहीं कहतीं। मैं किसी व्यक्ति के लिखे का सम्मान उसके ब्रांड नेम से नहीं करती। सार्वजनिक तौर पर कह रही हूं कि मृणाल पांडेय का लिखा मैंने कुछ नहीं पढ़ा और पढ़ने की जरूरत भी नहीं महसूस करती। हो सकता है निजी तौर पर मुझे कोई ऐसा लेखक पसंद हो जिसके बारे में कोई नहीं जानता। लेकिन जरा सोचिए, मेरे कमरे की बुक शेल्फ पर कौन सी किताब होगी ये तो मैं तय कर सकती हूं, लेकिन जहां मैं मामूली नौकर भर हूं, वहां क्या छपेगा ये मैं कैसे तय कर सकती हूं।
रवींद्र रंजन जी, ये घटना कतई इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती कि मेरी सोच ऐसी है, जो बड़े ब्रांड वालों को बड़ा लेखक मानती है। इससे ज्यादा सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी।
ये आपकी नहीं, इस दौर की दिक्कत है
♦ मृणाल वल्लरी
युवा जुझारू पत्रकार। प्रभात ख़बर और दैनिक हिंदुस्तान के बाद फिलहाल जनसत्ता में। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए कर रही हैं।
आपने सही कहा कि हम दोनों की बातचीत के बीच टेपरिकार्डर नहीं था। और अपनी बात को सार्वजनिक मंच पर लाने के पहले भी मेरे “जेहन” में टेपरिकार्डर होने या नहीं होने की बात बिल्कुल नहीं आयी। खैर टेपरिकार्डर होता तो…
बहरहाल, नंबर आपको कहीं से भी मिला, आपने बातों के क्रम में मुझसे कहा कि क्या आप हिंदुस्तान, नंदन और कादंबिनी की संपादक नहीं हैं? जबकि मृणाल पांडेय कब की हिंदुस्तान छोड़ चुकी हैं। कोई बात नहीं।
आपने अपना यह कन्फ्यूजन दूर होते ही, जिस तरह फोन काट दिया, वह इस बात का साफ संकेत था कि मेरे लेख का अर्थ मेरे नाम के कारण क्या हो गया है।
आपकी संस्थान के भीतर क्या बात हुई थी, यह मुझे बताना आपने जरूरी नहीं समझा, ताकि अगर कन्फ्यूजन की वजह से गड़बड़ी थी तो दूर हो जाए।
खैर, इधर मैंने एक दिन मृणाल पांडेय का लेख भास्कर के महिला पन्ने पर छपा देखा। वहां सागरिका घोष भी थीं और नीचे लिखा था कि दोनों लेख मनीषा पांडेय से बातचीत पर आधारित है। उसके बाद ही मुझे अपनी बात सामने रखना ज़रूरी लगा।
आपने मुझे भी फोन पर ही विषय पर बातचीत कर लेने की बात की थी। लेकिन मैं खुद को जानती हूं कि मैं फोन पर उतने सहज तरीके से अपनी बात नहीं कह पाती। इसलिए मैंने आपको लिख कर भेज देने की बात कही।
यह बिल्कुल सही है कि कभी आपने मुझे फोन किया था तो मैंने अपनी जानकारी में आयी यह बात बतायी थी कि शायद देहरादून से एडिशन शुरू हो रहा है, वहां के लिए आप ट्राई कर सकती हैं। उस समय भर्तियां होने की सूचना थी, मैं हिंदुस्तान के एनसीआर डेस्क पर थी और बहुत सारे लोगों के फोन आते थे। मेरे दूसरी सहयोगियों के पास भी। मेरे पास जितनी जानकारी थी, मैंने आपको बता दिया था।
उस वक्त भी मैं मृणाल वल्लरी के रूप में ही बात कर रही थी…
दूसरी बात, किसी के भी नौकरी खोजने जैसी परिस्थितियों का कभी भी मैं किसी भी रूप में मजाक नहीं उड़ा सकती। मैं इतना जानती हूं कि नौकरी मिलना आज कितना मुश्किल हो गया है और आज के दौर में उसे बचाये रखना और भी मुश्किल। इसलिए मैं यह बात दोबारा जोर देकर कहना चाहूंगी कि मैं इस तरह की स्थितियों का मजाक नहीं बना सकती।
जो भी हो, यह प्रसंग निजी तौर पर मेरे लिए भी एक सबक है। पत्रकारिता के आधुनिक दौर में इस प्रवृत्ति की समस्या का विस्तार बड़ा जटिल है मनीषा जी।
आपका बर्ताव आम आदमी का अपमान है
♦ प्रेमरंजन
किसी भी वैसी शख्स के लिए, जिसके लिए अस्मिता का सवाल अहम है, यह प्रसंग दुखद होना ही चाहिए। नंबर पूछना, बात करना, वहम में रहना, यहां तक किसी का धोखा हो सकता है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि जिस व्यक्ति के बारे में “वहम” टूटा, वह कोई “महान” और “चर्चित सेलिब्रेटी” नहीं है, उसके साथ इस तरह का व्यवहार करना उसे अपमानित करने की नीयत से भले नहीं किया गया हो, क्या इससे उस व्यक्ति के खोखलेपन का पता नहीं चलता कि व्यवहार के स्तर पर उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।
दैनिक भास्कर पहले ही एक ऐसा अखबार है, जिसके लिए नाम ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, काम नहीं। मृणाल वल्लरी के कई लेख हमने जनसत्ता और मोहल्ला में देखे हैं। हर लेख में अस्मिता की जंग होती है, और अगर वे इसके विस्तार के साथ अपनी अस्मिता के प्रति भी उतनी ही फिक्रमंद हैं, तो इसके लिए उन्हें बधाई देना चाहिए। यह तो नहीं हो सकता कि आप दूसरों को तो उपदेश दीजिए और खुद से जुड़े सवालों पर “क्या किया जाए” कह कर चुप्पी साध लें।
इस मसले को मृणाल वल्लरी की निजी परेशानी समझ कर इसका महत्व कम करने की जरूरत नहीं है। दरअसल, पूरी पत्रकारिता जगत में यह प्रवृत्ति एक आम फेनोमिना हो चुकी है। मृणाल वल्लरी ने अपनी प्रतिक्रिया में इसका उल्लेख किया भी है।
रही बात मनीषा की इस सफाई की कि उन्होंने सॉरी बोला था, तो यह समझना मुश्किल है कि फिर उन्हें टेपरिकार्डर का हवाला देने की जरूरत क्यों पड़ी। लेकिन बात को सॉरी तक समेट कर नहीं देख कर मीडिया में पसरे सेलिब्रिटियों के संसार पर चिंता कीजिए। मनीषा (पांडेय) को माफी मांगने में इतना “उदार” नहीं होना चाहिए कि वे खुद के निर्दोष होने का दावा भी करें और माफी भी मांगें। यह कौन-सा “विकास” है… मनीषा पांडेय इतनी “अनजान” पत्रकार तो नहीं होंगी कि मृणाल पांडेय जैसी “बड़ी पत्रकार” के बारे में इतना कम खबर रखती हों। खासकर तब तो और, जब वे किसी “बड़े” अखबार की फीचर एडिटर हों। मृणाल पांडेय ने जब हिंदुस्तान छोड़ा था, उस समय हिंदी जगत का शायद ही कोई पत्रकार इस खबर से अनजान रहा हो।
लेकिन छोड़िए। मृणाल वल्लरी ने घटनाक्रम का जैसा ब्योरा दिया है, संभव है यह मनीषा पांडेय के वहम का नतीजा हो। लेकिन क्या यह भी सच है कि अखबार की “प्रकृति” के हिसाब से मनीषा पांडेय किसी सेलिब्रेटी की तलाश में किसी “आम आदमी” से टकरा गयीं और इसके घोर अफसोस में उन्हें किसी आम आदमी के व्यक्तित्व का खयाल रखना जरूरी नहीं लगा। हालांकि मैं भी शायद इस “वहम” में अपनी बात कह रहा हूं कि आम आदमी के पास भी अपने व्यक्तित्व की गरिमा होती है।
लेकिन भइया, जब आपको एक आदमी की गरिमा का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता, तो उसके परेशान होने पर क्यों चिंतित हो रहे हैं। कोई मृणाल पांडेय अपनी आपत्ति जताएं तब परेशान होइए। एक अदनी-सी मृणाल वल्लरी के अपनी बात कहने से तो बड़े लोगों को लिखने योग्य मानने वाली मनीषा जी को माफी मांगनी ही नहीं चाहिए थी। वह भी मृणाल वल्लरी पर “झूठ” बोलने का आरोप लगाने के बाद। मजेदार वाकया है।
कुछ बंधुओं का खयाल है कि वे मनीषा पांडेय को निजी रूप से जानते हैं कि वे बड़ी विनम्र महिला हैं। इससे किसी को इनकार नहीं करना चाहिए। लेकिन हममे से कौन ऐसा है, जो स्थितप्रज्ञ है, सबके साथ समान, सब जगह समान।
क्या कोई क्रांति हो गयी है…
रही बात किसी के नंबर देने या लेने की, तो हममे से कौन ऐसा है जिसका कोई नजदीकी उसके जान-पहचान का नंबर मांगे तो नहीं देता है… अगर मुझे किसी से मनीषा का नंबर मांगने पर किसी से मनीषा यादव या मनीषा राम या मनीषा झा का नंबर मिल जाता है तो कसूर किसका है, देने वाले या लेने वाले का। खास कर जब मैं सेलिब्रिटियों का दीवाना होऊं।
यह तो मोहल्ला लाइव जैसे एक-दो मंचों की मेहरबानी है कि कोई अपनी बात कह ले पाता है, वरना यह पूरा प्रसंग मृणाल वल्लरी को अपने भीतर जज़्ब कर लेना पड़ता, ठीक वैसे ही, जैसे हजारों स्त्रियां अपने “सम्मान” के खातिर चुप रहती हैं।
नाश हो उस “सम्मान” का…
वोटिंग ऑप्शन में ग्रंथि छुपी है
♦ विनीत कुमार
टेलीविजन का एक कट्टर दर्शक। बिना मीडिया कोर्स किये प्रिंट में सुविधाजनक नौकरी के कई ऑफर मिले और उसे ठुकराते हुए मीडिया कोर्स किया। आजतक में काम किया। लाइव इंडिया में एक साल रहे। डीयू से टेलीविज़न माध्यम पर पीएचडी कर रहे हैं। एफएम चैनलों की भाषा पर एमफिल किया।
अविनाश भाई, मैं आपके डेमोक्रेटिक अंदाज का दीवाना हूं। अपनी क्षुद्रताओं की वजह से चाहकर भी मैं ऐसा नहीं हो पाता हूं। लेकिन आपकी बात मुझे हमेशा याद रहती है कि इस मंच पर हर किसी को अपनी बात रखने का हक है। आप दोनों पक्षों को सामने लाने के पक्ष में होते हैं। लेकिन क्या मैं जान सकता हूं कि आपने मनीषा पांडेय की इस पोस्ट को लेकर जो वोटिंग सवाल दिये हैं, उसके ऑप्शन में अगर कोई मनीषा के पक्ष में वोट देना चाहे तो वो कहां वोट करे। आपके सवाल और ऑप्शन कुछ इस तरह है :
क्या मनीषा पांडेय के बर्ताव के लिए भास्कर समूह को मृणाल वल्लरी से माफ़ी मांगनी चाहिए?
1. हां, ये भास्कर की गरिमा के अनुकूल होगा
2. छोड़िए, ये दौर ही ऐसे दंभी पत्रकारों का है
वोटिंग होने के पहले ही आपको जजमेंट की शक्ल गढ़ लेने का ये अधिकार क्या आपके डेमोक्रेटिक चरित्र के अनुकूल है। क्या जिस तरह कमेंट में दोनों के पक्ष में बातें सामने आ रही हैं, वैसा वोटिंग ऑप्शन में भी खुला स्पेस संभव नहीं था? आपने ऑप्शन में इतने तंग ख्याल क्यों डाले कि जिसे भी वोट करना है वो मनीषा के खिलाफ ही करे।
वैसे मेरी ये बात नितांत रूप से आपके रवैये को लेकर है। न तो मनीषा के पक्ष में और न ही मृणाल के विपक्ष में। ये वो रवैया है जिसका विरोध हम अक्सर अखबार और चैनलों के लिए करते आये हैं।









बात निकली और बहुत दूर तक चली गयी, मृणाल जी और मनीषा जी कोई मन में mail न रखें, यही सुन्दर होगा,
जैसा मनीषा जी ने लिखा भी है (अखबारों में हम किस तरह के दबाव और तनाव के बीच काम करते हैं, आपसे छिपा नहीं है।) … यह त्वरित होने की …सबसे पहले का कथित गौरव पाने की अंधी दौड़ , संपादन को गैर जिम्मेदारी से …बहुत हल्के से लेने वाली पत्रकारिता का युग है … दूसरो को न पढ़ने … स्वयं अपना भर ज्यादा से ज्यादा पढ़ा सकने के प्रयासो में लगे समय से उपजी संवेदनाये हैं … शायद इसी लिये आज के मैकेनिकल युग में हम नाम नही नम्बरो से पहचाने जाने लगे हैं
आगरा वार्ता की विफलता याद है आपको … मेरा मानना है कि असंपादित त्वरित पत्रकारिता का भी हाथ था उसमें …
मनीषा जी, आपने अपनी गलती मानकर अपना बड़प्पन ही जाहिर किया है। यकीनन गलती कन्फ्यूजन की वजह से हुई होगी। लेकिन आपने सारे कन्फ्यूजन दूर करके पूरे मसले को साफ-साफ रखा, इसके लिए आप भी तारीफ की हकदार हैं। उम्मीद है अब वल्लरी के मन में भी कोई शिकवा-शिकायत नहीं बाकी होगी।
अविनाश बाबू, ये तीसरा ऑप्शन कोई ऑप्शन नहीं है ! जो किया, सही किया ये तो शायद मनीषा पांडेय भी नहीं कह रहीं हैं. ये ऑप्शन रखकर आप अभी भी बहस का बेवजह तीखापन बनाए तो नहीं रखना चाहते, इतनी शर्त तो मैं लगा सकता हूँ कि आप सचेत रूप से ऐसा नहीं करेंगे. जनता के मूड के माकूल ऑप्शन तो ये होता कि भूल-चूक लेनी-देनी.
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