विकास पुरुष या यथास्थिति की एक फ्रीज़ तस्वीर?

♦ दिलीप मंडल

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ज्योति बसु की औद्योगिक नीति और निजी क्षेत्र की निर्णायक भूमिका : क्या ज्योति बसु की आलोचना वामपंथ की आलोचना है? कुछ मिथकों का टूटना शायद जरूरी है। मिसाल के तौर पर क्या आप उन लोगों में हैं, जो मानते हैं कि ज्योति बसु वामपंथी राजनीति कर रहे थे? हम यहां ज्योति बसु की पारिवारिक पृष्ठभूमि, उनकी विदेश में हुई शिक्षा, उनके शानदार रहन-सहन, हर साल गर्मियों में उनकी यूरोप यात्रा, सॉल्ट लेक में उनकी भव्य कोठी, उनके उद्योगपति पुत्र के धन संचय और ऐसे दूसरे निजी विचलनों और आचरणों की बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि तर्क ये कि इन निजी बातों से लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी प्रभावित नहीं होती। इसलिए नीतियों की ही बात की जाए, तो बेहतर। जो लोग ज्योति बसु को कम्युनिस्ट या वामपंथी मानते हैं, उन्हें “वामपंथ के इस प्रतीक पुरुष” की औद्योगिक नीति को जरूर पढ़ना चाहिए।

ये नीति 1994 में आयी थी। ये वो समय था, जब भारत में उदारीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और सीपीएम समेत वामपंथी पार्टियां उदारीकरण के खिलाफ सड़कों पर नारेबाजी कर रही थी। इस नीति में साफ कहा गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार उचित होने पर और परस्पर फायदे की सूरत में विदेशी टेक्नॉलॉजी और विदेशी पूंजी का स्वागत करती है। ज्योति बसु सरकार ने इस नीति में ही मान लिया था कि तेज गति से विकास में निजी क्षेत्र की निर्णायक भूमिका है। इस नीति पर पश्चिम बंगाल की सरकार पिछले 15 साल से अमल कर रही है। इसलिए कृपया इस भ्रम को पीछे छोड़ दें कि ज्योति बसु की आलोचना कम्युनिज्म की और वामपंथ की आलोचना है। ज्योति बसु खुद भी कहते रहे कि उनकी सरकार का चरित्र क्या है। इस बारे में संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

साथ ही वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक तबका पश्चिम बंगाल और ज्योति बसु के बारे में ये छवि बनाने की कोशिश करता रहा है कि इस शासन में राज्य ने काफी तरक्की की है। और ये तरक्की सिर्फ अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नहीं, बल्कि मानवीय विकास के क्षेत्र में भी हासिल की गयी है। लेकिन तथ्य इससे टकराते हैं। मिसाल के तौर पर ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि पश्चिम बंगाल सीपीएम के शीर्ष नेताओं को अपने इलाज के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेज या अस्पताल क्यों नहीं भाते?

क्या आपको ये बात चौंकाती है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम के तमाम बड़े नेता इलाज के लिए किसी सरकारी अस्पताल में नहीं, बल्कि निजी अस्पताल और नर्सिंग होम की शरण में जाते हैं। पश्चिम बंगाल और यहां तक कि राजधानी कोलकाता में कोई भी मेडिकल कॉलेज या सरकारी अस्पताल इस लायक नहीं रह गया है कि कोई सीपीएम नेता वहां अपना इलाज कराये। इसे सिर्फ संयोग नहीं कह सकते कि हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल सीपीएम के सेक्रेटरी अनिल विस्वास, सीटू के नेता चित्तब्रत मजुमदार और अब ज्योति बसु, तीनों का इलाज प्राइवेट नर्सिंग होम में हुआ और वहीं उनकी मौत हुई। ये बात राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवा का हाल बयां करती है।

और अब कुछ बात विकास की भी कर ली जाए।

1991 तक के आंकड़ों के मुताबिक (तब तक ज्योति बसु के राज के 14 साल हो गये थे) पश्चिम बंगाल के 33 फीसदी घरों में ही बिजली पहुंची थी, जबकि इस समय तक पूरे भारत के 42 फीसदी घरों में बिजली पहुंच चुकी थी। ये आंकड़ा उस किताब से है, जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने छापा है। पश्चिम बंगाल ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट को यूएनडीपी ने तैयार किया है।

पश्चिम बंगाल का प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच 20वें स्थान पर होना अगर किसी शासन की आर्थिक नीतियों की सफलता है, तो इस पर आश्चर्य ही किया जा सकता है। ये हाल उस पश्चिम बंगाल का है जो कभी देश के सबसे विकसित इलाकों में से एक था।

http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Indian_states_by_GDP

और जिस ऑपरेशन बर्गा को पश्चिम बंगाल की जादू की छड़ी बताया जाता है, उस पर अब बंगाल के अंदर कोई बात भी नहीं करता है। पश्चिम बंगाल में भूमि संबंधों का हाल ये है कि नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 1987-88 में गावों में 39.6 फीसदी परिवार भूमिहीन थे। ग्रामीण भूमिहीन परिवारों की संख्या 1993-94 में बढ़कर 41.6 फीसदी हो गयी और ज्योति बसु का कार्यकाल खत्म होने तक 1999-2000 में ग्रामीण भूमिहीन परिवारों की संख्या 49.8 फीसदी हो गयी। यानी पश्चिम बंगाल के गांवों में आधे परिवारों के पास अपनी कोई जमीन नहीं हैं।

देखें http://data.undp.org.in/shdr/wb/WBHDR.pdf

देश के शहरी इलाकों में जिन परिवारों में 15 साल से ज्यादा उम्र का कोई भी आदमी साक्षर नहीं है, ऐसे परिवारों की गिनती के मामले में राजस्थान (16 फीसदी), बिहार (15 फीसदी) के बाद पश्चिम बंगाल (14 फीसदी) का ही नंबर है।

http://www.mospi.gov.in/nsso_press_note517.htm

जिस राज्य में हर सौ में 78 बच्चे पहली से दसवीं तक पहुंचने के बीच कहीं स्कूल छोड़ जाते हैं, उस राज्य को विकसित किस मायने में कहा जाए, ये विचारणीय है। ड्रापआउट रेट के मामले में भारतीय औसत 61.92 फीसदी है।

http://pib.nic.in/archieve/others/2008/mar/r2008031721.pdf

90 के दशक के आखिरी वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के शहरों में 68 फीसदी और गांवों में 16 फीसदी घर ही पक्के हैं जबकि भारत का औसत शहरों के लिए 71 फीसदी और गांवों के लिए 29 फीसदी है।

देखें http://data.undp.org.in/shdr/wb/WBHDR.pdf

पश्चिम बंगाल असमान विकास के मामले में भी खतरनाक स्थिति पेश करता है। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स पर जहां कोलकाता और हावड़ा जैसे जिलों के .78 और .68 नंबर हैं, वहीं पुरुलिया और मालदा जैसे जिले काफी नीचे .44 और .45 पर हैं। पश्चिम बंगाल में विकास के नाम पर जो कुछ हुआ है, वो कोलकाता और आसपास के इलाकों में सिमट गया है।

देखें http://data.undp.org.in/shdr/wb/WBHDR.pdf

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे 61वां राउंड (2004-2005) में ये पाया गया कि पश्चिम बंगाल के 47.3 फीसदी गरीबों के पास न तो बीपीएल कार्य है और न ही अंत्योदय अन्न योजना का कार्ड। जबकि जो लोग गरीब नहीं हैं, उनमें से 43.3 फीसदी के पास या तो बीपीएल कार्ड है या फिर अंत्योदय अन्न योजना कार्ड। गरीबों के हित का पश्चिम बंगाल में ये हाल है।

देखें http://www.indicus.net/media/index.php/2009/1324-transforming-west-bengal-changing-the-agenda-for-an-agenda-for-change

पश्चिम बंगाल की ज्योति बसु सरकार के बारे में एक और मिथक ये है कि उनके शासन में मजदूर आंदोलन खूब हुए, हड़तालें हुईं, जिसकी वजह से कई उद्योग राज्य छोड़कर चले गये। वामपंथी राज में पश्चिम बंगाल के औद्योगिक रूप से पिछड़ने के पीछे ये तर्क इतनी बार दिया गया है कि इस पर लोग आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं। लेकिन क्या ये सच है? आप पश्चिम बंगाल सरकार की आर्थिक समीक्षा उठा कर पढ़ लीजिए। इसमें पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विवादों का पूरा ब्यौरा है। इसके मुताबिक 1977 में (जब ज्योति बसु पहली बार मुख्यमंत्री बने) पश्चिम बंगाल में 206 हड़तालें और 191 लॉक आउट हुए। लेफ्ट फ्रंट के शासन में साल दर साल हड़तालों की संख्या घटती चली गयी और 1980, 1985, 1987, 1989 और 1991 में हड़तालों की संख्या क्रमश: 78, 39, 39, 16 और 21 रह गयीं। जबकि इन्हीं वर्षों में मालिकों ने क्रमश: 130, 165, 197, 207 और 192 बार लॉक आउट किया यानी कारखाने बंद कर दिये।

देखें http://www.ippg.org.uk/papers/dp10.pdf

ये आंकड़ा सिर्फ ये बताता है कि ज्योति बसु के शासन काल में मजदूर आंदोलनों की क्या गति हुई और उद्योगपतियों का बोलबाला किस हद तक बढ़ा। वर्ल्ड बैंक और सीआईआई ने भी एक साझा रिपोर्ट में कहा है कि पश्चिम बंगाल में उद्योगपतियों की मुख्य समस्या मजदूर आंदोलन नहीं बल्कि कम मुनाफा है। इसके लिए कागजी कार्रवाई में होने वाली उलझन, खराब बुनियादी ढांचे और हुनरमंद लोगों की कमी को जवाबदेह ठहराया गया है।

2004 में बुद्धदेव घोष और प्रवीर दे ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 1981-82 में बुनियादी ढांचे के मामले में पश्चिम बंगाल का देश में स्थान 9 था, जो 1991-92 में 17 हो गया। ये सब कुछ उस दौर में हो रहा था, जब ज्योति बसु का राज अबाध चल रहा था।

अगले भाग में पढ़िए : कॉमरेड से खफा क्यों हैं पश्चिम बंगाल के मुसलमान?

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्‍थान, नयी दिल्‍ली में रेगुलर क्‍लासेज़ ले रहे हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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