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न्‍यू मीडिया पर अलग-अलग नज़र

25 January 2010 5 Comments

इस रविवार दो अख़बारों में न्‍यू मीडिया पर दो महत्‍वपूर्ण लोगों ने कलम चलायी। जनसत्ता में अपने नये कॉलम का आगाज़ करते हुए मृणाल पांडे ने और हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में वीर सांघवी ने। न्‍यू मीडिया को जहां मृणाल पांडे संदेह और अस्‍पृश्‍य नज़रों से देख रही हैं, वहीं वीर सांघवी इसे कमाल का माध्‍यम बता रहे हैं। हम दोनों ही नज़रियों को आमने-सामने रख रहे हैं। फ़ैसला आप करें कि किसकी बात में कितना वज़न है : मॉडरेटर

वेब मीडिया पर नया रुझान

♦ वीर सांघवी

पिछले साल काफी वक्त मैंने न्‍यू मीडिया का गौर से अध्ययन किया। ऐसा नहीं है कि मैने अपना कॉलम लिखना या टीवी पर आना बंद कर दिया। मैंने बस मीडिया के परंपरागत रुप को इसके आधुनिक अवतार के साथ जोड़कर समझने की एक कोशिश की। इसमें से एक इंटरनेट है। साल भर पहले जब मैंने अपना वेबसाईट www.virsanghvi.com बनाया था तो मेरी कोशिश नई पीढ़ी के लोगों से जुड़ने की अपेक्षा इस इंटरएक्टिव मीडियम का उपयोग करने की ज्यादा थी कि कैसे लोग घटनाओं और मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते हैं। कुछ महीनों पहले मैंने ट्विटर का भी उपयोग शुरु किया। हलांकि मैं हर रोज ट्वीट नहीं करता और सेलीब्रेटियों की तरह उस पर निजी टिप्पणी नहीं देता, मसलन-आज मैं काफी उबाऊ समारोह में था, मैं चाहता हूं कि बाहर जाकर मस्ती करुं ! हां, मैं ट्विटर पर अपने उन दोस्तों की प्रतिक्रिया जरुर लेता हूं जो वहां मुझे फोलो करते हैं।

लेकिन इसमें से कोई भी माध्यम मुझे ज्यादा सूचनाएं नहीं देता। मेरा वेबसाईट अभी भी बहुत हद तक एक निजी मामला ही है( सबसे ज्यादा हिट्स जो मैंने पाया है वो तकरीबन 30,000 के करीब है। हलांकि ये निजी तौर पर उतना कम भी नहीं है लेकिन हिंदुस्तान टाईम्स जैसे अखबार की ताकत और पहुंच के मुकाबले बहुत ही कम है।) ट्विटर पर मेरे तकरीबन 3.35 लाख फौलोवर है और मैं शशि थरुर के मुकाबले बहुत ही पीछे हूं। हलांकि कईयों से आगे भी हूं, लेकिन संभवत: मैं इस पर कोई सामान्यीकृत राय नहीं बना सकता।

लेकिन ये साल मेरे लिए एक शानदार साल रहा। तकनीक से ज्यादा मुझे उन लोगों में दिलचस्पी है जो इसका उपयोग करते हैं। मेरे जैसे पुराने जमाने के लोगों की राय के उलट आज के नौजवान राजनीति में काफी दिलचस्पी लेते हैं और कई मुद्दों पर उनकी राय काफी बेबाक है। वे अपनी पुरानी पीढ़ी की तुलना में काफी सुलझे विचार रखते हैं।

मौजूदा समय में ब्लॉगर्स, वेबसाइटों के विजिटर्स और ट्विटर का उपयोग करने वाले लोग पारंपरिक मीडिया के लोगों के लिए एक उत्सुकता का विषय बन चुके हैं। हम अभी तक उन्हे वो सम्मान या संजीदगी नहीं दे पाये हैं जो उन्हे पश्चिम के देशों में हासिल हैं। हम उन्हे अभी तक महज एक फिलर के तौर पर देखते हैं, मानो टीवी शो में कोई ग्राफिक चल रहा हो या फिर उन समाचारों के रुप में कि कोई सेलिब्रेटी ट्विटर पर क्या कर रहा है!

मुझे लगता है कि ऐसा करके पारंपरिक मीडिया के लोग बड़ी गलती कर रहे हैं। हमें ये सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए की एक पूरी की पूरी नई पीढ़ी सामने आ चुकी है जो अपने तरीके से चीजों को अभिव्यक्त कर रही है। ये बातें महज एक दशक पहले तक बिल्कुल अनजानी था। जैसे-जैसे ये पीढ़ी खुल कर अपने आपको अभिव्यक्त करने लगेगी, इसके विचार मुल्क की नीतीयों को तय करने में प्रभावशाली भूमिका निभाते जाएंगे। जो लोग इंटरनेट की दुनिया से बहुत वाकिफ नहीं हैं, उनके लिए मैंने कुछ अहम चीजें नोटिस की हैं जो मैंने ब्लॉग, ट्विटर और मेरे वेबसाईट या इस पर आई टिप्पणियों के मार्फत मालूम की है। हलांकि मैं ये दावा नहीं करता कि मेरे अनुभव बिल्कुल ही अलहदा हैं या ये किसी वैज्ञानिक किस्म के शोध का नतीजा है, लेकिन जो भी मैंने अनुभव किया है, उसे मैं बयां कर रहा हूं।

आर्थिक मुद्दे : अमूमन मैंने इंटरनेट पर मार्क्सवाद या समाजवादी विचारधारा के प्रति लोगों में तिरस्कार भाव पाय़ा है। यहां पर आम राय दक्षिणपंथी विचारधारा की तरफ निर्णायक रुप से झुकी हुई है और जब ज्योति बसु की मृत्यु हुई तो इंटरनेट पर लोगों के विचार श्रद्धांजलि देनेवाले बहुत कम थे-वे आलोचनात्मक ज्यादा थे। जबकि टीवी या प्रिंट मीडियम में ये श्रद्धासुमन ज्यादा थे। अगर मार्क्सवाद का खुले तौर पर समर्थन करने वाली कोई नई पीढ़ी वजूद में है तो जाहिरा तौर पर इंटरनेट पर उसकी मौजूदगी बहुत कमजोर है।

धार्मिक मुद्दे : इंटरनेट का उपयोग करने वाली पीढ़ी को बाबरी मस्जिद से बहुत लेनादेना नहीं है। यहां तक की जिन लोगों को बीजेपी से सहानुभूति भी हैं उन्हे भी रामलला का भव्य मंदिर बनवाने या हिंदू पुनुरुत्थान की बहुत चिंता नहीं है। इस पीढ़ी को पुराने जमाने के झगड़े और एक मध्यकालीन मस्जिद में बहुत दिलचस्पी नहीं है। दूसरी तरफ, लोगों को बढ़ता हुआ इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरपंथ से आपत्ति जरुर है। हालांकि इसका स्वरुप मुस्लिम विरोधी कम बल्कि उनके पिछड़ेपन का विरोधी ज्यादा है। ये पीढ़ी उस किसी भी चीज का विरोध करती है जो आदिम या दकियानूसी लगता है। कट्टरपंथी भावना को समय से पीछे चलने जैसा माना जा रहा है। लोग इसे जाहिलपन समझ रहे हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।

भाजपाई ब्लॉगर्स : कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति जिसे थोड़ा बहुत भी इंटरनेट का ज्ञान है वो आपको बता देगा कि इंटरनेट पर बीजेपी के कट्टर समर्थकों का एक बड़ा ब्लॉगर समुदाय सक्रिय है जो संघ परिवार के विचारों का घनघोर रुप से कट्टर समर्थक हैं। ये ब्लॉगर अपने विरोधियों को छद्मधर्मनिरपेक्षवादी ठहराकर उस पर कडा हमला करने के लिए हमेशा तैयार रहते है। दूसरी तरफ ऐसा कोई हार्डकोर कांग्रेस समर्थक ब्लॉगर या ट्विटर का इस्तेमाल करनेवाला समुदाय नहीं है जो उसी अंदाज में उनको जवाब दे सके।

इसकी वजह क्या हो सकती है? शायद इसकी एक वजह ये हो कि बहुत सारे ऐसे अप्रवासी भारतीय भी हैं जो बीजेपी के बड़े भक्त हैं और इंटरनेट के कीड़े भी। या ये भी हो सकता है, जैसा कि अफवाह है, कि बीजेपी ने कुछ लोगों को इसके लिए नियुक्त किया है कि वे बीजेपी के विरोधियों पर हर दिन नजर रखें और उन्हे मुंहतोड़ जवाब दें। मुझे सच्चाई का पूरी तरह से पता नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि इंटरनेट पर कांग्रेस, बीजेपी के सामने फिसड्डी है।

मनमोहन सिंह- लेकिन एक बात तय है कि प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह इंटरनेट पर एक विजेता के रुप में उभरे है्। कुछ हार्डकोर भाजपाई ब्लॉगरों को छोड़कर ज्यादातर ब्लॉगर या ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले मनमोहन सिंह की इज्जत करते हैं। वे इंटरनेट पर अभी तक के सबसे ज्यादा इज्जतदार नेता हैं और ट्विटर इस्तेमालकर्ताओं की निगाह में वे शायद ही कभी गलत फैसलें लेते हों। इसका एक मतलब ये भी है कि मनमोहन सिंह पढ़े लिखे भारतीयों की निगाह में कितना सम्मान रखते हैं लेकिन इसका बड़ा मतलब ये है कि इंटरनेट उनको आधुनिकतावादी, उदार आर्थिक नीतियों का जनक, स्वच्छ छवि और सुशिक्षित व्यक्ति के तौर पर ज्यादा देखता है।

पाकिस्तान और चीन : अगर आप किसी आतंकी हमले या चीन के किसी भड़काऊ बयान के बाद ट्विटर पर आए लोगों की प्रतिक्रियाओं को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि इसका इस्तेमाल करने वाले लोग कितने कट्टरपंथी और मुंहतोड़ जवाब देने के हिमायती हैं। लेकिन हकीकत इससे ज्यादा जटिल है। ये पीढ़ी एक अति देशभक्त पीढ़ी है जो हिंदुस्तान को एक संभावित महाशक्ति के तौर पर देखती है। जो कोई भी देश पर हमला करने के मूड में नजर आता है या फिर देश की तरक्की में वाधा नजर आता है, ये पीढ़ी उसके साथ कड़ाई से पेश आने की प्रवल पक्षधर है। यूं, नेट पर कई पाकिस्तानी साईट्स मौजूद हैं जो हेट इंडिया के नारे से संचालित हैं लेकिन हिंदुस्तान की नई पीढ़ी की बात की जाए तो यहां ऐसी कोई जनरलाईज्ड धारणा नहीं है। अगर मनमोहन सिंह कहते हैं कि वे पड़ोसी मुल्क के साथ संबंध सुधारना चाहते हैं, तो भी उनका स्वागत होता है। दूसरी तरफ, अगर पाकिस्तान, आतंकवादियों का साथ देता नजर आता है या 26/11 के आरोपियों को बचाता नजर आता है तो फिर ट्वीटर के इस्तेमाल करने वाले अपनी आस्तीन चढ़ाते हुए नजर आ जाते हैं!

ठीक यहीं मामला चीन के केस में भी है। बहुतों की राय में चीन वो सारा हथकंडा आजमाएगा जिससे भारत की तरक्की न हो। इंटरनेट पर चीन-विरोधी बातें इसी धारणा से प्रेरित है। यहां चीन के बारे में कोई जनरलाज्ड विरोध नहीं है जैसा कि आप पश्चिमी देशों की साईटों में देखते हैं मसलन मानवाधिकार, तिब्बत की आजादी आदि।

पूर्व प्रधानमंत्रियों के बारे में राय : जहां तक टीवी या प्रिंट की बात है तो इंदिरा गांधी की 25वीं पूण्यतिथि पर उनके द्वारा लगाए गए आपातकाल की घटना पर अभी भी आलोचनात्मक और निंदात्मक राय ही ज्यादा सामने आई है जबकि इंटरनेट का उपयोग करने वाली पीढ़ी को इस बात से बहुत मतलब नहीं है। बहुत से ब्लागरों के लिए तो इतिहास, 1980 से शुरु ही हुआ है, सो उनके लिए इंदिरा गांधी के दौर की सबसे बड़ी घटना ऑपरेशन ब्लू स्टार है ! जबकि दूसरे कई ब्लागर उनकी छवि को एक मजबूत नेता की छवि से जोड़कर देखते हैं और दुनिया भर में देश की धमक बढ़ाने के लिए उनका समर्थन करते नजर आते हैं। (अनुवाद : सुशांत झा)

असली चुनौतियां इधर है

♦ मृणाल पांडे

इक्कीसवीं सदी के इस पहले दशक ने हिंदी मीडिया को ऐतिहासिक रूप से एक विशाल उपभोक्ता-वर्ग दिला दिया है। और हिंदी की विशाल पट्टी के ग्यारह राज्यों की जनता तक सूचनाओं का इकलौता राजपथ बना हिंदी मीडिया हमें भारत की सूचना-प्रसार दुनिया का बेताज बादशाह नजर आता है। अगर हिंदी पत्रकारिता के पुरोधाओं के सपने संसाधनों के अभाव में साकार नहीं हो पा रहे थे, तो विज्ञापनों की प्रचुर आमदनी से दमकते हिंदी मीडिया को अब तो समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों, संसाधनों को लूटने वाले हर वर्ग से पूरे आत्मविश्वास के साथ बार-बार मोर्चा लेना चाहिए था।

यह सचमुच गंभीर शोध का विषय है कि वह ऐसा क्यों नहीं कर रहा है। क्यों वह ‘हैव्स’ का प्रतिनिधि समझे जाने वाले अंग्रेजी मीडिया के स्तर पर भी, महंगाई से लेकर पैसे लेकर खबरें छापने तक का खुला विरोध नहीं कर रहा? ब्लॉग-जगत के चंद नियतिहीन कोनों में हिंदी के कुछ मीडियाकर्मी न्यूयॉर्क की सड़कों पर पखावज बजा कर कीर्तन करने वाले हरे-कृष्ण अनुयायियों की तरह कुछेक सुरीले-बेसुरे नारे जरूर उठा रहे हैं; पर उनके सुरों में दम नहीं। हो भी कैसे? जिन अखबारों को वे इन पाप-कर्मों का दोषी बता रहे हैं, वहां नौकरियां खुलते ही वे सब हो हो कर उमड़ कर हर तरह की घिनौनी चिरौरी और सिफारिशी प्राणायाम साधने में तत्पर हो जाते हैं।

नौबत यहां तक आ गई है कि जब एक बड़े टीवी चैनल के प्रमुख एक बड़े अखबार में लिखते हैं कि मीडिया प्रबंधक आज पाठकों/दर्शकों से अधिक शेयर-धारकों और व्यवस्थापकों के आगे जवाबदेह हैं, लिहाजा अधिकाधिक मुनाफा कमाने की जुगत बिठाना उनका सहज और तर्कसंगत धर्म है, तो उसका प्रतिवाद करने की फुर्सत किसी के पास नहीं। क्या पता कब उस चैनल या अखबार में भर्तियां खुल जाएं? जब यही इनकी पार्टी-लाइन हो तो असहमति का जोखिम क्यों उठाएं?

मार्क्सवाद कहता है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नियमानुसार हर युग में थीसिस और एंटीथीसिस (स्थापना और प्रतिस्थापना) के बीच संघर्ष अनिवार्य है। इसी संघर्ष से नया समन्वय बनता है और तब इतिहास का रथ आगे बढ़ता है। अपने यहां यास्क भी ऋग्वेद के मंत्र की व्याख्या करते हुए कह गये हैं कि जब समान ज्ञानवान लोग समवेत बैठ कर बहस करते हैं, तो मन की गति से अपने ज्ञान के कुछ हिस्सों को त्याग देते हैं, ऐसे बात आगे बढ़ती है।

हमारे यहां दिक्कत यही है कि हिंदी मीडिया में टकराव के मुद्दों पर छातियां अलग-अलग बहुत कूटी जाती हैं, पर सच्चा एकजुट टकराव लगभग पूरी तरह अनुपस्थित रहता है। हिंदी मीडिया से जुड़े सबसे चिंताजनक मुद्दे हिंदी जगत की इस ढुलमुल प्रवृत्ति से ही उपजे हैं। मसलन, अगर हिंदी मीडिया पूंजीवादी बाजार को उपभोक्ता तक ले जाने वाले भाषा-सेतु को साझी करने देने के एवज में उससे विज्ञापनों के रूप में कर वसूल करता है, तब उसका सहज दर्शन यही होना चाहिए कि इस भाषा-सेतु में बाजार के लिए बनी लेन अलग हो। उसका ट्राफिक एक स्पष्ट अनुशासन में आता-जाता रहे, और कर-वसूली का काम वाजिब और रसीद समेत किये जाने का प्रावधान हो। और अगर वह चाहता है कि पूंजीवाद मरे और मीडियाकर्मियों का शोषण साम्यवाद की मार्फत बुनियादी क्रांति कराये तो वह कामगारों के पक्ष में सड़क पर लामबंद हो।

लेकिन हो क्या रहा है? चुपचाप लेनों के बीच के मार्कर इधर-उधर कर, बिना रसीद विज्ञापनदाता दलों से भरपूर काला चंदा लिया जा रहा है, इससे ट्राफिक भले अनियंत्रित होता हो, गाड़ियां टकराती हों, तो हों। दूसरी तरफ सामाजिक चेतनायुक्त जनोन्मुख और पेशेवर अधिकारों की बहाली की मांग करने वाली रिपोर्टिंग के लिए तमाम तरह के विवादित औद्योगिक घरानों से मीडिया द्वारा पुरस्कार स्वीकार किये जा रहे हैं और बदले में हाथोंहाथ उनके प्रतिनिधियों का (प्राय: उन्हीं के खर्चे से) वर्ष के सर्वश्रेष्ठ उपक्रमी के रूप में अभिनंदन भी कर दिया जा रहा है।
छपाई की रामराज्य जैसी सुविधाएं बनायी जा रही हैं, पर पत्रकारिता के स्वस्थ प्रतिमान कायम नहीं हो पा रहे, क्योंकि कई जगह प्रबंधन के हुकुम पर संपादकीय टीमें अपने काम में दक्षता लाने के बजाय विज्ञापन लाने और नेताओं-प्रशासकों की जरूरत के अनुसार मदद सुनिश्चित करने का काम कर रही हैं।

ऐसे मंजर में पूंजीवाद भी है, समाजवाद भी और दोनों को एक समझदार चुप्पी एक साथ गुंथे हुए है। अगर थीसिस और एंटीथीसिस के बीच नैसर्गिक टकराव के बजाय ऐसा हंसमुख शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम हो जाएगा तो, किसका संघर्ष और कैसी प्रगति?

हिंदी मीडिया की पहली चिंता यही होनी चाहिए।

दूसरी चिंता का मुद्दा है, हिंदी मीडिया के औसत नये उपभोक्ता की अपेक्षाएं। यह उपभोक्ता न तो पूंजीवादी खुले बाजार का विरोधी है; और न ही सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य कल्याण या सार्वजनिक वितरण-तंत्रों के भरोसे बैठे अपने सह-उपभोक्ताओं को लेकर उसमें किसी गहरी ग्लानि या आक्रोश का एहसास है। फिल्मी मनोरंजन, फलित ज्योतिष, धार्मिक अंधविश्वासों और रूढ़ियों को लेकर भी उसमें एक तरह की ललक है और विज्ञापनों द्वारा खबरों के बीचोबीच की जमीन हथियाने को लेकर भी बतौर एक उपभोक्ता वह इतना परेशान नहीं होता कि उन चैनलों या बड़े अखबारों का बायकॉट कर दे।

यह भी गौरतलब है कि हिंदी मीडिया को लेकर ऐसे सारे सवाल अंग्रेजी में ही पहले क्यों उठाये जा रहे हैं, और हिंदी में भी दिल्ली के ही मीडिया में क्यों, मुंबई, लखनऊ या चंडीगढ़ के मीडिया में क्यों नहीं? और सिर्फ चंद बड़े अखबारों की ही बाबत क्यों? उन तमाम छोटे प्रांतीय अखबारों की बाबत क्यों नहीं, जो वर्षों से यह तमाम गैर-पेशेवर काम करते आ रहे हैं, और अपने मालिकान और संपादकों को छोटे-मोटे प्रांतीय कुबेरों में तो तब्दील कर ही चुके हैं?

ये तमाम बातें गौर से देखने पर जुड़ी हुई दिखाई देने लगती हैं। एक और बात इनसे जुड़ती है : राजनीति से पूंजी का जुड़ाव खत्म करने की दिशा में किसी भी ठोस कदम का न उठाया जाना! चुनाव बड़ी थैली के बूते लड़े जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है। लिहाजा, हर राजनीतिक व्यक्ति को पेशेवर थैली-बटोर बनना पड़ता है, और जीतने के बाद थैली का अहसान ब्याज समेत लौटाना होता है। इसी स्रोत से पहले नौकरशाही में, और अब मीडिया में भी थैलीवाद के जरासीम आये हैं! औसत मीडिया-उपभोक्ता संविधान या कि मीडिया के अभिव्यक्ति के अधिकार की बारीकियां नहीं जानता। उच्चतम न्यायालय ने जो ऐतिहासिक स्थापना दी थी कि ध्वनि तरंगें (एअर वेव्स) जनता की संपत्ति हैं, उसे भाषाई मीडिया के उपभोक्ता का समर्थन है या नहीं, कहा नहीं जा सकता। अगर कल को सरकार मीडिया के लिए एक आचरण संहिता बना कर उसे लागू कराने पर उतारू हो जाए, और ध्वनितरंगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक सरकारी संस्थान के सुपुर्द कर दिया जाए तो क्या वैसा देशव्यापी जनांदोलन छिड़ सकता है जैसा तेलंगाना के नाम पर हुआ? बिना मुकदमा चलाए राजा मुंज से लेकर अनारकली तक को तहखाने में बंद रखने वालों और बलात्कृत लड़की को खराब आचरण का हवाला देकर स्कूल से निकलवाने वालों के मुल्क में, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का आखिर में जाकर कितना वजन माना जाएगा? अखबारों-चैनलों के कर्मी चूंकि जनता या शेयरधारकों द्वारा नहीं चुने जाते, उनसे यह भी तो कहा जा सकता है, कि उन्हें क्या हक है कि वे खुद को जनता की रुचि और रुझान का सरकार या प्रबंधक से बेहतर प्रवक्ता मान बैठें?

यह हिंदी मीडिया की स्व-आरोपित असहायता का ही सबूत है कि वह इस ताले की कुंजी आज भी संपादक नाम के जीव की जनेऊ में खोजे जा रहा है, जो खुद अक्सर मालिक भी है। अपने में यह उम्मीद गलत नहीं कि कहीं कभी एक अंतरात्मावान विवेकी अखबारी योद्धा घोड़े पर चढ़ कर आएगा और मीडिया में काले धन की गंगा का प्रवाह रोक देगा। लेकिन मूलत: धंधई संपादकों के अवसान के युग में यह एक नापाएदार उम्मीद है। जब तक देश की राजनीति में यह धन-वैतरणी प्रवाहित है, तब तक लोकतंत्र का कोई भी पाया इससे आप्लावित हुए बिना कैसे रह सकता है?

अगर हम हिंदी अखबारों-चैनलों को लोकतंत्र में हर कमजोर वर्ग की आजादी का पहरुआ देखना चाहते हैं, तो हमें स्वीकार करना होगा कि मालिक-संपादकों के रहते इसकी रक्षा हिंदी मीडिया के लोग नहीं कर सकते। इसलिए अखबार पढ़ने और चैनल देखने के अलावा और भी हजारों काम हिंदी मीडिया-उपभोक्ताओं को रोज-रोज करने होंगे। और पहला काम होगा मीडिया की सफाई के पक्ष में उस तरह बतौर उपभोक्ता दबाव बनाना, जैसा कि अब वे (देर-सबेर ही सही) महंगाई के खिलाफ बना रहे हैं।

5 Comments »

  • अंशुमाली रस्तोगी said:

    मृणालजी के लेख को पढ़कर सोच रहा हूं कि यह सब उन्होंने तब ही क्यों लिखा जब वे एक बड़े मीडिया संस्थान से अलग हुईं? वे अपनी आपत्तियां तब भी दर्ज करवा सकती थीं जब वे उस अखबार में थीं। क्या इसे यह नहीं माना जाए कि जब तक मीडिया से जुड़े रहो तब तक उसकी हर बुराई पर परदा डालते रहो और जब उससे अलग हो जाओ तब उसे जमकर गरियाओ। हम यह स्वीकारते हैं कि मीडिया में एक नहीं बहुत खामियां हैं लेकिन इन खामियों को यूंही हर दफा रोते-गाते रहने से भी क्या हासिल? कहीं कोई बात मीडिया में व्याप्त खामियों को दूर करने की नहीं की जाती सिवाय अपनी-अपनी रामकथा सुनाने के।
    मृणालजी अपने हिसाब से युवाओं की सोच और उनके काम करने के तरीकों को नहीं बदल सकतीं। यह नए युवाओं का नया मीडिया है। मुझे लगता है युवा पुरानी पीढ़ी से कहीं अधिक परिपक्कव है।
    वीर सिंघवी का लेख इस मायने में काफी सुलझा हुआ है। जब तक आप युवा विचार को सुनेंगे समझेंगे नहीं पता कैसे चलेगा कि वे क्या चाहते या क्या सोचते हैं सामाजिक, आर्थिक और मीडिया के बदलाव के प्रति।

  • एकलव्य said:

    मृणाल जी जिस दिन इस नए माध्यम पर आएंगीं उसी दिन उन्हें समझ में आ पाएगा कि मैनेज की गई प्रतिष्ठा और मिले-मिलाए ज्ञान से आगे भी बहुत कुछ होता है। यहां एक-एक करके बड़े-बड़े क़ाग़ज़ी शेरों की असलियत निकल कर आ रही है। क्यों कि यहां भोपाल के निकट किसी गांव से लेकर बीच दिल्ली और सुदूर कनाडा के लोग एक साथ एक ही वक्त पर बिना किसी हस्तक्षेप के हिस्सा लेते हैं। संपादन के नाम पर सेंसर यहां नाम-मात्र के लिए होता है। यह किसी अख़बारी किले का सुरक्षित कालम नहीं है कि आप तो जो मर्ज़ी कह दें और प्रतिक्रियायों में अपने ‘कद’ के मुताबिक काटा-पीटी कर लें।

  • विनीत कुमार said:

    चरमुंहा शेर मार्का विभाग में घुसते ही मृणालजी ने चाहिए शब्द का प्रयोग करना शुरु कर दिया। इ चरमुंहा शेर मार्का सिस्टम के अन्तर्गत जितने भी विभाग है उसकी एक सर्वभौम भाषा है- चाहिए।..अब आँख फाडकर हम भी देखते हैं कि चाहिए में और क्या-क्या बयान दिए जाएंगे।

  • विनीत कुमार said:

    होता तो पांच मुंह है लेकिन एक घटाकर इसलिए कि जो भी इस विभाग में आता है वो एक मुंह को रिप्लेस करके अपना लगा लेता है।..

  • rahul srivastava said:

    hi ,
    i think veer shangvi is a very arrogant man , and without any knowledge he is writing this crap , i mean he is secular or not ,i don’t care , but i know this certainly that what he thinks or to which he thinks are secular parties they are not , and wow i m very much amused that congress men are not net savvy . that’s a pleasant surprise .buttering of congress will not help for sure .

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