Home » ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, समाचार

तानाशाह कुलपति ने न्‍यायप्रिय प्रोफेसर को निकाल दिया

29 January 2010 46 Comments
Anil Chamadia

वर्धा से जब कुछ छात्रों ने फोन किया कि अनिल चमड़‍िया सर को निकाल दिया गया है, तो वीएन राय की गतिविधियों को लेकर पहले जितना गुस्‍सा था – वो लगभग घृणा में बदल गया। सृजन और लोकतंत्र का नकाब पहन कर कोई आदमी इस हद तक घिनौना हो सकता है कि एक असहमत आदमी को अपने घमंड की बूटों तले कुचल डाले? मुझे किसी ने बताया कि जिस कार्यकारिणी समिति ने अनिल चमड़‍िया को निकालने के फैसले पर मुहर लगायी है, उसमें विष्‍णु नागर और कृष्‍ण कुमार भी थे। विष्‍णु नागर कवि हैं और कृष्‍ण कुमार शिक्षाविद। दोनों को मैं व्‍यक्तिगत रूप से जानता हूं और मेरी जानिब दोनों ही बेहतरीन इंसान हैं और अच्‍छे-जुझारू लोगों का भरपूर साथ देते हैं।

मैंने तुरत नागर जी को फोन किया, तो उन्‍होंने बताया कि नहीं मैं पहले ही कार्यकारिणी से इस्‍तीफा दे चुका हूं – लिहाजा मैं बैठक में नहीं था। (बाद में किस्‍सा पता चला कि कार्यकारिणी समिति में मृणाल पांडे हैं और हिंदुस्‍तान के दिनों में विष्‍णु नागर उनके मातहत हुआ करते थे। उन्‍होंने वीएन राय को कहलवाया कि मैं पसंद नहीं करूंगी कि मेरा मातहत कार्यकारिणी की बैठक में मेरे बराबर बैठे। यह संदेश नागर जी के पास गया, तो उन्‍होंने कार्यकारिणी समिति से अलग होने का फ़ैसला लिया।)

कृष्‍ण कुमार से बात नहीं हुई – लेकिन पता चला कि उन्‍होंने सहमति दी है। गंगा प्रसाद विमल से बात हुई तो उन्‍होंने बताया कि अनिल चमड़‍िया की पात्रता में कमी थी। यह अजीब विडंबना है कि अनिल चमड़‍िया जैसे संघर्ष और न्‍याय के प्रति कमिटेड शिक्षक-पत्रकार को पात्रता के आधार पर बर्खास्‍त करने का फ़ैसला ले लिया गया। वह भी कृष्‍ण कुमार जैसे शिक्षक के रहते हुए, जो पोथी से ज्‍यादा समाज और लेक्‍चर से ज्‍यादा लय और खेत-खलिहान को ज्ञान की राह बताते आये हैं।

मामला दरअसल जातिवाद का है और कुछ नहीं। अभी दो दिनों पहले हिंदुस्‍तान अखबार में छपे आलेख गणतंत्र में छिपे हैं लोकतंत्र के बीज के लेखक विभूति नारायण राय ने मं गां अं हिं विवि वर्धा के अपने अब तक कार्यकाल में जितनी भी नियुक्तियां की हैं, उनमें नब्‍बे फीसदी भूमिहार हैं। इस वक्‍त जब अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने की खबर मिली है, उसी वक्‍त एक खबर यह भी आ रही है कि विभूति नारायण राय कवि आलोकधन्‍वा को विश्‍वविद्यालय का हिस्‍सा बना रहे हैं। यक़ीनन आलोकधन्‍वा एक बड़े और प्रभावशाली और विलक्षण कवि हैं – लेकिन विभूति नारायण राय की तरफ से उनके हिस्‍से का सच ये है कि आलोकधन्‍वा भूमिहार जाति से आते हैं। मुझे लगता है कि अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने का मसला सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि न्‍याय से छेड़खानी का मसला है और इस एक मसले पर हिंदी समाज के सृजनधर्मियों-संस्‍कृतिकर्मियों को अपना प्रतिवाद दर्ज करना चाहिए। विभूति नारायण राय के प्रचारित उज्‍ज्‍वल चेहरे के पीछे छिपे जातिवादी, अन्‍यायी और दंभी आदमखोर को बेपर्दा करना चाहिए।

खैर… इसी मुद्दे पर सवालों की शक्‍ल में कुछ नोट्स पत्रकार दिलीप मंडल ने हमें भेजे हैं : अविनाश

क्या अनिल चमड़िया का टर्मिनेशन अवैध है?

♦ दिलीप मंडल

पत्रकार, शिक्षक और सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ता अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से नियुक्ति रद्द किया जाना कई सवाल खड़े करता है।

सवाल 1 : क्या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 13 जनवरी को हुई एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मीनिट्स (मीटिंग में हुई बातचीत का ब्यौरा) लिये गये थे?

सवाल 2 : क्या मीटिंग का ये ब्यौरा एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को मंजूरी के लिए भेजा गया? नियमों के तहत ये जरूरी है ताकि बैठक में शामिल सदस्यों को इस बात की विधिवत जानकारी मिल सके कि बैठक में क्या फैसले किये गये?

सवाल 3 : क्या एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में शामिल सभी सदस्यों ने मीटिंग का ब्यौरा अपनी मंजूरी या एतराज के साथ वापस कर दिया है?

(नोट – लगभग दो दशक की पत्रकारीय साख को दांव पर रखकर मैं ये कह रहा हूं कि मीटिंग में शामिल सभी सदस्यों ने मिनिट्स पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगायी है। कम से कम 28 जनवरी की रात 9.30 बजे तक की स्थिति तो यही है।)

सवाल 4 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल विश्वविद्यालय से जुड़े फैसले करने वाली, सबसे बड़ी संस्था है। ऐसे में इसकी बैठक में शामिल सदस्यों द्वारा मीटिंग के ब्यौरे को मंजूर किए जाने से पहले क्या अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश विश्वविद्यालय जारी कर सकता है?

सवाल 5 : क्या ये विधि के विपरीत नहीं है? क्या ये एक्जिक्यूटिव कौंसिल को बाइपास करना नहीं है?

सवाल 6 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में मौजूद सदस्यों द्वारा मिनिट्स को मंजूर किए बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या अनिल चमड़िया को निकालने का फैसला कर दिया और उसे तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया?

सवाल 7: क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में किसी तरह की हड़बड़ी में है? अगर हां तो इसकी वजह क्या है?

सवाल 8 : प्रोफेसर चमड़िया की नियुक्ति का मामला जब सेलेक्शन कमेटी के सामने आया था, तो क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को उन मानकों की जानकारी नहीं थी, जिसके आधार पर प्रोफेसर की नियुक्ति होती है? ऐसी हालत में एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सामने क्या वाइस चांसलर ने अपनी गलती स्वीकार की?

सवाल 9 : क्या ऐसी ही और गलतियां भी की गयी हैं? क्या ऐसे सभी मामलों में वही फैसला किया गया जो अनिल चमड़िया के मामले में किया गया?

सवाल 10 : क्या विश्वविद्यालय में उन मानदंडों के आधार पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है, जिस आधार पर अनिल चमड़िया की नियुक्ति हुई है?

नीति और नैतिकता से इतर ये कुछ ऐसे सवाल है, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए, ताकि अकादमिक जगत में शुचिता कायम हो और अकादमिक स्वायत्तता कोरा शब्द बन कर न रह जाए।

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्‍थान, नयी दिल्‍ली में रेगुलर क्‍लासेज़ ले रहे हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

46 Comments »

  • anurag singh said:

    दुर्भाग्यपूर्ण! दिलीप जी आपके सारे सवाल सही हैं। पर इनके जवाब कहाँ हैं? विभूति क्या इतना ताकतवर है?

  • ravish kumar said:

    अविनाश

    नब्बे फीसदी एक जाति के हैं। उनकी सूची प्रकाशित कीजिए। इतनी बड़ी संख्या संयोग नहीं हो सकती। कहीं हम आलोकधन्वा जैसे कवि को जल्दी में जातिवादी न घोषित कर बैठे? वैसे मैं इनके बारे कुछ नहीं जानता।( हिन्दी साहित्य जगत के बारे में घोषित अज्ञानी हूं)अच्छे कवि भी हो सकते हैं लेकिन अगर जाति की पहचान पर जीते हैं तब तो हमारा साहित्य जगत हम पत्रकारों से भी तीन नंबरी है। अशोक वाजपेयी की तरह रोता हुआ कि कोई पूछता नहीं है। उन्हें अपनी कविताओं का इंग्लिश ट्रांसलेशन करा लेना चाहिए। फिर पता लग जाएगा कि जयपुर फेस्टिवल की तरह कितने साहित्य प्रेमी बांबे से आकर उन पर लूझते हैं। आटोग्राफ के लिए। खैर विषयांतर हो गया। ये भी हिन्दी पट्टी से मिली बीमारी है। गड्ढे की बात करते करते तमाम तरह की नदियों पर लेख लिख बैठे।

    बीएचयू में भी कुछ दिन पहले एक वीसी आए तो उन्होंने एक ही जाति के लोगों को चपरासी से लेकर प्रोफेसर तक बना दिया। तब के सांसद राजेश मिश्रा(ब्राह्मण) ने सर्वप्रिय मनमोहन सिंह को शिकायत भी भेजी थी। कुछ नहीं हुआ। तब लगा कि ये एक ब्राह्मण सांसद का ठाकुरों के प्रति स्थानीय प्रतिस्पर्धा का नतीजा भी हो सकता है। बाद में पता चला कि कई विभागों में वीसी की जाति के ही लोग आए। बल्कि सिर्फ उसी जाति के लोग आए। लेकिन बीएचयू के इतने संघर्षशील प्रतिभाशाली लोगों में से किसी एक ने भी सांकेतिक प्रतिवाद नहीं किया।

    वर्धा में जो चल रहा है उसकी जानकारी तो हमें थी ही। अनिल जी के ही चलते। अगर उनकी पात्रता में कमी थी तो वो रखे कैसे गए। ये तो कार्यकारी का बहाना है। एक फर्क बता दूं आपको। जगमोहन राजपूत थे तो एनसीईआरटी के भीतर जाकर कैमरे से शूट करता था और उनके घर के बाहर से पीटूसी करता था। राजपूत ने कभी नहीं कहा कि शिक्षा के भगवाकरण के खिलाफ रोज पीटूसी करने वाले पत्रकार को भगा दो। कृष्ण कुमार जी आ गए। एनसीईआरटी के गेट के बाहर अधचीनी के पास पीटूसी कर रहा था। गार्ड ने मना कर दिया। बोला परमिशन लेकर आइये। वहीं लात पटक कर कार में बैठा और दफ्तर आ गया। लेकिन क्या करें वो अच्छा तो लिखते ही हैं। समझ भी है ही। बिना उनको पढ़े काम भी नहीं चलता। साल में एक बार उनकी किताब को दोबारा ज़रूर पढ़ता हूं। आज तक कृष्ण कुमार जी के बारे में राय नहीं बना सका। सोचा कि इस एक प्रतिबंध के बहाने किसी ऐसे शख्स के बारे में राय बनाने वाला मैं कौन होता हूं जिसने अपने अध्ययन अध्यापन का काम ज़िम्मेदारी से किया। यह भी तो हो सकता है कि गार्ड ने अपनी मर्जी से भगा दिया हो और फिर हर कोई हर पैमाने पर खरा ही क्यों उतरे। किसी को अक्खड़ होने का भी अधिकार होना चाहिए। फिर विषयांतर हो गया।

    दिलीप के सवालों से सहमत हूं। इनका जवाब ढूंढा जाना चाहिए। आरटीआई से पूछा जाना चाहिए। क्या इस फैसले के खिलाफ अदालती लडाई लड़ी जा सकती है? अगर दर्ज कराने से काम चलता है तो अनिल चमड़िया के पक्ष में मेरा प्रतिवाद दर्ज कर लें।

  • दिलीप मंडल said:

    ये अनिल चमड़िया की नौकरी बचाने से कहीं बड़ा मामला है

    कृष्ण कुमार जी पर हमें भरोसा बनाए रखना चाहिए। मानकर चला जा सकता है कि अनिल चमड़िया के मामले की बारीकियां और उनके खिलाफ की गई साजिश की जानकारी उन्हें नहीं होगी। बैंठक के मिनिट्स जब उनके पास एप्रूवल के लिए जाएंगे, तो वो अपना एतराज दर्ज करा सकते हैं। आप में से जो भी कृष्ण कुमार से बात कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करना चाहिए और उनसे न्याय के पक्ष में खड़े होने की अपील करनी चाहिए। ऐसे निर्णायक मौकों पर किए गए आचरण से ही व्यक्ति का मूल्यांकन होता है। मेरी अभी भी उम्मीद है और पिछले 15 वर्षों में मैं जितना कृष्ण कुमार को जान पाया हूं, उसके आधार पर यही कह सकता हूं कि वे न्यायप्रिय लोगों को निराश नहीं करेंगे।

    अदालती लड़ाई लड़ी जा सकती है। लड़ी जानी चाहिए। लेकिन भारत में बड़ी अदालतों से जातिवाद के खिलाफ फैसले आने के उदाहरण मुझे कम ही मिले हैं। मेरी राय है कि ये लड़ाई लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा रखने वालों को ही लड़नी होगी। अगर इस लड़ाई के बहाने एकेडेमिक्स में जातिवाद की कुछ परतें खुल भी जाती हैं, कुछ नकाब उतर जाते हैं, कुछ लोगों को खुद को प्रगतिशील कहने में शर्म आने लगे, कुछ लोगों को लोग प्रगतिशील कहने में शर्म करने लगें, तो ये कम नहीं होगा। भारत को बेहतर देश बनाने के संघर्ष से इसे जोड़कर देखा जा सकता है। आखिर हम एक ऐसा देश ही तो चाहते हैं, जहां आदमी का मूल्यांकन जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, रिश्तों आदि के आधार पर न हो।

    दिलीप

  • एकलव्य said:

    मृणाल पांडे, मनीषा पांडे, अशोक वाजपेई, प्रभाष जोशी, कृष्ण कुमार जैसो को अभी कितना और ‘बेनीफिट आफ डाउट’ दिया जाएगा ? क्या सारा हिंदुस्तान बर्बाद होकर इनकी ‘श्रेष्ठता’ की रक्षा करेगा !?

  • शंबूक said:

    कृष्ण कुमार, गंगा प्रसाद विमल…क्या आप भी प्रभाष जोशी और मृणाल पांडे की गति को प्राप्त हुए। घनघोर और गले तक कीचड़ में धंसे जातिवादी। ऐसे में एक भी मूर्ति अक्षत बचेगी या नहीं, या सभी धूल में गिरे नजर आएंगे। जाति की कसौटी पर सभी अपनी चमक क्यों खो रहे हैं? ये तो आस्था और विश्वास का भयानक संकट काल है।

  • शंबूक said:

    इसी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में एक भूमिहार प्रोफेसर चोरी करके अपने नाम से किताबें छपवाता पकड़ा गया है। उसकी नियुक्ति भी खारिज हो गई होगी। कृष्ण कुमार , गंगा प्रसाद विमल और मृणाल पांडे ने तो उस नियुक्ति का विरोध किया ही होगा। या फिर कृष्ण कुमार गंगा प्रसाद विमल और मृणाल पांडे की किताबों पर भी जांच बिठाई जाए? वैसे मृणाल पांडे की किताबों को छोड़ दीजिए, उनकी किताबें इस लायक नहीं हैं कि उनकी जांच भी की जाए।

  • जय कौशल said:

    वर्षों से भारतीय मीडिया और समाज में अन्याय के खुले विरोधी प्रो. अनिल चमड़िया को वर्धा विश्‍वविद्यालय से निकाले जाने की खबर न केवल दुखद है, इससे अकदमिक हलके में न्याय की पक्षधरता को झटका लगा है। यह सच को पंगु करने का एक और घिनौना प्रयास है…

  • sarita said:

    MAHATMA GANDHI ANTARRASHTREEY HINDI UNIVERSITY, SHRI VN RAI ke baarey meiN Mohallalive mein hi sab kucch ujaagar ho raha hai.
    ye baat newpapers mein ya aur kanhi surkhiyoN mein nahin hai. iska kya kaaran hai?

    maaf keejiyega, aise hi poocch liya hai.

  • दिलीप मंडल said:

    प्रोफेसर योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने राष्ट्रीय मीडिया की सामाजिक बनावट पर सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ डेपलपिंग सोसाइटीज के सहयोग से एक बहुचर्चित शोध किया है। इससे पता चला कि मीडिया में कुछ खास जाति समूहों का और पुरुषों का कितना वर्चस्व है। सरिता जी, आपके सवाल का जवाब उसी शोध में है। भंग कुएं में ही पड़ी है सरिता जी, एक दो गिलास या बाल्टी में घपला नहीं है। ये सवाल भारतीय समाज का है। विभूति नारायण राय तो लक्षण हैं। उन्हें पूरी बीमारी मत मान लीजिए। न बीमारी उनके साथ आई है न उनके साथ जाएगी।

  • nutan said:

    Survey ki baat mai kyoon uljha rahein hai. Sidhe boliye media aur sahitya par Brahaman and company ki hedgemony hai. Mere hisaab se patrakarita mai to Brahman amd company( Kayastha, Rajput) ko chhodkar KOYI HAI HI NAHI. Jihar najar phero koyi, sharma, Pandey, dube, mishra, Jha hi najar aata hai.Isliye to mai kahta hoon pragtisilta ke tane bane mai chhupe brahmanwad ko poori tarah se benakab kiya jaye. Aur yah kam sabse pahle patrakarita se suru kiya jaye. Ek baat aur sirf lakshan par ho halla karne se ya Brahman nam se gali dene se kuchh nahi ho saktabalki us lakshan ke karanon mai jakar brahmanwad ki bimari ko jad mool se khatam karna hoga.

  • algu ram said:

    सवाल 1 : क्या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 13 जनवरी को हुई एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मीनिट्स (मीटिंग में हुई बातचीत का ब्यौरा) लिये गये थे?
    उत्तर – हाँ
    सवाल 2 : क्या मीटिंग का ये ब्यौरा एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को मंजूरी के लिए भेजा गया? नियमों के तहत ये जरूरी है ताकि बैठक में शामिल सदस्यों को इस बात की विधिवत जानकारी मिल सके कि बैठक में क्या फैसले किये गये?
    उत्तर-हाँ
    सवाल 3 : क्या एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में शामिल सभी सदस्यों ने मीटिंग का ब्यौरा अपनी मंजूरी या एतराज के साथ वापस कर दिया है?

    (नोट – लगभग दो दशक की पत्रकारीय साख को दांव पर रखकर मैं ये कह रहा हूं कि मीटिंग में शामिल सभी सदस्यों ने मिनिट्स पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगायी है। कम से कम 28 जनवरी की रात 9.30 बजे तक की स्थिति तो यही है।)
    उत्तर- नहीं . सभी ने बातचीत के बाद सहमती जताई (अब आपकी साख कैसे बचे इसका जुगाड़ खोजिये )
    सवाल 4 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल विश्वविद्यालय से जुड़े फैसले करने वाली, सबसे बड़ी संस्था है। ऐसे में इसकी बैठक में शामिल सदस्यों द्वारा मीटिंग के ब्यौरे को मंजूर किए जाने से पहले क्या अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश विश्वविद्यालय जारी कर सकता है?
    उत्तर- प्रश्न अस्पष्ट है . वैसे जब एक्जिक्यूटिव कौंसिल ने मंजूरी दी तभी आदेश जारी हुआ .
    सवाल 5 : क्या ये विधि के विपरीत नहीं है? क्या ये एक्जिक्यूटिव कौंसिल को बाइपास करना नहीं है?
    उत्तर- नहीं
    सवाल 6 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में मौजूद सदस्यों द्वारा मिनिट्स को मंजूर किए बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या अनिल चमड़िया को निकालने का फैसला कर दिया और उसे तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया?
    उत्तर-प्रश्न अस्पष्ट है
    सवाल 7: क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में किसी तरह की हड़बड़ी में है? अगर हां तो इसकी वजह क्या है?
    उत्तर-प्रश्न अस्पष्ट है-
    सवाल 8 : प्रोफेसर चमड़िया की नियुक्ति का मामला जब सेलेक्शन कमेटी के सामने आया था, तो क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को उन मानकों की जानकारी नहीं थी, जिसके आधार पर प्रोफेसर की नियुक्ति होती है? ऐसी हालत में एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सामने क्या वाइस चांसलर ने अपनी गलती स्वीकार की?
    उत्तर-प्रश्न अस्पष्ट है
    सवाल 9 : क्या ऐसी ही और गलतियां भी की गयी हैं? क्या ऐसे सभी मामलों में वही फैसला किया गया जो अनिल चमड़िया के मामले में किया गया?
    उत्तर-प्रश्न अस्पष्ट है
    सवाल 10 : क्या विश्वविद्यालय में उन मानदंडों के आधार पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है, जिस आधार पर अनिल चमड़िया की नियुक्ति हुई है?

    उत्तर-नहीं

  • algu ram said:

    मेरी सलाह है की अविनाश और दिलीप मंडल दोनों पढ़े तब लिखे . जल्दबाजी में गलती होने की पूरी संभावना रहती है

  • suman said:

    algoo ram jee yani p.r.o. of daroga ji kam-aj-kam apni pahchan ko to saf taur par rakhte ki dig sab ne sab chor hi bhar ke rakhe hai. aur mudde ko bhatkane ke liye sarab peene ko beech me lane wale bhai sab aap anil chamadiya ke sath sarab piye the kya? ya ab v.n. ray pila rahe hai. kyonki katha samay me bahut daroo aayi hai kathakaro ke liye peene pilane ka hi karykram hai.

  • merarajdand said:

    mera rajdand suno-

    1.Jo hua accha hi hua,
    Tum kaya laye the jo tumne kho diya,jo kal tera tha wo aaj kisi aur ka hai,to tum bina kisi karan ke shok karte ho,

    2.karam pradhan vishwa kari rakha,Jo jas karai so tash phalu chakha

    3.jaisi karni waisi bharni

    4.parhit saris dharma nahi bhai pad pira sam nahi adhmai.

    5.Sakal padarath hai jag mahi karam hin nar pawat nahi.

  • mahesh said:

    ye vibhoti narayan rai ke pale hue gunde hai jo is tarah se bol rahe hai aur ramayan banch rahe hai. dilip mandal aur avinash ko parne ki salah dene se pahle yah salah vibhoti narayan ko de do jo ab tak kisi aur se hi likhwate rahe hai. pata nahi hai to pata kar lo.

  • DEEPMALA said:

    It is really unfortunate decision of the vice chancellar of Mahatma Ganghi University regarding Anil Ji. It is difficult to belive that he is not eligible for the post of proffesor. After six month of his appointment, mr chancellar got the wisdom regarding his ability.It is not only the matter of caste discrimination, it also highlight the worse of our academic prejudiced mind set. If some how Anil did not fullfill technical grounds but we can not deny his capability as a eminant scholar.It is a matter of shame for Mr. Chancellar that he is not aware of basic foundamentel of appointment. It is a time to stand in solidarity with Anil ji.

  • uday said:

    avinash ji shayad aap education ki bat kar rahen hain chhatron ki pukar aap bahut jaldi sun lete hain chamaria sir ne to kahin aapako phon nahi kiya tha waise main aapako ek raj ki bat bata doon …..bechare chamaria ji to char panch mahine pahale se hee black listed the karan janana chahenge ?……. khair chodiye aap unse hi pooch lijiyega doosari bat kya bharatiya patrakarita ke din lad gaye………shiksha ke star me girawat ki duhai dene wala media ki najar mein chamaria jase popular teacher ki kami hai kyon ki unke jaise log hi patrkarita men lambandi gootbaji ki path padate hain ………….ab kya hoga mgahv ke chhatron ka………….main to kahata hoon ki avinash ji aap mgahv mein professor bankar aa jaeye…………kyonki aapake aajane se chamqariya ji ki kami nahin khalegi ………………….waise bhi professor banane ke liye kisi yogyata ya degree ki jaroorat nahi hoti…….aisa aap to manate hi hain …….kyonki pothi pad pad jag muaa pandit bhaya na koi…………

  • uday said:

    sunate hain chamaria ji aapako hata diya gaya hai ……..aab aap nyyalay ke sharan mein ja raje hain…. waha bhi to aapase aapaki yogyata poochhi jayegi .khair waha bhi sabse pahle koi solid jugar laga lijiyega.kyonki aap to jugar patrakarita ke doctrate hain.

  • uday said:

    avinas ji aap ko mghav me professor banaya ja raha hai.khabar pakki hai kya ……….chamariya ji se salah jaroor le lena………..ok

  • विनीत कुमार said:

    आपलोगों में से सबों से अपील है कि आप अल्गू राम को कुछ भी न कहें। फेके गए टुकड़े खाकर इंसान ज्यादा वफादार होता है,परोसी गयी थाली के मुकाबले। अल्गू राम ने अपने चरित्र के हिसाब से सही काम किया है। इसलिए इस पर बहस केन्द्रित करके टाइम खोटा न करें। वैसे चार महीने से इलाहाबाद में विभूति नारायण राय का हड़काये जानेवाला वक्तव्य अभी भी भूल नहीं पा रहा हूं।..

  • manish said:

    vineeet tumhari bhasa bhi dalali ki hai.

  • manish said:

    vineet tum samay kharab karne ki baat mat karo. Aakhir tum kaun mahakavya rach rahe ho. ulool julool likhkar apne aapko lekhak manne ki bhool mat karo.

  • Tulsi Pandit said:

    Bhai
    Avinash Bhai Khari Khari Ke liye badhai.

    Bhai ap chahein to ise focused Hindi mein chhapein

    Sambodhit Hai ALgu Ram Ko- Ye Algu Ram Baccha Babu, Hai Bhumihar, Ya Umesh Singh Hai, Brahman Ya, Ya Amit Biswas, declaring OBC, Waise Ye Kripa Chowbey Bhi Hos Sakte Hain, Mahir Hain Bhai.

    Kul Milakar Kisi Mudde JKo Pitne Ke lIye Yadi Usi Community se rahana Jaroori Hai to Lijiyae Maine Bhi Apna Nam Diya Tulsi Pandit– Sabhin Sahay Ram Gusain.

    Ab Baat Algu Ram se Yani Bachcha Babu Se jise kucch malai milni hai, ya umesh singh se, jo rahega ant mein than than gopala. Amit biswas se, wo to kat raha gopinathan jee kke samay se hi aur Mauritus Jayega, Waise Yadi Ap bhi Bhari Bharkam Rakhtae Hian to kai malia tel uske pas hai. Krip Chowbey- Inse bachaye Ram Gusain, Ye B.N.Rai ke asli Mukhbir hai, waise Pratibadhta ke himayti bhi.

    TO
    Algu Ram je Arthat Char mein se koi ya koi aur Mukhbir ya chamcha Kya apko pata nahin ki Ilina sen ki niyukti bhi avaidh ahi, aur Chamadiya ji ki tulna mein Gair jaroori.
    Apko Pata Hona Chahiye ki Kripa chowbey bhi direc reader ho gaye hain, professor to direct banaye bhi jate hai, eminent ke adhar par reader nahi. Inko EC ne nirasat kyon nahin kiya.
    Bhai Algu ram aplka chor guru jiske liye patrakaron se aap lathaiti karte ho uska kya , sunte hai wo uniswan kitab likh raha hai. Waise to wo bhi nahin bachne wala, Rai kab tak bachayeinge, koi illahabad ka judge bhi nahin bachayega.

    Aur Atam Prakash Shrivastav, Rakesh Srivastav, jo rakesh nam ka chhadam banakar Rajniti Karta hai, ke bachaye se kab tak bachega.
    TO
    Algu Ram jee
    Apko shubhkamnayien ki apka tel ka katori Bhara Rahe

  • दिलीप मंडल said:

    अलगू राम,

    एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों द्वारा मिनिट्स (मीटिंग का ब्यौरा) एप्रूव किए बगैर किसी विश्वविद्यालय में फैसलों की घोषणा नहीं होती। ये प्रक्रिया कैसे तोड़ी जा सकती है? फिर एक्जिक्यूटिव कौंसिल बनाई ही क्यों जाती है। एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मिनिट्स क्यों लिए जातें हैं? उन्हें एप्रूवल के लिए भेजा क्यों जाता है? आप अगर बेहद अज्ञानी नहीं हैं तो ये आप जानते ही होंगे। या फिर आप बेहद ज्ञानी हैं और भ्रम फैलाना चाहते हैं।

    ये बताएं कि कल को अगर एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों ने मिनिट्स एप्रूव नहीं किए तो क्या होगा। अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश क्या ऐसी स्थिति में रद्द नहीं हो जाएगा? विश्वविद्यालय प्रशासन को ये भरोसा कैसे है कि ईसी के सदस्य मिनिट्स एप्रूव कर ही देंगे?

    क्या विश्वविद्यालय प्रशासन में दो-चार दिन तक रुकने का भी धैर्य नहीं है? कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई है? हालांकि आप इन सवालों का जवाब देने के लिए प्राधिकृत हैं या नहीं, ये समझना मुश्किल है। इसलिए आपकी बातों को कितनी गंभीरता से लिया जाए, ये कहा नहीं जा सकता।

  • manish said:

    mandal apki baton ko bhi koyi gambhirta se nahi le raha hai. apne muh miya mithoon bante raho. Tumko kisne adhikrit kiya hai sawal karne ke liye batao to. Aakhir tum kya doge patrakarita ki duhayi.

  • dilip said:

    दरअसल विभूति नारायण राय की पूरी कार्य-प्रणाली ही जिद्दी कुतर्क करके अपनी बातों को मनवाने वाली है. शुरुआत में अपने भाषणों में वे लोकतांत्रिक वातावरण बनाने की ख़ूब घोषणा करते थे . अब भी करते है. लेकिन लोकतंत्र के मायने उनको पता ही नहीं हैं, बनाएंगे कैसे? लोकतंत्र की उनकी अपनी परिभाषा है जिसमें वे अपने सुविधानुसार जहाँ मन करे लोकहित और जहाँ मन करे बहुमत और जहाँ मन करे नियम की बात करते हैं . इन सारे शब्दों में उनके द्वारा भरे हुए अर्थ है जो हमारी समझ से परे है.
    उनकी लाबिइंग करने की कला बेमिसाल है, इसमें कोई शक नहीं हो सकता. देखिए कि एक तरफ़ जब देश में उनकी किरकिरी हो रही है तो उन्होंने ठीक उसी समय देश के कुछ जाने माने हिंदी साहित्यकारों को यहाँ बुला लिया है. वे जानते है कि उनकी साख का एक मात्र माध्यम अपने पावर का इस्तेमाल के जरिए कुछ आयोजन तक सीमित है . वे अपने पावर का इस्तेमाल करना बखूबी जानते है. वे कर रहे हैं. वर्धा में उनके आने के बाद से एक पर एक मूर्खतापूर्ण फ़ैसले लिए गए है जिसमें पुलिसिया जिद्द साफ़ साफ़ दिखती है. उनको कवर करने के लिए उनके कुछ मातहत हमेशा यहाँ तैयार मिलेंगे जिनसे आप पूछेंगे तो पता चलेगा कि विभूति कोई दिव्य पुरूष है. मेरी राय जानेंगे तो वे परले दर्जे के आत्ममुग्ध और मूर्ख इंसान है. वे अभी से घोषणा कर रहे है कि विद्यार्थियों को इन मामलों में ज़्यादा सर नहीं खपाना चाहिए और वे अनिल चमड़िया की जगह कोई ’बढ़िया’ प्रोफ़ेसर लाएंगे. शायद उनके मन में कोई नाम पहले से चल रहा हो और ये सारा ड्रामा उस भाई साहब को ही यहाँ लाने के लिए किया गया हो!!! जिस डिपार्टमेंट में यह सब कहानी चल रही है उसमें ’चोर गुरू’ को अपने छत्र-छाया में विभूति बरदहस्त दिए हुए हैं. ज़रा विभूति नए शिक्षक का नाम भी घोषित कर दे तो हमें नाम जानकर थोड़ी राहत मिलेगी कि हमारे भविष्य को सँवारने के लिए किसे चुना गया है. अनिल चमड़िया का विकल्प ढूँढ लो बहुत मेहनत का काम है. हिंदी में लगभग असंभव सा. और आपका विश्वविद्यालय हिंदी में ही है.

  • aam admi said:

    सामंती चरित्र और प्रतिक्रियावादी मानसिकता में पगा आदमी अपने हितों को साधने के लिए सबसे पहले प्रगतिशीलता का ही लबादा ओढ़ता है. विभिन्न स्रोतों से वर्धा से आ रही ख़बरों से यह साबित होता है कि महात्मा गाँधी के नाम पर बने विश्वविद्यालय को सामंती चरित्र और प्रतिक्रियावादी मानसिकता में पगे लेकिन प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़े एक कुलपति ने अपनी निजी मिल्कियत मान लिया है. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी व्यवस्था/ निकाय / संस्थान का नेतृत्व किसी ‘रंगे सियार’ के हांथो में आया है, उसका बंटाधार ही हुआ है.

  • premranjan said:

    दिलीप जी के सवालों का जवाब अलगू राम ने दिया है।

    कायदे इन सवालों का जवाब तो सिर्फ विभूति नारायण राय और एक्जीक्यूटिव काउंसिल के लोगों को ही पता रहना चाहिए।

    सवाल है कि अलगू राम को ये जवाब कहां से मिले?

    कहीं ऐसा तो नहीं कि लोमड़ी ने गीदड़ का बाना ओढ़ लिया है।

    और ऐसा लगता है कि गीदड़ ने अब शायद शहर की ओर दौड़ लगा दिया है।

    बंधुओं, समझ रहे हैं न,

    गीदड़ कब शहर की ओर भागता है…

  • बात बोलेगी said:

    विभूति नारायण राय का खेल अब खत्म हो गया। नौकरी में वो बने रह सकते हैं लेकिन सेकुलर साहित्याकार और जनपक्षी छवि अब वो कहां से लाएंगे। अब कोई जनपक्षी व्यक्ति उनके साथ बैठने को तैयार नहीं होगा।

    विभूति भाई का देहावसान दुखद है। हम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी वाले इस शोक में हिंदी समाज के साथ शामिल हैं।

  • premranjan said:

    किसी की रचनाओं के आधार पर उसे अंतिम तौर पर महान घोषित करने का यही दुखद परिणाम होता है। विभूति नारायण राय ऐसा अकेला शख्स नहीं है।

    अपने आसपास देखिए, बहुत सारे साहित्यिक एक्टीविस्ट का चोला ओढ़े तथाकथित कवि-साहित्यकार लोग ‘लिख देंगे’ की धमकी देते हुए कितना पाखंडपूर्ण जीवन जीते हैं। अपने असली चरित्र पर सवाल उठाने वालों की अस्मिता पर हमला करते हैं और अश्लील जातिवादी टिप्पणियां करके अपमानित करते रहते हैं।

    विभूतिनारायण राय उसी गिरोह का नेता है, जो दिखावे के लिए लिखे एक उपन्यास की कमाई खा रहा है कि वह सांप्रदायिकता विरोधी है। लेकिन उसका असली चरित्र क्या है, यह अब साफ देखा जा सकता है।

  • संवेदना said:

    अविनाश जी, आपका ब्‍लॉग सराहनीय है. यह ऐसा मंच है जिसमें हम अपनी बात कह सकते हैं, अपना प्रतिरोध दर्ज कर सकते हैं. लेकिन एक समस्‍या है. आप कमेंट/टिप्‍पणियों स्‍वयं अप्रूव कर प्रकाशित करिए वरना विभूति के चमचे टिप्‍पणी लिख-लिखकर लोगों का ध्‍यान भटका देंगे और प्रतिरोध का स्‍वर कमजोर पड जाएगा. अन्‍याय और झूठ के खिलाफ हमारी लडाई जिंदाबाद.

  • शशिभूषण said:

    अनिल चमड़िया जी का निलंबन दुखद है.प्रक्रिया की क्या कहें ताक़तवर के लिए कुछ भी सिद्ध करना असंभव नहीं.

  • बात बोलेगी said:

    वी एन राय ताकतवर? जी नहीं,उसका रेत का बना महल मिट्टी में मिल रहा है। जरा गौर से देखिए। उसकी साख इतनी कम कभी नहीं हुई थी। अब वो शख्स खत्म हो चुका है।

  • tota ram said:

    bandhuwo
    bada maza aa raha hin esh wiwad me.
    anil aur ray done dhule nahi hain.

    jara pata to karo ki yaha chaube ji kisaki shipharish par aa gye. gahara raj hain.

  • जगदीश्वर चतुर्वेदी said:

    यह शिक्षा में मौजूद सडांध और मठाधीश संस्कृति का परिणाम है। यह जाति के साथ प्रोफेशनल योग्यता का भी अपमान है। घिन आती है ऐसी हिन्दी और उसके रखवालों पर। महात्मा गांधी वि.वि. की नाभि में शैतान बैठे हैं। हिन्दी के नामपर महाभ्रष्टाचार का प्रतीक है यह विश्वविद्यालय। हिन्दी कॉकस चला रहा है इसे। यही कॉकस अन्य संस्थानों और अन्य विश्वविद्यालयों में भी सक्रिय है। आपने प्रतिवाद करके सही किया है।

  • Prof Pyarelal said:

    यह तो खूब रही. बात के केन्द्र में यह होना चाहिए कि उन्हें निकाले जाने की वजह क्या हैं न कि वे किस जाति के थे. अगर उपकुलपति ऐसे ही थे तो उन्हें लिया कैसे गया था. और फिर लिस्ट तैयार कीजिए कैसे 90 प्रतिशत भूमिहार हैं वहां. आलोक धन्वा को अगर उस विश्वविद्यालय में लिया जा रहा है तो इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती. इस विषय पर तरीके से बात हो सकती है. मृणाल पाण्डेय ने ऐसा कहा है क्या कि वे अपने मातहत के साथ नहीं बैठेंगे? मुझे संदेह है.

  • bikas said:

    me bhi vibhuti narayan rai ko shradhanjali arpit karata hoon, ek sharir ke sath hi vo ab jinda hai, jiska koi matlab nahi.

    Anil ji ke sath hua vo dukhad hi nahi balki samast nyaypriy logo ke muh par din ke ujale me mara gaya thhappad hai, or iski gunj V.N. Rai ko jindagi bhar sunaee degi. Mr. Rai apni ulti ginati shuru kar do!!!!

  • बात बोलेगी said:

    ये फिल्म नही है गुरु। यहां रैंचो यानी फुनसुक वांगडू को मरना पड़ेगा। चोर गुरु जिंदाबाद। चोर गुरुओं के सरदार दारोगा जिंदाबाद। सवर्णवाद जिंदाबाद। द एंड। बच्चों ताली बजाओ। जय हिंद जय भारत। भारत माता की जय। महात्मा गांधी अमर अमर रहे।

  • अभिषेक यादव said:

    अलगू राम जी, नाम से तो आप दलित लगते है लेकिन लेखन से भूमिहार। आपकी सफाई पढ़ी। लेकिन जिस सवाल का आप जवाब नहीं दे पाए वे सारे सवाल अस्पष्ट कैसे हो गए। आप ये न भूलें कि अनिल भाई के मामले में जो कुछ हुआ वो भारत में यूनिवर्सिटी में चल रहे आंधा युग का प्रमाण है। अगर अनिल चमड़िया पत्रकारिता नहीं पढ़ा सकते तो उनसे योग्य और कितने लोग इस कामकाज में हैं। अनिल चमड़िया ने संसदीय रिपोर्टिंग करते हुए संसद के कामकाज पर तीखी टिप्पणी करते हुए किताब तक लिखी थी, जब ऐसी आलोचनात्मक किताबें लिखने का चलन तक नहीं था। दिल्ली आने से पहले बिहार में भी उनकी धारदार पत्रकारिता काफी चर्चा में रही। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को वे इस काम के सारे पक्ष बताने में सबसे सक्षम लोगों में हैं। उनके कम से कंम हजार लेख तो देश के बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में छपे होंगे। कौन सी प्रतिष्ठित पत्रिका है अनिल चमड़िया को ससम्मान नहीं छापती है। महात्मागांधी अतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के तमाम लोगों ने जितना लिखा होगा उसके बराबर तो अनिल जी ने अकेले लिखा है। प्रोफेसर बनने के लिए अगर अनिल चमड़िया सही पात्र नहीं है तब तो चोर गुरु और भूमिहार शिरोमणि अनिल राय अंकित से ही देश की पत्रकारिता शिक्षा गौरवान्वित होगी। जिन लोगों को पत्रकारिता नहीं आती वो पत्रकारिता पढ़ाएंगे। अखबार का एक पन्ना या टीवी का एक कार्यक्रम बनाने की तमीज नहीं, उनका विश्लेषण करने की क्षमता नहीं और छात्रों को पत्रकारिता सिखाएंगे। घर से पत्रकारिता का इतिहास या नैतिकता के सिद्धांत किसी किताब से रटकर आएंगे और क्लास में उगल देंगे। इस तरह पढ़ाई जाएगी पत्रकारिता? अनिल चमड़िया जी चाहें को अनिल राय अंकित को साल में हर दिन पत्रकारिता के पाठ पढ़ा सकते हैं। अनिल जी जातिवाद के उस खांचे में फिट नहीं बैठते, जहां वे एकेडेमिक्स के जंजाल में कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ सकें।

    सारे जातिवादी भूमिहार और ब्राह्मण पिनपिनाए हुए हैं कि कोई और कैसे इनके डोमेन में घुस गया। भूमिहार शिरोमणि अंकित को चैलेंज है कि जेएनयू में किसी भी विषय पर एक क्लास को फेस कर लें, अगर रोते हुए क्लास से बाहर न निकलें तो देखिएगा। अनिल चमड़िया और दिलीप मंडल जैसे लोग वहां भाषण देते हैं और जेएनयू की फेकल्टी से लेकर डॉक्टरल पोस्ट डॉक्टरल के छात्र सुनते हैं। समझ गए अलगू राम उर्फ फर्जी दलित महोदय। इसलिए वीसी की आवाज बनने से पहले थोड़ा पढ़ समझ लीजिए। किसी से पूछ लीजिए। अनिल चमड़िया पर सवाल उठाने और दिलीप मंडल की बातों को काटने वाले आप कौन हैं आपने क्या लिखा पढ़ा है। इन्होंने जितना लिखा-पढ़ा काम किया है उसका शतांश भी आने किया हो तो बताइए। हमारे जिले में कहते हैं न कि गलथेथरई मत कीजिए।

  • Arun Oraon said:

    जहां तक अनिल चमड़िया सर का सबाल है कि सर को पढ़ाने नहीं आता, वहीं दूसरी और यह सबाल भी उठता है कि पढ़ना किसे कहेगें। चतुर जैसा स्टूडेंट रट्टा मार ले लेकिन दूसरा दरजा पाने के बाद भी काॅलेज की दीवार में अपना सर फोड़ ले, सच तो यह है कि राय जी पुलिस को बहाल करने से लेकर धूसखोर बनाने का हथकंडा अपना रहें है उसमें अनिल चमड़िया बहुत बड़ी दीवार हैं जिसको हटाना उचित समझा…इसलिए चमड़िया सर को पढ़ाना नहीं आता ।
    लेकिन जहां विश्वविद्यालय में छात्र को पढ़ाना हो और पत्रकार बनाना हो तो पुलिस व्यवस्था का एक भी नियम फीट नहीं बैठता है। विश्वविद्यालय को सूचारू रूप से चलने के लिए जिस तरह के लोग चाहिए थे उसमें अनिल अंकित राय ही सही है। क्योंकि इस विश्वविद्यालय में पत्रकारिता ने नाम पर ठगा जाता है वहां के छात्र की मानें तो वहां पत्रकारिता विभाग में न ही दैनिक समाचारपत्र आते हंै न ही पत्रकारिता से संबंधित कोई उपयोगी समाग्री । पत्रकारिता से संबंधित पठन-पाठन की सामाग्री की मांग को जब अनिल सर ने रखा तो कुलपति को यह बात बहुत बूरा लगा, क्योंकि हमारे यहां तो लोकतंत्र में राजतंत्र है। कुलपति राय सहाब ने इस आड़ में यह कहना उचित समझा कि अनिल चमड़िया को पढ़ाने नहीं आता, क्योंकि कुलपति पुलिस की नौकरी से आये है राहित्य और कहानियों में रूचि रखते है किताबों को अपने घर के अंदर जंजीर में बांधना ही उचित समझते है।क्योंकि हर शासक का यही विचार होता है कि जनता जाग गई तो कोई उसे डरेगा नहीं । इसी व्यवस्था के खिलाफ अनिल चमड़िया ने अवाज उठायी तो कुलपित वी. एन.राय को नागवार लगा।

  • राजीव रंजन श्रीवास्‍तव said:

    अनिल जी जैसे लोगों को पचा पाना कम से कम ‘पुलिसिया अचार-विचार’ वाले लोगों की पाचन शक्ति के बूते की बात नहीं है। अनिल जी के पक्ष में मै भी अपना प्रतिवाद दर्ज कराता हूं। वैसे मैं भी हिंदी पट्टी का हूं, रवीश कुमार जी की तरह। और, मुझमें भी मुल मुददे से हटकर साइड वाले मुद्दे पर बात करने की बीमारी है। रवीश जी के NCERT वाले किस्‍से पर एक बात कहना चाहता हूं। अगर कृष्‍ण कुमार की जगह ‘भगवावादी’ जे एस राजपूत उन्‍हें परिसर के बाहर PTC करने से मना करते, तो क्‍या रवीश जी राजपूत को भी कृष्‍ण कुमार की तरह संदेह का लाभ देते?

  • naam me kya rkha hai? said:

    अभिषेक यादव जी पहले चमड़िया जी खुद एम.ए. कर लें ( जो प्रो. बनने के लिए प्रारम्भिक योग्यता है और इस ‘प्रारम्भिक योग्यता’ का दर्द चमड़िया जी से बेहतर और कौन जान सकता है यही नहीं होने के कारण तो उन्हें विश्वविद्यालय से निकाला गया है) फिर किसी को पढाने का सोचें.

  • Ramesh Parashar said:

    दिलीप मंडल तो अब तुम अभिषेक यादव भी बन गए.अपने मुंह मियां मिठ्ठू क्यों बन रहे हो? मैं भी IIMC का student रहा हुँ और तुम या अनिल चमड़िया क्या पढा सकते हो उस खोखलेपन की जानकारी मुझे भी है.चमड़िया जी यहां भी पढाने का जुगाड़ लौबिंग करके ही लगए थे . अच्छा है उस विश्वविद्यालय ने जल्दी पिछा छुड़ा लिया.

  • Mohalla Live » Blog Archive » जब सवाल जाति का हो तो सेकुलर(?)-संघी भाई-भाई said:

    [...] 1 February 2010 No Comment जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग [...]

  • विनोद कुमार मिश्र said:

    चमड़िया जी का निष्कासन विभूति राय जैसे पुलिसिया दिमाग वाले लाठीबाज़ का कुकृत्य उजागर करता है। संस्था के शीर्ष पर बैठकर विभूतिराय ने अपने ऐतिहासिक जातिगत दोगलेपन का सबूत दिया है। गांधी के नाम पर स्थापित हिन्दी की सबसे बड़ी संस्था पर बैठे गिद्ध प्रजाति के आखिरी उत्तराधिकारी के अंत का समय निर्धारित होना चाहिए। इन्हें पुलिस का डंडा देकर किसी नाके पर ट्रकवालों से ह्फ़्ता वसूलने की जिम्मेदारी दे देनी चाहिए।

  • विनोद कुमार मिश्र, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला said:

    चमड़िया जी का निष्कासन विभूति राय जैसे पुलिसिया दिमाग वाले लाठीबाज़ का कुकृत्य उजागर करता है। संस्था के शीर्ष पर बैठकर विभूतिराय ने अपने ऐतिहासिक जातिगत दोगलेपन का सबूत दिया है। गांधी के नाम पर स्थापित हिन्दी की सबसे बड़ी संस्था पर बैठे गिद्ध प्रजाति के आखिरी उत्तराधिकारी के अंत का समय निर्धारित होना चाहिए। इन्हें पुलिस का डंडा देकर किसी नाके पर ट्रकवालों से ह्फ़्ता वसूलने की जिम्मेदारी दे देनी चाहिए।

Leave your response!

Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)

Add your comment below, or trackback from your own site. You can also subscribe to these comments via RSS.

Be nice. Keep it clean. Stay on topic. No spam.

You can use these tags:
<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

This is a Gravatar-enabled weblog. To get your own globally-recognized-avatar, please register at Gravatar.

Spam Protection by WP-SpamFree