“प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”
आपातकाल के दौर में प्रभाष जोशी के किए काम को दुनिया याद रखेगी। उस आंदोलन के खिलाफ एक्सप्रेस समूह का बड़ा रोल था और निस्संदेह उसमें प्रभाष जोशी का बड़ा योगदान था। ये विचार कुलदीप नैयर के हैं। कुलदीप नैयर गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी की स्मृति में संपादित एक किताब के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की जो मिसाल कायम की, वो अपने आप में नायाब है। उन्होंने ये मानने से इनकार कर दिया कि एक समुदाय विशेष को आतंकवादी कहा जाए। कुलदीप नैय्यर ने कहा कि प्रभाषजी जैसे घनघोर पढऩेवाले पत्रकार बिरले ही होते हैं, उनका अध्ययन संसार विशाल था। अपने आपको जिंदगी की आखिरी बेला में खड़ा बताते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पीढ़ी खास कुछ नहीं कर पायी। ये नयी पीढ़ी का कर्तव्य है कि वो प्रभाषजी के जलाये अलख को कायम रखे और समाज में भाईचारा बनाने की दिशा में काम करे।
साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने प्रभाषजी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी उन गिने चुने पत्रकारों में थे, जिनकी आवाज साहित्यिक जगत तक में साफ सुनी जाती थी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की तुलना करते हुए कहा कि ये वे लोग थे, जिन्होंने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी वालों को उनका उचित सम्मान दिलाने में पूरी कोशिश की। उन्होंने ये भी कहा कि प्रभाषजी जैसा पत्रकार पैदा नहीं हुआ, जो हिंदीभाषी पूरे समाज का प्रवक्ता बन गया हो। वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी संभवत: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।
टीवी पत्रकार पुण्यप्रसून वाजपेयी ने प्रभाष जोशी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी अपनी मृत्यु से पहले भी पत्रकारीय नैतिकता को स्थापित करने के जिहाद में लगे रहे। उन्होंने उनके द्वारा पैकेज पत्रकारिता के खिलाफ उठायी गयी आवाज को याद किया और पत्रकारिता की अर्थव्यवस्था पर भी चर्चा की।
समारोह में प्रभाष जोशी के बेटे सोपान जोशी ने भी अपने पिता को याद करते हुए विचार रखा। संदीप ने कहा कि उनके पिता पत्रकारिता करने तो निकले ही नहीं थे, वे तो लोकसेवा करने निकले थे। फिर पता नहीं कैसे उन्होंने लोकसेवा करते हुए इस पेशे में 52 बरस काट दिये, पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा कि पत्रकारों का अपना अलग-अलग नेटवर्क होता है, किसी का राजनीतिक, किसी का आर्थिक। जबकि प्रभाष जोशी का नेटवर्क लोक नेटवर्क था, जिसने उन्हें प्रभाष जोशी बनाया।
वरिष्ठ पर्यावरणविद और गांधीमार्ग के संपादक अनुपम मिश्र ने प्रभाष जोशी को याद करते हुए कहा कि हमें प्रभाष जोशी द्वारा शुरू किये गये कामों को याद करने तक ही नहीं रुकना चाहिए, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम प्रण करें कि हम दिन में कुछ अच्छा काम जरूर करेंगे और एक वाक्य ही सही, अच्छा जरूर लिखेंगे।
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि प्रभाष जोशी ने जो पत्रकारीय स्वतंत्रता की मिसाल जनसत्ता में कायम की, उसे वे भरसक आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रभाषजी जैसा निर्भीक पत्रकार बहुत कम पैदा होता है।
गुरुवार शाम पांच बजे गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुए लोकार्पण समारोह में पुष्पराज और मंगलेश डबराल ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन किया रवींद्र त्रिपाठी ने। लोकार्पित किताब का संपादन मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी और स्मित पराग ने।
♦ मोहल्ला लाइव संवाददाता









इस रिपोर्ट में आए सारे नाम : प्रभाष जोशी, कुलदीप नैयर, अशोक वाजपेयी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अनुपम मिश्र, ओम थानवी, रेखा अवस्थी, रवींद्र त्रिपाठी, मंगलेश डबराल, पुष्पराज, सोपान जोशी, संदीप जोशी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, स्मित पराग…। हमें कुछ नहीं कहना है।
जातिवाद के खिलाफ हमारी लडाई जिंदाबाद.
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