पुरुष पंडितों ने सभा की, पंडित प्रभाष जोशी को याद किया
♦ समरेंद्र
दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी पर लिखी गयी पुस्तक का लोकार्पण हुआ (लोकार्पण समारोह की रपट के लिए यहां क्लिक करें : “प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”)। इसे आप महज संयोग कहेंगे या क्या कहेंगे कि उस लोकार्पण में जितने लोगों ने प्रभाष जोशी के बारे में अपनी राय रखी, उनमें से एक को छोड़ कर कोई भी गैर ब्राह्मण नहीं था। जो अकेला शख्स गैरब्राह्मण था, वो भी एक ऐसी जाति से ताल्लुक रखता था जो खुद को ब्राह्मण होने का दावा करती रही है। यहां तक कि हद से अनहद गये का प्रकाशक भी ब्राह्मण ही है। इसे भी आप महज संयोग कहेंगे या फिर क्या कहेंगे कि मंच पर आकर प्रभाष जोशी को महान बताने वालों में एक भी महिला नहीं थी।
यहां बहुत से लोग कह सकते हैं कि यह अनजाने में हुआ होगा। लेकिन यही तो जातिवादी व्यवस्था की खूबी है कि हम इसकी जकड़न में ग़लतियां और अपराध – दोनों करते हैं मगर उसका एहसास नहीं होता। मंच से नीचे श्रोताओं में राजेंद्र यादव समेत पिछड़ी जाति के ढेरों ऐसे विद्वान मौजूद थे, जो प्रभाष जोशी पर अपनी राय रख सकते थे। दलित विद्वान भी इसमें शिरकत करने के लिए पहुंचे थे। लेकिन मेरे जैसे कई श्रोता मंच का संचालन कर रहे रवींद्र त्रिपाठी के मुख से उन नामों को सुनने के लिए तरसते रहे और आखिर तक तरसते रह गये।
प्रभाष जोशी से कई मुद्दों पर गहरी असहमति रही है। “हिंदू होने का धर्म” से लेकर “लुटियंस के टीले” तक उनकी कई पुस्तकें पढ़ चुका हूं। उन घटनाओं के बारे में भी, जो मेरे होश संभालने से पहले हुईं। उनके लेखों को पढ़ने के बाद मैं यह कहने में ज़रा भी नहीं हिचकता कि वो सामंती व्यक्ति थे और अपनी आस्थाओं में इस हद तक जकड़े थे कि जाने-अनजाने सामंती व्यवस्था को खाद-पानी मुहैया कराते रहे। लेकिन इस एक बहुत बड़े पहलू को छोड़ दिया जाए तो प्रभाष जोशी में ढेरों खूबियां थीं और मेरे जैसे बहुत से लोग उन्हें उनकी खूबियों की वजह से चाहते और मानते थे।
गुरुवार को भी बड़े-बड़े दिग्गजों ने प्रभाष जोशी की खूबियों पर जमकर चर्चा की। उनका यशोगान किया। लेकिन किसी ने उस द्वंद्व की चर्चा नहीं की जिससे प्रभाष जोशी हमेशा जूझते रहे। यहां बहुत से लोग कहेंगे कि मृत्यु के बाद किसी की कमियों पर बात करने की हमारे यहां परंपरा नहीं है। ऐसा करना ग़लत होता है। लेकिन ऐसा कहने वालों को हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रमोद महाजन के निधन पर प्रभाष जोशी ने क्या लिखा था? प्रमोद महाजन ही क्यों … नरसिम्ह राव के निधन पर प्रभाष जोशी के शब्द भी याद कीजिए? क्या लगता है कि आप सभी को प्रभाष जोशी ने सिर्फ़ और सिर्फ़ तारीफ़ करना ही सिखाया है?
प्रभाष जोशी बहुत बड़े आलोचक थे। वो सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख़्स की आंख में आंख डाल कर यह कहने की हिम्मत रखते थे कि सुनो पंडित तुम ग़लत कर रहे हो। उन्होंने जन्म और मृत्यु दोनों मौकों पर अपने पत्रकारीय धर्म का निर्वाह किया। फिर हम और आप ऐसा करने से क्यों बचते हैं? क्यों लोकार्पण समारोह में उनका सिर्फ़ और सिर्फ़ गुणगान किया गया और उन कमजोर पहलुओं पर बात नहीं की गयी, जिन्हें प्रभाष जोशी अपने व्यक्तित्व से दूर कर पाते तो उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा लोग स्वीकार कर पाते।
इस समारोह में सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्रणों और वो भी पुरुष ब्राह्मणों का कब्जा नहीं था बल्कि इस गांव में एक भी शख़्स ऐसा नहीं था जो उस लोक का नेतृत्व करता हो… जिसका प्रतिनिधि प्रभाष जोशी को घोषित किया जाता रहा है। आखिर क्यों? क्या गांव-देहात में सक्रिय एक भी ऐसा बंदा नहीं मिला जिसके साथ प्रभाष जोशी उठे-बैठे हों और जिनके संघर्षों में उन्होंने साथ दिया हो? या फिर उन्हें ढूंढने की कोशिश ही नहीं की गयी?
अगर आयोजक कहते हैं कि उन्हें ऐसा ठेठ गंवई और जूझारू बंदा नहीं मिला… तो फिर उनसे गुजारिश है कि प्रभाष जोशी का महिमामंडन करना बंद करें। अगर उन्होंने उस लोक को ढूंढने की कोशिश नहीं कि जिसके प्रतिनिधि प्रभाष जोशी बताये जाते हैं … तो यकीन मानिए उन सबने प्रभाष जोशी का अपमान किया है। और अपने इस गुनाह में ओम थानवी और अनुपम मिश्र जैसे उन तमाम लोगों को भी घसीट लिया है, जिन्हें हम ब्राह्मण होने की वजह से नहीं बल्कि एक बेहतर इंसान और पत्रकार होने की वजह से जानते और मानते हैं।
आखिर में, प्रभाष जोशी का एक प्रशंसक होने के नाते मैं आप सबसे एक गुजारिश करता हूं कि हो सके तो प्रभाष जोशी का महिमामंडन बंद करें। उनके नाम पर पंडितों का सम्मेलन बंद करें। ब्राह्मणवाद को खाद-पानी मुहैया कराना बंद करें। प्रभाष जोशी को पराड़कर और राजेंद्र माथुर से भी अधिक महान साबित करने की कोशिश भी बंद की जाए। प्रभाष जोशी अब इस दुनिया में नहीं हैं। अगर उन्हें ज़िंदा रखना है तो उस लोक की चिंता कीजिए जिसके लिए प्रभाष जोशी की कलम आखिर तक कागद कारे करती रही। आज उनका वह लोक बेहद संकट में है … वो हमारी और आपकी तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहा है। उसे और प्रभाष जोशी को नाउम्मीद मत करें।
(समरेंद्र। सीनियर टीवी जर्नलिस्ट। स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी में लंबे समय तक रहे। इन दिनों साइबर पत्रकारिता में कुछ नये प्रयोगों के साथ जुटे हैं। जनतंत्र डॉट कॉम के संपादक हैं। उनसे indrasamar@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









“प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”
Wah ! InheN pahle se pata hai ki ab aur koi GandhiWadi Pravakta nahiN paida hone wala ya aane wala ! ADBHUT ! Ye hai inka nayi ya yuva peedhee par vishvas ! Dekh lo mere desh ke yuvao ! kaise-kaise jyotishi, pande aur kupmanduk ghuse baithe haiN sahitya aur patrakarita me pragatisheel ban-bankar ! In vaicharik vriddhoO, giddhoN aur mritaatmaon se kab tak aas lagaye baithe rahenge aap ?
Mayavati ki sabha mein kitne brahmano ko bhashan karne diya jaata hai.
Congress kee meeting mein kitne Amar Singh ko bulaya jaata hai ? Ya phir Muslimo kee kaun see baithak mein gair muslimo ko nyota bheja jaata hai ya phir patrakaaro kee kaun see sabha mein hum jaise choote patrakaaro ya gair patrakaaro ko bulaya jaata hai? In sab se upar is sabhee sabhao mein kaya charcha hoti hai iskee bhee chinta kisee ko bhee nahi hai visheshkar Samrendra jee ko to katai bhee nahi hogi…parantu brahmano kee sabha mein kisko shradhanjalee dee ja rahi hai iskee chinta bahut ho rahi hai…
Is desh mein sabhee vaad chal sakte hai aur bahut hee khullam-khulla taur se, parantu aabadee ka kul 6 ya 7 pratishat samudaay yadi kahi baith kar kuchh charcha kare ya kisi ko shradhanjalee bhee de to bahut kasht hone lagta hai.
Har baat mein Brahmano ko kosna ab chhod dena chahiye….aap ko kisne mana kiya hai…aap bhee ek sabha kar ke Prabhash Joshi ya kisee aur tripathee ke marne kee khushiya mana sakte hai…kisne roka hai aapko.
Patrakarita ke naam par jaat ka khel ab bandh hona hee chahiye…
Are so called budhee-jiveeyo….Kanshi Ram ke marne par mayavati dwara kee gai sabha par bhee kuchh likhte….jaise sabko apnee jaati wale bhai bandhu ko shradhanjalee dene ka haqu hai vaise hee Brahmano ko bhee yeh adhikaar hai ki voh bhee shardhanjalee de sakte hai…
ब्राह्मणों के प्रति ये भाव और दलित लेखन से जुड़े लोगों द्वारा लगातार सवर्ण व दलितों के बीच अपनी कुंठित सोच का यूं ही खाका खीचते रहना, यकीनी तौर पर पूरे समाज के लिए घातक है। इन्हे अपनी कुंठा त्याग कर ब्राह्मणों से सीख लेनी चाहिए ताकि उनके मन और बुद्धि दोनों का विस्तार हो सके और वह भी अपने लेखन को महान ब्राह्मणों के लेखन की तरह विस्तार दे सके। मगर अफ़सोस आप लोग सीखने के बजाय, भद्दे व बिना मतलब तू तू मैं मैं करके अपनी मानसिकता को और दूषित कर रहे है। आखिर अच्छे को अच्छा कहने में शर्म कैसी है!
आप भी पात्र खोजिए सवर्ण पात्र जैसे महान ब्राह्मणों ने खोजे दलितों में और वों अमर हो गये अपने उन पात्रों के साथ! , उनके जीवन का लेखा-जोखा, उनके दुख तकलीफ़, खुशियां, अच्छाईया सभी कुछ प्रस्तुत किया।
हम एक दूसरे के दुख-दर्द और हंसी-खुशी को लिखे…………….ये एक बेहतर तालमेल होगा नही तो भा ऐसे ही ढ़पली बजाइयें कल्याण के बजाय निश्चित तौर पर हानि ही होगी
जिस कार्यक्रम पर आपने टिपण्णी की है, वह तो प्रभाषजी ने आयोजित नहीं किया था. वह कमुनिष्टों का किया धरा था भाई साहब. जब कमुनिष्ट ही ब्राह्मणवादी निकले तो प्रभाषजी के पीछे कब तक पड़े रहोगे?
जातिय झगड़ों और वैमनस्ता की कीमत हमने हजारों साल की गुलामी से चुकाई है । यह बिल्कुल सच है कि सवर्ण व्यवस्था में दलितों के साथ बहुत अन्याय होता रहा है । लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि विषवमन हमें जारी रखना चाहिये । अब लोकतंत्र है और इसे मानने में किसी को आपत्ती नहीं होगी कि स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं । सुधार और होगा यदि हम थोड़ा समझदारी से संयमित सार्वजनिक बयानबाजी करें । यदि सब एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलेंगे तो इससे व्यवस्था का पुर्नगठन तो नहीं ही होगा । समरेन्द्र का दुख समझा जा सकता है , वे जो चाहते हैं वही करोड़ों लोगों की भी मंशा है परंतु अब हमें अच्छे तरीकों का चुनाव करना चाहिये । समरेन्द्र भाई ….. हम आपकी भावना के साथ है , भाषा के साथ नहीं । निसंदेह मिश्रजी और शर्माजी की भाषा के साथ भी नहीं ।
ब्राह्मणों को पूरा अधिकार है कि वो अपने एक हीरो को याद करें। लेकिन इस हीरो को पूरी पत्रकारिता का हीरो साबित करेंगे तो ये हमें मंजूर नहीं।
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