चमड़िया जैसा ‘इडियट’ नहीं, राय जैसा चतुर चाहिए
♦ विजय प्रताप
अनिल चमड़िया एक ‘इडियट’ टीचर है। ऐसे ‘इडियट्स’ को हम केवल फिल्मों में पसंद करते हैं। असल जिंदगी में ऐसे ‘इडियट’ की कोई जगह नहीं। अभी जल्द ही हम लोगों ने ‘थ्री इडियट’ देखी है। उसमें एक छात्र सिस्टम के बने बनाये खांचे के खिलाफ जाते हुए नयी राह बनाने की सलाह देता है। यहां एक अनिल चमड़िया है, वह भी गुरू शिष्य-परंपरा की धज्जियां उड़ाते हुए बच्चों से हाथ मिलाता है। उनके साथ एक थाली में खाता है। उन्हें पैर छूने से मना करता है। कुल मिलाकर वह हमारी सनातन परंपरा की वाट लगा रहा है। महात्मा गांधी के नाम पर बने एक विश्वविद्यालय में यह प्रोफेसर एक संक्रमण की तरह अछूत रोग फैला रहा है। बच्चों को सनातन परंपरा या कहें कि सिस्टम के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। दोस्तों, यह सब कुछ फिल्मों में होता, तो हम एक हद तक स्वीकार भी कर लेते। कुछ नहीं तो कला फिल्म के नाम पर अंतरराष्ट्रीय समारोहों में दिखा कर कुछ पुरस्कार-वुरस्कार भी बटोर लाते। लेकिन साहब, ऐसी फिल्में हमारी असल जिंदगी में ही उतर आये, यह हमे कतई बर्दाश्त नहीं। ‘थ्री इडियट’ फिल्म का हीरो एक वर्जित क्षेत्र (लद्दाख) से आता था। असल जिंदगी में यह ‘इडियट’ चमड़िया भी उसी का प्रतिनिधित्व कर रहा है। ऐसे तो कुछ हद तक ‘थ्री इडियट’ ठीक थी। हीरो कोई सत्ता के खिलाफ चलने की बात नहीं करता। चुपचाप एक बड़ा वैज्ञानिक बनकर लद्दाख में स्कूल खोल लेता है। लेकिन यहां तो यह ‘इडियट’ सत्ता के खिलाफ भी लड़कों को भड़काता रहता है। हम शुतुरमुर्ग प्रवृत्ति के लोग सत्ता व सनातन सिस्टम के खिलाफ ऐसी बातें नहीं सुन सकते।
सो साथियो, हमारे ही बीच से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति या यूं कहें कि सनातन गुरुकुल परंपरा के रक्षक द्रोणाचार्य के अवतार वीएन राय साहब ने इस परंपरा की रक्षा का बोझ उठा लिया है। वह अपनी एक पुरानी गलती (जिसमें कि उन्होंने छात्रों के बहकावे में आकर चमड़िया को प्रोफेसर नियुक्त करने की भूल की) सुधारना चाहते हैं। राय साहब को अब पता चल गया है कि गलती से एक कोई एकलव्य भी उनके गुरुकुल में प्रवेश पा चुका है। दुर्भाग्यवश अब हम लोकतंत्र में जी रहे हैं (नहीं तो कोई अंगुली काटने जैसा एपीसोड करते), इसलिए चमड़िया को बाहर निकालने के लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा है। तब एकलव्य के अंगुली काटने पर भी इतनी चिल्ल-पौं नहीं मची थी जितने इस कथित लोकतंत्र में कुछ असामाजिक तत्व कर रहे हैं। राय साहब आपके साथ हमें भी दुख है कि इस सनातन सिस्टम में लोकतंत्र के नाम पर ऐसे चिल्ल-पौं करने वालों की एक बड़ी फौज तैयार हो रही है। आपने ‘साधु की जाति नहीं पूछने वाली’ मृणाल पांडे जी के साथ अपने ऐसे इडियटों को सिस्टम से बाहर करने का जो फैसला किया है, वो अभूतपूर्व है। इसी इडियट ने हमारी मुख्यधारा के मीडिया के सामने आईना रख दिया था, जिसकी वजह से हमें कुछ दिनों तक आईनों से भी घृणा होने लगी थी। हम आईने में खुद से ही नजर नहीं मिला पा रहे थे। वो तो धन्य हो मृणाल जी का, जिन्होंने “साधु को आईना नहीं दिखाना चाहिए, उससे केवल ज्ञान लेना चाहिए” का पाठ पढाया।
ठीक ही किया जो अपने विष्णु नागर जैसे छोटे कद के आदमी को मृणाल जी व खुद के समकक्ष बैठाने की बजाय उनका इस्तीफा ले लिया। हमारे सनातन सिस्टम में सभी के बैठने की जगह तय है। उसे उसके कद के हिसाब से बैठाना चाहिए। मृणाल जी की बात अलग है। वो कोई चमाइन नहीं, पंडिताइन हैं, उनका स्थान ऊंचा है। सनातन सिस्टम में भी फैसला करने का अधिकार पंडितों व भूमिहारों के हाथ में था। आप उसे जीवित किये हुए हैं। हिंदू सनातन धर्म को आप पर नाज है।
साहब आप तो पुलिस में भी रहे हैं। हम जानते हैं कि आपको सब हथकंडे आते हैं। एक और दलितवादी जिसका नाम दिलीप मंडल है, आप की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है। कहता है कि आपने एक्जिक्यूटिव कांउसिल से चमड़िया को हटाने के लिए सहमति नहीं ली। उस मूर्ख को यह पता ही नहीं कि द्रोणाचार्य जी को एकलव्य की अंगुली काटने के लिए किसी एक्जिक्यूटिव कांउसिल की बैठक नहीं बुलानी पड़ी थी। आप तो “आन द स्पाट” फैसले में विश्वास करते हैं। सर जी, यह तो लोकतंत्र के चोंचले हैं। और आप तो पुलिस के आदमी हैं, वहां तो थानेदार जी ने जो कह दिया वही कानून और वही लोकतंत्र है। लोग कह रहे हैं साहब कि जिस मीटिंग में चमड़िया को हटाने का फैसला हुआ, उसमें बहुत कम लोग थे। उन्हें क्या पता कि जो आये थे, वह भी इसी शर्त पर आये थे कि सनातन सिस्टम को बचाये रखने के लिए सभी राय साहब को सेनापति मानकर उनका साथ देंगे। जो खिलाफ जाते, आपने बड़ी चालाकी से उन्हें अलग रख दिया। वाह जी साहब, इसी को कहते हैं सवर्ण बुद्धि। आप वहां हैं, तो हमें पूरा भरोसा है कि वह विश्वविद्यालय सुरक्षित (और ऐसे भी साहब जहां पुलिस होगी, वहां सुरक्षा तो होगी ही) हाथों में है। साब जी, हमने गांव के छोरों से कह दिया है – यह लंठई-वंठई छोड़ो। इधर-उधर से टीप-टाप कर बीए, ईमे कर लो। बीयेचू चले जाओ, कोई पंडित जी पकड़ कर दुई चार किताबें टीप दो। फिर तो आप हईये हैं। एचओडी नहीं तो कम से कम प्रुफेसर-व्रुफेसर तो बनवाइए दीजिएगा। और साहब हम आपके पूरा भरोसा दिलाते हैं यह लौंडे ‘अनिल चमड़िया’ जैसा इडियट नहीं ‘अनिल अंकित राय’ जैसा चतुर बन कर आपका नाम रौशन करेंगे।









अनिल जी जैसे व्यक्ति के साथ उस यूनिवर्सटी में यही होना था। वैसे अच्छा भी है कि वीएन राय जैसे ”प्रगतिशीलों” की सच्चाई ज्यादा नंगे रूप में सामने आ रही है। आपकी धुलाई का अंदाज अच्छा लगा।
विभूति जी, संभालिएगा। कहीं आपका मानस पुत्र और मृणाल संस्कृति का प्रतीक अनिल राय अंकित किसी गंदे नाले में कूदकर आत्महत्या न कर ले। इतनी बदनामी झेलना किसी इंसान के बस में नहीं। वह घर में बीवी को अपना मुंह कैसे दिखाता होगा। आत्महत्या न की तो वह छात्र-छात्राओं की थू-थू में डूबकर मर जाएगा। जयपुर विश्वविद्यालय में हम उनके और आपके नाम पर थूक रहे हैं।
विजय प्रताप जी, चतुर और हमारे शिक्षक अनिल राय अंकित की तुलना ठीक नहीं। चतुर रट लेता था, अंकित टीप लेता है। दोनों को बारबरी पर रखना चतुर के साथ सरासर नाइंसाफी है। आपको सॉरी बोलना चाहिए।
शिखा जी,
राय साहब जैसे लोगों से सॉरी बोलने में तो किसी को भी शर्म आएगी मुझे भी आ रही. मैं आप और पाठको से ही माफ़ी मांग लेता हूँ.
सारथी मीणा जी आप थूकते रहिये विभूति नरायण बहुत हृश्ट-पुष्ट आदमी हैं आपके विश्वविद्यालय का ही नहीं बल्कि ऐसे कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों का ही नही पूरे देश का थूक घूंट जायेंगे.
जब किसी व्यक्ति के सामंती सनक और हनक को जनवादी चेतना से तगड़ी चुनौती मिलती है, तो वह विभूति नारायण राय जैसी ही ऊटपटांग हरकतें करता है. जीवन भर थानेदारी करने वाले शख्स को कुलपति की कुर्सी मिलती है और वह विश्वविद्यालय को एक थाना में तब्दील करने की जिद पकड़ लेता है. ताउम्र डंडा फटकारने वाला भला क्यों मानता कि विश्वविद्यालय पठन- पाठन और सीखने- सिखाने के लिए होता है, न कि रोब-दाब झाड़ने के लिए. उसे कहाँ बर्दाश्त होता कि दलित-वंचित समुदाय के लोग उसकी आंखों में आंख डालकर बात करने की जुर्रत करें.
सिस्टम की चाटुकारिता में पूरी ज़िन्दगी गुजार देनेवाला कैसे समझता कि असली पत्रकारिता सीखने के लिए ‘चोरी’ से डिग्री हासिल करनेवाले ‘गुरु’ की नहीं, बल्कि सच को पूरी ताक़त से कहने वाले अनिल चमड़िया जैसे शिक्षक की जरुरत होती है. वह इसपर क्यों यकीन करता कि असली पत्रकारिता ‘गुरुओं’ के चरण-रज लेने के बजाय समाज की विसंगतियों को उजागर करने से आती है.
मात्र एक किताब की बदौलत बनी ‘छवि’ (जिसकी असलियत अब खुल चुकी है) की ‘कमाई’ खानेवाला इस तथ्य पर कैसे अमल करता कि लोकतंत्र का वास्तविक मतलब असहमति का सम्मान करना होता है. वर्षों के पुलिसिया अनुभव के आधार पर वह क्यों नहीं मानता कि शासक के कान सिर्फ सहमति के स्वर ही सुनते हैं और इसके लिए किये गए तमाम ‘प्रबंध’ नैतिकता की कसौटियों से परे होते हैं.
‘एनकाउन्टर’ के माहौल में उम्र खपा देनेवाला यह क्यों नहीं सोचता कि अदालतों को कभी भी ठेंगा दिखाया जा सकता है और उसके निर्णय का इंतज़ार करना कतई जरुरी नहीं.
अनिल चमड़िया का ये कहना कि वे दलित हैं, 100 फीसदी झूठ है। श्री चमड़िया पत्रकारिता में मौका पाने के लिए स्वयं को दलित कहते हैं। इनका तथाकथित दलित प्रेम भी एक स्वांग है क्योंकि अनिल जी और इनके परिवार को दलितों से कोई लेनादेना नहीं है। अनिल चमड़िया न जाति से और न कर्म से दलित हैं। बल्कि वे जाति से मारवाड़ी बनिया और बड़े व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनकी शिक्षा सासाराम में ही हुई है। अत: हर व्यक्ति इनके बारे में अच्छी तरह जानता है। इनका विवाह सासाराम शहर के बड़े वैश्य परिवार गिरीश चन्द्र जायसवाल की बेटी से हुआ है। जिनका शहर में दर्जनों मकान, मार्केट और व्यापार है। अन्य भाइयों और बहन की शादियां भी बड़े मारवाड़ी व्यापारी परिवार में हुई है। इनके परिवार के किसी भी दूर के रिश्तेदार का भी वैवाहिक सम्बंध किसी दलित परिवार से नहीं है। अनिल चमड़िया और उनके परिवार का एक संक्षिप्त परिचय-
अनिल चमड़िया, पिता स्व. राम गोपाल चमड़िया, निवासी -हरे कृष्ण कॉलोनी, कंपनी सराय, थाना- सासाराम, जिला-रोहतास, बिहार, अपने पांच भाई और एक बहन में सबसे बड़े हैं। इनके अन्य भाइयों का नाम सुनील चमड़िया पेशे से चार्टर्ड एकाउटेंट, आलोक चमड़िया और अमित चमड़िया पेशे से पत्रकार और अशोक चमड़िया पारिवारिक गल्ले के व्यवसाय में हैं। बहन प्रीती चमड़िया का विवाह हो गया है। इनके परिवार का लगभग 30-35 वर्षों से गल्ला के थोक दलाली का व्यवसाय है, जिसे पूर्व में इनके पिता और अब भाई संचालित करते हैं। ये लोग मूलत: मध्य प्रदेश के सागर शहर के निवासी हैं। जो बाद में व्यवसाय हेतु सासाराम आ गए थे। इनका परिवार सासाराम शहर के बड़े व्यवसायी मारवाड़ी परिवारों में शुमार होता है। अनिल चमड़िया के चचेरे चाचा श्री मनोहर लाल जी अपने ननिहाल के धन पर सागर से सासाराम आए। यहां आकर इन्होने अपनी सरनेम चमड़िया की जगह पोद्दार लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि इनके ननिहाल का उपनाम पोद्दार था। मनोहर लाल जी चूंकि अपने ननिहाल के घर पर आए तो इन्होंने अपना उपनाम पोद्दार रख लिया। परन्तु अनिल चमड़िया के पिता ने अपना मूल मारवाड़ी उपनाम चमड़िया बरकरार रखा। जो आज तक चला आ रहा है। श्री अनिल चमड़िया के दादा का नाम महावीर प्रसाद चमड़िया था, जो म.प्र. के सागर शहर में व्यवसाय करते थे। बाद में सासाराम आने से पहले इनके पिता और चाचा ने वहां की संपति बेच दी। आज श्री चमड़िया के परिवार के पास शहर और उसके आसपास करोड़ों का व्यवसाय पत्रकारिता के धौंस पर बखूबी चलता है। इनके और इनके भाइयों के पत्रकारिता की धौंस हमेशा इन लोगों के व्यवसायिक हितों के काम आई है।
चमड़िया के सरनेम वाले श्री सीताराम चमड़िया कांग्रेस के जमाने में बिहार सरकार के मन्त्री हुआ करते थे। जो मारवाड़ी बनिया थे। अनिल जी शायद देश के पहले स्वघोषित दलित हैं, जिन्होंने दलित जुमले का इस्तेमाल अपने पत्रकारिता के करियर को चमकाने में किया है। लेकिन श्री चमड़िया पहले शख्स होंगे, जो गैर दलित होते हुए दलित के नाम पर सहानुभूति लेते हैं। मैं पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ इनके तहसील का ही निवासी हूं। इसलिए इनसे जुड़ी हुई सारी जानकारी आप लोगों के सामने रख रहा हूं। इनके दलित होने और दलित प्रेम का खुलासा करना अभी बड़ा मौजूं था क्योंकि मैं भी बेसब्री से इस वक्त का इन्तजार कर रहा था। आशा है आपको यह तहकीकात अच्छी लगेगी।
रमेश पराशर
चमड़िया जी की कुंठा इतनी बढ गई है कि वह अपने ही पोस्ट पर अलग-अलग नाम से कमेंट पोस्ट करने लगे हैं|
इस लेखक महोदय
अनिल चामड़िया को मैं टीवी.-9 के जमाने से जानता हुँ और किस बड़े चैनल के दिग्गजों की बात आप कर रहे हैं?
टीवी.-9 में काम करने के समय भी उन्हे गंदी राजनीति और स्वहित के लिए दलित तथा दलितमुद्दों का दुरुपयोग करते देखा है.मुझे पुरा यकिन है कि वह लोगों को गुमराह करने के अलावे कुछ कर ही नहीं सकते|जिन शुरुआती दिनों की बात आप कर रहे हैं उन दिनों मैं उनका जुनियर था,बहुत अरमान लेकर मैं वहां ज्वाईन किया था कि चामड़िया जी से कुछ सिखुंगा,पर उनकी गंदी रजनीति से परेशान होकर चैनल मालिक ने चैनल ही बंद कर दिया|
उस सौदेबाजी में भी चामड़ियाजी ने बहुत कमाए पर हम जैसे मिडिया कर्मी जो सपने लेकर वहां गए और उनके बहकाबे में नहीं आए, उनकी आवाज वह कभी नहीं बने.
और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल आप कर रहे हीं उससे स्पष्ट झलक रहा है कि आपको किस तरह की गंदी घुट्टी चामड़िया जी ने पिलाई है. अगर संभव है तो खुद को अभी भी बचा लिजिए.
आप दुसरों की लाईन छोटी कतने की क्यों सोचते हैं चामड़िया जी अपनी लाईन बड़ी कर लिजिए दुसरों की लाईन छोटी करने के चक्कर में तो आपकी लाईन ही मिटती जा रही है|
चामड़ियाजी आपके अंदर जो कुंठा भरी है वह इतनी स्तरहीन होगी की विश्वविद्यालय छोड़ते ही सजातीय और विजातीय की बात करने लगेंगे ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.वैसे तो दुसरे विभाग के शिक्षक होने के नाते मेरा आपसे मिलना-जुलना कम होता था पर आप इतने छिछले होंगे, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.खाशकर जब TBI के जमाने के आपके कारनामें जो अलग-अलग रुपों में आज तक जारी है, के बारे में पढा तो यही सोचने में आया कि अगर आपका जमीर तनिक भी खुद को शिक्षक मानता है या जब पहली बार ही आप शिक्षक बनना चाहे, उसी समय आपको एक चुल्लू पानी की तलाश करनी चाहिए थी, अब उस एक चुल्लू पानी में आपको क्या करना है यह बताने की जरुरत नहीं है.
संज्ञान में आया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पिछे उनके पूराने मित्र ‘चौबेजी’ हैं,जो शुरु से ही मौके की तलाश में थे,जैसा कि एक मानव स्वभाव माना जाता है कि अपनों-दोस्तों का आगे निकलना कुछ ज्यादा ही तकलिफदेह होता है,वैसे ही रिडर बने चौबे जी चामड़ियाजी का प्रो. बनना पचा नहीं पा रहे थे तथा मौका मिलते ही उनको विश्वविद्यलय से बाहर का रास्ता दिखलाने की कोशिश में लग गए और सुनने में आया है कि उनकी गिद्ध नजर तो उनकी पोस्ट पर अभी भी लगी है..
चुंकि मैं विश्वविद्यालय के लगभग प्रारम्भिक दौर से किसी न किसी रुप में जुड़ी हुई हूं,इसलिए विश्वविद्यालय को किसी ‘बक्से’ में बन्द करने,’वाद’ में संकुचित करने अथवा अनावश्यक विवाद खड़ा कर उसे बदनाम करने की साजिश रचने से बेहद आहत हूं.क्या अनिल चमड़िया इस बात की ओर गौर फरमाने की कोशिश करेंगे कि कक्षा में उनकी विषयगत अज्ञानता किसी भी छात्र से छुपी नहीं है और उनके गिने चुने शब्दों और उदाहरणों (जैसे-साधारण नमक कैसे आयोडिन नमक बना और जब मैं एक टेलीविजन चैनल में था तो मुझे कैसे ग्राहक के बदले कंज्यूमर लिखने के लिए कहा गया)को सुन-सुन कर छात़्रों के कान पक चुके हैं.जिसकी चर्चा करते उनके छात्र परिसर में इधर -उधर कहीं भी मिल जाते हैं.अब विषय की पढाई कर अपनी अज्ञानता कम कर खुद को अपडेट करने का उनके पास बेहतरीन मौका है, बेचारे अनिल चमड़िया मानसिक रुप से बिमार चल रहे हैं.इसलिए पहले अपनी बिमारी का इलाज करा लें जिससे उन्हे अपनी हकिकत का पता चल सके,संभव है उन्हें कभी अपनी गलती महसूस न हो और वह दूसरों पर ही किचड़ उछालते रहें और आप जैसे पत्रकार पत्रकारिता कम और इनकी चाटुकारिता अधिक करते रहें|पर अगर बिमारी ठिक हो जाए और अपनी गलतियों को महसूस कर सकें तो पहले एम.ए. कर लें,कहीं और से क्यों इसी विशवविद्यालय में आकर नमांकन करा लें|फिर प्रो. बनने का सोंचें|
भाई रितेश
अनिल चमडिया दलित हो ना हो लेकिन उसने जितना दलितों के लिए लिखा है, उसकी भी कोई खोजी रिपोर्ट देते तो हम आपकी खोजी पत्रकारिता के आभारी होते. दलित जाती से ही होना जरुरी नहीं, चमडिया ने दलितों को लेकर मीडिया को जो आइना दिखाया है उसके बारे में आपका क्या ख्याल है?
“टीवी.-9 में काम करने के समय भी उन्हे गंदी राजनीति और स्वहित के लिए दलित तथा दलितमुद्दों का दुरुपयोग करते देखा है”
भाई बेबाक जी,
नाम न बताए ठीक है लेकिन आप जैसे अनाम साफ-सुथरे लोगों को दलितों के बारे में सवाल उठाना गन्दी राजनीती ही लगेगी. मैं उस समय उस चैनल में नहीं था लेकिन इतना जनता हूँ जहाँ मजदुर-कर्मचारियों की बात उठती है वहां मालिक के कुत्तों को गन्दी राजनीती की बास ही आती है.
फर्जी विश्विद्यालयकर्मी
सवाल उठाने के लिए कभी उनकी क्लास में बैठ कर देखिएगा. रट्टू तोता और अनिल अंकित राय की तरह टिप कर की तरह पढाई की हो तो कोई बात समझ में नहीं आएगी लेकिन अगर कुछ पढ़ने का शौक होगा…तो बिना पढ़े सब कुछ समझ में आ
जायेगा.
रमेश जी आप अपने को कम से कम पत्रकार तो न ही कहिये….क्योंकि किसी की जाति और उसके पुरखों की जानकारी पत्रकारिता की विधा नहीं है…इसलिए अपना असली पेशा हम सब को बता दीजिये….ताकि अपके मतलबों को जान सके….वैसे कुंठा तो आपको है….ये आपकी किसी के बारे में रखी गई जानकारी बताती है….
अनिल चमड़िया सर ने साफ कहा है कि उन्होंने न कभी अपनी जाति किसी को बताई है न किसी से जाति पूछी है। जनतंत्र डॉट कॉम पर उनका इंटरव्यू पढ़ें। उनके 25 साल के सार्वजनिक जीवन से बढ़कर उनका परिचय क्या हो सकता है। सर हम आपके साथ हैं। आपने अपनी कक्षाओं में जेंडर और कास्ट इक्वैलिटी का पाठ पढ़ाया है, उसे हम भूलें नहीं हैं। और रितेश-बेबाक तुमलोग अपना सही नाम नहीं लिखोगे तो कमेंट लिखने की मजदूरी कैसे क्लेम करोगे।
रितेश, बेबाक, वैभव, एक विश्वविद्यालयकर्मी टाइप लोगों की भाषा की थोक गलतियों से लगता है कि ये सब अनिल राय अंकित के घर में टंकित हो रहा है। देखिए नमूने, ये तब है जब मैंने कॉपी नरमी से जांची है। ये सब एक ही तरह की गलती करते हैं। लगता है ये सभी एक ही टीचर के चेले हैं।
bebak said:
इस लेखक महोदय
अनिल चामड़िया (क्या आप चमड़िया नहीं लिख सकते?) को मैं टीवी.-9 के जमाने से जानता हुँ(हूं लिखना नहीं सिखाया अंकित सर ने) और किस बड़े चैनल के दिग्गजों की बात आप कर रहे हैं?
टीवी.-9 में काम करने के समय भी उन्हे (उन्हें लिखने की तमीज नहीं है) गंदी राजनीति और स्वहित के लिए दलित तथा दलितमुद्दों का दुरुपयोग करते देखा है.मुझे पुरा(पूरा लिखना नहीं आता) यकिन(यकीन नहीं लिख सकते) है कि वह लोगों को गुमराह करने के अलावे कुछ कर ही नहीं सकते|जिन शुरुआती दिनों की बात आप कर रहे हैं उन दिनों मैं उनका जुनियर(फिर गलत, जूनियर शब्द लिखने का अभ्यास करो) था,बहुत अरमान लेकर मैं वहां ज्वाईन किया था कि चामड़िया(फिर गलत) जी से कुछ सिखुंगा(ये भी गलत, ऐसे कैसे सीख पाओगे),पर उनकी गंदी रजनीति(कैसे पत्रकार हो भाई, रजनीति लिखते हो) से परेशान होकर चैनल मालिक ने चैनल ही बंद कर दिया|
उस सौदेबाजी में भी चामड़ियाजी(???) ने बहुत कमाए पर हम जैसे मिडिया(लिखना ही नहीं आता) कर्मी जो सपने लेकर वहां गए और उनके बहकाबे में नहीं आए, उनकी आवाज वह कभी नहीं बने.
और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल आप कर रहे हीं उससे स्पष्ट झलक रहा है कि आपको किस तरह की गंदी घुट्टी चामड़िया(सुधर जाओ) जी ने पिलाई है. अगर संभव है तो खुद को अभी भी बचा लिजिए.
# 30 January 2010 at 9:22 pm
bebak said:
आप दुसरों (दूसरों लिखना चाहिए था) की लाईन छोटी कतने की क्यों सोचते हैं चामड़िया जी अपनी लाईन बड़ी कर लिजिए(आपको सही कुछ लिखना आता है या नहीं, लीजिए शब्द का अभ्यास करो) दुसरों (फिर वही गलती) की लाईन छोटी करने के चक्कर में तो आपकी लाईन ही मिटती जा रही है|
# 30 January 2010 at 9:30 pm
ritesh said:
चामड़ियाजी(बेबाक भी यही गलती करता है) आपके अंदर जो कुंठा भरी है वह इतनी स्तरहीन होगी की(किसने तुम्हें पत्रकार बनाया) विश्वविद्यालय छोड़ते ही सजातीय और विजातीय की बात करने लगेंगे ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.वैसे तो दुसरे(फिर गलती) विभाग के शिक्षक(अच्छा तो तुम शिक्षक हो, विभूति ने तुम्हें नौकरी देकर साबित कर दिया है कि उसने विवि का क्या बना दिया है) होने के नाते मेरा आपसे मिलना-जुलना कम होता था पर आप इतने छिछले होंगे, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.खाशकर (टीचर महोदय, खासकर होता है, 10 बार लिखकर अभ्यास करो)। जब TBI (जी नहीं, TVI) के जमाने के आपके कारनामें(गलत लिखा, कारनामे होता है) जो अलग-अलग रुपों ( नहीं, रूपों लिखिए, र पर उ और ऊ की मात्रा अलग तरीके से लिखी जाती है) में आज तक जारी है, के बारे में पढा(पढ़ा होता है) तो यही सोचने में आया कि अगर आपका जमीर तनिक भी खुद को शिक्षक मानता है या जब पहली बार ही आप शिक्षक बनना चाहे, उसी समय आपको एक चुल्लू पानी की तलाश करनी चाहिए थी, अब उस एक चुल्लू पानी में आपको क्या करना है यह बताने की जरुरत(जरूरत भी गलत लिखा है इस विभूति वाले टीचर ने) नहीं है.
# 30 January 2010 at 9:32 pm
vaibhav said:
संज्ञान में आया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पिछे(इनको पीछे लिखने का शऊर नहीं है) उनके पूराने(पुराने को भी ठीक से नहीं लिख सकते) मित्र ‘चौबेजी’ हैं,जो शुरु(शुरू भी गलत लिखा है) से ही मौके की तलाश में थे,जैसा कि एक मानव स्वभाव माना जाता है कि अपनों-दोस्तों का आगे निकलना कुछ ज्यादा ही तकलिफदेह(तकलीफदेह लिखना होता है मेरे भाई) होता है,वैसे ही रिडर (रिडर नहीं, रीडर होगा) बने चौबे जी चामड़ियाजी(ये गलती तो बेबाक ने भी की और रितेश ने भी और वैभव भी यही गलती कर रहा है) का प्रो. बनना पचा नहीं पा रहे थे तथा मौका मिलते ही उनको विश्वविद्यलय(गलत लिखा है) से बाहर का रास्ता दिखलाने की कोशिश में लग गए और सुनने में आया है कि उनकी गिद्ध नजर तो उनकी पोस्ट पर अभी भी लगी है..
# 30 January 2010 at 9:36 pm
एक विश्वविद्यालय कर्मी said:
चुंकि (गलतलिखा है) मैं विश्वविद्यालय के लगभग प्रारम्भिक दौर से किसी न किसी रुप (गलत लिखती हैं आप। रूप होता है) में जुड़ी हुई हूं,इसलिए विश्वविद्यालय को किसी ‘बक्से’ में बन्द करने,’वाद’ में संकुचित करने अथवा अनावश्यक विवाद खड़ा कर उसे बदनाम करने की साजिश रचने से बेहद आहत हूं.क्या अनिल चमड़िया इस बात की ओर गौर फरमाने की कोशिश करेंगे कि कक्षा में उनकी विषयगत अज्ञानता किसी भी छात्र से छुपी नहीं है और उनके गिने चुने शब्दों और उदाहरणों (जैसे-साधारण नमक कैसे आयोडिन नमक बना और जब मैं एक टेलीविजन चैनल में था तो मुझे कैसे ग्राहक के बदले कंज्यूमर लिखने के लिए कहा गया)को सुन-सुन कर छात़्रों के कान पक चुके हैं.जिसकी( जिसकी से पहले फुल स्टॉप क्यों लगाया टीचर जी) चर्चा करते उनके छात्र परिसर में इधर -उधर कहीं भी मिल जाते हैं.अब विषय की पढाई कर अपनी अज्ञानता कम कर खुद को अपडेट करने का उनके पास बेहतरीन मौका है, बेचारे अनिल चमड़िया मानसिक रुप(गलत लिखा) से बिमार (फिर गलती, बीमार लिखने का पांच बार अभ्यास कीजिए) चल रहे हैं.इसलिए पहले अपनी बिमारी(फिर वही गलती) का इलाज करा लें जिससे उन्हे अपनी हकिकत(हकीकत शब्द 10 बार लिखें) का पता चल सके,संभव है उन्हें कभी अपनी गलती महसूस न हो और वह दूसरों पर ही किचड़ उछालते रहें और आप जैसे पत्रकार पत्रकारिता कम और इनकी चाटुकारिता अधिक करते रहें|पर अगर बिमारी (फिर गलत) ठिक(ये भी गलत) हो जाए और अपनी गलतियों को महसूस कर सकें तो पहले एम.ए. कर लें,कहीं और से क्यों इसी विशवविद्यालय (विश्वविद्यालय लिखे कम से कम 20 बार) में आकर नमांकन(नामांकन लिखें पांच बार) करा लें|फिर प्रो. बनने का सोंचें(सोचें लिखें 50 बार और नारा लगाएं, अनिल राय अंकित जिंदाबाद, विभूति नारायण राय अमर रहें)|
और भी…कीचड़ को किचड़ लिखा है, पढ़ाई को पढाई लिखा है…अनिल राय अंकित के चेलों को देश में कौन अखबार और चैनल नौकरी देगा? छात्रों के लिए सलाह- किसी से मत कहना कि अंकित ने तुम्हें पढ़ाया है।
डिपार्टमेंट बंद करो अंकित। डूब मरो अंकित। विभूति नारायण राय की तेरहवीं कब है? उनके नाम के एक तथाकथित प्रगतिशील हुआ करते थे, वो तो गुजर चुके हैं और उनका पुनर्जन्म भूमिहार अवतार में हुआ है। तो खुशी जन्म की मनाएं या मरने की।
रितेश बोलता है कि वो विभूति के विश्वविद्यालय में टीचर है। उसने 12 लाइनों में सिर्फ वर्तनी की आठ बड़ी गलतियां की हैं। ऐसी गलती पांचवी क्लास का बच्चा करे तो उसे कान पकड़कर उठक-बैठक करने को कहा जाता है। रितेश जैसे टीचर को क्या सजा मिलनी चाहिए? रितेश टीचर है,योग्य है और अनिल चमड़िया अयोग्य हैं? इस देश का तो जो होना है होगा, लेकिन विभूति के विश्वविद्यालय का क्या हो रहा है, ये समझ में आ रहा है। वहां के छात्रों को वाइस चांसलर और ऐसे मूर्ख टीचर के खिलाफ विद्रोह कर देना चाहिए।
विदर्भ में विभूति राय उत्तर प्रदेश का जातिवादी खेल नहीं खेल पाएंगे। ये अंबेडकर की भूमि है। यह एनहिलेशन ऑफ कास्ट लिखने वाले महापुरुष की जमीन है। यहां जातिवाद को फिर से जमाने की कोशिश करने वालों की कब्र खुदेगी। आप सब देख लेना। कोई जातिवादी यहां बचेगा नहीं।
शिखा जी,
आपने जिन बारीकियों को पकड़ा है, वो काबिल ए तारीफ है. ये फर्जी कमेंटेटर जरुर अनिल अंकित राय के चेले (वहां गुरु-चेले की ही परम्परा है) होंगे. खैर आपने साबित कर दिया की आप एक योग्य गुरु की स्टुडेंट हैं
इसे भी देखें- http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_277.html
यह खासा हास्यास्पद प्रसंग बन गया है. ब्लॉग लेखन कोई ट्रेन के बाथरूम का लेखन न बन जाए ( जो कि अभी तक बना नहीं है, पर बन जायेगा अगर यही ट्रॆंड चलता रहा). चमडिया जी दलित नहीं हैं और अपनी जाति नहीं बताते हैं और दलित का सा बने रहकर दलितों के स्पेस में समर्थन जुटाकर आगे बढे जा रहे थे! यह तो बहुत सामान्य सी बात है. बहुत सारे दलित ध्वजाधारी यही करते हैं. मूर्ख तो वे हैं जो इनके खिलाफ की जा रही कार्यवाही (जो सही या गलत कुछ भी हो सकती है) पर विचार करने के बजाए मामले का कास्ट एंगल देखते हैं. धन्य हैं!
प्रोफेसर प्यारेलाल का नाम जगदीश्वर चतुर्वेदी है। उन्हें चतुर्वेदी मानकर ही पढ़ें।
करीब बीस साल पहले बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर भाषण देकर मालवीय भवन के बाहर निकला। एक लड़के ने कहा ,’भाषण तो अच्छा दिया ,अपनी जाति भी बता दीजिए’। मैंने उससे कहा कि मैं जाति में नहीं मानता । उस लड़के ने कहा , ’कोई जाति होगी जो आपको अपने में मानती होगी,वह ही बता दें ।’ मैं निरुत्तर हो गया ।
वैसे , बिहार में हर किस्म के बनिया पिछड़े वर्ग में आते हैं । बिड़ला भी ।
बिहार में कौन किस वर्ग में आता है? ये अपने-आप में एक अलग सवाल हो सकता है। अनिल चमड़िया किस जाति के है, ये भी जाननें की मेरी तो इच्छा नहीं है। इस देश में दलितों में भी कई ऐसे लोग है जिन्होंनें कभी दलित हितों की नहीं सोची। यदि किसी गैर-दलित नें अपनें जीवनभर केवल दलितों, मज़दूरों और किसानों पर लिखा, उनके लिए इतना काम किया जो शायद कोई दलित पत्रकार या दलित चिंतक भी ना कर पाता। तो ऐसे व्यक्ति की जाति के बारे में सवाल खड़ा करना कहां तक सही है? रही बात उनकी जाति के बारे में जानकारी मांगनें की? तो ये सोच हमारे समाज में आज भी व्याप्त है कि कोई भी व्यक्ति किसी क्षेत्र, धर्म, समुदाय, भाषा लोगों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाए तो वहां उसका स्वार्थ मान लिया जाता है। कहीं फलां व्यक्ति उसी संप्रदाय या जाति विशेष का तो नहीं है। या वो किसी धर्म संप्रदाय से कोई विशेष लाभ तो नहीं ले लेगा? लेकिन दलितों से क्या लाभ लेगा कोई? मज़दूर या किसानों से क्या लाभ लेगा कोई? आदिवासियों से क्या लाभ कमाएगा कोई? जो व्यक्ति (आप जैसे लोगों के कहे मुताबिक)एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता हो, उसे क्या कमाना होगा? मेरे एक बिहार के मित्र ने मुझसे पूछा कि अनिल जी के भाई स्टे्टसमैन में काम करते है, लेकिन वो बायस्ड है। मैनें पूछा कि ऐसा क्यों कहा आपनें? तो जवाब आया कि वो एस.सी हैं तो केवल एस.सी लोगों को ही गाईड करते हैं। मैनें पूछा कि क्या वो मना करते हैं किसी अन्य जाति के लोगों को कुछ बतानें से? तब जवाब आया कि ऐसा लोगों का मानना है कि वो केवल अपनें लोगों की ही मदद करते हैं। तो मेरे दोस्तों इस देश में लोगों के मन में ये भाव, जड़ तक है कि फलां व्यक्ति किस जाति का है?और उसी प्रकार उस व्यक्ति से आशा भी रखी जाती है। तो इसमें क्या बुराई रही है, की कोई इंसान किसी वंचित के हित की लड़ाई के लिए अपनी जाति छिपाए और उसी को अपनी जाति मान ले। एक वरिष्ठ पत्रकार (जो हाल ही में दिवंगत हुए है) नें कभी अनिल जी के लिए कहा था…ये अनिल चमड़िया है, इनके पूर्वज चमड़े का का काम किया करते थे। दोस्तों लोगों की सोच क्या कहती है, औऱ कैसे उस दंश को स्वीकार करके, अपनी सच्चाई छिपाते हुए काम करना, है दम तो फिर बात करे कोई?
अगर कोई सवर्ण ऐसा कर सकता हो, वो अनिल सर पर उंगली उठानें का हक़दार हो सकता है?
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