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	<title>Comments on: चमड़िया जैसा &#8216;इडियट&#8217; नहीं, राय जैसा चतुर चाहिए</title>
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		<title>By: खरी-खोटी</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/01/30/anil-chamadia-is-a-idiot-professor/comment-page-1/#comment-5887</link>
		<dc:creator>खरी-खोटी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Feb 2010 16:11:58 +0000</pubDate>
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		<description>बिहार में कौन किस वर्ग में आता है? ये अपने-आप में एक अलग सवाल हो सकता है। अनिल चमड़िया किस जाति के है, ये भी जाननें की मेरी तो इच्छा नहीं है। इस देश में दलितों में भी कई ऐसे लोग है जिन्होंनें कभी दलित हितों की नहीं सोची। यदि किसी गैर-दलित नें अपनें जीवनभर केवल दलितों, मज़दूरों और किसानों पर लिखा, उनके लिए इतना काम किया जो शायद कोई दलित पत्रकार या दलित चिंतक भी ना कर पाता। तो ऐसे व्यक्ति की जाति के बारे में सवाल खड़ा करना कहां तक सही है? रही बात उनकी जाति के बारे में जानकारी मांगनें की? तो ये सोच हमारे समाज में आज भी व्याप्त है कि कोई भी व्यक्ति किसी क्षेत्र, धर्म, समुदाय, भाषा लोगों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाए तो वहां उसका स्वार्थ मान लिया जाता है। कहीं फलां व्यक्ति उसी संप्रदाय या जाति विशेष का तो नहीं है। या वो किसी धर्म संप्रदाय से कोई विशेष लाभ तो नहीं ले लेगा? लेकिन दलितों से क्या लाभ लेगा कोई? मज़दूर या किसानों से क्या लाभ लेगा कोई? आदिवासियों से क्या लाभ कमाएगा कोई? जो व्यक्ति (आप जैसे लोगों के कहे मुताबिक)एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता हो, उसे क्या कमाना होगा? मेरे एक बिहार के मित्र ने मुझसे पूछा कि अनिल जी के भाई स्टे्टसमैन में काम करते है, लेकिन वो बायस्ड है। मैनें पूछा कि ऐसा क्यों कहा आपनें? तो जवाब आया कि वो एस.सी हैं तो केवल एस.सी लोगों को ही गाईड करते हैं। मैनें पूछा कि क्या वो मना करते हैं किसी अन्य जाति के लोगों को कुछ बतानें से? तब जवाब आया कि ऐसा लोगों का मानना है कि वो केवल अपनें लोगों की ही मदद करते हैं। तो मेरे दोस्तों इस देश में लोगों के मन में ये भाव, जड़ तक है कि फलां व्यक्ति किस जाति का है?और उसी प्रकार उस व्यक्ति से आशा भी रखी जाती है। तो इसमें क्या बुराई रही है, की कोई इंसान किसी वंचित के हित की लड़ाई के लिए अपनी जाति छिपाए और उसी को अपनी जाति मान ले। एक वरिष्ठ पत्रकार (जो हाल ही में दिवंगत हुए है) नें कभी अनिल जी के लिए कहा था...ये अनिल चमड़िया है, इनके पूर्वज चमड़े का का काम किया करते थे। दोस्तों लोगों की सोच क्या कहती है, औऱ कैसे उस दंश को स्वीकार करके, अपनी सच्चाई छिपाते हुए काम करना, है दम तो फिर बात करे कोई?

अगर कोई सवर्ण ऐसा कर सकता हो, वो अनिल सर पर उंगली उठानें का हक़दार हो सकता है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिहार में कौन किस वर्ग में आता है? ये अपने-आप में एक अलग सवाल हो सकता है। अनिल चमड़िया किस जाति के है, ये भी जाननें की मेरी तो इच्छा नहीं है। इस देश में दलितों में भी कई ऐसे लोग है जिन्होंनें कभी दलित हितों की नहीं सोची। यदि किसी गैर-दलित नें अपनें जीवनभर केवल दलितों, मज़दूरों और किसानों पर लिखा, उनके लिए इतना काम किया जो शायद कोई दलित पत्रकार या दलित चिंतक भी ना कर पाता। तो ऐसे व्यक्ति की जाति के बारे में सवाल खड़ा करना कहां तक सही है? रही बात उनकी जाति के बारे में जानकारी मांगनें की? तो ये सोच हमारे समाज में आज भी व्याप्त है कि कोई भी व्यक्ति किसी क्षेत्र, धर्म, समुदाय, भाषा लोगों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाए तो वहां उसका स्वार्थ मान लिया जाता है। कहीं फलां व्यक्ति उसी संप्रदाय या जाति विशेष का तो नहीं है। या वो किसी धर्म संप्रदाय से कोई विशेष लाभ तो नहीं ले लेगा? लेकिन दलितों से क्या लाभ लेगा कोई? मज़दूर या किसानों से क्या लाभ लेगा कोई? आदिवासियों से क्या लाभ कमाएगा कोई? जो व्यक्ति (आप जैसे लोगों के कहे मुताबिक)एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता हो, उसे क्या कमाना होगा? मेरे एक बिहार के मित्र ने मुझसे पूछा कि अनिल जी के भाई स्टे्टसमैन में काम करते है, लेकिन वो बायस्ड है। मैनें पूछा कि ऐसा क्यों कहा आपनें? तो जवाब आया कि वो एस.सी हैं तो केवल एस.सी लोगों को ही गाईड करते हैं। मैनें पूछा कि क्या वो मना करते हैं किसी अन्य जाति के लोगों को कुछ बतानें से? तब जवाब आया कि ऐसा लोगों का मानना है कि वो केवल अपनें लोगों की ही मदद करते हैं। तो मेरे दोस्तों इस देश में लोगों के मन में ये भाव, जड़ तक है कि फलां व्यक्ति किस जाति का है?और उसी प्रकार उस व्यक्ति से आशा भी रखी जाती है। तो इसमें क्या बुराई रही है, की कोई इंसान किसी वंचित के हित की लड़ाई के लिए अपनी जाति छिपाए और उसी को अपनी जाति मान ले। एक वरिष्ठ पत्रकार (जो हाल ही में दिवंगत हुए है) नें कभी अनिल जी के लिए कहा था&#8230;ये अनिल चमड़िया है, इनके पूर्वज चमड़े का का काम किया करते थे। दोस्तों लोगों की सोच क्या कहती है, औऱ कैसे उस दंश को स्वीकार करके, अपनी सच्चाई छिपाते हुए काम करना, है दम तो फिर बात करे कोई?</p>
<p>अगर कोई सवर्ण ऐसा कर सकता हो, वो अनिल सर पर उंगली उठानें का हक़दार हो सकता है?</p>
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		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/01/30/anil-chamadia-is-a-idiot-professor/comment-page-1/#comment-5819</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2010 08:32:01 +0000</pubDate>
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		<description>करीब बीस साल पहले बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर भाषण देकर मालवीय भवन के बाहर निकला। एक लड़के ने कहा ,’भाषण तो अच्छा दिया ,अपनी जाति भी बता दीजिए’। मैंने उससे कहा कि मैं जाति में नहीं मानता । उस लड़के ने कहा , ’कोई जाति होगी जो आपको अपने में मानती होगी,वह ही बता दें ।’ मैं निरुत्तर हो गया ।
वैसे , बिहार में हर किस्म के बनिया पिछड़े वर्ग में आते हैं । बिड़ला भी ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>करीब बीस साल पहले बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस पर भाषण देकर मालवीय भवन के बाहर निकला। एक लड़के ने कहा ,’भाषण तो अच्छा दिया ,अपनी जाति भी बता दीजिए’। मैंने उससे कहा कि मैं जाति में नहीं मानता । उस लड़के ने कहा , ’कोई जाति होगी जो आपको अपने में मानती होगी,वह ही बता दें ।’ मैं निरुत्तर हो गया ।<br />
वैसे , बिहार में हर किस्म के बनिया पिछड़े वर्ग में आते हैं । बिड़ला भी ।</p>
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		<title>By: पंकज कोरी, नागपुर</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/01/30/anil-chamadia-is-a-idiot-professor/comment-page-1/#comment-5813</link>
		<dc:creator>पंकज कोरी, नागपुर</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2010 07:07:51 +0000</pubDate>
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		<description>प्रोफेसर प्यारेलाल का नाम जगदीश्वर चतुर्वेदी है। उन्हें चतुर्वेदी मानकर ही पढ़ें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रोफेसर प्यारेलाल का नाम जगदीश्वर चतुर्वेदी है। उन्हें चतुर्वेदी मानकर ही पढ़ें।</p>
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		<title>By: Prof Pyarelal</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/01/30/anil-chamadia-is-a-idiot-professor/comment-page-1/#comment-5811</link>
		<dc:creator>Prof Pyarelal</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2010 06:28:46 +0000</pubDate>
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		<description>यह खासा हास्यास्पद प्रसंग बन गया है. ब्लॉग लेखन कोई ट्रेन के बाथरूम का लेखन न बन जाए ( जो कि अभी तक बना नहीं है, पर बन जायेगा अगर यही ट्रॆंड चलता रहा). चमडिया जी दलित नहीं हैं और अपनी जाति नहीं बताते हैं और दलित का सा बने रहकर दलितों के स्पेस में समर्थन जुटाकर आगे बढे जा रहे थे! यह तो बहुत सामान्य सी बात है. बहुत सारे दलित ध्वजाधारी यही करते हैं. मूर्ख तो वे हैं जो इनके खिलाफ की जा रही कार्यवाही (जो सही या गलत कुछ भी हो सकती है) पर विचार करने के बजाए मामले का कास्ट एंगल देखते हैं. धन्य हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह खासा हास्यास्पद प्रसंग बन गया है. ब्लॉग लेखन कोई ट्रेन के बाथरूम का लेखन न बन जाए ( जो कि अभी तक बना नहीं है, पर बन जायेगा अगर यही ट्रॆंड चलता रहा). चमडिया जी दलित नहीं हैं और अपनी जाति नहीं बताते हैं और दलित का सा बने रहकर दलितों के स्पेस में समर्थन जुटाकर आगे बढे जा रहे थे! यह तो बहुत सामान्य सी बात है. बहुत सारे दलित ध्वजाधारी यही करते हैं. मूर्ख तो वे हैं जो इनके खिलाफ की जा रही कार्यवाही (जो सही या गलत कुछ भी हो सकती है) पर विचार करने के बजाए मामले का कास्ट एंगल देखते हैं. धन्य हैं!</p>
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		<title>By: suman</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/01/30/anil-chamadia-is-a-idiot-professor/comment-page-1/#comment-5810</link>
		<dc:creator>suman</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2010 05:52:25 +0000</pubDate>
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		<description>इसे भी देखें- http://mgahv.blogspot.com/2010/01/blog-post_277.html</description>
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