Articles Archive for February 2010
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
शशि भूषण ♦ इस घटना से हुसैन के समर्थकों को भारत में मौजूद हिंदू चरमपंथ को कोसने का बड़ा मौका मिल गया है। वे इस घटना को हो सकता है, भविष्य में भारत के मुसलमानों में पल रही असुरक्षा की भावना को बढ़ानेवाला घोषित कर दें। यह आशंका जताने लगें कि आगे और कलाकार पलायन करने को मजबूर होंगे। यह होना भी चाहिए क्योंकि हिंदू विघटनकारी ताकतों ने फिदा हुसैन का भारत रहना मुश्किल कर दिया। उन्हें डर के साये में भारत से दूर रहने-जीने को मजबूर किया। उनकी कलाकृतियों को नष्ट करने की लगातार कोशिशें की। पर सवाल ये भी उठता है कि हुसैन दुबई या लंदन की नागरिकता की अपील भी तो कर सकते थे, जहां वे लंबे समय से रहते रहे हैं और क्या पता क़तर के नागरिक हुसैन आगे भी इन्हीं देशों में से ही कहीं रहें।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ हमार के चैनल हेड उदयचंद्र सिंह को कुछ लोगों ने पीट दिया। उन्हें उन लोगों ने पीटा, जिन्हें दो दिनों पहले ही चैनल से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। वे इस बात से क्षुब्ध थे कि चैनल के प्रति वेतन न मिलने के बावजूद कमिटमेंट के साथ काम करने पर भी उन्हें निकाल दिया गया। बकाया वेतन भी नहीं दिया गया। जिन दो लोगों ने उदयचंद्र सिंह की थप्पड़ों और घूंसों से पिटाई की, उनके बारे में कर्मचारी बता रहे हैं कि उनके साथ उदयचंद्र सिंह ने बदतमीजी की हद कर दी थी। उनके बर्ताव से आमतौर पर लोग दुखी हैं। घटना ऑफिस के बाहर सड़क पर हुई।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, समाचार »
डेस्क ♦ हमार और फोकस में होली से पहले कर्मचारियों में उबलते आक्रोश को ठंढा करने के लिए प्रबंधन ने एक महीने की सैलरी बांट दी है। यह सैलरी नवंबर माह की है। हम पाठकों को बता दें कि हमार और फोकस के कर्मचारियों की नवंबर, दिसंबर और जनवरी की सैलरी पेंडिंग थी। हताश कर्मचारियों का गुस्सा अपने अपने तरीके से फूट रहा था। इस बीच हमार पर होली की हुड़दंग कार्यक्रम शुरू हुआ, तो उनकी हताशा भी कुछ घटनाओं के जरिये जाहिर हुई। चैनल हेड और कर्मचारियों के बीच आपस में तू-तू मैं-मैं बढ़ गयी। इस बीच हुआ ये कि चैनल से 12 मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
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आवेश तिवारी ♦ देश में एमएफ हुसैन को भारत रत्न दिलाने वालों की जमात में एक बड़ा नाम शशि थरूर का भी रहा है। शशि और उन जैसे लोग हुसैन को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक मानते रहे हैं। एक व्यक्ति अगर धर्मनिरपेक्षता को कायम रखने की कवायद कर रहा था, तो ये वास्तव में बड़ी चीज है। उसके खिलाफ किसी भी साजिश या पूर्वाग्रह का विरोध होना चाहिए। लेकिन अगर वही व्यक्ति पूरी जिंदगी हिंदुस्तान में गुजारकर खुद को हिंदुस्तानी मूल का कहे और देश के कानून की चिंदियां उड़ाता हुआ दूसरे देश की नागरिकता ग्रहण कर ले तो उसे कानून के शब्दों में भगोड़ा कहा जाना निस्संदेह गलत नहीं होगा। देश के मान को बचाये रखने का यही अंतिम तरीका है।
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दिलीप ♦ कुलानुशासक ने अनिल को 6 महीने के लिए निष्कासित किये जाने का नोटिस भिजवाया जबकि नियम यह कहता है कि कुलानुशासक किसी भी विद्यार्थी को अधिकतम दो हफ्ते के लिए ही निष्कासित कर सकते हैं। इस फैसले के विरोध में छात्रों ने कुलानुशासक से जवाब मांगा तो उन्होंने यह माना कि नियम का इस मामले में पालन नहीं किया गया है लेकिन अगर फैसला हो गया है तो अनिल को इसे मानना चाहिए। प्रशासन का यह कहना है कि जब तक अनुशासन कमेटी की रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक के लिए उसे निष्कासित किया जाएगा। यह पूछे जाने पर कि अगर उसे दोषी नहीं पाया गया तो पहले ही उसको मिल गयी सजा की भरपाई कौन करेगा? कुलानुशासक मानना था कि “निष्कासन सजा नहीं होती”।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
विनीत कुमार ♦ कुल मिलाकर कहानी ये है कि जब भी हिंदी के चैनल बजट जैसे अंग्रेजी कार्यक्रमों को हिंदी में दिखाने के दावे करते हैं, उनकी खोखली और व्यावसायिक घोषणा ही होती है कि अपनी भाषा में बात समझी जाए, बहुत ही फूहड़ हो जाती है। उसके भीतर अचानक से दूरदर्शन की आत्मा घुस जाती है। मामला उबाऊ और बोझिल लगने लग जाता है। ऐसे में किशोर आजवाणी और अभिसार शर्मा जैसे काबिल एंकरों की भद्द पिटती है, मिसब्रैंडिंग होती है। अगर वो भाषाई स्तर के बदलाव को बारीकी स्तर पर नहीं समझ पाते हैं, इस काम के लिए पैसे खर्च नहीं करते हैं और सिर्फ हिंदी के नाम पर भुनाने के चक्कर में होते हैं, तो वो अपनी रेगुलर ऑडिएंस भी खो देते हैं, इसकी संभावना बनी रह जाती है।
खेल खेल में, मीडिया मंडी »
विनीत कुमार ♦ इंडिया टीवी के रहते ये भला कैसे पिचकता? इंडिया टीवी की स्पेशल स्टोरी रही – 200 का देवता। इस चैनल ने सचिन को देवता करार देने के साथ ही 200 संख्या को भी स्टैब्लिश करने की कोशिश की। न्यूज चैनलों में तारीखों और संख्या को स्टैब्लिश करने की बहुत मारामारी मची रहती है। ये भी 9/11 से उधार लिया पैटर्न है। हेडर में बार-बार आता है – 5 मिनट, 5 इंच का देवता। पीछे से जोधा-अखबर का गाना, अजीबो शान शहंशाह… इस चैनल की छवि है कि ये दुनिया की किसी भी खबर में देवी-देवता, रहस्यमयी शक्तियों को तलाश लेती है।
खेल खेल में, समाचार »
संदीप पांडेय ♦ मैं कहता हूं, नहीं यार, एक रन चाहिए। ये धोनी का बच्चा स्ट्राइक ही नहीं दे रहा। वो कहता है मैं फोन पर रहूंगा। मुझे महसूस करना है सचिन का दोहरा शतक। आखिरी ओवर की तीसरी गेंद। सचिन का दोहरा शतक पूरा। दिल धड़ाके मार रहा है। तालियों की गड़गड़ाहट। शोर में मैं संज्ञा शून्य हो गया हूं। आंख भर आयी है। प्रभाष जी कहां हो आप… देख रहे हो न अपने लाडले का कमाल! सोच रहा हूं कल का जनसत्ता कैसा होगा? पढ़ भी पाऊंगा या नहीं। एक बार एक साथी ने कहा था, प्रभाष जी की मौत को क्रिकेट से जोड़ कर तुम उनके योगदान का अपमान कर रहे हो। मैं उससे क्या कहता… कि क्रिकेट और सचिन को लेकर उनकी आस्था और मोह सारे तर्कों से परे था।
खेल खेल में, नज़रिया, समाचार »
ब्रजमोहन सिंह ♦ सचिन को क्या नाम दें? सचिन रनबीर तेंदुलकर। सचिन शतकबीर तेंदुलकर। सचिन महाबीर तेंदुलकर या और कुछ… क्या फर्क पड़ता है। नाम से क्या फर्क पड़ता है। सचिन ने वो कर दिया है, जो अभी तक कोई नहीं कर पाया। इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं। शायद आगे कब होगा, यह भी पता नहीं। मैं सचिन को 2011 के वर्ल्ड कप में खेलते हुए देख रहा हूं। मुझे ऐसा भी लग रहा है कि वो एक दिवसीय मैच और टेस्ट में 100 शतक भी बनाएंगे। लेकिन फिर भी उनकी दीवानगी कम नहीं होगी। सचिन के उम्र की बात होती रहती है। लोग कहते हैं 36 साल पुराने सचिन की हड्डी पुरानी हो गयी। अब वोह बात नहीं। लेकिन सचिन क्या हाड़-मांस के बने भी हैं, ऐसा नहीं लगता मुझे। सचिन के साथ एक अरब हिंदुस्तानी लोगों की दुआ साथ है।
नज़रिया »
आवेश तिवारी ♦ हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में परिसरों के भीतर सेनाएं तैनात कर दी जाएं। शांत सड़कों, गलियों और घने जंगलों के बजाय छात्रावासों में पुलिस मुठभेड़ की कहानियां लिखी जाएं। ये भी हो सकता है कि विश्वविद्यालय का कुलपति छात्रों की सूची पुलिस को सौंप कर कहे, ये हैं माओवादी, इन्हें ले जाइए। ये भी संभव है कि गैरबराबरी का विरोध करने वाले देश के सारे लोग नक्सलवादी घोषित कर दिये जाएं। मगर इन तमाम संभावनों के बावजूद ये बेहद जरूरी है कि पूरे देश के छात्र इस साजिश के खिलाफ एकजुट हों और हल्ला बोलें। हाल की घटनाओं से ये स्पष्ट हो गया है कि छात्रों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। तिरुपति राव जैसे लोग देश में कम हैं।


