कथाकारों ने वर्धा में विभूति के प्रयासों की सराहना की
♦ सूरज प्रकाश
असग़र वजाहत को भेंट प्रदान करते हुए कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा। साथ में हैं सूरज प्रकाश एवं अजित राय।
कहानी पाठ करते हुए एसआर हरनोट। साथ विराजमान हैं (बायें से तेजेंद्र शर्मा, महुआ माजी, संजीव एवं अमरीक सिंह दीप)।
अपने लेख का पाठ करते हुए तेजेंद्र शर्मा। मंच पर विराजमान बायें से – राकेश, संतन कुमार, डा गंगा प्रसाद विमल, संजीव।
तेजेंद्र शर्मा के कहानी संग्रह क़ब्र का मुनाफ़ा का विमोचन करते हुए महात्मा गांधी विश्विविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय। साथ में करतल ध्वनि करते असग़र वजाहत, सेरा यात्री एवं डा सूरज पालीवाल।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) द्वारा 29-31 जनवरी 2010 को आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी कथा समय 2010 के अवसर पर एक अनौपचारिक कार्यक्रम में कथा यूके के 15 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर कथा यूके की ओर से अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान पाने वाले लेखकों के साथ एक अंतरंग संवाद संपन्न हुआ। उन्हें कथा यूके की ओर से एक प्रतीक चिन्ह एवं उपहार भेंट किया गया। ज्ञात रहे कि कथा यूके ने पिछले 15 वर्षों में हिंदी के जिन पन्द्रह लेखकों को अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया है वे इस समय हिंदी साहित्य की मुख्य धारा के महत्वपूर्ण लेखक हैं।
इस समय कथा साहित्य को लेकर आयोजित होने वाली कोई भी संगोष्ठी या कार्यक्रम इन लेखकों की भागीदारी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। इन लेखकों में असग़र वजाहत, चित्रा मुदगल, नासिरा शर्मा, संजीव, विभूति नारायण राय, ज्ञान चतुर्वेदी, भगवान दास मोरवाल, एसआर हरनोट, गीतांजलिश्री, अखिलेश, देवेंद्र, धीरेंद्र अस्थाना, प्रमोद कुमार तिवारी, मनोज रूपड़ा एवं महुआ माजी शामिल हैं।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कथा समय 2010 (हिंदी कथा साहित्य के दो दशक) में उपरोक्त कथाकारों में से असग़र वजाहत, संजीव, विभूति नारायण राय, एसआर हरनोट, भगवान दास मोरवाल और महुआ माजी कार्यक्रम में शामिल हुए। साथ ही कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा एवं भारतीय प्रतिनिधि सूरज प्रकाश और अजित राय भी कार्यक्रम में मौजूद थे।
इस अवसर पर आत्मीय संवाद में तेजेंद्र शर्मा ने कहा कि पिछले दो दशकों में जो भी श्रेष्ठ कथा साहित्य लिखा गया, उसे कथा यूके ने हमेशा रेखांकित किया। यही वजह है कि पिछले 15 वर्षों में कथा यूके ने हर वर्ष की एक श्रेष्ठ कृति का चुनाव कर उसके लेखक को सम्मानित किया है। यह ख़ुशी की बात है कि कथा यूके द्वारा चयनित कृतियों को व्यापक हिंदी समाज का समर्थन हासिल होता रहा है। और अभी तक इसको लेकर कोई अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) के कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से यहां साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम मिला है।
कथा समय 2010 का उदघाटन 29 जनवरी की शाम सुप्रसिद्ध कथाकार सेरा यात्री ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता विभूति नारायण राय ने की, जबकि बीज वक्तव्य असग़र वजाहत ने दिया। कार्यक्रम का संचालन राकेश श्रीवास्तव ने किया और साहित्य विद्यापीठ के डीन सूरज पालीवाल ने स्वागत भाषण में इस संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस अवसर पर विभूति नारायण राय ने तेजेंद्र शर्मा के कहानी संकलन क़ब्र का मुनाफ़ा (सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली) का लोकार्पण किया।
विश्वविद्यालय परिसर में महात्मा गांधी हिल के प्राकृतिक परिवेश में वरिष्ठ कथाकार और हंस के सहायक संपादक संजीव की अध्यक्षता में एक कहानी पाठ का आयोजन हुआ। इसमें अमरीक सिंह दीप (प्रलय), एसआर हरनोट (नदी खो गयी), महुआ माजी (चंद्र बिंदु) और तेजेंद्र शर्मा (क़ब्र का मुनाफ़ा) ने कहानी पाठ किया।
संगोष्ठी के दूसरे दिन (30 जनवरी) वरिष्ठ साहित्यकार गंगा प्रसाद विमल की अध्यक्षता में दो दशक की हिंदी कहानियों पर खुल कर चर्चा हुई, जिसमें संजीव, महुआ माजी, राजेंद्र राजन, वीरेंद्र मोहन, वंदना राग, सनत कुमार, सुशीला टाक भवरे आदि ने भाग लिया। तेजेंद्र शर्मा ने ‘भारत के बाहर हिंदी कथा साहित्य’ विषय पर अपना लिखित आलेख पढ़ा। उन्होंने दुनिया भर में लिखी जा रही हिंदी की महत्वपूर्ण कहानियों पर विस्तार से चर्चा की।
30 जनवरी महात्मा गांधी का शहादत दिवस होता है। समारोह की शुरुआत में दो मिनट का मौन रख कर बापू को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। इसी शाम कथा समय 2010 में सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत लिखित नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जन्मया हि नइ का मंचन राजेंद्र नाथ के निर्देशन में श्रीराम सेंटर रंगमंडल दिल्ली के कलाकारों ने किया। नाटक के मंचन से पहले विश्वविद्यालय के कुलपुति विभूति नारायण राय ने सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘जिस लाहौर… नाटक के दो दशक’ का लोकार्पण किया।
31 जनवरी को पिछले दो दशकों की कथा आलोचना पर चर्चा हुई। कथा समय 2010 में उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त अब्दुल बिस्मिल्लाह, वीरेंद्र यादव, सूरज प्रकाश, भगवान दास मोरवाल, वसंत त्रिपाठी, मीनाक्षी जोशी, मृदुला शुक्ल सहित विश्वविद्यालय के अध्यापकों और शोध छात्र शामिल हुए।









ओहो बड़े-बड़े तीसमारखां, प्रगतिशील, महाबुद्धिजीवि वहां मौजूद थे। पुरस्कार-सम्मान लेते समय अब इनमें से किसी को भी विचार या विचारधारा का रत्तीभर भी ख्याल नहीं आया होगा। आएगा भी क्यों?
एक तरफ वो महाप्रगतिशील साहित्यकार भी हैं जो आजकल तन-मन-धन से सैमसंग पुरस्कार दिए जाने का गा-बजाकर विरोध कर रहे हैं।
अच्छा तो चचा संजीव भी वहां थे। फिर भला वह क्यों इस हस्ताक्षर अभियान में शामिल होंगे।
यह दिल्ली दरबार के अमीर उमरा हैं. इन्होने तो अमीर खुसरो की चापलूसी की, बाद में उनको गालियाँ दीं, इन्होने गालिब को अपमानित किया, दारा शिकोह के खिलाफ थे यह . यह न्याय का साथ कभी नहीं देते . चापलूसी इनका ब्रह्मास्त्र है और हुकूमत की नज़र-ए-इनायत है इनका इनाम. इन इनामजीवी बुद्धिजीवियों से न्याय की उम्मीद नहीं करना चाहिए. और आज की तारीख में विभूति नारायण राय , हिन्दी दुनिया में इनाम देने की हैसियत रखने वालों में सरे फेहरिस्त हैं.
क्यो झूठ बोलते हो सूरज प्रकाश,यह कार्यक्रम कथा यूके के 15 वर्ष पूरे होने का उत्सव की तौर पर कब मनाया गया? मै वही था, और तेजेंद्र शर्मा की उपेक्षा होती देख रहा था. जबरन अपने आप का और कथा यूके का टुच्चा विज्ञापन क्यो? तेजेंद्र शर्मा खुद को कथाकार कहना बन्द करे तो ठीक है, इससे कथा यूके की गरिमा बच सकती है. सबने तो बायकाट किया
बुलाया कितनो को आए कितने? चित्रा मुदगल, नासिरा शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, भगवान दास मोरवाल, गीतांजलिश्री, अखिलेश, देवेंद्र, धीरेंद्र अस्थाना, मनोज रूपड़ा?
लिजलिजे लेखक आए जिनमे सस्ती लोकप्रियता और नकली लेखन तथा एक पुरानी बिना छ्पी, कही से मिली पांडुलिपि का अनुवाद करवा कर, संजीव से बाकायदा मय पारिश्रमिक ठीक करवा कर मी बोरिशाइल्ला से लेखिका बनी, महुआ माजी शामिल हैं। चाहे तो संजीव से पूछ ले वह इसे जीवन की भूल कह्ते है.
खैर हमे क्या?
महुआ माजी अपनी निहायत कमजोर भाषा-शैली और कथ्य संयोजन के बावजूद चाहे किसी से लिखवा कर या सौभाग्यवश आज की डेट में प्रतिष्ठित कथाकार बन चुकी हैं। यदि जरूरी ही हो तो उन्हें व्याखयान देना चाहिए, क्योकि वो पर्चा भी किसी का लिखा ही पढती है. अप्ने उप्न्यास पर मह्ज रटा रटाया बोलती है, नया पूछ्ने पर उसकी बोलती बन्द हो जाती है.
सस्तापन, फूह्ड् पहनावा… महुआ माजी को कब तक लेखिका बनाए रखेगा?
तेजेन्द्र जी, आपकी भारत यात्रा की रिपोर्ट भी पढी, समीक्षा और आलोचनात्मक टिप्प्णीयाँ भी, कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है और जो होता है उस पर आलोचना होना स्वाभाविक है. वर्धा में सैम्सुंग प्रश्न और हरियाणा में साहित्यकारों द्वारा “सम्मान हत्याओं” पर चुप्पी ऐसे प्रश्न थे जिनकी उपेक्षा किया जाना एक आपराधिक कृत से कम नहीं है. जो लोग स्वयं को कथाकार अथवा साहित्यकार की उपमा से नवाज़ते हैं या जाते है उनके क्रियाकलापों, सम्मेलनों,ब्यानों के माध्यम से ही उनकी कोई तसवीर उतारी जा सकती है कि इतिहास की किस घडी में वे कहाँ खडे थे. खैर मेरे लिये सेरा यात्रि जी की तस्वीर देखना एक बडी बात है, शायद १९९० में मैं उनके घर पर मिला था, लेकिन वर्तमान साहित्य की कोई चर्चा नहीं हुई, क्या “कथा यू.के.” राय साहब की वर्तमान साहित्य को निगल गयी?
Kisi ne bataya toh dekha ki koi mere naam se aapko tippaniyaan bhej raha/ rahi hai.
Paathkon ko bata den ki mainne kisi par koi tippani nahin kee hai.
Thanks.
Snowa Borno
Main is karyakram me hissa lene ke liye sharminda hoon. Main apni bhartsna karta hon aur sabse maafee mangta hoon.
Sanjeev
maaffi mangne ke liye shuriya SANJEEV. bhai ye kabtak chalega?…..daag to lag gaya…..jis dalaal ko, yaani AJIT RAI ko aapki patrika ne paal-poskar jawan kiya hai, aaoko uspar kuchh nahi kahna? rajendr yadawjee to eske liye prasidhh rahe hain….pahle bharat bhardwaaj aur ab ajit rai…. aapko espar bhi sharm pragat karni chaahiye.
Sanjeev ji, agar aap wohi samvesansheel kathakar Sanjeev hain, jinhen ham gupchup padhte rahe hain, to main chahti hoon ki aapne dukhi hokar oopar jo kuchh kaha hai, us par apni baat vistaar se naye logon tak pahunchaayen.
Yah agar sahitya hai to gandagi kya hoti hai?
Sachhe log gumanaam kyon rahna pasand karte hain?
Saadar,
Snowa Borno
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