क्या मृणाल पांडे वर्धा विवि से खुद को अलग करेंगी?
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के शोध छात्र देवाशीष प्रसून, कथाकार मिथिलेश प्रियदर्शी और विश्वविद्यालय के कुछ अन्य छात्रों ने कल चार फरवरी को दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में मृणाल पांडेय से संक्षिप्त मुलाक़ात की। इस दौरान उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने विश्वविद्यालय की कार्य-परिषद की बैठक में किन आधारों पर प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति को ख़ारिज करने पर अपनी सहमति दी? उनका जवाब था कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जब इस नियुक्ति को न्यायालय में बतौर गलती स्वीकार कर लिया था, तो किसी तरह की कानूनी फजीहत से बचने के लिए यह निर्णय लिया गया। छात्रों ने कहा कि इस विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में पहली बार राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त किसी काबिल व्यक्ति ने अध्यापन का कार्यभार संभाल था। उनको विश्वविद्यालय से निकाले जाने से विद्यार्थी बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसके लिए कुलपति विभूति नारायण ने कार्य-परिषद के सभी नवनिर्वाचित सदस्यों को जिम्मेवार माना, जो अनिल चमड़िया की प्रोफेसरी को खरिज करने पर तुले हुए थे। छात्र जब विभूति के इस बयान का प्रमाण देने लगे तो झल्लाकर मृणाल जी कहती हैं कि उन पर बेवजह आरोप लग रहा है। यह उनके प्रति लोगों के पूर्वाग्रह के कारण से है और ऐसी छीछालेदर को देखते हुए कल ही वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कार्य परिषद से इस्तीफा दे देंगी। अब यह आज पता चलेगा कि यह मृणाल जी की झुंझलाहट थी या एक जबावदेह बयान।









agar poorwagrah na ho anil chamadiya ke prati to unhe isteefa de hi dena chahiye.
विभूति नारायन क्या ओर मृणाल पांडेय क्या ये सब के सब छात्र विरोधी है. विवि को बरबाद करके छोडेंगे..इन्हे “चोर” अंकित राय नहीं दिखता?
असली जड़ तो “चोर” अंकित राय ही है ज्ञान भाई.
स्वागत है.
मृणाल पांडे इस्तीफा शायद ही देंगी। वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा इस्तीफा देंगे। वो विभूति का दिया पद और पैसा नहीं लेंगे। ऐसा उन्होंने सार्वजनिक रूप से कम से कम 10 लोगों को कहा है। वे नहीं चाहते कि उनके इतने साल के किए धरे पर जातिवाद की कालिख पुत जाए।
आप यहाँ भी देखिये- http://mgahv.blogspot.com/2010/02/blog-post_04.html
भाई संजय बर्नवाल जी, क्या अविनाश जी बनिया हैं। अच्छा किया आपने बता दिया, अभी तक मैं नहीं जान रहा था। मैं वैसे भी जाति-वाति में विश्वास नहीं करता। लेकिन मुफ्त में ज्ञानवद्धर्न हो रहा है तो क्या नुकसान। मोहल्ला पर पढ़-पढ़ कर मैं यही जान सका कि विभूति नारायण राय भूमिहार है, जो अनिल चमड़िया जैसे वरिष्ठ पत्रकार को नौकरी से निकाल दिया है। मेरा विरोध अनिल चमड़िया से नहीं है और अविनाश (सिर्फ सूरत और नीयत को छोड़कर) का तो मैं फैन ही हूं। अब जबकि आपने जाति भी बता दी तो मेरी अविनाश के प्रति पसंदगी का ग्राफ एक प्वाइंट गिर गया है। सूरत, नीयत के साथ अब जाति भी जुड़ गई है। नाम से तो बर्नवाल जी आप भी बनिया लगते हैं (पता न कितना सच है)। फिर भी आपके प्रति किसी तरह के आग्रह-दुराग्रह से इतर मैं बता दूं कि मुझे सबसे ज्यादा नफरत बनिया से ही है। क्योंकि बनिए के बच्चे को जन्म लेते ही सबसे पहले बनियागिरी सिखाई जाती है। बनियागिरी यानि लोगों को ठगने की कला। जब तक बनिया ठगे नहीं, तबतक उसकी दुकानदारी नहीं चलती। यही ठगी लोगों को धुर्त बनने के लिए प्रेरित करती है और धुर्त व्यक्ति कभी किसी का अपना नहीं होता। जब विभूति ने अनिल चमड़िया को नौकरी दी तब तो वह बहुत अच्छे थे और अब जब ले ली तो बहुत खराब हो गए। अविनाश जी को भी जब प्रभात खबर वाले हरिवंश जी ने नौकरी दी थी, तब हरिवंश जी इस देश के सबसे बड़े पत्रकार थे, लेकिन जब ले ली तब…। कथादेश में हरिवंश जी पर अविनाश का लिखा मैंने पढ़ा था। भाई बर्नवाल जी, अविनाश जी, चमड़िया जी, कुछ तो शर्म करो और बनियागिरी से बाज आओ। नौकरी लेने देने से किसी के व्यक्तित्व का आकलन नहीं करना चाहिए।
जगदीश श्रीवास्तव, मैं मोहल्ले पर जातिपक्षपात के बारे में पढ़ता रहा हूं लेकिन अभी तक विश्वास नहीं होता था कि कोई व्यक्ति की विचारधारा इतनी कमीना हो स कि उसके मन में एक जाति के प्रति बैर अंदर इतना अंदर तक गहरा जाये कि किसी की नौकरी तक लेने पर आजाये.
आज आपके बनिया जाति के बारे में विचार पढ़े तो आपको देख लिया, अब मुझे विश्वास है कि विभूति नारायण भी आपकी तरह विचारधारा रखने वाला ही कोई होगा…
होती है, एसी कमीनी विचारधारा होती है, जो मांबाप संस्कार देते है, बच्चा उन्हें ही ढोता है, ढोते रहता है,
थू है आपकी किसी जाति के प्रति विचारधारा पर
ह ह ह ह आप बोल दिये न रमेश जी, बस जगदीश यही चाह रहे थे मैं सोचा कि ये खुद लिखकर जब खुद ही उजागर हो रहे हैं तो इस तरह थूका न जाये न ही कुछ बोला जाय बस ह ह हा हा ही कफी है.
कफी को काफी पढ़ें.
खुफिया नजर को संबोधित-
http://matmatantar.blogspot.com/2009/05/3.html
Wednesday, May 20, 2009
यादों में बसे लोग- 3
“जो जात-पांत की बात करे, उस पर थूक दीजिए…”
1991 में मैं एमए (इतिहास) में दाखिला ले चुका था। विजय कुमार ठाकुर के संरक्षण में अशोक जी ने “इतिहास विचार मंच” की स्थापना की, जिसका मुझे संयोजक बनाया गया। इस संस्था का प्रमुख काम अकादमिक महत्त्व के विषयों में लेक्चर आयोजित करना था। इसी सिलसिले में हमलोग एक दिन आलोक धन्वा से मिले और “प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था” विषय पर अपनी बात रखने के लिए उनसे आग्रह किया। लगभग आधे घंटे तक वे तफसील से बताते रहे कि किन-किन महत्त्वपूर्ण गोष्ठयों की उन्होंने अध्यक्षता की है। इस बात को भी रेखांकित किया कि कैसे आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा ने उनसे एक बार किसी गोष्ठी की अध्यक्षता करवाई थी, जब वे महज इंटर के छात्र थे। लगभग आधे घंटे की अपनी विरुद् गाथा से निवृत्त होकर उन्होनें बदली भंगिमा में कहना शुरू किया- “राजू भाई, अगर कोई जाति-पांति की बात करता हो तो वैसे लोगों पर थूक दीजिए।” मैंने हल्का प्रतिवाद करने की कोशिश की- “आलोक जी, मैं जाति की राजनीति करने की कोई मंशा नहीं रखता। मेरा उद्देश्य तो समस्या का समाजशास्त्रीय अध्ययन भर है।”
वे कहां मानने वाले थे। जब वे अपनी रौ में होते तो सामने वाले की शायद ही सुनते थे। फिर वे अपने मूल कथन को ही दुहराने लगे। मैं तो लिहाजवश चुप ही रहा, लेकिन अशोक जी ने अपना मुखर मौन तोड़ा। कहने लगे- “आलोक जी, सच्चाई यह है कि जाति-पांति का नाम लेने वाले हर आदमी पर अगर इसी तरह थूकते रहे तो आप डिहाइड्रेशन के शिकार हो जाएंगे और देवयोग से अगर बच भी गए तो अपने ही थूक के अंबार में डूबे जीवन की भीख मांगते नजर आएंगे। वैसे इसकी कम ही संभावना है कि ऐसा करने को आप बचे भी रहें।” इसके बाद हम दोनों मन ही मन कुढ़ते हुए अशोक जी के लालबाग स्थित डेरे में लौट आए।
नौकर के खर्च में तो एक बीवी रखी जा सकती है…
आलोक धन्वा एक लंबे समय से एकाकीपन में जीते आ रहे थे। शादी नहीं की थी। इस लायक शायद किसी को समझा नहीं था। या फिर कोई और कारण भी हो सकता है। कभी-कभी वे शारीरिक दुर्बलताओं का भी जिक्र किया करते। लेकिन इन दिनों शादी को लेकर कुछ गंभीर होने लगे थे। “छतों पर लड़कियां” कविता का ठीक यही समय है। एक दिन वे खाने-पीने की दिक्कतों की बात करने लगे। मैंने सलाह दी, “कोई नौकर क्यों नहीं रख लेते?” वे बोल उठे- “नौकर बहुत महंगा हो गया है। खाता भी बहुत है। उतने खर्च में तो एक बीवी भी रखी जा सकती है।”
मैं भी वही हूं…
वे जानते थे कि मेरी शादी हो चुकी है, इसलिए पूछ बैठे- “राजू भाई, आपकी कोई बड़ी साली है?” मैंने मजाक के लहजे में कहा- “सर, मेरी पत्नी बहनों में सबसे बड़ी है। अफसोस!” वे कहने लगे- “कोई बात नहीं, इधर-उधर ही देखिए।”
आगे उन्होंने अंतिम सत्य की तरह जोड़ते हुए कहा- “आप तो मेरी जाति जानते हैं न राजू भाई? आप भूमिहार हैं न! मैं भी वही हूं।”
Posted by राजू रंजन at 11:51 PM
Labels: यादें
और जहां तक जगदीश श्रीवास्तव नाम के फर्जी शख्स का सवाल है, वह मूर्ख है, बेहूदा है, बेहया है, हरबोलवा और कुंठित है। (इतना याद रखना श्रीवास्तव हमारी जुबान गालियां नहीं निकाल सकती
इसलिए उसकी बातों पर गौर करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। उसका लिखा अगर मजबूरी में पढ़ भी लें तो उसके अविकसित मस्तिष्क वाला होने के कारण उस पर दया करें। उस पर गुस्साने या थूकने की जरूरत नहीं है।
भाई रमेश अग्रवाल और (बहन या भाई कुछ भी) सुमन जी।
जाति की बात आई तो कितना बुरा लगा। लेकिन पहले इसकी पृष्ठभूमि तो जान लेते। किसी संजय बर्नवाल जी ने पूर्व के पोस्ट में अपनी बनियागिरी का उल्लेख करते हुए कहा था कि इस बार विभूति का पाला बनिया से पड़ा है। मेरी यह प्रतिक्रिया उसी के बाद आई है। कृपया आप दोनों अपनी सलाह पहले संजय बर्नवाल को दें। जहां तक बनियागिरी से मेरी नफरत की बात है तो उस पर मैं हमेशा अडिग रहूंगा। इसकी वजह भी है। मैं ठहरा किसान का बेटा जो अन्न उपजाता है और लोगों का पेट तथा बनिया की तिजोरी भरता है। बनियागिरी के चलते किसान तीन तरह से ठगे जाते हैं। बचपन में दुकान से सामान लाने के दौरान मैंने इस कला का बारीकी से अध्ययन किया है और भुगता भी है। गांव की दुकानों से आज भी अनाज के बदले सामान खरीदे जाते हैं, जिनमें पांच तरह की ठगी होती है। प्रथम तो अनाज का भाव कम लगाया जाता है। दूसरा तौलते समय डंडी मारी जाती है। तीसरा, सामान की कीमत ऊंची लगाई जाती है और इसे तौलते समय भी डंडी मारी जाती है। पांचवा, सामान में मिलावट तो आम बात है। एेसे में आप लोग मेरी नफरत की वजह समझ सकते हैं। फिर भी आप सबको आपत्ति है तो अपनी नफरत का एंगल बनिया के बदले बनियागिरी की तरफ मोड़ देता हूं। लेकिन एक बार आप लोग संजय बर्नवाल जी से भी आग्रह कर लो कि मुद्दों पर बहस के बीच में जात-पात को मत लाएं। हम बहस में बने रहेंगे। बशर्ते, आप लोग अपना स्तर थोड़ा और ऊंचा कर लो।
श्रीवास्तव, तुम सबसे नीचे पड़े सड़ रहे हो। संजय वर्णवाल सहित विभूतिनारायण राय के खिलाफ खड़े सारे लोग तुमसे बहुत ऊपर खड़े हैं। इसलिए अपनी फिक्र करो। जाओ… मूंगफली खरीदो। और खरीदते समय वजन करते या डंडी मारते मत देखना। मारते-मारते गर्दा उड़ा देंगे आज के बनिया। अब ज्यादातर दुकानें सवर्णों की हैं। और जिनकी दुकान होती है वह सब बनिया होते हैं।
जगदीश, “विभूति का पाला बनिया से पड़ा है” का मतलब तुमने ये समझा कि अविनाश बनिया है? अब इस जगदीश की अक्ल का क्या करें। किसी दुकान में IQ बढ़ाने वाला टॉनिक बिकता है क्या। वैसे मैं क्षमाप्रार्थी हूं कि मैंने जाति शब्दों का इस्तेमाल किया। विभूति के खिलाफ लड़ाई हर न्यायपसंद आदमी की है,चाहे वो ब्राह्मण हो या दलित। विभूति की हरकत से किसी भी जाति का भला नहीं हो रहा है। बस कड़वाहट बढ़ रही है। मुझे माफ करें। मेरी इस तरह की बात से विभूति के खिलाफ लड़ाई कमजोर हो सकती है। मैं अपने शब्द वापस लेता हूं।
बर्णवाल भाई जान।
आपने अपना शब्द वापस ले लिया और माफी मांग ली तो चलो मोगैम्बो भी खुश हो गया। अपना उसूल भी बिना वजह लड़ाई लड़ने का नहीं। लेकिन हम दोनों के झगड़े में यह राजन कहां से टपक पड़ा। कौन है यह। लगता है कुली-कबाड़ी है, गर्दा उड़ाने की बात करता है। शार्ट टेंपरामेंट का भी है। खैर अपन का टेंपरामेंट बिल्कुल ठीक है यार। मुझे क्या लेना-देना किसी की जन्मजात बीमारी से। बेचारा राजन। परिचित होता तो कांके (रांची) में भर्ती भी करा देता, लेकिन वह भी तो नहीं है। एेसे में तरस खाने के अलावा और मैं क्या कर सकता हूं। बहरहाल बर्णवाल जी, माफी मांगने और भविष्य में फिर जाति-बिरादरी की बात न करने के संकल्प के लिए एक बार फिर आभार। जाति-बिरादरी की बात नीच आदमी करते हैं यार। तुम्हारी तो समझदारी ठीक-ठाक लगती है।
ANIL CHAMADIYA DALIT HAIN HI NAHI.
hote to kya aap unhe sir-aankhoN par bitha lete!
तृतीय श्रेणी से स्नातक पास एक व्यक्ति को प्रोफेसर बनाकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का सिलसिला कब तक चलेगा। यहां सवाल जाति, धर्म, संप्रदाय या मजहब से जुड़ा हुआ नहीं है। यहां बात अनुशानस की है। यहां बात काबलियत की हो रही है। यहां बात शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने की है न की किसी न किसी बहाने अपनी राजनीति चमकाने की। यह तो बेशर्मी की हद है कि चमड़िया जी अयोग्य होने के बावजूद दूसरे योग्य व्यक्तियों पर तोहमत लगा रहे हैं। मुझे तो ये सोचकर हंसी आती है कि शिक्षा के क्षेत्र में कैसे कैसे लोग घुसपैठ करने की जुगत में लगे रहते हैं। तहजीब के दायरे में रहकर तमीत से शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन शराब पीकर विश्वविद्यालय परिसर में दादागिरी दिखाना भी ठीक बात नहीं है। यहीं नहीं जब लोग कहे कि भाई विश्वविद्यालय परिसर में शराब पीकर मत आओं तो उन पर बिना देरी किए दलित नामक ब्रह्मास्त्र से वार करना दुनिया के किस संविधान में लिखा गया है। विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के अलावा अगर कोई शख्स राजनीति या बाबा साहेब आंबेडकर के नाम का दुरूपयोग करता है तो वह व्यक्ति छात्र समुदाय के साथ साथ समाज और देश का सबसे बड़ा गुनहगार है।
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आपका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
अपने यहां आज तक जितनी पी.एच.डी. हुई हैं सब पर जांच बिठा दी जाए तो आधे से ज़्यादा को नानी याद आ जाएगी। और जब चमड़िया को रखकर और निकालकर ग़लती ‘सुधारी’ जा सकती है तो एक दिन वो भी आएगा जब बोगस पी.एच.डी.धारिओं से डिग्री वापस लेकर ग़लती सुधारी जाएगी। थोड़ा इंतज़ार कीजिए।
भाई लोग, अब तक मैं यह नहीं समझ पाया कि यह साला लाला (जगदीश श्रीवास्तव) कहां से निकला है। लगता है साले को मां-बाप ने संस्कार ही नहीं दिए। हमारे यहां तो लाला लोग बड़े संस्कारवान लोग माने जाते है, ये साला तो बनियों के पिछे ही पड़ गया। साले श्रीवास्तव जब तू पैदा लिया होगा तो तेरी मां को जो खाने का सामान दिया गया होगा, वह बनिये की दुकान का ही होगा। इस तरह की बातें कर के क्यू अपने गवांर और असंस्कारी होने का परिचय दे रहा है। साले असल मुद्दे से ध्यान ही भटका दिया। क्यों भाई लोगों.?
शरमा जी, तो क्या आरक्षण से आने वाले लोग दूध से धुले रहेंगे इसकी गारंटी लेते हैं आप? आप ज़रा उनका भी कुछ डाटा पेश करें कि उनकी प्रोडक्टिविटी बहुत ऊपर है -
अगर आपका इशारा इस तरफ है कि बिना आरक्षण के आने वाले डाक्टर गुर्दे बेचते हैं तो इसलिए आरक्षण उचित है तो बलिहारी है आपकी सोच की | और नहीं तो यह भी देखिये कि जो भी ऊंचे डाक्टर है वाब ज़्यादातर (मैं अंदाज़ से ही लिख रहा हूँ) बिना आरक्षण के आये हैं|
आप फिर अवसरों की कमी की बात करें उससे पहले मैं आपसे यह बता दूं, कि अगर उचित अवसर मिलें और काफी डाक्टर आरक्षण से आने लगेंगे तो क्या फिर उनमें कुछ बेईमान नहीं होंगे ? या सारे के सारे सत्य वादी बनेंगे?
जो किसी तरह से डिग्री हथिया ले ऐसी पद्धति का विरोध करें – आपके वक्तव्य से लगता है कि डिग्री लेना या पढ़ाई लिखाई का ही कोई महत्व नहीं है – तो फिर क्या कोई विश्वविद्यालय खुला अखाड़ा बन जाए?
[...] इससे जुड़ी पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं : क्या मृणाल पांडे वर्धा विवि से खुद को… [...]
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