कुलपति का पुतला दहन करेंगे वर्धा के छात्र
♦ वर्धा से प्रेस विज्ञप्ति
हिंदी विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं का आंदोलन बड़ा होता जा रहा है। जनसंचार विभाग के लोकप्रिय प्रोफेसर अनिल चमड़िया को यहां से हटाये जाने के विरोध में विद्यार्थियों ने बैठक कर विश्वविद्यालय में व्याप्त अलोकतांत्रिक माहौल को खत्म करने पर कुछ ठोस कार्यक्रम बनाये।
विश्वविद्यालय में लगातार हो रही अनियमितताओं और कुलपति विभूति नारायण राय के मनमाने फ़ैसले से विद्यार्थियों में आक्रोश व्याप्त है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि अनिल चमड़िया बहुत ही बेहतरीन शिक्षक हैं लेकिन उनकी सत्य के प्रति पक्षधरता विश्वविद्यालय प्रशासन को शुरू से खटक रही थी। इसलिए उनकी नियुक्ति को कुलपति ने एक्जक्यूटिव कौंसिल के निर्णय की आड़ में निरस्त करवाया। जिस आधार पर कुलपति प्रो चमड़िया की नियुक्ति को गलत बता रहे हैं, उसी मामले में कुलपति ने न्यायालय में खुद अपनी गलती स्वीकारी है। छात्रों का कहना है कि प्रशासन का यह दोहरा चरित्र और अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल है। इससे पहले भी दलित उत्पीड़न के एक मामले में प्रशासन ने अपना पक्ष विद्यार्थियों के बीच नहीं रखा। जबकि वह आंदोलन महीने भर से ज़्यादा समय तक चला था। इस बैठक में छात्र-छात्राओं द्वारा कई तरह के प्रस्ताव आये जिसमें कुलपति का पुतला दहन करने की बात भी कही गयी। इसके साथ–साथ विरोध प्रदर्शन में जुलूस निकालने व कक्षा का सामूहिक वहिष्कार करने पर भी चर्चा की गयी। बैठक में छात्र-छात्राओं ने अकादमिक स्तर पर होने वाली परेशानियों व विभाग में छात्रों के साथ हो रहे दुर्भावनापूर्ण व्यवहार को भी एक दूसरे से साझा किया।
विद्यार्थियों की इस सामूहिक बैठक में यह फैसला लिया गया कि प्रो अनिल चमड़िया के निकाले जाने के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा, जिसमें पूरे विश्वविद्यालय के लोग शामिल हों। साथ ही यह भी फैसला लिया गया कि इस तरह की सामूहिक बैठक नियमित हो, जिसमें सभी छात्र-छात्राएं अपनी बेबाक टिप्पणी दर्ज़ करें। जनसंचार विभाग के 22 विद्यार्थियों ने पहले ही इस फैसले के विरोध में अनिश्चितकालीन कक्षा बहिष्कार और अपनी-अपनी डिग्री वापस करने को लेकर एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया है। विद्यार्थियों का यह मानना था कि अगर प्रो चमड़िया को ससम्मान वापस नहीं लाया जाता है और प्रशासन अपने हिटलरी फरमान को नहीं छोड़ता है, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
छात्रों का एक समूह जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, आइआइएमसी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और देश भर के अन्य जगहों में चलाये जा रहे हस्ताक्षर अभियान को इकट्ठा करके राष्ट्रपति, यूजीसी, मानव संसाधन मंत्रालय और सभी संबंधित जगहों पर भेजे जाने का काम भी करेगा।









अविनाश जी, आपकी खबरों का असर नहीं हो रहा है तो बंद कर दो यह प्रलाप। विभूति नारायण के पीछे महीने भर से तो लंगोटी खोल कर पीछे पड़े हो। फिर भी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पा रहे हो। यहां बर्धा में किसी के खिलाफ पुतला दहन की कोई योजना नहीं है यार। न ही छात्रों में आक्रोश है। सब बकबास लिख रहे हो। अपने मोहल्ले में नाली बहा रहे हो। अरे अच्छी-अच्छी बातें लिखो। दुनिया पढ़ेगी, तुम्हारे शब्द ज्ञान से अभिभूत भी होगी।
प्रिय जगदीश,
मैं तो नहीं था पर छात्रों की व ए.एस.एफ. अम्बेडकर स्टूडेन्ट फोरम की बैठक में यह प्रस्ताव लिया गया है. अब तुन्हें पता होना चाहिये कि ए.एस.एफ. में विश्वविद्यालय के २४७ छात्रों में १०० से अधिक छात्र हैं. बाकी तकरीबन ६० अन्य छात्रों ने भी हस्ताक्षर किया है कुछ छात्र हैं भी नहीं, गणित जानते हो तो आंकड़ा और प्रतिशत लगा लो.
प्रिय सुमन मुझे नहीं पता की आपक किस क्लास तक गणित पढ़े है ,पर गणित करना जानते है आप . यह सब आपकी ही करतूत है की आंबेडकर के नाम का दुरुपयोग किया जाय.
kitane छात्र है यह सबको पता है. हर छात्र इस कीचड का क्या करेगा. यह तो वाही करे जिसके पास कोई काम न हो . जैसा की मै आपका नाकाबिल छात्र.मेरे विभाग के शायद ही किसीछात्र ने आपलोगों का साथ दिया हो . दलित के नाम पर आजकल दलित ही उत्पीडन कर रहे है. पता यह भी चला है कि आप भी दलित नहीं है ठीक वैसे ही जैसे एल कारुन्याकर सर जो पैदा तो हुए इसाई धर्म में पर वक्त का तकाजा देखिया और बन गए बौध दलित. लखनऊ में गेस्ट लेक्चरारो से कमिसन लेकर पढवाते थे पता नहीं यहाँ प् रहे है कि नहीं देखना पडेगा आजकल खूब सांठ गाँठ हो रही है आपकी . आखिर आप भी तो रंगे सियार है
निश्चित तौर पर यहाँ विद्यार्थियों में आक्रोश है. आक्रोश की सीमा यह है कि पहली बार कुलपति के पुतले दहन जैसे मामले पर दर्जन से अधिक छात्र-छात्राओं ने सहमति जताई जबकि यहाँ आपसी बात-चीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने की अब तक परंपरा रही है. दरअसल अनिल चमड़िया के निकाले जाने को अब यहाँ कोई एक फैसले के रूप में नहीं देख रहा है बल्कि इस मामले में बड़ी सहमति है यह कि यह फैसला यहाँ की अब तक की कार्यसंस्कृति का परिणाम है जिसमें आलाअधिकारियों को यह लगता है कि वे कोई भी निर्णय लें बड़ा विरोध नहीं होने वाला है. और यह भी कि होने वाले ’टुच्चे विरोध” को वह आसानी से झेल लेगा. कल से फिर दफ़्तर खुलेगी कल से फिर वही फैसले होंगे.
पुतला दहन और छात्र आंदोलन हर विश्वविद्यालय में होते रहता है लेकिन वर्धा में बाहरी लोग जरुरत से ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं. ऐसे पत्रकार जिनको वर्धा से कोई लेना देना नहीं हो सकता है केवल अपनी जातिगत दुश्मनी साधने क लिए छात्रों को भड़काने का काम कर रहे हैं. विभूति जैसे कुलपति ही वर्धा को सुधार सकते हैं. हार्ड फैसला हमेशा कटु होता है लेकिन अंततः दूरगामी और अछे परिणाम देते हैं.
KULPATI JI IN STUDENTS KE BACK PER 25 DANDE MAAR KAR INKO EXPEL KAR DIJIYE.
हां जो भी विरोध कर रहा है उसे एक्सपेल कर दीजिए। फिर सब गाएंगे ओम जय विभूति हरे। क्या बात कही है। ऐसे ही चलाना चाहिए विश्वविद्यालयों को। वरना छात्र बिगड़ जाएंगे। वैसे मार तो इस समय विभूति के बैक पर पड़ ही है रिंकू। तुम्हें नजर नहीं आता कि इस समय पिटाई किसकी हो रही है। आयोडैक्स लेकर जाओ उनके घर।
अविनाश की असलियत भी अब ज़माने के सामने आ चुकी है। मीडिया और पत्रकारिता के नाम पर सच्चाई को दबाने का कारोबार कब तक चलेगा। तृतीय श्रेणी से स्नातक पास एक व्यक्ति को प्रोफेसर बनाकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का सिलसिला कब तक चलेगा। तहजीब के दायरे में रहकर तमीत से शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन शराब पीकर विश्वविद्यालय परिसर में दादागिरी दिखाना भी ठीक बात नहीं है। यहीं नहीं जब लोग कहे कि भाई विश्वविद्यालय परिसर में शराब पीकर मत आओं तो उन पर बिना देरी किए दलित नामक ब्रह्मास्त्र से वार करना दुनिया के किस संविधान में लिखा गया है। विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के अलावा अगर कोई शख्स राजनीति या बाबा साहेब आंबेडकर के नाम का दुरूपयोग करता है तो वह व्यक्ति छात्र समुदाय के साथ साथ समाज और देश का सबसे बड़ा गुनहगार है।
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आनका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
कुलपति राय का पुतला मेरे रहते जल नही सकता
हम वर्धा के पुराने दबंग है, देखते है कौन मेरी इस तक्षशिला मे धुआँ उठाता है.
बहुत हुआ विभूति पुराण …
राकेश मिश्र
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