वर्धा विश्वविद्यालय एक कबीला बन गया है
♦ बृजेश सिंह
पिछले कुछ दिनों से मोहल्ला पर बहस चल रही है। अनिल चमड़िया को वर्धा विश्ववविद्यालय से निकालना सही है या गलत। इस मामले का तकनीकी पक्ष क्या है, इसकी जानकारी तो विश्वविद्यालय के पास होगी, लेकिन जिस तरह से मोहल्ला लाइव ने अनिल जी के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है, वो भी समझ से परे है। अनिल चमड़िया जब वर्धा विश्वविद्यालय में आये, उसके कुछ समय बाद ही वहां अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित की गयी थीं।
मैने भी एमफिल और पीएचडी पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए फॉर्म भरा। जब प्रवेश परीक्षा देने हम वर्धा पहुंचे, तब वहां का माहौल देख कर साफ हो गया कि यहां बाहर से आये अर्थात जो प्रतिभागी इस विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे, उनका दाखिला नहीं लेने की बाबत राय बनायी जा चुकी है। प्रशासन ने यह निर्णय ले लिया था कि बाहर के किसी छात्र को यहां एडमिशन नहीं दिया जाएगा। हुआ भी यही। एक-दो सीटों को छोड़ कर एमफिल की सभी सीटों पर वहीं के छात्रों को एडमिशन दिया गया। भले ही उनमें से कई उसके योग्य नहीं थे। ठीक इसी प्रकार की धांधली पीएचडी की प्रवेश परीक्षा के दौरान भी की गयी। पीएचडी के साक्षात्कार के दौरान कुछ छात्रों से कुछ भी नहीं पूछा गया। साक्षात्कार पैनल में चमड़िया जी भी थे।
कई ऐसे छात्र थे, जो इस बात से हैरान थे कि उनका सलेक्शन कैसे हो गया। बाहर के छात्र बाहर ही रह गये। ये सारी बातें आप किसी भी छात्र से पूछ सकते हैं, जो पिछली बार यहां परीक्षा देने आये थे। प्रवेश परीक्षा की पूरी प्रक्रिया केवल दिखावा मात्र थी। जिस परीक्षा समिति ने यह सारा खेल किया, उसके सदस्य चमड़िया जी भी थे। लेकिन उन्होंने इस अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठायी। उस दौरान उन्हें नहीं लगा कि कोई अन्याय हो रहा है।
यह विश्वविद्यालय एक कबीला बन गया है। जहां एक खास तरह के लोग अपने लोगों को वहां भरने में जुटे हैं। ये सारी बातें मैं आपसे इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इस पाप में अनिल जी भी बराबर के हिस्सेदार हैं। आज उन्हें लग रहा है कि उनके साथ बहुत नाइंसाफी हुई है। लेकिन लंबे समय तक वर्धा कैंपस में हो रहे अन्याय को लेकर उन्होंने भी आंख पर पट्टी बांध रखी थी। आज जब आग अपने घर में लग गयी है तो वर्धा विश्वविद्यालय के प्रशासन में सारी कमियां दिख रही हैं।
आज जो प्रशासन चमड़िया जी को धृतराष्ट्र नजर आ रहा है। अगर वह ऐसा नहीं होता तो चमड़िया साहब को वहां नौकरी भी नहीं मिलती। मैंने ये सारी बातें इसलिए लिखी हैं ताकि आपको भी इस बारे में पता चले कि जिनके पक्ष में आप कैंपेन चला रहे हैं और आपको लगता है कि उनके साथ बहुत नाइंसाफी हुई वो खुद कुछ दिनों पहले तक उसी भ्रष्ट व्यवस्था का सर्मथक था।
(लेखक के बारे में : माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर। फिलहाल भास्कर डॉट कॉम में सब एडिटर)









bat to sahi hai. chamadia ne to marks me bhi heraferi ki hai
बृजेश जी, मैं यहाँ पर मीडिया विभाग में पी.एच. डी. का छात्र हूँ क्या आप एक बार इमानदारी से सोचेंगे कि जब डिस्कसन का सत्र चल रहा था तो उसमे सबसे अच्छी प्रस्तुति हिन्दी वि.वि. के ही छात्रों की थी इसलिये उनकी ज्यादा संख्या में नियुक्ति का होना सम्भव था. अनिल चमड़िया को लेकर जो बात आप कह रहे हैं कि उन्होंने आवाज क्यों नहीं उठायी इस पूरी प्रक्रिया को जब दुबारा किया गया तो विभूति नारायण राय ने अनिल चमड़िया को ही इस प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों के लिये दोषी माना था जबकि उसमे प्रो. वी.सी. व ऐसे ५ अन्य सदस्य भी सम्मलित थे लिहाजा आप समझ सकते हैं कि कुलपति कब से और कितना अनिल चमड़िया के पीछे पड़े रहे हैं.
ANIL CHAMADIYA KO NIYUKT HI NAHI KARNA CHAHIYE THA. GALTI SUDHARNE KE LIYE KULPATI JI KO DHANYAVAAD.
तृतीय श्रेणी से स्नातक पास एक व्यक्ति को प्रोफेसर बनाकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का सिलसिला कब तक चलेगा। यहां सवाल जाति, धर्म, संप्रदाय या मजहब से जुड़ा हुआ नहीं है। यहां बात अनुशानस की है। यहां बात काबलियत की हो रही है। यहां बात शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने की है न की किसी न किसी बहाने अपनी राजनीति चमकाने की। यह तो बेशर्मी की हद है कि चमड़िया जी अयोग्य होने के बावजूद दूसरे योग्य व्यक्तियों पर तोहमत लगा रहे हैं। मुझे तो ये सोचकर हंसी आती है कि शिक्षा के क्षेत्र में कैसे कैसे लोग घुसपैठ करने की जुगत में लगे रहते हैं। तहजीब के दायरे में रहकर तमीत से शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन शराब पीकर विश्वविद्यालय परिसर में दादागिरी दिखाना भी ठीक बात नहीं है। यहीं नहीं जब लोग कहे कि भाई विश्वविद्यालय परिसर में शराब पीकर मत आओं तो उन पर बिना देरी किए दलित नामक ब्रह्मास्त्र से वार करना दुनिया के किस संविधान में लिखा गया है। विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के अलावा अगर कोई शख्स राजनीति या बाबा साहेब आंबेडकर के नाम का दुरूपयोग करता है तो वह व्यक्ति छात्र समुदाय के साथ साथ समाज और देश का सबसे बड़ा गुनहगार है।
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आपका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
अपने यहां आज तक जितनी पी.एच.डी. हुई हैं सब पर जांच बिठा दी जाए तो आधे से ज़्यादा को नानी याद आ जाएगी। और जब चमड़िया को रखकर और निकालकर ग़लती ‘सुधारी’ जा सकती है तो एक दिन वो भी आएगा जब बोगस पी.एच.डी.धारिओं से डिग्री वापस लेकर ग़लती सुधारी जाएगी। थोड़ा इंतज़ार कीजिए।
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