पत्रकारिता ईश्वरीय पाठ्यक्रम नहीं है, उसे बदलो!
प्रति,
अध्यक्ष
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग,
नयी दिल्ली
महोदय,
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) की ओर से हम सभी युवा पत्रकार, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) में पत्रकारिता के प्रोफेसर व वरिष्ठ पत्रकार, अनिल चमड़िया को बिना कोई कारण बताये निकाले जानी की कड़ी निंदा करते हैं। जैसा कि आपको ज्ञात होगा, विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय ने प्रो अनिल चमड़िया को व्यक्तिगत नापसंदगी के चलते कार्यपरिषद की नामंजूरी का बहाना बनाकर विश्वविद्यालय से निकाल दिया दिया। साथ ही आपको यह भी ज्ञात होगा कि वहां इन्हीं कुलपति महोदय ने छात्रों के विरोध के बावजूद एक नकलची प्रोफेसर को पत्रकारिता विभाग का विभागाध्यक्ष बना रखा है।
अध्यक्ष महोदय से हम मांग करते हैं कि वह इस मामले को संज्ञान में लेते हुए प्रो चमड़िया के निष्कासन को तुरंत निरस्त करें व विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष की योग्यता की जांच कराएं। संगठन का यह मानना है कि पत्रकारिता की पढ़ाई आम विषयों की पढ़ाई से बिल्कुल अलग है और इसे पढ़ाने का तरीका भी सामान्य विषयों से अलग होना चाहिए। आयोग को हम मीडिया के छात्रों, पत्रकारों व अनुभवी शिक्षकों से बातचीत के आधार पर पत्रकारिता की पढ़ाई के संबंध में कुछ सुझाव भी पेश कर रहे हैं।
संगठन को उम्मीद है कि आयोग इन सुझावों पर गंभीरता से विचार करेगा और पत्रकारिता शिक्षण को समाज, देश व आम लोगों के हितों के अनुरूप व्यावहारिक बनाने पर जोर देगा।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) मांग करती है कि
(1) देशभर में पढ़ाये जा रहे पत्रकारिता के पाठ्यक्रम की समीक्षा हो। पत्रकारिता “ईश्वरीय कार्य है” (राजर्षि टंडन ओपन यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद के पाठ्यक्रम के अनुसार) की बजाय इसे विशुद्ध रूप से मानवीय कार्य ही रहने दिया जाए। पाठ्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा व्यावहारिक पक्ष को शामिल किया जाए।
(2) पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के साथ ही इसे पढ़ने वाले शिक्षकों, प्रोफेसरों और पत्रकारों की भी समीक्षा हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि पत्रकारिता को व्यावहारिक रूप से जानने-समझाने वाला व्यक्ति ही इस क्षेत्र में आये। हम यूजीसी से मांग करते हैं कि कम से कम पत्रकारिता जैसे पाठ्यक्रमों में नेट/पीएचडीधारियों की बाध्यता समाप्त की जाए और इसे पढ़ने की जिम्मेदारी पत्रकारों को ही सौंपी जाए ताकि इसके विद्यार्थियों को भी ज्यादा से ज्यादा व्यावहारिक जानकारी मिल सके।
(3) पत्रकारिता की पाठ्य-पुस्तकों की भी जांच हो। नकलची लेखकों की पुस्तकों की जांच कर उनके खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई हो। जैसा कि आप सभी को पता ही होगा, अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में नकलची लेखकों की भरमार है। हम यूजीसी से मांग करते हैं कि वो कम से कम मान्य विश्वविद्यालयों और संस्थानों में इस तरह की पुस्तकों के अनुमोदन पर रोक लगाएं।
(4) पत्रकारिता के विद्यार्थियों को व्यावहारिक, सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान देने की कोशिश हो न कि केवल सैद्धांतिक। जैसा कि अधिकांश विश्वविद्यालयों और संस्थानों में विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अव्यावहारिक और कुंद बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। हम मांग करते हैं कि पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को कम से कम आइईएस जैसी परीक्षाओं की तरह शुद्ध रूप से प्रशासनिक और सरकारी न बनाते हुए इसे ज्यादा से ज्यादा सामाजिक बनाया जाए।
(5) पत्रकार समाज का सबसे जागरूक तबका होता है। इस क्षेत्र और इसकी शिक्षा में भी समाज के सभी तबकों की भागीदारी सुनिश्चित करायी जाए। हालांकि अभी तक के सर्वेक्षण (देखें मीडिया स्टडी ग्रुप की ओर से किया गया सर्वेक्षण चौथा पन्ना) में यह साफ हो गया है कि मीडिया संस्थानों में सवर्ण जातिओं का वर्चस्व है। मीडिया पाठ्यक्रम में इस वर्चस्व को खत्म कर समाज के निचले तबके, महिलाओं और अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढायी जाए। यूजीसी इस वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों को विशेष प्रोत्साहन भी दे।
(6) निजी मीडिया शिक्षण संस्थानों में पत्रकारिता की पढ़ाई और प्लेसमेंट के नाम पर बड़े पैमाने पर ठगी का कारोबार चल रहा है। इस पर तत्काल रोक लगायी जाए। विभिन्न अखबारों व चैनलों ने खुद के मीडिया संस्थान भी खोल रखे हैं। यहां छात्रों को नौकरी देने के नाम पर प्रवेश देकर उनसे फीस के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है। यूजीसी इन सभी संस्थानों का सर्वे कराकर ऐसे गोरखधंधे पर रोक लगाये और इन संस्थानों में वाजिब फीस ढांचा लागू किया जाए।
भवदीय
ऋषि कुमार सिंह, अवनीश राय, अरुण उरांव, सौम्या झा, विनय जायसवाल, नवीन कुमार सिंह, शालिनी बाजपेयी, प्रबुद्ध गौतम, पीयूष तिवारी, पूर्णिमा उरांव, लक्ष्मण प्रसाद, अर्चना महतो, पंकज उपाध्याय, अभिषेक कुमार सिंह, राघवेंद्र प्रताप सिंह, राकेश कुमार, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, विजय प्रताप व जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) के अन्य सदस्य।
प्रति प्रेषित,
1) प्रतिभा देवी सिंह पाटिल
राष्ट्रपति, भारत सरकार
2) कपिल सिब्बल
केंद्रीय मंत्री, मानव संसाधन विकास विभाग
3) नामवर सिंह
चांसलर, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र









जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा राष्ट्रपति, मानव संसाधन विकास मंत्री और चांसलर, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को भेजा गया ज्ञापन बहुत संवेदनशील और मानीखेज सवालों को उठाता है. इन मुद्दों की गंभीरता को तात्कालिक आग्रहों से ऊपर उठ कर देखने की जरूरत है. भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक समाजों में यह मुश्किल लेकिन बेहद जरूरी होता है कि शिक्षा व्यापक सामाजिक सन्दर्भों और सरोकारों के आधार पर खड़ी हो. जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) के युवा पत्रकार इस जरूरत को आग्रह के साथ ध्यान दिलाते हैं तो देश के नीति-नियामक वर्ग को सुनना ही चाहिए.
पंकज पुष्कर,
दिल्ली
media me jaatibaad aur bhai bhatija baad hai….ise najarandaaj nahi kia jaa sakta hai…lekin mahilaon ki sankhiya kam hai ye kahan bemani hogi….har media house me ladikiyon ka hi bolbala hai….ladke to shoshit pidit hain….alpsankhiyak aap kise kahte hain mujhe pata nahi….patrakarita me OBC,SC aur ST ki sankhiya jaroon bahut kam hai….
अगर पत्रकारिता ईश्वरीय पाठ्यक्रम हो तो क्या उसे बदलने की बात छोड़ दी जाए !? या गैलीलियो की नियति को प्राप्त होने को तैयार रहा जाए !?
UN SABHI LOGO SE MERA NIVEDAN HAI JINKO PATRA SAMBODHIT KIYA GAYA HAI KI VE KEVAL 3RD DIVISION WALO KO SIDHE PROFESSOR BANANE KA NIYAM BANA DE.
नहीं तो नकल करके, डोनेशन देके, जुगाड़ लगा कर पास होने वाले ब्राहमण-बच्चों को सीधे कुलपति बना दें।
तृतीय श्रेणी से स्नातक पास एक व्यक्ति को प्रोफेसर बनाकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का सिलसिला कब तक चलेगा। यहां सवाल जाति, धर्म, संप्रदाय या मजहब से जुड़ा हुआ नहीं है। यहां बात अनुशानस की है। यहां बात काबलियत की हो रही है। यहां बात शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने की है न की किसी न किसी बहाने अपनी राजनीति चमकाने की। यह तो बेशर्मी की हद है कि चमड़िया जी अयोग्य होने के बावजूद दूसरे योग्य व्यक्तियों पर तोहमत लगा रहे हैं। मुझे तो ये सोचकर हंसी आती है कि शिक्षा के क्षेत्र में कैसे कैसे लोग घुसपैठ करने की जुगत में लगे रहते हैं। तहजीब के दायरे में रहकर तमीत से शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन शराब पीकर विश्वविद्यालय परिसर में दादागिरी दिखाना भी ठीक बात नहीं है। यहीं नहीं जब लोग कहे कि भाई विश्वविद्यालय परिसर में शराब पीकर मत आओं तो उन पर बिना देरी किए दलित नामक ब्रह्मास्त्र से वार करना दुनिया के किस संविधान में लिखा है। विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के अलावा अगर कोई शख्स राजनीति या बाबा साहेब आंबेडकर के नाम का दुरूपयोग करता है तो वह व्यक्ति छात्र समुदाय के साथ साथ समाज और देश का सबसे बड़ा गुनहगार है।
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आपका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
अपने यहां आज तक जितनी पी.एच.डी. हुई हैं सब पर जांच बिठा दी जाए तो आधे से ज़्यादा को नानी याद आ जाएगी। और जब चमड़िया को रखकर और निकालकर ग़लती ‘सुधारी’ जा सकती है तो एक दिन वो भी आएगा जब बोगस पी.एच.डी.धारिओं से डिग्री वापस लेकर ग़लती सुधारी जाएगी। थोड़ा इंतज़ार कीजिए।
पत्रकारिता ईश्वरीय पाठ्यक्रम नहीं है तो कौन -२ से पाठ्यक्रम है ,ये तो बतायें . युग के अनुरूप ही पाठ्यक्रम ही बनाए जाते है . जुगादियो से वि वि बचा रहे .इसलिए नियम बने . नहीं तो खबर का धुन्स दिखा सभी प्रोफ़ेसर बन जाएँ. पिछले चुनाव में देखा की नहीं मीडिया ने पैसा लेकर क्या क्या लिखा . न ध्यान हो तो पी सइनाथ को पढ़ लें . पॅकेज का चलन मीडिया में कितना बढ़ा है.और इसमें हम सब नंगे है. युनियन बनाकर दूध के धुले नहीं हो जायेंगे. आप आप अपने पीछे देखिये दो नग्न आँखे घूर रही है
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