“आप जातिवादी हैं, इसके कई प्रमाण हैं मिस्टर वीसी!”
जातिवाद के प्रतिरोध का अविस्मरणीय दस्तावेज
विभूति को एक दलित प्रोफेसर का जवाब
वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर विभूति नारायण राय ने अपने कार्यकाल में कुछ शिक्षकों को नोटिस जारी किये हैं। अब कोई क्या कर सकता है, अगर सारी गड़बड़ियां और अनुशासनहीनता दलित शिक्षक ही करते हों? विभूति की प्रगतिशीलता से अभिभूत लोगो के लिए तथ्य है कि ये सारे नोटिस दलित शिक्षकों के खिलाफ जारी किये गये। यहां ये जानना महत्वपूर्ण है कि इसी विवि के चोर गुरु नाम से कुख्यात एक प्रोफेसर को अब तक कोई नोटिस जारी नहीं हुआ है। एक दलित प्रोफेसर को नोटिस इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने 6 दिसंबर को संविधान निर्माता अंबेडकर की जयकार लगाने और ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद का नारा लगाने की गलती की। और नोटिस भी वैसी भाषा में जैसा कि हवलदार कहता है या जैसा कि एक सामंत अपने खेत मजदूर को कहता है। अगर एक हफ्ते में पैसे न पहुंचाये तो… या एक हफ्ते में अनाज गोदाम में न पहुंचाया तो… टाइप। प्रोफेसर (डॉ) एल करुण्यकारा ने इस नोटिस का जवाब भेजा। वीसी को भेजी गयी प्रो करुण्यकारा की चिट्ठी का अनुवाद दिलीप मंडल ने किया है : मॉडरेटर
प्रति,
श्रीमान विभूति नारायण राय
वाइस चांसलर
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय।
विषय : 6 दिसंबर को बाबा साहेब अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर मेरे शामिल होने को लेकर भेजे गये आपके नोटिस के संदर्भ में।
महोदय,
ये मेरा उत्तर उस नोटिस के संदर्भ में है, जो आपने मुझे छह दिसंबर को बाबा साहेब आंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस समारोह के दौरान अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम (दलित और आदिवासी छात्रों का संगठन) द्वारा आयोजित मोमबत्ती जुलूस में शामिल होने को लेकर जारी किया था।
सबसे पहले मैं आपको भारतीय इतिहास में 6 दिसंबर की तारीख का महत्व बता दूं। इस तारीख को भारतीय संविधान के रचयिता बाबा साहेब अंबेडकर का निधन हुआ था और इतिहास इस दिन को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाता है।
सांप्रदायिक ताकतों ने बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए जानबूझ कर इस दिन को चुना। 5 या 7 दिसंबर को नहीं। क्योंकि 6 दिसंबर को बाबा साहेब का महापरिनिर्वाण दिवस है। सांप्रदायिक ताकतें इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाती हैं तो सेकुलर लोगों के लिए ये काला दिवस है। दोनों ही पक्ष अंबेडकर को भुलाने का नाटक करते हैं और साल दर साल ऐसा हो रहा है। दलित बुद्धिजीवी इसे मनुवादी प्रलाप मानते हैं और इसमें साजिश देखते हैं।
जाति की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए जब कोई सेकुलर व्यक्ति कुछ काम करता है, तो मैं उसे सेकुलर जातिवाद कहता हूं। और ऐसा करने वाले को मैं सेकुलर जातिवादी कहता हूं। सेकुलरवाद का यूं तो जातिवाद से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन कुछ लोग सेकुलर होने का लबादा ओढ़कर अल्पसंख्यकों के हितों की बात करते हैं। दरअसल खुल्लमखुल्ला जातिवाद करते हैं, जो दलितों के विकास में बाधक है। सेकुलर जातिवादी दरअसल स्वघोषित सेकुलर होता है, जो सेकुलरवाद की आड़ में अपना मतलब पूरा करता है। लिहाजा सेकुलर जातिवाद और कुछ नहीं, एक धर्मनिरपेक्षतावादी का जातिवादी व्यवहार है। सेकुलर जातिवादी कई बार उदारवादी, प्रगतिशील और कई बार मार्क्सवादी होने का ढोंग करता है, लेकिन उसका छिपा हुआ एजेंडा होता है – जातीय वर्चस्व को कायम रखना।
एक सेकुलरवादी, चाहे वो मार्क्सवादी हो या न हो, जरूरी नहीं है कि जातिवाद विरोधी होगा। कोई सेकुलरवादी व्यक्ति जातिवादी और सामंती भी हो सकता है। कोई सेकुलरवादी व्यक्ति काफी पढ़ा-लिखा और जाना-माना बौद्धिक हो, इसका मतलब ये नहीं है कि वो जातिवाद विरोधी होगा। वह आकंठ जातिवादी, सामंती और अलोकतांत्रिक हो सकता है। वह देश के कानून और वंचित तबकों के लिए बनाये गये कानूनों और आरक्षण की धज्जियां उड़ा सकता है।
मिसाल के तौर पर किसी संस्थान का प्रमुख मार्क्सवादी या गैरमार्क्सवादी सेकुलर होते हुए वंचित तबकों के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है लेकिन साथ ही वो सामाजिक न्याय का दुश्मन भी हो सकता है। वह दिखावे के लिए उदार और प्रगतिशील हो सकता है, लेकिन वह न्याय के लिए कई दिनों से भूख हड़ताल कर रहे दलितों की जिंदगी के प्रति बेपरवाह हो सकता है। दलित शिक्षा से सदियों से वंचित रहे हैं। अंबेडकर की सीख को मानते हुए दलित हर कीमत पर शिक्षा हासिल करना चाहते हैं। शिक्षा के केंद्रों में प्रवेश के लिए दलित जान की बाजी लगाने के लिए तैयार रहते हैं। संस्थाओं में दाखिला पाने के लिए वो अपनी पूरी नैतिक और भौतिक ताकत के साथ जातिवादी शक्तियों से भिड़ जाते हैं। अगर संस्थान का प्रमुख सांप्रदायिक हो तो दलितों के लिए जातिवादी षड्यंत्र का पर्दाफाश करना आसान होता है। लेकिन अगर संस्थान का प्रमुख सेकुलरवादी हो तो दलितों के लिए उसके कामों से परदा उठाना मुश्किल होता है। कई संस्थाओं और खास कर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जातीय उत्पीड़न के मामलों के दबे रह जाने के पीछे ये भी एक बड़ी वजह है। ऐसा लगता है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय सामाजिक न्याय विरोधी गतिविधियों के अड्डे बन गये हैं।
क्या आपने कभी सुना है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में किसी अल्पसंख्यक समूह के छात्रों के साथ भेदभाव किया गया है। क्या आपने सुना है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में अल्पसंख्यक छात्र पीएचडी में दाखिले के लिए भूख हड़ताल पर बैठे हों। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। लेकिन ये बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि सेकुलरवादियों के नेतृत्व में चल रहे कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव के मामले सामने आते रहते हैं।
इसलिए एक सचेत दलित को अपने अधिकार और आत्मसम्मान के लिए सेकुलर जातिवादी से लड़ना पड़ता है। आम जनता की स्मृति से बाबा साहेब महापरिनिर्वाण दिवस की स्मृति को मिटाने के लिए सेकुलर जातिवादियों ने सांप्रदायिक जातिवादियों से हाथ मिला लिया है। ये प्रभुत्वशाली लोगों द्वारा जातीय श्रेष्ठता को फिर से स्थापित करने की कोशिश है और इससे दलित प्रतीकों और नारों के जरिये ही लड़ा जा सकता है।
दलित बुद्धिजीवियों के लिए छह दिसंबर को फिर से अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस के तौर पर स्थापित करने का कोई और उपाय नहीं है। महापरिनिर्वाण दिवस दलित गौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक है। सेकुलर और कम्युनल दोनों ही, ग्राम्सी के शब्दों में कहें तो दलित बौद्धिकों को वार ऑफ पोजिशन (बौद्धिक गतिविधि) से वार ऑफ मूवमेंट (जन आंदोलन) की ओर धकेल रहे हैँ। ये विचारधारात्मक पक्षों का सांस्कृतिक संघर्ष है।
छह दिसंबर 2009 को बाबा साहेब परिनिर्वाण दिवस पर अंबेडकर स्टूडेंट फोरम की ओर से आयोजित मोमबत्ती जुलूस में मेरे शामिल होने को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आयोजकों ने बताया कि उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए आप समेत विश्वविद्यालय के ज्यादातर कर्मचारियों को बुलाया था। इसमें शामिल होना या न होना किसी व्यक्ति पर निर्भर करता है। मैंने इस जुलूस में शामिल होने का फैसला किया, क्योंकि ये जुलूस जाति विरोधी था।
दलित छात्रों द्वारा आयोजित महापरिनिर्वाण दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने का मुझे गर्व और अभिमान है। मैं ये देखकर काफी खुश हुआ कि अलग अलग जाति के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने जुलूस में शिरकत की और जातिवाद के खिलाफ नारे लगाये। किसी के भी द्वारा आयोजित इस तरह के अंबेडकरवादी कार्यक्रमों में शामिल होने से मुझे खुशी होती है। किसी भी स्वाभिमानी दलित के लिए ये एक मौका होता है, जब वो इतिहास पर अपनी दावेदारी जताता है और बिना किसी भय के जातिवाद से संघर्ष के अपने इरादे का इजहार करता है।
प्रतीक और नारे संस्कृति का हिस्सा हैं। जाति विरोध की संस्कृति में, जाहिर है, जातिवाद के खिलाफ नारे लगाये जाते हैं। इस जुलूस में अन्य सहभागियों के साथ मेरे द्वारा नारे लगाये जाने को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
ज्यादातर नारे हिंदी में लगाये गये और वो इस तरह है :
छह दिसंबर किसके नाम। बाबा साहब, बाबा साहब।
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद। मनुवाद मुर्दाबाद। जातिवाद मुर्दाबाद।
मनुवाद का क्या जवाब। अंबेडकरवाद-अंबेडकरवाद।
ब्राह्मणवादी संस्कृति को एक टक्कर और दो।
बोल रे साथी जय भीम। हम भी बोले जय भीम। तुम भी बोलो जय भीम।
ये नारे जातिवादी नहीं हैं, जैसा कि आपने नोटिस में लिखा है, बल्कि ये जातिवाद विरोधी नारे हैं। इन नारों से कैंपस की शांति और सदभावना को कोई खतरा नहीं है, जैसा कि आपने नोटिस में लिखा है, बल्कि इन नारों से न्याय और सदभाव के साथ शांति का माहौल मजबूत होता है। ये नारे जातिवादी संस्कृति के खिलाफ हैं।
यहां ये बात गौर करना महत्वपूर्ण है कि जबसे आप वीसी बने हैं, तब से आपने जहां तक मेरी जानकारी है, चार नोटिस जारी किये हैं और चारों नोटिस दलित शिक्षकों को (दो मुझे, एक श्री कठेरिया और एक सुश्री शीला बोदरा को) जारी किये गये हैं। आपने अब तक दो एकेडेमिक सेशन के लिए छात्रों का एडमिशन किया है और दोनों ही बार दलित और आदिवासी छात्र धरने पर बैठे हैं। आपने एसिस्टेंट और टाइपिस्ट पदों पर कई अस्थायी नियुक्तियां की हैं, लेकिन उनमें से एक भी दलित या आदिवासी नहीं है। मैंने आपके सामने कई बार ये मामला उठाया है।
बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था, “हर देश में बुद्धिजीवी वर्ग अगर सत्ताधारी वर्ग न हो तो भी सबसे प्रभावशाली वर्ग होता है। बुद्धिजीवी वर्ग दूरदर्शी होता है। यह वर्ग सलाह दे सकता है और नेतृत्व कर सकता है। किसी भी देश में आम जनता बौद्धिक काम और विचारों का निर्वहण नहीं करती, आम जनता आम तौर पर बुद्धिजीवी वर्ग के नक्शेकदम पर चलती है। ये कहने में अतिश्योक्ति नहीं है कि किसी देश की नियति उसके बौद्धिक वर्ग से तय होती है। अगर बुद्धिजीवी वर्ग निष्पक्ष और ईमानदार हो तो वो संकट के समय में देश का बेहतर नेतृत्व कर सकता है। ये सच है कि बौद्धिकता अपने आपमें कोई गुण नहीं है। ये सिर्फ एक साधन है और साधन का इस्तेमाल साध्य और साधन को इस्तेमाल करने वाले बुद्धिजीवी पर निर्भर करता है। एक बुद्धिजीवी अच्छा आदमी हो सकता है, लेकिन साथ ही वो फरेबी और समाज विरोधी भी हो सकता है। उसी तरह एक बुद्धिजीवी वर्ग अच्छी नीयत वाला, परोपकारी और लोगों को रास्ता दिखाने वालों का समूह हो सकता है और वो गुंडों का गिरोह या अपने पिछलग्गुओं के हितों को पूरा करने वाला समूह भी हो सकता है।”
आज मैं जो कुछ भी हूं, वह बाबा साहब अंबेडकर की वजह से ही हूं। एक शिक्षित दलित होने की वजह से मैं न्याय की हर लड़ाई में साथ हूं। एक अंबेडकरवादी होने के नाते मेरा मानना है कि जातिवाद विरोधी संघर्ष में शामिल होना और अंबेडकर से संबंधित किसी भी जुलूस में शामिल होना मेरा अधिकार है।
मेरे महापरिनिर्वाण दिवस कार्यक्रम को लेकर आपने जिस तरह से नोटिस जारी किया है, वह अपमानजनक है। नोटिस में आपने सिर्फ सुनी सुनायी बातों के आधार पर मेरे आचरण पर सवाल उठाये हैं। एकेडेमिक्स से जुड़ा हुआ व्यक्ति होने के नाते मुझे अधिकार है कि मैं राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने वाली किसी भी विचारधारा को सार्वजनिक रूप से अमल में लाऊं। अंबेडकरवाद और अंबेडकरवादी संस्कृति जातपात विरोधी है और सामाजिक न्याय के पक्ष में है।
ये दूसरी बार है, जब आपने तथ्यों का पता लगाये बगैर मुझे नोटिस जारी किया है। ये इस बात का प्रमाण है कि आप मुझे नुकसान पहुंचाने पर तुले हुए हैं।
मुझे लगता है कि बाबा साहेब अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर कार्यक्रम में शामिल होने और नारे लगाने के लिए आपने मुझे जो नोटिस जारी किया है, वो आपका मेरे प्रति जातिवादी पूर्वाग्रह है और इसका मकसद विश्वविद्यालय के एकमात्र दलित प्रोफेसर को अपमानित करना और मानसिक उत्पीड़न करना है।
एल करुण्यकारा
17-12-09
द्वारा, प्रोफेसर (डॉ) एल करुण्यकारा, निदेशक, बाबा साहेब अंबेडकर दलित और आदिवासी अध्ययन केंद्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय।










करुन्यकारा जी की लेखनी से ऐसा लगता है की इन्हें प्रोफ़ेसर कम और नेता ज्यादा कहा जाय. एक प्रोफ़ेसर और एक नेता की भाषा बिलकुल अलग होती है. इतनी गन्दी और जातिवादी भाषा का प्रयोग करने वाले की हिमायती हम लोग कर रह हैं. लगता है विभूति राय ने विश्वविद्यालय में हो रहे गोरखधंधो पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया है. जब नकेल कसती है तो ऐसे ही आरोप प्रत्यारोप लगने शुरू हो जाते हैं. दलित के नाम पर इस तरह की blackmailing कोई नयी नहीं है. लेकिन दिक्कत ये है की जातिवादी का रोना केवल इसी विद्यालय के नोटिस मिले हुए लोग कर रह हैं. विभूति जब ९४ में पुस्तकालय खोले थे तब उनके पुस्तकालय का पहला librarian एक दलित था.
पत्र के आखिरी पैरे में लिखा है कि पूरे वर्धा विश्वविद्यालय में करुण्यकारा एकमात्र दलित प्रोफेसर है। ये तो अजीब बात है। आरक्षण के संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की इस तरह धज्जियां कैसे उड़ाई जा सकती है। इसकी न्यायिक जांच होनी चाहिए और अपराधियों को इसकी सजा मिलनी चाहिए। एससी कमीशन में इसकी शिकायत मैं भेज रहा हूं। आप सबकों भी ऐसी चिट्ठी भेजनी चाहिए, राष्ट्रपति को भी और सांसदों को भी, ताकि इस बार के बजट सत्र में करुऩ्यकारा वाला मामला जरूर उठे।
अनिल चमड़िया की बर्खास्तगी से बहुत बड़ा मामला है ये।
विभूति जैसे लोग ऐसे नोटिस इसलिए भेजते हैं ताकि दलितों का एकेडमिक कैरियर चौपट हो जाए और उनके प्रमोशन की बात आने पर कहा जाए कि उनके खिलाफ तो नोटिस जारी हो चुका है। ये सारे नोटिस कन्फिडेंशल रिपोर्ट में जाते हैं। इसलिए सभी नोटिस सिर्फ दलित शिक्षकों को दिए गए। विभूति तुम इंसान से पहले जातिवादी हो।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड या बिहार-उत्तर प्रदेश के किसी अपरहण माफिया या डाकू या गुंडों का सरगना भी ठीक इसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहता है कि अगर दो करोड़ रुपल्ली कल शाम तीन बजे तक पुराने मंदिर के पीछे वाले अहाते के कोने पर नहीं रखा तो मई तेरा बेट्टा को छोटा-छोटा पीस में काट डालेगा…
अब राय ने जिस भाषा में नोटिस के बहाने करुण्यकारा को धमकी दी है, और उसका जवाब अगर करुण्यकारा ने अपनी चिट्ठी में इस भाषा में दिया है, उससे बहस पर नजर रखने वालों को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि अपराधी और परले दर्जे का पूर्वाग्रही और अविकसित शख्स कौन है?
एक किताब या कुछ कविता-कहानी लिख कर प्रगतिशीलता और बौद्धिकता का चोला ओढ़ लेना आपको कहीं से भी इंसान नहीं बनाता। विभूति नारायण राय को सोचना चाहिए कि वे उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद कितने इंसान बन सके हैं।
करुण्यकारा ने अपने जवाब में बता दिया है कि इंसान होने के लिए पहले किस स्तर पर खुद को बदलने की हिम्मत करनी पड़ती है। फिर भी, इतना तो साफ है कि करुण्यकारा एक हद दर्जे के निम्न कोटि के शख्स के सामने खड़े हैं।
इतना साहसपूर्ण जवाब देने के लिए उनको बधाई और बहुत-बहुत शुक्रिया।
दरअसल, ऐसे जवाब एक वैसी पूरी पीढ़ी का निर्माण करने में मदद करती है, जो अपनी अस्मिता और गरिमा को ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानती है, बजाय इसके कि पद और पैसे से अपनी हैसियत बनाने के लिए अपनी रीढ़ किसी के हाथों गिरवी रख दे और क्रांति का ढोल पीटते हुए राय जैसे लोगों के लिए दलाली करने लगे…
कारुण्यकारा प्रोफ़ेसर हैं.अंग्रेज़ीदां हैं.दलित हैं.लोग पूछते हैं कारुण्यकारा दलित होने की वजह से प्रोफ़ेसर और अंग्रेज़ीदां हैं या प्रोफ़ेसर और अंग्रेज़ीदां होने के कारण दलित हैं.लोग ये भी जानना चाहते हैं कि दलित होना फ़ायदेमंद कैसे हो गया है.
Avinash Ji,
teen website par 1 hi khabar…khabar bhi nahi agenda…Mohalla, Jantantra aur ek koi aur…!!! Badliye nahi to khatam ho jaayenge…baazar tezi se aage nikal gaya hai….aap log wahi ke wahi atke pade hain. Mohalla mein kuch bhi to naya nahi milta hai aajkal…moh bhang ki stithi ban rahi hai..! BN Rai…Anil Chamaria…! kaun sach bol raha hai…agar aap nahi jante to bata du…4 Dalit ke alaava Rai saheb ne 3 OBC, 2 BC, 1 ST aur 6 forward class ko bhi notice jaari kiya hai…aap ek paksh pakad kar baithe hain. Usse bhi badi baat ye ki aap jinke samarthan me aage aaye hain, unka background jaan lena bhi zaroori hai. Yahan sab nange hain…hum aap sab.
KARUNYAKARA KE LIYE KEVAL ITNA HI KAHA JA SAKTA HAI -MAAR PADI SHAMSHIRO KI TO MAHARAJ MAIN NAAI HOON.
तो महामहोपाध्याय श्री श्री 440 विभूति नारायण राय जी महाराज,
अब तो प्रोफेसर करुण्यकर ने बता दिया कि आगे भी अंबेदकर से जुड़े कार्यक्रमों में जाते रहेंगे और जातिवाद विरोधी नारे भी लगाते रहेंगे। तुम्हारे धमकी भरे नोटिस को तो उन्होंने टायलेट पेपर बराबर भी इज्जत नहीं दी। तुम्हारी धमकी भी दुनिया पढ़ रही हैं और प्रोफेसर का जवाब भी। अब तुम उनका क्या बिगाड़ लोगे? तुम्हारी इज्जत तो सरे बाजार नीलाम हो रही है वीसी साहब। चमड़िया प्रकरण से तुम उबरे भी नहीं हो कि करुण्यकर ने तुम्हें नंगा कर दिया। आगे और क्या क्या होने वाला है, कितने कुकर्मों का लेखा जोखा सामने आना वाला है। ये तो टीवी सीरियल बन गया है। हर दिन कोई नया तमाशा।
Dr.Umesh Singh ,Priti Sagar,Dr.Sanjay Suman,Dr.M.L.Kassare,Sandeep Sapkale ye sare MGAHV me ye sab dalit Professor hai apne tathyo ki jankari thhik rakhe
वाजपेयी नामधारी सज्जन,
अगर प्रोफेसर करुण्यकारा ने वीसी को लिखी अपनी चिट्ठी में कहा है कि वो विवि के अकेले दलित प्रोफेसर हैं और आपको उनके दिए तथ्यों में कोई बात गलत लगती है तो आपको तथ्य लेकर आना चाहिए। चलिए सत्य के संधान में हम आपके साथ कुछ कदम चलने की कोशिश करते हैं।
आपने जिन लोगों को प्रोफेसर बताया है, उनमें से कोई भी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि में प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत नहीं है। ये जानने के लिए ज्ञानी होने की भी जरूरत नहीं है। आप इस बहस में हैं तो मैं ये मानकर चलने का जोखिम उठा रहा हूं कि आप रीडर, लेक्चरर और प्रोफेसर का फर्क समझते होंगे। देखिए विवि ने अपनी साइट में इनका क्या परिचय लिखा है। साइट पर ये लिंक देख लें, और पूरा परिचय जरूर पढ़ें -http://www.hindivishwa.org/faculty.php
डॉ. उमेश कुमार सिंह
सहायक प्रोफेसर साहित्य विभाग, साहित्य विद्यापीठ
जन्मतिथि:03.02.1962
डॉ. प्रीति सागर
रीडर, साहित्य विभाग
जन्मतिथि:06.09.1976
Madhukar Laxmanrao Kasare
निदेशक, डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौध्द-अध्ययन केन्द्र ,संस्कृति विद्यापीठ
Dr.Sanjay Suman नहीं इससे मिलते जुलते नाम वाले एक लेक्चरर विवि में हैं और संदीप जी भी वहां लेक्चरर ही हैं।
उम्मीद है आपकी जिज्ञासा शांत हो गई होगी। धन्यवाद।
दिलीप जी
नमस्कार,
काफी दिनों से आपसे मुलाकात नहीं हुई। आखिरी बार हमलोग आईआईएमसी में मिले थे। उस वक्त आप भी जल्दी में थे और मैं भी। आपने प्रोफेसर साहब के जवाब का सही अनुवाद किया होगा, इतना मुझे आप पर यकीन है। लेकिन आपने कब से इस तरह के पचड़ों में पड़ना शुरू कर दिया है। आपने जिनके जवाब का अनुवाद किया है उस महाशय की पूरी कहानी पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है वह गलत जगह पर आ गए है। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर की जगह राजनीति के मैदान में होना चाहिए था। राजनीति करना बुरी बात नहीं है। दलित होना भी बुरी बात नहीं है ठीक उसी तरह जैसे किसी अन्य वर्ग या जाति में पैदा होना। आपसे बस इतनी गुजारिश है कि आप अपने आप को ऐसे लोगों से दूर रखें।
आपका साथी
लोकेश
धन्यवाद लोकेश जी।
मिस्टर कारुण्यकारा
विभूति नारायण राय ने आपको नोटिस देकर बिल्कुल ठीक किया है और शैक्षणिक संस्थान की गरिमा के अनुकूल काम किया है। शैक्षणिक संस्थान किसी व्यवस्था की भर्त्सना करने के लिए प्रेरित नहीं करते। जबकि आपने खुद स्वीकार किया है कि जिस संगठन के जुलूस में आपने शिरकत की, उसमें ब्राह्मणों के खिलाफ और अंबेदकरवाद के पक्ष में नारे लगाए गए। क्या यह जातिवाद नहीं है। आपने कैसे मान लिया कि अंबेदकरवाद के पक्ष में नारे लगाना जातिवाद नहीं है और ब्राह्मणवाद के खिलाफ नारे लगाना जातिवाद है। मैं खुद मनुवाद के खिलाफ हूं। ब्राह्मणवाद की कुछ अवधारणाओं को भी नापसंद करता हूं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होना चाहिए कि जो मुझे पसंद नहीं, वह दूसरों के लिए भी वर्जित हो। क्या आपको नहीं लगता कि ब्राह्मणों की तरह अंबेदकर के सिद्धांतों में कुछ न कुछ खामियां हैं। तो क्या इसके लिए ब्राह्मणों को अंबदकरवादियों के खिलाफ मोर्चा खोल लेना चाहिए।
इसे आप प्रश्नोत्तर शैली में पढ़ें
1.सबसे पहले मैं आपको भारतीय इतिहास में 6 दिसंबर की तारीख का महत्व बता दूं।
उत्तर . जैसे इतिहास यही पढ़े है और कोई नहीं.
2. इस तारीख को भारतीय संविधान के रचयिता बाबा साहेब अंबेडकर का निधन हुआ था और इतिहास इस दिन को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाता है।
उत्तर . किसी के जन्मदिन पर किसी को क्या आपत्ति.
3. सांप्रदायिक ताकतों ने बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए जानबूझ कर इस दिन को चुना।
उत्तर . दरअसल आप तब इतने बड़े बुद्धिजीवी नहीं बने थे अन्यथा लोग आपसे नव दलित ब्राहमण से तिथि तय करते.
4. जाति की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए जब कोई सेकुलर व्यक्ति कुछ काम करता है, तो मैं उसे सेकुलर जातिवाद कहता हूं। और ऐसा करने वाले को मैं सेकुलर जातिवादी कहता हूं।
उत्तर . आप से बड़ा जातिवादी कौन है . जो कि वि वि में सिर्फ दलित अध्यापको से बात चीत करता है सामाजिक न्याय का दुश्मन आपसे बड़ा कौन है जो दलित -२ तो कहता है पर आजतक किसी विद्यार्थी को शोध नहीं करा रहा है. नहीं तो इसके पीछे क्या कारन हो सकते है.
5. वह दिखावे के लिए उदार और प्रगतिशील हो सकता है,
उत्तर . यह तो आप है ही.
5. मैंने इस जुलूस में शामिल होने का फैसला किया, क्योंकि ये जुलूस जाति विरोधी था।
उत्तर . अर्थात जो आप करेंगे जातिविरोधी और दूसरे करे तो जातीवादी हा हा हा
6. मैं ये देखकर काफी खुश हुआ कि अलग अलग जाति के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने जुलूस में शिरकत की और जातिवाद के खिलाफ नारे लगाये।
उत्तर . जब कभी शिक्षक संघ की बैठक हुई तब आप कभी नहीं आयी . क्यों क्योकि आप जातीय ग्रंथि से पीडीत है . जबकि वि वि के अन्य सभी लोग शिरकत करते है,..
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद। मनुवाद मुर्दाबाद। जातिवाद मुर्दाबाद।
ब्राह्मणवादी संस्कृति को एक टक्कर और दो।
बोल रे साथी जय भीम। हम भी बोले जय भीम। तुम भी बोलो जय भीम।
7.ये नारे जातिवादी नहीं हैं. ये कैसे कह सकते है .
उत्तर . एक जाती के खिलाफ खुला नारा है. किसी मनु या किसी ब्राह्मण का क्या दोष . कोई जय भीम कहे तो जातिविरोधी और एनी पर जाती का तोहमत .
8. आज मैं जो कुछ भी हूं, वह बाबा साहब अंबेडकर की वजह से ही हूं।
उत्तर . क्यों पुराने धर्म को क्यों भूल गए. अंबेडकर ने यह नहीं कहा था कि मुफ्त का पाओ माल उडाओ नहीं तो दलित. कितने दलितों की सहायता कि है आपने .
9. एकेडेमिक्स से जुड़ा हुआ व्यक्ति होने के नाते मुझे अधिकार है कि मैं राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने वाली किसी भी विचारधारा को सार्वजनिक रूप से अमल में लाऊं।
उत्तर .और कभी किसी भी शिक्षक बैठक में न जाऊ, पर दलित नाम का लाभ उठाने के लिए हर जगह जाऊ. किसी दलित को शोध न कराऊ, पर गलत मेडिकल मेडिकल बिल भुनाऊ. और बिना छुट के हैदराबाद जरूर जाऊ
मि दिलीप थोड़ा भी पड़े लिखे होंगे तो नियम कानून जाने होंगे ऐसी उम्मीद की जाती है.
वि वि में कई दलित अध्यापक है जिनमे से एक ये भी है. इनको तो हिन्दी आती ही नहीं न विश्वास हो पता कर लीजिये. अब बताइये हिन्दी वि वि में कम करने वाले को हिन्दी ही नहीं आती है तो वह पढाता कैसे होगा .यह तो वि वि की उदारता है . अंगरेजी ये कितना जानते यही जाने .
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आपका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
अरे मि 33% यानी एल कारुन्कारा वर्धा में भी नौटंकी शुरू कर दिया है . वह तो हमारे यूनिवर्सिटी में मि 33% के नाम से विख्यात था . वह कब से नैतिक हो गया है भाई. यहाँ वि वि में तमाम रिकार्ड है उसके . अपना वि वि भी शुरू -२ में गेस्ट फैकल्टी से चलता था तब मि 33% यानी एल कारुन्कारा किसी भी टीचर से कमीशन पर पढ़ाने पर बुलाथे थे . अगर किसी को यह सब रिकार्ड चाहिए तो वह हमारे वि वि -अम्बेडकर वि वि से मंगा सकता है . कमीशन बाजी में तो महोदय कभी दलित का पक्ष नहीं लिए . अब कहा से दलित याद आ गए
उस विश्वविद्यालय के काम-काज की भाषा हिन्दी क्यों नहीं है ? हिन्दी के नाम पर यह विश्वविद्यालय बन्द कर दें , यह बेहतर होगा। एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय से हमेशा के लिए निष्कासित होने का तजुर्बा मुझे भी है – कारण बताओ नोटिस हिन्दी में न दिए जाने पर जवाब नहीं देता था ।
इस तरह की नोटिस देकर विश्वविद्यालय परिसर में शान्ति और सद्भावना बनी रहे यह मुमकिन नहीं ।
’सेक्युलर जातिवादी ’ की तरह ’कम्युनिस्ट जातिवादी’ भी हुआ जा सकता है ?
मित्र गोपाल प्रधान आज-कल कहाँ है ?
अफलातून भाई, दिल पर मत लेना। लगता है कि ये वीसी अंग्रेजी और हिंदी दोनों में गंदा काम करता है।
सूप तो सूप तो सूप चलनी भी बोले . बक अप अफलातून . आप कब निकाले गए थे . आपका मामला क्या था ? साफ़ -२ कहिये . दोनों मामले एक नहीं है. आप अपने अन्दर झाकिये और ज़रा राकेश सिन्हा के दर्द को समझिये , ब्लॉग से क्रांति नहीं पैदा होती है. वि वि से गोपाल प्रधान कब के जा चुके है और अभी खोज रहे है ? गलत बयानी से बचिए . और अपने किये हुए paर शर्म अगर हो तो, कर लें.
dosto, uparokt coment chandrika, media vibhag hindi vishvavidyalay ka nahi hai.
Ye Atal Bihari Bajpayee ke jankari keliye. MGAHV me sirf ek hi Professor hai. Aur Vo hai Professor. Karunyakara. Baki sab lecturer ya readear hai. 1. Dr.Umesh Kumar Singh,Lecturer,Sahitya;
2. Dr.Priti Sagar, Reader,Sahitya,Dr.Sunil Suman,Lecturer,Sahitya, Dr.M.L.Kasare,Retired Reader from local college,working as temporary teacher,Mr.Sandeep Sapkale,Lecturer,Distance Education. Jinki Ph.D. hui nahi hai.
प्रोफ. करुण्यकारा जी ने बहुत ही सही जवाब दिया है मिसटर वी सी एक. जातिवाद है और अपने को सेकुलरवाद की आड़ मई छुपा
लेते है.
जगदीश श्रीवास्तव सबसे पहिले मैं आपको लिखनेका तरीका सिखाता हू . प्रोफेसर करुण्यकर लिखते है , ना की मिसटर करुण्यकर किसी दलित को इतने उचे पोस्ट पर देखना सहें नाही हो रहा है क्या अप क्या जाने एक दलित को उचाइ पाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है , आप दलित होते तो जानते लिकिन अप तो रॉय साहब के चमचे हो .शायद अपने रॉय. शहाब को अपना ससुर मान लिया है आप शायद नाही जानते की जब V.V. मे 2009 मे टाइपिस्ट और असिस्टेंट की जगहा भारी गये थी लेकिन उसमे
1 भी दलित केटेगरी के कॅंडिडेट का सेलेक्षन नाही हुवा था ये जातिवाद नाही तो और क्या है आपकी जानकारी के लिए बता दु की जीतने भी कॅंडिडेट सेलेक्ट गये सब रॉय. के, और उनके चमचो के रिश्तेदार है ये जातिवाद नाही है तो और क्या है अगर आप चाहे तो मैं रॉय और. उनके चमचो के नाम और उनके कॅंडिडेट के नाम भी बता सकता हू ,
जरा अपनेसे पढ़े लिखे और बड़े इंसान के बारे मे बोलने के पहिले जरा सोचा क्ीई, और किसी दलित के बारे मे बोलने से पहिले 1000 बार सोचा कीजीय
क्योकि 1 दलित 1000 ब्रहम को भारी पद सकते है जैसे की प्रोफेसर करुण्यकर भारी पड़े है रॉय साहब को
मिस्टर गोलू
मैं मोहल्ले पर किसी निरर्थक बहस में पड़ने नहीं आता। केवल इस उम्मीद से इसे क्लिक कर लेता हूं कि अविनाश कभी-कभी अच्छा लिख लेता है। लेकिन इधर कुछ दिनों से बकबास कर रहा है। अगर इसी तरह कचरा फैलाते रहा तो यहां (मोहल्ला में) कौन आएगा। अविनाश भले चुतियापा कर रहा है पर मैं उसकी लेखनी को पसंद करता हूं। उम्मीद है एक न एक दिन सुधऱ जाएगा। हालांकि तुम लोग उसे सुधरने दो तब न।
मेरा एक सवाल है वीसी को की क्या यदि कोई हिन्दू पर्व होता और लोग जय सरिराम जिंदाबाद का नारा लगते तो क्या उनको भी नोटीस देते.
उपाध्ययजी आप क्यो भूल जाते है की अंबेडकर एक दलित नेता थे, और प्रोफेसर करुण्यकर अंबेडकर वादी है ,
अगर आपको इतिहास की थोड़ी जानकारी होगी तो मैं ये बता दु की उरोप मे कर्न्ति एक प्रोफेसर ने ही लय थे और सारे
उरोप का इतिहसा बदल कार रखा दिया था शाय्द इसी बात का डर श्री विभूति रॉय को है
हम रू नाही रहे हम सिर्फ अपना अधिकार माँग रहे मैं प्रोफेसर करुण्यकर का आभारी हू की द्र. अंबेडकर्जई ने जो करवा छोड़के गये थे हू करवा प्रोफेसर करुण्यकर चला रहे है
धन्यवाद करुण्यकरा
कल्पना कीजिये किसी आंबेडकर विश्वविद्यालय के अन्दर ये जुलूस निकल रहा है | जुलूस वाले आरक्षण विरोधी हैं, जबकि विश्वविद्यालय परिसर में समर्थकों और दलितों की बहुतायत है | उस समय ऐसे नारे लगें तो क्या कहेंगे आप ?
“छह दिसंबर किसके नाम। जय श्री राम, जय श्री राम ।
अम्बेडकरवाद मुर्दाबाद। दलितवाद मुर्दाबाद। जातिवाद मुर्दाबाद।
अम्बेडकरवाद का क्या जवाब। हिन्दूवाद – हिन्दूवाद ।
दलितवादी संस्कृति को एक टक्कर और दो।
बोल रे साथी जय श्री राम । हम भी बोले जय श्रीराम । तुम भी बोलो जय श्रीराम ।”
जातिवाद के काम करने का तरीका थोड़ा महीन है। बीजेपी में ही एक ओबीसी नेता ने कहा था कि जातिवाद बर्फ की छुरी है, एक ऐसी छुरी, जो कत्ल के निशान नहीं छोड़ती। इसलिए जातिवादी कभी भी अंबेडकरवाद मुर्दाबाद के नारे नहीं लगाते। समझे करण। कर्ण होते तो समझने में आसानी होती।
सारथी जी,
हो सकता है मेरे नाम में र को आधा करने से बुद्धि डबल हो जाती , लेकिन मेरा प्रश्न तो ये नहीं था कि जातिवादी क्या मुर्दाबाद करते हैं या कैसे काम करते हैं |
मुझे अंदाज़ा है कि लोग पोलोतिकली करेक्ट होने के लिए क्या कहते हैं और क्या नहीं कहते हैं | ये तो मुझे भी नहीं लगता कि कोई दलितवाद मुर्दाबाद के नारे लगाएगा अगर उसे वोट चाहिए तो | मगर इससे ये थोड़ी सिद्ध हो जाता है कि जिसके खिलाफ नारे नहीं लगते वहाँ सब सही है | ये भैया इन्टरनेट का ज़माना है, यहाँ जो चाहिए बोल सकते हैं , बिना वोट की चिंता किये | आपके पास तर्क हों तो गलत सिद्ध कीजिये , कौन क्या कहेगा इसके ऊपर क्यों जाते हैं| आप अगर ये समझते हैं कि यहाँ भी अपने तर्क रखने में किसी को राजनैतिक रूप से सही होने की ज़रुरत है तो आप खुश रहें अपने भ्रम में |
आप भी किसी घिसी पिटी नारेबाजी वाली गाडी के सारथी न बन कर तर्कपूर्वक महारथी बनें , इसी कामना के साथ
Hindi Vishva Vidyalaya ke Harijan Dalal lo, ye kyu bhul ja rahe hai, ki Pavitra Dalitonke ladai ke karan ap logonki chaplusi ki dukan badi jor-sor se chal rahi hai. V.N. Rai ki chamcha giri me, apni asmita ko bhaite. Babasaheb ko bechi diya. Jab ki Babasaheb ki karan ap log jo kuch bhi hai, uniki den hai. Maparinirvan Divas ke uplakshme aplog aye bhi nahi, aur jati vadi V.N.Rai ke talve chatrahe hai. To ap ko kya hak hai, Prof. Karunyakara khilaf bholneka?
कारण मैं आपके हिमत की दाद देता हू की आप ने ये बात कहेने की हिम्मत की, आप क्यू दलितो को उकसा रहे हो ,
सालो से अंबेडकर वाद की खिलाफ वाही नारे लगते आ रहे हो, शायद अप खायलंजी कांड भूल गये है शायद ही कोए
अंबेडकर के खिलाफ इस तरहा केन नारे लगानेकी हिम्मत करेगा दलित समाज़ हर तरहा की लड़ाई करना जानते है ,
नारे लगने के अलावा विभूति रॉय को सज़ा देने की बारे मे बता दे तो अछा होगा ,
रॉय साहब दलितो का उत्पीड़न करना बंद कार दीजिए वरना काही अंबेडकर के शेर जाग गये तो आप के शरीर पर
कपड़े भी नाही बचेंगे……
नागपुर और आसपास के दलित अगर ये सब जान गए तो वर्धा में राय के किले की एक ईंट नहीं बचेगी ।भूमिहार वाद यूपी में चल सकता है, बाबा साहेब के शेरों की बस्ती नें ये सब नहीं चलेगा । राय के जातिवाद से से पंडित और ठाकुर भी खुश नहीं हैं। बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेशराम पिछले दिनों जयपुर आए थे ।उनका राष्ट्रीय सम्मेलन था। मैंने उन्हें वर्धा कांड के बारे में बताया है। देखिए वे क्या करते हैं। उन्होंने कुछ ठान लिया तो विभूति बचेंगे नहीं।
गोलू के कथन से लगता है कि मेरी बात काफी उकसावे वाली थी, है कि नहीं ? किस तरह से , समझायेंगे ? अगर थी तो वि०वि० परिसर में जो नारे लगे थे वे कैसे उकसावे वाले नहीं थे, यह भी ठीक से समझाएं
आपके कथन में कि ‘कौन हिम्मत करेगा’ में तर्क कम है इसलिए धमकी का स्वर ज्यादा है | इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपको जो बात पसंद नहीं है, वह कोई न बोले | अगर बोले तो आप आँख दिखायेंगे और चुनौती देंगे कि हमें उकसाओ मत | यहाँ से बहस का अंत होता है और बाहुबल का रास्ता शुरू | यही हथियार सारथी जी के कथन में भी नज़र आता है कि अब लगता है वर्धा में ‘ईंटे’ नहीं बचेंगी |
राय जातिवादी हैं तो उनका मुकाबला कीजिये, डट कर कीजिये, मुझे राय साहब के बारे में ज्यादा नहीं मालूम है | लेकिन मैं यहाँ बहस का रूप देख रहा था कि किस तरह बहस को अपने पक्ष में ढालने के लिए इस तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं कि ‘उनका चेहरा उतर गया था’ और ‘वर्धा में किस तरह प्रेम फैलाने वाले नारे लगाए गए’
वाह रे शेरों |
Prof.Karunyakarji sare Dalit Duniya apke sath hai. Ap Babasaheb ke mission ko age le jayiye. Hum sub apke sath hai. Ap akele nahi hai. Behanji Mayawati ne kaha tha:”Ithihas sirf uska samman karte hai, jo hava ka rukh badalte hai”. Jo kam ap kar rahe hai, vo kam hava ki disha badalne vale kam hai. Naye Ithihas ki racahna hamesha ap jaise Buddha Jivi logo ne hi kiya tha. Babasaheb ka karava aage le jayiye. Pure Dalit samaj, disha nirdesh ke liye apjaise logo ka intijar kar rahe hain.
कारण जी ब्रहमान वादी लोग बाबासाहब अंबेडकर का नम लेना भी पसंद नाही करते तो नारे क्या खाक लगयणगे,
आप सही कहा रहे है ये एक तरहा से धमकी ही है क्योकि रॉय वो इंसानो है जो “लातो के भूत बातो से नाही मानते” , हमारी लढाई रॉय और उनके चमचो के खिलाफ नाही है हमारी लाढ्य ब्रहमान वाद के खिलाफ है, जिस तरहा V.V.
मे जातिवाद चल रहा है क्या उसके बारे मे आप जानते ? शायद नही, हमारा नारा ब्राहमान जाती के खिलाफ नाही था हमारा नारा ब्राहमानवाद के खिलाफ था, जिस तरहा रॉय ने V.V. मे जातिवाद कार रखा है उदहारण. संतोष बघेल, राहुल कांबले,
गोलू ने लिखा की V.V. कर्मचारी भारती करते वक़्त हुवा घोटाला, ये सब उदहारण है की रॉय एक जातिवादी इंसान है,
क्या हमे ऐसे इंसान और समाज़ के खिलाफ नारे लगाने का कोए हुक़ नाही ! कारण जी अपने अंत मे लिखा है के “वाहा रे शेरो”
क्या ये उकसाने वाला वाकया नाही है , अप अगर दलित होते तो शायद समाज़ जाते फर्क यही है के रॉय साहब कुर्सी पर बैठकर
दलितो के खिलाफ कलम चलते है और हम दलित लोग नारे लगाकर , अगर प्रोफ. करुण्यकर ने नारे लगये तो उनपर एक कमेटी
क्यो नाही गठित हुए, क्यो उन्हे शोवकौसे नोटीस क्यो दिया गया और 1 बार नाही बार बार क्यो दिया गया , क्या ये दलित
विरोधी काम नाही है , आप तो रॉय साहब को बहोत कम जानते है , रॉय साहब एक पुलिस कर्मी थे तो उनका दमन साफ कैसे हो सकता है,
भाई सारथी मीणा जी
प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। ये मैं नहीं कह रहा। ऐसा न्यूटन के तीसरे नियम में वर्णित है। अतीत भी इसका गवाह रहा है और वर्तमान भी इसका साक्षी है। आपके विचार को जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप किसी खास अभियान का हिस्सा हैं। आपका मकसद क्या है ये आपको बेहतर पता होगा। आज़ादी के बाद से लेकर आज तक जिस भी पार्टी ने सत्ता संभाली हो। लेकिन देश,समाज और खासकर युवावर्ग की क्या हालत है, इसे दर-दर नौकरी के लिए भटक रहे हम जैसे बेरोजगार युवकों से ज्यादा अच्छी तरह से कौन समझ सकता है। बेकार की टीका टिप्पणी करने के बजाए सही बात लिखने में आपको क्या आपत्ति है। वर्धा के छात्रों की विभिन्न ब्लॉग और वेव साइटों पर दी गई टिप्पणी को पढ़कर ऐसा लगता है कि पूरी दाल ही काली है। भड़ास4मीडिया पर पिछले दिनों एक छात्र ने कुछ इस प्रकार की टिप्पणी की थी। “अनिल चमड़िया ने वर्धा के भोले भाले छात्रों को दिल्ली की राजनीति और पत्रकारिता का सब्जबाग दिखाकर शिक्षा के नाम पर उनके साथ गद्दारी की है।” यहीं वजह है कि विश्वविद्यालय ने अनिल चमड़िया को बाहर का दिखाकर अपनी नाक बचाने में ही भलाई समझी। एक बात मैं यहां बिलकुल साफ कर देना चाहता हूं कि मैं ना तो विश्वविद्यालय की तरफदारी कर रहा हूं और न ही माननीय श्री अनिल चमड़िया जी का। मेरा मकसद मोहल्ला वेबसाइट पर ज़रुरत से ज्यादा तूल दिए जा रहे इस मुद्दे पर लोगों के सामने परद-दर-परत छुपी हुई हक़ीक़ीत को बेपर्दा करना है। क्योंकि मैं खुद भी इस विश्वविद्यालय का छात्र हूं। और पत्रकारिता विषय से यहां से एमए,एमफिल के बाद अब पीएचडी कर रहा हूं। इसलिए भी मैं अनिल चमड़िया जी को बेहद करीब से जानता हूं। हो सकता है कि नाम के बजाए मेरे लिखने की शैली को देखकर ही अनिल चमड़िया जी मुझे पहचान ले। लेकिन एक बात मैं पूरी दुनिया के सामने खुलकर कहना चाहता हूं कि सच को स्वीकार करने में ही सबकी भलाई है चाहे वो साऱथी हो,रथी हो या कोई महारथी। क्योंकि सच से बड़ा कोई नहीं है। और सच यहीं है कि अनिल चमड़िया जी तृतीय श्रेणी से उतीर्ण वाणिज्य स्नातक है। जिस व्यक्ति की नींव ही कमजोर हो, वो किसी को भी मजबूत आधार कैसे दे सकता हैं। जिस शख्स ने छात्र जीवन में गंभीरतापूर्वक अध्ययन नहीं किया हो, वो विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों को अध्यापन कैसे करा सकता है। ये वो मूलभूत बाते है जिस पर गौर फरमाने की ज़रूरत है। हो सकता है कि अनिल चमड़िया जी यहां भी दलित राग अलापना शुरू कर दे और ये कहे कि चूकि मैं दलित था इसलिए मुझे स्नातक में तृतीय श्रेणी के लायक अंक दिया गया। मैं इस बहस में हिस्सा ले रहे तमाम लोगों को खुली चुनौती देता हूं कि वो वर्धा के छात्रों के हित में सकारात्मक पक्षों को तर्कसंगत तरीके से सबके सामने रखे। सिर्फ मुद्दे की बात करे और विषय से भटकने से परहेज करे। आगे जारी है……….
[...] दिसंबर 2009 को आपके पहले नोटिस पर अपने पांच पेज के जवाब में मैंने साफ-साफ कहा था कि एक [...]
Leave your response!
Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)जनमत
Tag Cloud
abraham hindiwala anil chamadia anil yadav anurag kashyap arundhati rai arundhati roy Bahastalab bahastalab 2 bihar blog debate dalit dilip mandal first narendra memorial award gorakhpur hamar TV hindi hindi cinema Hindi Literature hindi media jansatta kabaadkhaana Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya mahatma gandhi international hindi university maoism maoist matang singh namwar singh naxal naxalism Nirupama Pathak om thanvi pankaj srivastav politics prabhash joshi prabhat khabar rajendra yadav rajya sabha ravish kumar uday prakash vibha rani Vibhuti Narayan Rai vineet kumar vn rai yogi adityanath मीडिया मंडीArchive