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	<title>Comments on: &#8220;आप जातिवादी हैं, इसके कई प्रमाण हैं मिस्‍टर वीसी!&#8221;</title>
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		<title>By: Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; &#8216;Mr VC, मैं आपकी शिकायत SC/ST कमिशन से करुंगा&#8217;</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/02/07/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai/comment-page-1/#comment-7215</link>
		<dc:creator>Mohalla Live &#187; Blog Archive &#187; &#8216;Mr VC, मैं आपकी शिकायत SC/ST कमिशन से करुंगा&#8217;</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Mar 2010 20:05:44 +0000</pubDate>
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		<description>[...] दिसंबर 2009 को आपके पहले नोटिस पर अपने पांच पेज के जवाब में मैंने साफ-साफ कहा था कि एक [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] दिसंबर 2009 को आपके पहले नोटिस पर अपने पांच पेज के जवाब में मैंने साफ-साफ कहा था कि एक [...]</p>
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		<title>By: prithvinath</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/02/07/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai/comment-page-1/#comment-6254</link>
		<dc:creator>prithvinath</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 17:31:14 +0000</pubDate>
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		<description>भाई सारथी मीणा जी
प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। ये मैं नहीं कह रहा। ऐसा न्यूटन के तीसरे नियम में वर्णित है। अतीत भी इसका गवाह रहा है और वर्तमान भी इसका साक्षी है। आपके विचार को जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप किसी खास अभियान का हिस्सा हैं। आपका मकसद क्या है ये आपको बेहतर पता होगा। आज़ादी के बाद से लेकर आज तक जिस भी पार्टी ने सत्ता संभाली हो। लेकिन देश,समाज और खासकर युवावर्ग की क्या हालत है, इसे दर-दर नौकरी के लिए भटक रहे हम जैसे बेरोजगार युवकों से ज्यादा अच्छी तरह से कौन समझ सकता है। बेकार की टीका टिप्पणी करने के बजाए सही बात लिखने में आपको क्या आपत्ति है। वर्धा के छात्रों की विभिन्न ब्लॉग और वेव साइटों पर दी गई टिप्पणी को पढ़कर ऐसा लगता है कि पूरी दाल ही काली है। भड़ास4मीडिया पर पिछले दिनों एक छात्र ने कुछ इस प्रकार की टिप्पणी की थी। “अनिल चमड़िया ने वर्धा के भोले भाले छात्रों को दिल्ली की राजनीति और पत्रकारिता का सब्जबाग दिखाकर शिक्षा के नाम पर उनके साथ गद्दारी की है।” यहीं वजह है कि विश्वविद्यालय ने अनिल चमड़िया को बाहर का दिखाकर अपनी नाक बचाने में ही भलाई समझी।  एक बात मैं यहां बिलकुल साफ कर देना चाहता हूं कि मैं ना तो विश्वविद्यालय की तरफदारी कर रहा हूं और न ही माननीय श्री अनिल चमड़िया जी का। मेरा मकसद मोहल्ला वेबसाइट पर ज़रुरत से ज्यादा तूल दिए जा रहे इस मुद्दे पर लोगों के सामने परद-दर-परत छुपी हुई हक़ीक़ीत को बेपर्दा करना है। क्योंकि मैं खुद भी इस विश्वविद्यालय का छात्र हूं। और पत्रकारिता विषय से यहां से एमए,एमफिल के बाद अब पीएचडी कर रहा हूं। इसलिए भी मैं अनिल चमड़िया जी को बेहद करीब से जानता हूं। हो सकता है कि नाम के बजाए मेरे लिखने की शैली को देखकर ही अनिल चमड़िया जी मुझे पहचान ले। लेकिन एक बात मैं पूरी दुनिया के सामने खुलकर कहना चाहता हूं कि सच को स्वीकार करने में ही सबकी भलाई है चाहे वो साऱथी हो,रथी हो या कोई महारथी। क्योंकि सच से बड़ा कोई नहीं है। और सच यहीं है कि अनिल चमड़िया जी तृतीय श्रेणी से उतीर्ण वाणिज्य स्नातक है। जिस व्यक्ति की नींव ही कमजोर हो, वो किसी को भी मजबूत आधार कैसे दे सकता हैं। जिस शख्स ने छात्र जीवन में गंभीरतापूर्वक अध्ययन नहीं किया हो, वो विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों को अध्यापन कैसे करा सकता है। ये वो मूलभूत बाते है जिस पर गौर फरमाने की ज़रूरत है। हो सकता है कि अनिल चमड़िया जी यहां भी दलित राग अलापना शुरू कर दे और ये कहे कि चूकि मैं दलित था इसलिए मुझे स्नातक में तृतीय श्रेणी के लायक अंक दिया गया। मैं इस बहस में हिस्सा ले रहे तमाम लोगों को खुली चुनौती देता हूं कि वो वर्धा के छात्रों के हित में सकारात्मक पक्षों को तर्कसंगत तरीके से सबके सामने रखे। सिर्फ मुद्दे की बात करे और विषय से भटकने से परहेज करे। आगे जारी है……….</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई सारथी मीणा जी<br />
प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। ये मैं नहीं कह रहा। ऐसा न्यूटन के तीसरे नियम में वर्णित है। अतीत भी इसका गवाह रहा है और वर्तमान भी इसका साक्षी है। आपके विचार को जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप किसी खास अभियान का हिस्सा हैं। आपका मकसद क्या है ये आपको बेहतर पता होगा। आज़ादी के बाद से लेकर आज तक जिस भी पार्टी ने सत्ता संभाली हो। लेकिन देश,समाज और खासकर युवावर्ग की क्या हालत है, इसे दर-दर नौकरी के लिए भटक रहे हम जैसे बेरोजगार युवकों से ज्यादा अच्छी तरह से कौन समझ सकता है। बेकार की टीका टिप्पणी करने के बजाए सही बात लिखने में आपको क्या आपत्ति है। वर्धा के छात्रों की विभिन्न ब्लॉग और वेव साइटों पर दी गई टिप्पणी को पढ़कर ऐसा लगता है कि पूरी दाल ही काली है। भड़ास4मीडिया पर पिछले दिनों एक छात्र ने कुछ इस प्रकार की टिप्पणी की थी। “अनिल चमड़िया ने वर्धा के भोले भाले छात्रों को दिल्ली की राजनीति और पत्रकारिता का सब्जबाग दिखाकर शिक्षा के नाम पर उनके साथ गद्दारी की है।” यहीं वजह है कि विश्वविद्यालय ने अनिल चमड़िया को बाहर का दिखाकर अपनी नाक बचाने में ही भलाई समझी।  एक बात मैं यहां बिलकुल साफ कर देना चाहता हूं कि मैं ना तो विश्वविद्यालय की तरफदारी कर रहा हूं और न ही माननीय श्री अनिल चमड़िया जी का। मेरा मकसद मोहल्ला वेबसाइट पर ज़रुरत से ज्यादा तूल दिए जा रहे इस मुद्दे पर लोगों के सामने परद-दर-परत छुपी हुई हक़ीक़ीत को बेपर्दा करना है। क्योंकि मैं खुद भी इस विश्वविद्यालय का छात्र हूं। और पत्रकारिता विषय से यहां से एमए,एमफिल के बाद अब पीएचडी कर रहा हूं। इसलिए भी मैं अनिल चमड़िया जी को बेहद करीब से जानता हूं। हो सकता है कि नाम के बजाए मेरे लिखने की शैली को देखकर ही अनिल चमड़िया जी मुझे पहचान ले। लेकिन एक बात मैं पूरी दुनिया के सामने खुलकर कहना चाहता हूं कि सच को स्वीकार करने में ही सबकी भलाई है चाहे वो साऱथी हो,रथी हो या कोई महारथी। क्योंकि सच से बड़ा कोई नहीं है। और सच यहीं है कि अनिल चमड़िया जी तृतीय श्रेणी से उतीर्ण वाणिज्य स्नातक है। जिस व्यक्ति की नींव ही कमजोर हो, वो किसी को भी मजबूत आधार कैसे दे सकता हैं। जिस शख्स ने छात्र जीवन में गंभीरतापूर्वक अध्ययन नहीं किया हो, वो विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों को अध्यापन कैसे करा सकता है। ये वो मूलभूत बाते है जिस पर गौर फरमाने की ज़रूरत है। हो सकता है कि अनिल चमड़िया जी यहां भी दलित राग अलापना शुरू कर दे और ये कहे कि चूकि मैं दलित था इसलिए मुझे स्नातक में तृतीय श्रेणी के लायक अंक दिया गया। मैं इस बहस में हिस्सा ले रहे तमाम लोगों को खुली चुनौती देता हूं कि वो वर्धा के छात्रों के हित में सकारात्मक पक्षों को तर्कसंगत तरीके से सबके सामने रखे। सिर्फ मुद्दे की बात करे और विषय से भटकने से परहेज करे। आगे जारी है……….</p>
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	<item>
		<title>By: golu</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/02/07/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai/comment-page-1/#comment-6244</link>
		<dc:creator>golu</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 11:00:45 +0000</pubDate>
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		<description>कारण जी ब्रहमान वादी लोग बाबासाहब अंबेडकर का नम लेना भी पसंद नाही करते तो नारे क्या खाक  लगयणगे, 
आप सही कहा रहे है ये एक तरहा से धमकी ही है क्योकि रॉय वो इंसानो है जो “लातो के भूत बातो से नाही मानते” ,  हमारी लढाई रॉय और उनके चमचो के खिलाफ नाही है हमारी लाढ्य ब्रहमान वाद के खिलाफ है, जिस तरहा V.V.  
मे जातिवाद चल रहा है क्या उसके बारे मे आप जानते ? शायद नही, हमारा नारा ब्राहमान जाती के खिलाफ नाही था हमारा  नारा ब्राहमानवाद के खिलाफ था, जिस तरहा रॉय ने V.V.  मे जातिवाद कार रखा है उदहारण. संतोष बघेल, राहुल कांबले, 
गोलू ने लिखा की V.V.  कर्मचारी भारती करते वक़्त हुवा घोटाला, ये सब उदहारण है की रॉय एक जातिवादी इंसान है, 
क्या हमे ऐसे इंसान और समाज़ के खिलाफ नारे लगाने का कोए हुक़ नाही ! कारण जी अपने अंत मे लिखा है के “वाहा रे शेरो” 
क्या ये उकसाने वाला वाकया नाही है , अप अगर दलित होते तो शायद   समाज़  जाते फर्क यही है के रॉय साहब कुर्सी पर बैठकर 
दलितो के खिलाफ कलम चलते है और हम दलित लोग नारे लगाकर , अगर प्रोफ. करुण्यकर ने नारे लगये तो उनपर एक कमेटी 
क्यो नाही गठित हुए, क्यो उन्हे शोवकौसे नोटीस क्यो दिया गया और 1 बार नाही बार बार क्यो दिया गया , क्या ये दलित 
विरोधी काम  नाही है ,  आप तो रॉय साहब को बहोत कम जानते है , रॉय साहब एक पुलिस कर्मी थे तो उनका दमन साफ  कैसे हो सकता है,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कारण जी ब्रहमान वादी लोग बाबासाहब अंबेडकर का नम लेना भी पसंद नाही करते तो नारे क्या खाक  लगयणगे,<br />
आप सही कहा रहे है ये एक तरहा से धमकी ही है क्योकि रॉय वो इंसानो है जो “लातो के भूत बातो से नाही मानते” ,  हमारी लढाई रॉय और उनके चमचो के खिलाफ नाही है हमारी लाढ्य ब्रहमान वाद के खिलाफ है, जिस तरहा V.V.<br />
मे जातिवाद चल रहा है क्या उसके बारे मे आप जानते ? शायद नही, हमारा नारा ब्राहमान जाती के खिलाफ नाही था हमारा  नारा ब्राहमानवाद के खिलाफ था, जिस तरहा रॉय ने V.V.  मे जातिवाद कार रखा है उदहारण. संतोष बघेल, राहुल कांबले,<br />
गोलू ने लिखा की V.V.  कर्मचारी भारती करते वक़्त हुवा घोटाला, ये सब उदहारण है की रॉय एक जातिवादी इंसान है,<br />
क्या हमे ऐसे इंसान और समाज़ के खिलाफ नारे लगाने का कोए हुक़ नाही ! कारण जी अपने अंत मे लिखा है के “वाहा रे शेरो”<br />
क्या ये उकसाने वाला वाकया नाही है , अप अगर दलित होते तो शायद   समाज़  जाते फर्क यही है के रॉय साहब कुर्सी पर बैठकर<br />
दलितो के खिलाफ कलम चलते है और हम दलित लोग नारे लगाकर , अगर प्रोफ. करुण्यकर ने नारे लगये तो उनपर एक कमेटी<br />
क्यो नाही गठित हुए, क्यो उन्हे शोवकौसे नोटीस क्यो दिया गया और 1 बार नाही बार बार क्यो दिया गया , क्या ये दलित<br />
विरोधी काम  नाही है ,  आप तो रॉय साहब को बहोत कम जानते है , रॉय साहब एक पुलिस कर्मी थे तो उनका दमन साफ  कैसे हो सकता है,</p>
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	<item>
		<title>By: V.R.Kale</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/02/07/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai/comment-page-1/#comment-6236</link>
		<dc:creator>V.R.Kale</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 06:21:06 +0000</pubDate>
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		<description>Prof.Karunyakarji sare Dalit Duniya apke sath hai. Ap Babasaheb ke mission ko age le jayiye. Hum sub apke sath hai. Ap akele nahi hai. Behanji Mayawati ne kaha tha:&quot;Ithihas sirf uska samman karte hai, jo hava ka rukh badalte hai&quot;. Jo kam ap kar rahe hai, vo kam hava ki disha badalne vale kam hai. Naye Ithihas ki racahna hamesha ap jaise Buddha Jivi logo ne hi kiya tha. Babasaheb ka karava aage le jayiye. Pure Dalit samaj, disha nirdesh ke liye apjaise logo ka intijar kar rahe hain.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Prof.Karunyakarji sare Dalit Duniya apke sath hai. Ap Babasaheb ke mission ko age le jayiye. Hum sub apke sath hai. Ap akele nahi hai. Behanji Mayawati ne kaha tha:&#8221;Ithihas sirf uska samman karte hai, jo hava ka rukh badalte hai&#8221;. Jo kam ap kar rahe hai, vo kam hava ki disha badalne vale kam hai. Naye Ithihas ki racahna hamesha ap jaise Buddha Jivi logo ne hi kiya tha. Babasaheb ka karava aage le jayiye. Pure Dalit samaj, disha nirdesh ke liye apjaise logo ka intijar kar rahe hain.</p>
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		<title>By: karan</title>
		<link>http://mohallalive.com/2010/02/07/prof-reply-to-vc-vibhuti-narayan-rai/comment-page-1/#comment-6234</link>
		<dc:creator>karan</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 06:06:40 +0000</pubDate>
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		<description>गोलू के कथन से लगता है कि मेरी बात काफी उकसावे वाली थी, है कि नहीं ? किस तरह से , समझायेंगे ? अगर थी तो वि०वि० परिसर में जो नारे लगे थे वे कैसे उकसावे वाले नहीं थे, यह भी ठीक से समझाएं

आपके कथन में कि &#039;कौन हिम्मत  करेगा&#039; में तर्क कम है इसलिए धमकी का स्वर ज्यादा है &#124; इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपको जो बात पसंद नहीं है, वह कोई न बोले &#124; अगर बोले तो आप आँख दिखायेंगे और चुनौती  देंगे कि हमें उकसाओ मत &#124; यहाँ से बहस का अंत होता है और बाहुबल का रास्ता शुरू &#124; यही हथियार  सारथी जी के कथन में भी नज़र आता है कि अब लगता है वर्धा में &#039;ईंटे&#039; नहीं बचेंगी &#124;

राय जातिवादी हैं तो उनका मुकाबला कीजिये, डट कर कीजिये, मुझे राय साहब के बारे में  ज्यादा नहीं मालूम है &#124; लेकिन मैं यहाँ बहस का रूप देख रहा था कि किस तरह बहस को अपने पक्ष में ढालने के लिए इस तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं कि &#039;उनका चेहरा उतर गया था&#039; और &#039;वर्धा में किस तरह प्रेम फैलाने वाले नारे लगाए गए&#039;

  वाह रे शेरों &#124;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गोलू के कथन से लगता है कि मेरी बात काफी उकसावे वाली थी, है कि नहीं ? किस तरह से , समझायेंगे ? अगर थी तो वि०वि० परिसर में जो नारे लगे थे वे कैसे उकसावे वाले नहीं थे, यह भी ठीक से समझाएं</p>
<p>आपके कथन में कि &#8216;कौन हिम्मत  करेगा&#8217; में तर्क कम है इसलिए धमकी का स्वर ज्यादा है | इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपको जो बात पसंद नहीं है, वह कोई न बोले | अगर बोले तो आप आँख दिखायेंगे और चुनौती  देंगे कि हमें उकसाओ मत | यहाँ से बहस का अंत होता है और बाहुबल का रास्ता शुरू | यही हथियार  सारथी जी के कथन में भी नज़र आता है कि अब लगता है वर्धा में &#8216;ईंटे&#8217; नहीं बचेंगी |</p>
<p>राय जातिवादी हैं तो उनका मुकाबला कीजिये, डट कर कीजिये, मुझे राय साहब के बारे में  ज्यादा नहीं मालूम है | लेकिन मैं यहाँ बहस का रूप देख रहा था कि किस तरह बहस को अपने पक्ष में ढालने के लिए इस तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं कि &#8216;उनका चेहरा उतर गया था&#8217; और &#8216;वर्धा में किस तरह प्रेम फैलाने वाले नारे लगाए गए&#8217;</p>
<p>  वाह रे शेरों |</p>
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