अनिल चमड़िया को निकाल कर गलती सुधार ली

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का यह इंटरव्यू पांच फरवरी की शाम साढ़े छह बजे से आठ बजे के बीच लिया गया। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में। इंटरव्यू जनतंत्र डॉट कॉम के संपादक समरेंद्र, वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और मोहल्ला लाइव डॉट कॉम के मॉडरेटर अविनाश ने लिया। करीब चालीस मिनट की बातचीत रही और वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ी जगजाहिर विसंगतियों को लेकर सवाल-जवाब हुए। कुलपति ने धैर्यपूर्वक सबके जवाब दिये। एकाध बार माहौल में तल्खी भी आयी, लेकिन बातचीत में खलल लेकर नहीं। बातचीत में हमने कोई एडिटिंग नहीं की है। लंबा है, इसलिए इसे हम किस्तों में रखेंगे। पूरी बातचीत के बाद हम इसका ऑडियो वर्ज़न भी यूजर्स को मुहैया कराएंगे : मॉडरेटर
प्रोफेसर अनिल चमड़िया वाले मामले में क्या हुआ था?
अनिल चमड़िया का जो अप्वाइंट हुआ था। उस अप्वाइंटमेंट लेटर में लिखा हुआ था कि “दिस विल बी सब्जेक्ट टू अप्रूवल ऑफ ईसी (एक्जीक्यूटिव कौंसिल)”। ईसी की मंजूरी के बाद ही उनकी नियुक्ति प्रभावी होगी। उनके अप्वाइंटमेंट के बाद ईसी का गठन हुआ। 13 जनवरी को दिल्ली में बैठक हुई। वहां पर जितने लोगों का अप्वाइंटमेंट अनिल चमड़िया के साथ हुआ था, उन सभी लोगों का केस रखा गया। और ईसी ने अनिल चमड़िया को छोड़ कर बाकी सबका अप्रूवल कर दिया। इनका छोड़ दिया।
ईसी में कितने लोग थे?
12 या 13 थे। मुझे इक्जैक्ट तो याद नहीं। लेकिन 12-13 लोग थे।
ईसी के रिजेक्ट करने का आधार क्या था?
ईसी सारे रिकॉर्ड देखती है। सारे डॉक्यूमेंट देखती है। उसके बाद फैसला करती है।
तो क्या ईसी में आपने कुछ प्रस्ताव भी रखा था।
नहीं मैंने कोई प्रस्ताव नहीं रखा। मैंने उनके सामने यह रखा कि ये केसेज हैं… अप्वाइंटमेंट के। इनको मेरिट के आधार पर तय करना है।
ईसी कब कंस्टीट्यूट हुई थी।
ईसी… मुझे लगता कि हमारी 13 को मीटिंग हुई थी तो सात या फिर आठ (जनवरी) को ईसी का गठन हुआ था।
कितने लोग हैं ईसी में इस समय?
ईसी में इस समय… देखिए हमारी ईसी का फॉर्मेशन ऐसा होता है कि सात विजिटर के नॉमिनी होती हैं। तो सात उन्होंने विजिटर ने किये थे। उसमें एक विष्णु नागर जी ने पहले ही दिन.. जैसे ही सात या आठ तारीख को मैंने उनको फोन करके कहा कि आप हमारी ईसी के मेंबर हो गये हैं, उन्होंने कहा कि उनके लिए यह संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि पिछली बार भी वो ईसी में हमारे थे और उनका कहना था कि ईसी की बैठक का शिड्यूल बहुत व्यस्त और थका देने वाला था.. तो वो इस बार नहीं रह पाएंगे। तो इस तरह से छह लोग बचे।
इस समय आपकी ईसी में सब मिला कर कितने लोग हैं।
आठ लोग हैं।
ये पूरी ईसी है?
नहीं, ये पूरी ईसी नहीं है। इसमें सात अध्यापक भी होने चाहिए। अध्यापक पिछले डेढ़, दो साल से नहीं हो पा रहे हैं हमारी ईसी में। उसकी वजह है कि उनकी सीनियॉरिटी को लेकर विवाद चल रहा है। जब तक वो हल नहीं हो जाता, वो ईसी में नहीं आ सकते। ये लगता है कि सवा साल तो मुझी को हो गया और ये मेरे आने के पहले से यानी लगभग दो साल से बिना अध्यापकों के… केवल विजिटर के नोमिनी की ईसी चल रही है।
ये जो एजेंडा में जब ये क्लॉज आया होगा, तो क्या आपने उनको (ईसी मेंबर्स को) इसके बारे में कोई बैकग्राउंडर दिया था?
बैकग्राउंडर दो होते हैं। एक तो विज्ञापन की कॉपी होती है। दूसरा यूजीसी की गाइडलाइंस होती हैं। ये दोनों बैकग्राउंडर उनके पास होते हैं।
ये वैकेंसी कब की थी। 1998, 2000 या फिर 2009 की?
यह मुझे याद नहीं। ये वैकेंसी… जिसमें अनिल चमड़िया हुए थे?
हां
ये मुझे ध्यान नहीं। ये देखना पड़ेगा अपने रिकॉर्ड्स में।
अच्छा?
98 की हो ही नहीं सकती क्योंकि 2001 के बाद हमारे यहां पठन-पाठन हुआ था। तो उसके बाद ही की होगी।
जब आपने एडवरटाइज किया था और अनिल चमड़िया ने अप्लाई किया था तो आपको यह क्यों लगा कि ये क्राइटेरिया फुलफिल करते हैं?
नहीं। उस समय हमारे दफ़्तर से ग़लती हुई थी। यूजीसी की दो गाइडलाइंस थीं। एक गाइडलाइंस पहले की थी, जिसमें… असल में ऐसा है कि यूजीसी में एक एक्सलेंस का क्लॉज है। एक्सलेंस के क्लॉज में आप किसी को प्रोफेसर बना सकते हैं। अगर उसने उस क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण कंट्रीब्यूशन किया हो तो। लेकिन उसके बाद 2002 में यूजीसी ने नयी गाइडलाइंस जारी की थी… 2000 या 2001 में…
2000 में।
चलो तो अच्छा है आपने देख रखा है… तो फिर आप मुझसे क्या पूछ रहे हैं? (थोड़ा पॉज) उन गाइडलाइंस में यह स्पष्ट था कि यूजीसी ने मास कॉम से ये क्लॉज हटा दिया था। बाकी दूसरी जगह है। जैसे अनिल चमड़िया साहित्य के प्रोफेसर हो सकते थे। किसी और हमारे सब्जेक्ट के हो सकते थे। लेकिन वो मास कॉम के नहीं हो सकते थे। दुर्भाग्य से हमारे दफ़्तर में जब स्क्रूटनी (फॉर्म की) हो रही थी, तो वो रिकॉर्ड हमारे सामने नहीं आया था। उस चक्कर में हमने अनिल चमड़िया को बुला लिया और सलेक्शन कमेटी ने उनको सलेक्ट भी कर लिया।
इस ग़लती की जानकारी आप लोगों ने ईसी को दे दी थी। या फिर ईसी ने …
नहीं। हमने दे दी थी। हम क्यों ईसी से छिपाएंगे। हमने उससे पहले हाईकोर्ट को यह जानकारी दे दी थी। शायद आपको यह तथ्य नहीं मालूम है कि नागपुर में हाईकोर्ट में अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ एक रिट है। एक सज्जन जो कि… आशुतोष मिश्रा नाम के एक सज्जन हैं, जो उसी इंटरव्यू में आये थे, जिनका सलेक्शन नहीं हुआ था। तो आशुतोष मिश्रा ने एक रिट कर रखी है हाईकोर्ट में। उन्होंने कहा है कि भाई साहब 2002 या फिर 2001… अब आप कह रहे हैं कि 2000 तो यूजीसी की 2000 वाली गाइडलाइंस का यूनिवर्सिटी ने उल्लंघन किया है। यह विश्वविद्यालय को अधिकार नहीं था। यह ईसी के बैठक से पहले की बात है। हफ़्ते-दस दिन पहले की बात। जब हमने अपना पक्ष रखा, तो हमने स्वीकार कर लिया था कि हमसे ग़लती हो गयी थी। और हम इस ग़लती को सुधार कर आपके पास आएंगे।
हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई की जानकारी ईसी को दी गयी थी?
हां, ये ईसी के मेंबर्स को भी पता होगी।
उनको पता था कि आपलोग एक पोजीशन ले चुके हैं।
हां… नहीं… ये तो मुझे ध्यान नहीं आ रहा कि शायद यह पक्ष उठा था या नहीं उठा था। लेकिन जो यूजीसी के नॉर्म्स थे और जो एड्वरटिजमेंट था, वो सब ईसी के सामने रखा गया था। उन्होंने सारे… दस बारह जितने अप्वाइंटमेट हुए थे… सबका एक-एक करके देखा।
कोर्ट का जिक्र किया गया था?
मुझे नहीं लगता कि कोर्ट का जिक्र किया था। हो सकता है कि बातचीत में आया भी हो, तो मुझे ध्यान नहीं।
मृणाल पांडे का कहना है कि बैठक में कहा गया था कि ग़लती हो गयी है, उसे हमें सुधारना है।
हां… यह तो हमने कहा ही था कि हमसे ग़लती हो गयी है और उसे सुधारना है।
मृणाल जी ने ये भी कहा कि किसी भी कानूनी पचड़े से बचने के लिए हमने उनको अप्रूव नहीं किया।
चलो अच्छा है। मृणाल जी कह रही हैं तो ठीक ही होगा। मृणाल जी का कहना ठीक ही होगा। (पॉज) क्योंकि हमने ऑलरेडी नागपुर हाईकोर्ट में यह स्वीकार कर रखा है कि हमसे ग़लती हुई है। अगले दस पांच दिन में हाईकोर्ट का फ़ैसला आ जाएगा। हमसे ग़लती हुई है तो हम उसे छिपाएं क्यों?
आपके कार्यकाल के दौरान कुल कितनी नियुक्तियां हुई हैं?
अब यह तो ध्यान नहीं… देखना पड़ेगा।
फैक्लटी पोजिशन..
अब यह ध्यान नहीं। 12-13 तो हुई ही होंगी।
बस 12-13 के आस-पास
अभी तक तो एक ही विज्ञापन निकला था मेरे सामने, जिसका इंटरव्यू हुआ था। दूसरा विज्ञापन अब निकला हुआ है। 10-12 लोगों का और। जिस पर अगले एक-दो महीने में इंटरव्यू होंगे।
(((कमरे की घंटी बजती है।)))
लगभग 12 के आसपास आपके मुताबिक नियुक्तियां हुई हैं।
यस… ज़रा एक मिनट शाहिद (कमरे में बैठे हुए शाहिद से उन्होंने गुजारिश की दरवाज़ा खोलने के लिए। बैरा चाय लेकर कमरे में दाखिल होता है। बातचीत जारी रहती है।) इक्जैक्ट संख्या तो मुझे देखनी पड़ेगी।
नियुक्तियों के लिए क्या कोई अप्रूवल लेना पड़ता है? ईसी से या फिर फाइनेंस कमेटी से या फिर यूजीसी से?
नहीं अप्रूवल नहीं लेना पड़ता।
यूजीसी से भी नहीं लेना पड़ता।
यूजीसी की गाइडलाइंस उनकी वेबसाइट पर हैं। अगर आपको चाहिए तो आप उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं।
(((अब बातचीत थोड़ी देर कर लिए रुकती है। चाय बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है)))
“अंकित की चोरी साबित होगी, तो उसे जाने से कोई नहीं रोक सकता”
इसी से जुड़ा हुआ मामला है। क्या आपने ईसी को इस बात की जानकारी दी थी कि डॉ अनिल राय अंकित को लेकर विवाद चल रहा है।
नहीं… नहीं। देखिए। ये ईसी से जुड़ा मसला नहीं है। जो अनिल राय अंकित के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने प्लैगरिज्म (plagiarism – दूसरे के विचार और भाषा को उठा कर अपने नाम पर चेंप देना) किया है… दूसरों की किताबों से चुरा कर लिखा है… उसकी जांच हो रही है। जांच की रिपोर्ट आएगी, वो ईसी के सामने रखी जाएगी। क्योंकि अनिल राय अंकित वो सारी योग्यताएं पूरी करते थे, जो यूजीसी की गाइडलाइंस में थीं, इसलिए अंकित के मामले में कोई दिक्कत नहीं हुई। यह तो दूसरा आरोप है कि उन्होंने प्लैगरिज्म किया है। दूसरों की किताबें उठा कर अपने नाम पर छाप दिया है। यह जांच का विषय है। जांच कमेटी बना दी गयी है।
अंकित अभी सस्पेंड हैं या काम कर रहे हैं?
क्यों भई? जब तक कोई दोषी नहीं पाया जाएगा, उसे सस्पेंड क्यों किया जाए?
सस्पेंड तो करना ही चाहिए था।
काहे को सस्पेंड?
जांच कमेटी में कौन कौन है?
वो मैं अभी नहीं बता सकता। क्योंकि कमेटी के मेंबरों के रिटेन कंसेंट अभी आये नहीं थे। हमने उनको ऑलरेडी भेज रखा है। जब मैं चला था तो उन्होंने कहा था कि उन्होंने स्पीड पोस्ट से भेज दिया है। मुझे वहां से चले सात दिन हो गये हैं। अब मैं जाकर के देख कर बताता हूं।
ये जो ईसी फैसले होते हैं – किसी को रखने और निकालने के फैसले – इसमें क्या ईसी का फैसला अंतिम होता है या फिर इसके ऊपर कोई और भी अथॉरिटी है, जो उसके फैसले को बदल सकती है?
ईसी के ऊपर तो कोई नहीं है। ईसी ही है। अब चमड़िया जी कोर्ट में जाना चाहते हैं तो जाएं।
विजिटर की कोई भूमिका होती है क्या?
विजिटर की भूमिका… विजिटर को हमने भेज दिया है। अब विजिटर के यहां से कोई ऑब्जेक्शन आये, तो देखा जाएगा।
अप्रूवल आ गया क्या?
नहीं। विजिटर के अप्रूवल की कोई ज़रूरत नहीं होती है। विजिटर को हम सूचनार्थ ईसी की सारी प्रोसिडिंग के फैसले भेजते हैं।









बेचारे विभूति बाबू…अच्छी क्लास हो रही है
अब तक विभूति इंटरोगेशन करते थे। तीसेक साल से कर रहे थे। अब इंटरोगेट हो रहे हैं। अभियुक्त की जगह पर पहुंच गए हैं। बुरा वक्त आना अगर ये नहीं है तो क्या है। हिंदी में इंटरनेट युग के पहले बड़े शिकार बने हैं विभूति नारायण राय, IPS। अखबार में एक लाइन नहीं छपी और इंटरनेट पर छपा देखकर खुद ही इंटरनेट पर लाइन हाजिर हो गए। इसे संचार माध्यमों की आने वाली किताबों में दर्ज किया जाना चाहिए। वर्धा में आगे चलकर इस पर शोध भी हो सकता है।
संदिग्ध चरित्र के अविनाश जैसा कि अन्य भाई बंधू लगातार दर्ज करा रहे है को शर्म है कि आती है नहीं . वही पुराना राग वर्धा वि वि . कही और भी देखो भाई. एक तरफा सब दिख रहा है . बेहतर चीजे लाइए . पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लिखे . जीवन में जो घतियाई किये तो किये अब उससे बचिए .
Mr. Dinesh why r u being panicked? If there is going something wrong with Mr BN Roy he must be out of his feudal shade and answer. Is he Monarch or tribal chief of some unheard land or he Polpot? Pls, do welcome the move as internet is democratising the thing not heard of a decade ago.
अनिल चमडिया का निकाला जाना बेहद दुखद है..हम पिछले तीन सालों से इस वि.वि.के जनसंचार विभाग में घिसट रहे थे..न पर्याप्त संसाधन और न ही कोई रचनाशील शिक्षक..एक-दो जो भी थे,पारंपरिक पढाई में ही लिथडकर रहने वाले,और उनसे हमने क्या सीखा,ये ईश्वर ही जाने..खैर,अनिल सर इस बीच अतिथि शिक्षक के तौर पर हमारे बीच आते रहे और उनसे ही हमने जाना कि पत्रकारिता के असली मायने क्या हैं..मैं एक दलित छात्र हूं,और मुझे यह स्वीकारने में आज कतई संकोच नहीं होता कि अनिल सर से मिलने के पहले तक मैं अपनी पीढियों का पिछडापन अपने माथे पर लिये घुमता था..लेकिन पिछले 6-7 महीनों में सब-कुछ बदल गया..उन्होंने मेरे भीतर गजब का आत्मविश्वास भरा..अपने हक-हकूकों के प्रति सचेत किया..मैंने इसी दौरान एक नई सोच के साथ लिखना-पढना-बोलना सीखा..मेरे साथ पढने वाले लोग मेरे भीतर आई इस तब्दीली के गवाह हैं..खास बात कि यह किसी एक दिनेश मुरार की कहानी नहीं है,मुझ जैसे कई दलित और पिछडे आपको वि.वि.में इतने ही आत्विश्वास के साथ घूमते-बोलते मिल जायेंगे..न केवल लडके,बल्कि कई लडकियां भी..मेरी यह टिप्पणी किसी चंगाई सभा में किसी मरीज के ठीक हो जाने पर दिये गये वक्तव्य की तरह नहीं है..यह उस इंसान से संबंधित खरा सच है..सच तो यह भी है कि उनको हटाने की साजिश में शामिल लोग, विद्यार्थियों के बीच उनकी बढती लोकप्रियता से घबराने लगे थे..कुलपति महोदय की बातों पर मुझे बस ये कहना है कि उनके द्वारा पेश किये जा रहे तर्कों के भ्रम का ज्यादा समय तक टिकना संभव नहीं है..क्या सही है,क्या गलत है,का सवाल लिये कोई भी बाहरी जिस दिन परिसर में आकर ईमानदारी से सच जानना चाहेगा,सारे झूठ बिखर जायेंगे..बस बाहर से आने वाले को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि वो 8-10 की संख्या में फैले उन प्रशासन के चारण-भाटों को चिन्हित कर पाने में सफल हो जायें,जो बेहद संजिदगी से वि.वि.के भीतर कोई पद पाने की लालसा समेटे चाकरी में जुटे हैं..मुझे फिलहाल इतना ही कहना है..शेष अगली बातचीत में..
अविनाश कुछ तो शर्म करो चमड़िया की अंधभक्ति में अपनी लुटिया क्यों दुबो रहे हो यार..
क्या अपने वेबसाइट के viewership तुम्हे पता है? वही घिसे-पिटे दो-चार frustrate लोग, जो जिन्दगी में आज तक न कुछ किए हैं न कुछ करने की चाह में हैं और सच तो यह है कि उनसे कुछ होने वाला भी नहीं…. उनकी नाकाम जिन्दगी इसकी गवाह है, हकीकत के धरातल पर टाएं-टांए फिस्स…. चाहे वह चमड़िया ही क्यों न हों.
वैसे सुनने में आया है किसी अमृतवर्षा नामक गुमनाम अखबार (जिसमें पता नहीं पैसा भी किसका लगा है, वह भी कोई गोरखधंधा करने वाला तो नहीं जो तुम जैसे ब्लैकमेलर – जैसा कि तुम्हारे वेबसाइट को देखने से लगता है, को संपादक बना दिया) में नौकरी लगने से तुम्हारी बेरोजगारी खत्म हो गई, चलो हो सकता है पैसा आने के साथ-साथ सुबुद्धी भी आ जाए और दिमाग से छद्म मार्क्सवाद/समाजवाद का भूत भी उतर जाए.
सब कुछ कितना दु:खद है! इसमें अनिल चमड़िया का क्या दोष अगर विश्वविद्यालय के चयनकर्ताओं या नियुक्तिकर्ताओं ने यू जी सी की गाईड लाईन ही नही पढ़ी। यह तो सरासर किसी बेरोजगार के पेट पर लात मारने का खेल खेलना हुआ। और विभूति बाबू कितने आराम से यह स्वीकार कर रहे हैं। उससे भी बुरा यह कि अविनाश जी आपके मन मे यह सवाल क्यों नही आया? गाईड लाईन जिसने नहीं पढ़ी और अपनी अज्ञानता के कारण किसी के भविष्य से खिलवाड़ कर बैठा उसे कोई सजा नही मिलनी चाहिये?
Very impressive interview by Mr. V N Rai. Now it is crystal clear that somebody didn’t get selected he/she start playing caste game. This is very common in India. The moment you loose play the game of bla bla…. Nobody will look at the actual reason rather start concluding on caste/community/atrocity etc.. etc..
अगर अनिल चमड़िया को प्रोफेसर बनाना गलत था और विभूति ये बात मान भी रहा है और कोर्ट में विवि ने ये कहा भी है तो कहीं ये करप्शन का मामला तो नहीं। इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए और तब तक वीसी को निलंबित किया जाना चाहिए। आप लोगों की क्या राय है? छात्रों के भविष्य के साथ ऐसे किसी वीसी को खिलवाड़ करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। इसकी की हुई सारी नियुक्तियां शक के दायरे में है।
जिन्हें तमाम कोशिशों के बावजूद वर्धा विश्वविद्यालय में पढ़ाने की नौकरी नहीं मिली है, और जो मानते हैं कि वे ज्यादा योग्य हैं, उन्हें नागपुर हाईकोर्ट में दाखिल विवि की एफिडेविट को आधार बनाकर तमाम नियुक्तियों को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करनी चाहिए। उन्हें एक महीने में अपने पक्ष में फैसला मिल जाएगा। क्योंकि हाईकोर्ट में विवि ने स्वीकार किया है कि उससे गलती हुई है। अनिल के चमड़िया साथ 12 और रिक्रूटमेंट हुए हैं और सबका आधार एक ही विज्ञापन है। न्याय पाने का ये एक बेहतरीन ग्राउंड है।
भाई अविनाश
आपका नाम तो वाकई में सत्यानाश होना चाहिए था। क्योंकि आप वर्धा में पढाई कर रहे छात्रों का बेड़ा गर्क करने पर तुले हो। सिर्फ एक प्रोफेसर की नौकरी को बचाने की खातिर सैकड़ों छात्रों के भविष्य पर कालिख क्यों पोत रहे हो मेरे बड़े भाई। हमने आपका क्या बिगाड़ा है। आप मीडिया वाले हो मामले की गंभीरता को आपसे बेहतर कौन समझ सकता है। एक बात आप लिख कर रख लो कि विश्वविद्यालय की बदनामी की कीमत हम छात्रों को ही चुकानी पड़ेगी,जब हम बाज़ार में उतरकर नौकरी मांगते फिरेंगे। चलो छोड़ो यार सार्वजनिक रुप से ऐसी बात लिखने के लिए क्षमा चाहता हूं, बुरा मत मानना भाई। आप बाज़ार के हिसाब से चलने वाले आदमी हो। आपको अपने तिजोरी की चिंता ज्यादा सता रही होगी। हम गरीब छात्रों की कौन सुनेगा। आप आज के पत्रकार हो हम आने वाले कल के। सो लेखनी में थोड़ा फर्क होना तो लाजिमी है। लेकिन एक बात बता दो भाई भूतपूर्व प्रोफेसर साहब से उनके पक्ष में गलत को सही बनाकर पेश करने के लिए कितने में मामला सेट हुआ। या फिर कोई और ही बात है। सच चाहे जो भी हो, अगर बताने को आप राजी नहीं तो आपकी मर्जी। लेकिन ये तो हम गरीब छात्रों का हक बनता है कि कोई छात्रों के नाम पर गलत सही छापता रहे और सच बताने से भी परहेज करे। भाई ताली एक हाथ से नहीं बजती। इसलिए छात्रों के हितों का भी ध्यान रखिएगा। क्योंकि विश्वविद्यालय की बदनामी का मतलब है कि निर्दोष छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़। अनिल चमड़िया जी के पक्ष में या विपक्ष में जो कोई खड़ा है वह ये बात अच्छी तरह जान ले कि इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा नुकसान तो यहां के छात्रों का हो रहा है, जिसकी किसी को परवाह नहीं है। अविनाश तो अपनी टीआरपी बढ़ाने में जुटा है। साथ में मंडल जी जैसे वरिष्ट पत्रकार को भी मिला लिया है। समरेंद्र के साथ साथ voiceofmedia.com और chhapas.com के कर्ताधर्ता को भी अपने साथ लेकर जाते। क्यों उनके साथ गोटी फिट नहीं हो पाई क्या।
पृथ्वीनाथ,
चोर गुरु के शिष्यों को देश के चैनलों और अखबारों में नौकरी पाने से कौन रोक सकता है। विभूति नारायण राय जिंदाबाद कि उन्होंने स्वजातीय अंकित राय को नौकरी दी और देश में बदनामी के बावजूद EC से उसकी नियुक्ति OK भी करा ली। जयपुर तक ये चर्चा है कि आपके वीसी तो पंडितों और राजपूतों तक को अपने आसपास नहीं सटने देते। सिर्फ राय ही राय और शुक्ला ही शुक्ला है उनके आसपास। आपके विश्वविद्यालय को अब देश में कौन सा संपादक नहीं जानता। Net पर ये सब न छपता तो आज नहीं तो कल भारत के अखबार छापते…छापेंगे। दलित विरोध का मामला अविनाश ने बाद में छापा है पहले Times Of India और Outlook ने इसे घर घर तक पहुंचा दिया है। अंकित का केस भी पहले अखबारों-पत्रिकाओं में छपा और टीवी चैनलों पर दिखा।
Jaha sumati taha sampati nana
Jaha kumati taha bipati nidana
ये पाठक और उपाध्याय लोग कमेंट लिखते समय अपने ही नाम में खुद ही -JEE- क्यों लगाते हैं। उपाध्यायजी, पाठकजी…। हम आदिवासी ये प्रपंच अब तक न सीख पाए।
इंटरनेट को कोसने की जगह लीजिए पढ़िए: http://timesofindia.indiatimes.com/india/Wardha-VC-accused-of-being-anti-dalit/articleshow/5408327.cms
अविनाश भाई
साबित हो गया कि तुम बहुत बड़े लतखोर और कुंठित आदमी हो यार। कहावत है न कि लातों का भूत बातों से नहीं मानता। तुम्हे इतने लोग सदबुद्धि देने में लगे हुए हैं, लेकिन तुम हो कि सुन नहीं रहे हो। अब समझा कि तुम्हें बार-बार नौकरी से लात मारकर भगा क्यों दिया जाता है। जरूर तुम सब जगह इसी तरह की हरकत करते होगे। आखिर कोई कब तक झेलेगा। अब दो कौड़ी के अखबार अमृतवर्षा में पहुंचे हो तो वहां भी तुम ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हो।
तो ये सब विभूति ने चमड़िया को दिए नोटिस में क्यों नहीं लिखा ? ‘योग्यता’ क्या होती है ? कि एक बार किसी तरह पी. एच. डी. डिग्री हथिया ली और हो गए योग्य ? गुर्दे निकाल कर बेच देने वाले डाक्टर क्या आरक्षण से आए हैं ? सरकारी दफ्तरों में सालों से टांग पर टांग रखे सोए और बिना रिश्वत के तमीज से बात तक न करने वाले लोग क्या आरक्षण से आए थे ? झूठ बोलना बंद कीजिए और आंखें खोलना शुरु कीजिए। सारी दुनिया देख रही है। यह आपका बनाया बंद समाज नहीं है इंटरनेट का युग है। अविनाश आपके कमेंट पब्लिश तो होने दे रहे हैं। आपकी दुनिया में तो अंबेडकर अपनी क्लास के घड़े से पानी भी नहीं पी सकते थे।
अपने यहां आज तक जितनी पी.एच.डी. हुई हैं सब पर जांच बिठा दी जाए तो आधे से ज़्यादा को नानी याद आ जाएगी। और जब चमड़िया को रखकर और निकालकर ग़लती ‘सुधारी’ जा सकती है तो एक दिन वो भी आएगा जब बोगस पी.एच.डी.धारिओं से डिग्री वापस लेकर ग़लती सुधारी जाएगी। थोड़ा इंतज़ार कीजिए।
ये कुंठित ब्लॉगर जो कुछ भी नहीं जानते है बेकार का प्रलाप कर रहे है. चमडिया की क्या लोकप्रियता है ? जो क्लास में कभी जाना ही नहीं चाहता था. रूम में बैठकर गप्प करना और बात है . गप्प करने को यह कहना की २-२ घंटे क्लास चलाती है. २-४ लडको को दारु पिलाकर लोकप्रियता नहीं हासिल होती है. सूना है आजकल चमडिया अपने नए जुगाड़ में लगा है. कुछ नेताओं की चरण चापलूसी करने में लगा है. काश की इतना म्हणत नेक कार्यो के लिए करते. जो लोग इस ब्लॉग पर लिख भी रहे है उन्हें हकीकत का पता नहीं. जैसे यह कहना की १८ लोगो की इ सी ही पुरी है . उन्हें यह पता ही नहीं है की इस वि वि में अभी तक राष्ट्रपति से नामित इ सी से कार्य चलता रहा है .इसमे कोई नया पहाड़ वी एन राय ने नहीं तोड़ा है.
अविनाश क्या पढ़ते लिखते है वे ही जाने . पर मेरी समझ तो यही कहती है की इनको निम् क़ानून कुछ पता नहीं है . कट पेस्ट करना और समझदारी दोनों अलग -२ है.
दिनेश मुरार की सोच बदल गयी मात्र ६ महीने में जबकि चमडिया इन ६ महीनो में ४ महीने बाहर हे रहे. और तो और पिछले वर्स्हू से उनका कही असर नहीं पडा तो ६ महीने में कैसे पद गया यह तो हसने की बात है .
अनुराग की दृष्टि में बेरोजगारी का मामला है . चमडिया जैसे क्रन्तिपुत्रो के बारे में ऐसी टिप्पणी शोभा नहीं देती है. उनकी पत्नी नौकरी में है . वे खाते पीते परिवार से है. वैसे भी रोप्य पैसा उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है
सुन रहे है की चमडिया किसी संसद सदस्य से जुगाड़ लगा रहे है और गलत सलत समझाया है. अब सांसद तो किसी के जाने पर उसकी बात सुनेगे ही .पर उन्हें दोनों पक्ष को सुनना चाहिए जिससे सही बात पता चल सके .
अखबार में कालम लिखना और किसी संस्था में करना दो अलग -२ बाते है. चमडिया को इसे समझना चाहिए .और सचमुच में इतनी योग्यता है तो भारत में और भी वि वि है जहा उनके गुणों की क़द्र की जायेगे प्रयास करके देखे
और जो खाते-पीते-लूटते-खसोटते-भंभोड़ते परिवारों से हैं उनका क्या ? आपको अच्छी तरह मालूम है कि और विश्वविद्यालय भी फ़िलहाल कितने निष्पक्ष और निरपेक्ष हैं !? इसी लिए इतना उछल रहे हैं ना। लेकिन कब तक ! आप बाहर जाकर ऐसे प्रयास करके देखें ज़रा !
बहुत ही बेहतरीन इंटेरोगेशन है। हो सकता है कोर्ट के फैसले में इससे भी कुछ तथ्य मिल जाएं। लेकिन सबसे अजीब बात है कि वाइस चांसलर को अपने फैकल्टी के बारे में ही मालूम नहीं है। हा हा हा। कैसे वीसी हैं भाई!!!!!
chandrika nam se likha uparokt coment durbhavana me ya fir kisi any chandrika dvara likha gaya hai chandrika media, hindi uni. wardha ka nahi hai mai anil chamadiya ke nikale jane ke sakht virodh me hoo aur adhikans chhtro dvara is par hastakshar abhiyan bhi chal raha hai. mai vishvaviduyalay me vyapt tanashahi ke khilaf hoon.
vc ko kuchh bhee kaho us admee ne wardha aakar vishvvidyalaya kee soorat badal dee yah dekhane kee bat hai . uskee imandaree aur niyat par shak karne valon par sharm aatee hai. p0lic ke daroga kee naukaree koyee naheen chhodega aur is aadmee ne DG POLICE kee naukaree chhod dee. kitne logon me yah himmat hai ki vah is tarah se apnee galtee sveekar le. vo bhee court me? maf kariyega yah galtee sirf patrkarita ke professor pad kee bhartee men hee huyee hai . kripaya vc ka interview dhyaan se padhen.
सब चुतियापा है। बकबास है। अनिल चमड़िया को हटाया जाना कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि इस पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा हो। अविनाश जैसे कुछ निठल्ले लोगों के लिए यह अच्छ रोजगार हो सकता है, लेकिन बुद्धिजीवी लोग एेसी बेतुकी बहस में क्यों पड़ रहे हैं।
सब बकवास है तो जगदीश श्रीवास्तव इस बहस में क्यों पड़ रहे हैं। चुतियापा है तो रोज यहां झांकने क्यों आते हैं। वे येचर्चा बंद क्यों कराना चाहते हैं। वे डरते क्यों हैं। उन्हें किस बात का भय है। बताओ जगदीश तुम आतंकित क्यों हो।
सारथी मीणा
मैं मोहल्ले पर किसी निरर्थक बहस में पड़ने नहीं आता। केवल इस उम्मीद से इसे क्लिक कर लेता हूं कि अविनाश कभी-कभी अच्छा लिख लेता है। लेकिन इधर कुछ दिनों से बकबास कर रहा है। अगर इसी तरह कचरा फैलाते रहा तो यहां (मोहल्ला में) कौन आएगा। अविनाश भले चुतियापा कर रहा है पर मैं उसकी लेखनी को पसंद करता हूं। उम्मीद है एक न एक दिन सुधऱ जाएगा। हालांकि तुम लोग उसे सुधरने दो तब न।
शरमा जी, तो क्या आरक्षण से आने वाले लोग दूध से धुले रहेंगे इसकी गारंटी लेते हैं आप? आप ज़रा उनका भी कुछ डाटा पेश करें कि उनकी प्रोडक्टिविटी बहुत ऊपर है -
अगर आपका इशारा इस तरफ है कि बिना आरक्षण के आने वाले डाक्टर गुर्दे बेचते हैं तो इसलिए आरक्षण उचित है तो बलिहारी है आपकी सोच की | और नहीं तो यह भी देखिये कि जो भी ऊंचे डाक्टर है वाब ज़्यादातर (मैं अंदाज़ से ही लिख रहा हूँ) बिना आरक्षण के आये हैं|
आप फिर अवसरों की कमी की बात करें उससे पहले मैं आपसे यह बता दूं, कि अगर उचित अवसर मिलें और काफी डाक्टर आरक्षण से आने लगेंगे तो क्या फिर उनमें कुछ बेईमान नहीं होंगे ? या सारे के सारे सत्य वादी बनेंगे?
जो किसी तरह से डिग्री हथिया ले ऐसी पद्धति का विरोध करें – आपके वक्तव्य से लगता है कि डिग्री लेना या पढ़ाई लिखाई का ही कोई महत्व नहीं है – तो फिर क्या कोई विश्वविद्यालय खुला अखाड़ा बन जाए?
[...] कर दी है और वो अपना काम कर रही है। जबकि मोहल्ला लाइव से इंटरव्यू में कुलपति ने बताया कि जांच कमेटी [...]
सुनो भाईयो, देखो आप सारी ईमानदारी की उम्मीद उनसे करो जो आरक्षण से आएं। सारी कत्र्तव्यपरायणता उनसे मांगो जो भूखे-नंगे हैं। न्यायपरक लड़ाई की उम्मीद उनसे करो जो हज़ार साल से पिटे चले जा रहे हैं। जो हज़ार साल साल से पीट रहे हैं लूट रहे हैं उनसे कैसी न्याय की उम्मीद ? उनसे क्यों की ईमानदारी की कामना ? उनका हक़ है बेईमानी। उनका जन्मसिद्ध अधिकार है अत्याचार। उनका नैसर्गिक स्वभाव है मलाई खाना। उनके खि़लाफ़ क्यों कमेंट डालना ? चलो इसी बात को स्वीकार कर लो। फिर भी ख़ुदको निष्पक्ष और पढ़ा-लिखा घोषित कर लो। चमड़िया के खि़लाफ़ कुछ दिखे तो झट से स्वीकार कर लो। और राय के खि़लाफ़ कुछ हो तो कहो मैं उन्हें जानता नहीं ! ओफ्फो क्या मुसीबत है ये कारण नामधारी सज्जन! इनको समझाने का कोई तरीका है किसी के पास ?
[...] विभूति नारायण राय के इंटरव्यू का एक हिस्सा हमने पहले जारी किया था। उसके बाद का यह [...]
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