पुस्तक मेले से लौट रहे थे, पुलिस ने नक्सली कह कर पकड़ लिया
यूपी की मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय को पुलिस ने नक्सली बताकर गिरफ्तार किया है। हमें मालूम है कि इस एक विशेषण की आड़ पुलिस किन मंसूबों के साथ लेती है। और आजकल इस नक्सली शब्द पर केंद्र भी सजग है। उसे मालूम है कि पहाड़ों पर और जंगलों में संघर्ष बन कर उगे हुए इन नक्सलियों को साफ किये बिना वो पहाड़ों और जंगलों पर कब्जा नहीं कर सकती। सोनभद्र से आवेश तिवारी ने एक रिपोर्ट लिखी है। साथ ही इस संदर्भ में हम पीयूसीएल का एक पत्र भी छाप रहे हैं, जो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखा गया है : मॉडरेटर
सत्ता, साजिश और सीमा
आवेश तिवारी
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को अचानक इलाहाबाद जंक्शन से गिरफ्तार कर लिया गया। वे दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले से लौट रहे थे। ये घटना बताती है कि उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार आहत और लहूलुहान है। जिस एक वजह से सीमा आज़ाद और उनके पति की गिरफ्तारी की गयी, उस एक वजह का यहां हम खुलासा करेंगे।
जिस वक़्त सीमा आजाद को गिरफ्तार किया गया, ठीक उसी वक़्त पूर्वी उत्तर प्रदेश के अति नक्सल सोनभद्र जनपद में सोन नदी के किनारे बालू के अवैध खनन को लेकर सरकार के विधायक विनीत सिंह और उदयभान सिंह उर्फ़ डॉक्टर के समर्थकों के बीच गोलीबारी हो रही थी। इस गोलीबारी से डर कर तमाम आदिवासी अपने घरों से भाग खड़े हुए थे। घटनास्थल पर पुलिस पहुंची। गोली के खोखे भी बरामद किये, लेकिन किसी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी। ये घटना कोई नयी नहीं है। समूचे प्रदेश में खनन मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा और उनके कारिंदों के द्वारा अवैध खनन का जाल बिछा कर अरबों रुपये की काली कमाई की जा रही है और इसको अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रदेश के तमाम माफियाओं, हिस्ट्रीशीटरों को बेनामी ठेके दिये जा रहे हैं। निस्संदेह ऐसी स्थिति में आम मजदूर, आदिवासी और किसान का शोषण होना लाजिमी है।
सीमा आजाद इन्हीं मजदूरों के हक़ की लड़ाई लड़ रही थी। अकेले लड़ रही थी। इलाहाबाद-कौशांबी के कछारी क्षेत्र में अवैध वसूली व बालू खनन के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों के दमन पर उन्होंने बार-बार लिखा। जबकि किसी भी बड़े अखबार ने हिम्मत नहीं की। नंदा का पुरा गांव में पिछले ही माह जब पुलिस व पीएसी के जवान ग्रामीणों पर बर्बर लाठीचार्ज कर रहे थे, सीमा अकेले उनसे इन बेकसूरों को बख्श देने के लिए हाथ जोड़े खड़ी थी। उस वक़्त भी किसी अखबार ने इस बर्बरता के बारे में एक लाइन खबर नहीं छापी। सीमा की यही जंगजू प्रवृत्ति सरकार को नहीं भायी। खनन माफियाओं को खुश करने और अपनी झोली भरने के लिए सीमा को रास्ते से हटाना जरूरी था। इलाहाबाद के डीआईजी ने ऊपर रिपोर्ट दी कि सीमा माओवादियों का जत्था तैयार कर रही है और अब नतीजा हमारे सामने है।
ऐसा नहीं है कि सरकार समर्थित अवैध खनन के गोरखधंधे को अमली जामा पहनाने के लिए सीमा से पहले फर्जी गिरफ्तारी नहीं की गयी है। कैमूर क्षेत्र मजदूर महिला किसान संघर्ष समिति की रोमा और शांता पर भी इसी तरह से पूर्व में रासुका लगा दिया गया था क्योंकि वो दोनों भी आदिवासियों की जमीन पर माफियाओं के कब्जे और पुलिस एवं वन विभाग के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा रही थी। हालांकि काफी हो-हल्ला मचने के बाद सरकार ने सारे मुक़दमे उठा लिये। इन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस ने सोनभद्र जनपद से ही गोडवाना संघर्ष समिति की शांति किन्नर को भी आदिवासियों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। शांति एक वर्ष बीतने के बाद जैसे तैसे जमानत पर रिहा हुई।
आज विभिन्न चैनलों पर चल रहे न्यूज फ्लैश, जिसमें नक्सलियों की गिरफ्तारी की बात कही जा रही थी… देखकर हमें लग गया था कि टीवी चैनलों के पास सच्चाई की एक ही सुरंग है और वो है सत्ता का पक्ष। सत्ता का वर्जन। उनके पास अपनी कोई हूक नहीं कि वो पुलिस की दी गयी सूचना पर सवाल खड़ा कर सके। काउंटर कर सके। जो पुलिस बताये, वही सूचना है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र
प्रति,
अध्यक्ष,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
नयी दिल्ली।
महोदय,
हम आपको अवगत कराना चाहते हैं कि इलाहाबाद की पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता व पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) की राज्य कार्यकारिणी सदस्य व संगठन मंत्री सीमा आजाद, उनके पति पूर्व छात्रनेता विश्वविजय व साथी आशा को शनिवार को पुलिस ने इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन से बिना कोई कारण बताये उठा लिया है। ये दोनों मानवाधिकार कार्यकर्ता नयी दिल्ली से विश्व पुस्तक मेले में भाग लेकर रीवांचल एक्सप्रेस से इलाहाबाद लौट रहे थे। पुलिस का कहना है कि ये लोग नक्सली हैं।
महोदय, संगठन आपको इस गिरफ़्तारी की पृष्ठभूमि से अवगत करना चाहता है। पिछले दिनों इलाहाबाद व कौशांबी के कछारी इलाकों में बालू खनन मजदूरों पर पुलिस-बाहुबलियों के दमन के खिलाफ पीयूसीएल ने लगातार आवाज उठाया। इलाहाबाद के डीआईजी ने बाहुबलियों व राजनेताओं के दबाव में मजदूर आंदोलन के नेताओं पर कई फर्जी मुकदमे लादे हैं। डीआईजी ने यहां मजदूरों के ‘लाल सलाम’ संबोधन को राष्ट्रविरोधी मानते हुए ‘लाल सलाम’ को प्रतिबंधित करार दिया था। पीयूसीएल ने लाल सलाम को कम्युनिस्ट पार्टियों का स्वाभाविक संबोधन बताते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग की निंदा की थी। पीयूसीएल का मानना है कि ‘लाल सलाम’ पूरी दुनिया में मजदूरों का एक आम नारा है और ऐसे संबोधन पर किसी तरह का प्रतिबंध अनुचित है। इलाहाबाद-कौशांबी के कछारी क्षेत्र में अवैध वसूली व बालू खनन के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों के दमन पर सवाल उठाते हुए, पिछले दिनों पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद व केके राय ने कौशांबी के नंदा का पुरा गांव में वहां मानवाधिकार हनन पर एक रिपोर्ट जारी किया था। नंदा का पूरा गांव में पिछले एक माह में दो बार पुलिस व पीएसी के जवानों ने ग्रामीणों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। इसमें सैकड़ों मजदूर घायल हुए। पुलिस ने नंदा का पुरा गांव में भाकपा माले न्यू डेमोक्रेसी के स्थानीय कार्यालय को आग लगा दिया। उनके नेताओं को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर कई दिनों तक जेल में रखा।
इस सबके खिलाफ आवाज उठाना इलाहाबाद के डीआईजी व पुलिस को नागवार गुजर रहा था। पुलिस कत्तई नहीं चाहती कि उसके क्रियाकलापों पर कोई संगठन आवाज उठाये। सीमा आजाद, उनके पति विश्वविजय व एक अन्य साथी आशा की गिरफ्तारी पुलिस ने बदले की कार्रवाई के रूप में किया है। सीमा आजाद का नक्सलियों से कोई संबंध नहीं है और वह मानवाधिकारों के क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से कार्यरत हैं। सीमा आजाद ‘दस्तक’ नाम की मासिक पत्रिका की संपादक भी हैं। उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों की स्थिति, मजदूर आंदोलन, सेज, मुसहर जाति की स्थिति व इंसेफेलाइटिस बीमारी जैसे कई मसलों पर गंभीर रिपोर्टें बनायी हैं। सीमा आजाद के पति विश्वविजय व उनकी साथी आशा भी पिछले लंबे समय तक इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र नेता के रूप में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने ‘इंकलाबी छात्र मोर्चा’ के बनैर तले छात्र-छात्राओं की आम समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है। पुलिस जिन्हें नक्सली बता रही है, वो पिछले काफी समय से छात्र और मजदूरों के बीच काम कर रहे है।
महोदय उत्तर प्रदेश पुलिस पहले भी पीयूसीएल के नेताओं को मानवाधिकारों की आवाज उठाने पर धमकी दे चुकी है। 9 नवंबर को चंदौली में कमलेश चौधरी के पुलिस मुठभेड़ में हत्या के बाद पीयूसीएल ने इस पर सवाल उठाये थे। जिसके बाद 11 नवंबर, 09 को खुद डीजीपी बृजलाल ने एक प्रेस कॉनफ्रेंस में कहा था कि “पीयूसीएल के नेताओं पर भी कार्रवाई की जाएगी।” (देखें 12 नवंबर, 09 का दैनिक हिंदुस्तान )
इलाहाबाद से सीमा आजाद की गिरफ्तारी पुलिस की उसी बदले की कार्रवाई की एक कड़ी है।
अतः हम आप से अपील करते हैं कि इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिसिया उत्पीड़न पर रोक लगाएं और मानवाधिकारों की रक्षा के दायित्व को पूरा करें। हम यह भी मांग करते हैं कि सीमा आजाद व उनके साथियों को तुरंत मुक्त किया जाए।
भवदीय
चितरंजन सिंह, राष्ट्रीय सचिव, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल)
केके राय, अधिवक्ता, राज्य कार्यकारिणी सदस्य, पीयूसीएल
संदीप पांडेय, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता व राज्य कार्यकारिणी सदस्य, पीयूसीएल
एसआर दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, राज्य कार्यकारिणी सदस्य, पीयूसीएल
शाहनवाज आलम, संगठन मंत्री, पीयूसीएल
राजीव यादव, संगठन मंत्री, पीयूसीएल
विजय प्रताप, स्वतंत्र पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता









ninda karta hu.
इस तरह की घटनाओं में अभी और वृद्धि होने वाली प्रतीत होती है। अब राज्य सरकारें अपनी विफलता का ठीकरा इसी तरह फोड़ेंगी।
हक की आवाज उठाओ तो नक्सली
अगर रोजी रोटी कमाने बाहर जाओ तो गुंडों की सेना
महान देश का महान लोकतंत्र !!!
मैं पुलिस की इस कायरतापूर्ण कार्यवाही की कठोर निंदा करता हूं। क्या लोकतंत्र में अब कोई सहिष्णुता नहीं बची?
साथ ही जंगलों में आतिशबाज़ी कर नवजनवादी क्रांति की लाईन लेने वाले संगठनों को भी सोचना चाहिये कि उनके इस मध्यवर्गीय रूमानियत के चलते जनता में काम करना कितना मुश्किल होता जा रहा है। मैं उनसे भी अपनी पूरी कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार की अपील करता हूं।
आतंकवादियों से ज्यादा बड़ी चुनौती है आमलोगों की भीड़ – सीआरपीएफ़
(खबर पढ़ें – http://www.hindustantimes.com/News-Feed/newdelhi/Mobs-bigger-challenge-than-terrorists/Article1-506187.aspx)
सत्ता के ऊपरी गलियारों वाले भले ही यह दुहराते रहें कि सशस्त्र उग्रवाद सबसे बड़ी चुनौती हैं, लेकिन जो सरकार कि तरफ से असल में जमीन पर लड़ते हैं, वो जानते हैं कि इस व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा खतरा कौन है – रोटी, गरिमा और न्याय के लिए जूझते निहत्थे आम लोगों की भीड़ !
मौजूदा केन्द्र सरकार बर्बर हो चुकी है। उसके मुँह खून लग चुका है। आदमखोर हो चुकी है। आवेश तिवारी ने जो लिखा है उसे ध्यान रखते हुए कहा जा सकता है कि सरकारी संरक्षण प्राप्त गुण्डों के खिलाफ जान दाँव पर लगाने वाले पत्रकारों की जान वो गुण्डे नहीं लेंगे। सरकार लेगी। संवैधानिक तरीके से लेगी!
bol k lab khaamosh hain tere!!!!!
lekin kab tak!!!!
आपके सर में दर्द होता है तो आप दावा लेते है गला नहीं कटवाते.
सरकार इस तरह का काम करके आपने असफलता जाहिर कर रही है या …असफलता.
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