“जाति के सवाल पर विभूति का चेहरा उतर गया था”

♦ हेमंत

VN Raiबात बहुत पुरानी नहीं है। चर्चा छिड़ी है, तो बता रहा हूं। विभूति नारायण राय बीते साल पटना आये थे। गांधी मैदान में नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में श्री राय पाठकों से मुखातिब थे। सवाल-जवाब का दौर चल रहा था। कोई पूछ रहा था कि इतने बड़े पुलिस ऑफिसर होकर आप इतना बढ़िया कैसे लिख लेते हैं? आपको कोई परेशानी तो नहीं होती है? श्री राय मजे से इन सवालों का जवाब देते जा रहे थे। मेरे मन में भी सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे। मैं अचानक खड़ा हो गया। मंच संचालन कर रहे सज्जन से माइक मिलते ही मैंने अपना सवाल पूछा। सवाल था, सांप्रदायिकता पर बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन जातिवाद के नये चेहरे पर कलम क्यों नहीं चल रही है? मौजूदा दौर का जातिवाद अलग किसम का है। अब छुआछूत की समस्या नहीं है। जाति के आधार पर अवसरों से वंचित करने कि साजिश बड़ी समस्या है। उम्मीद थी कि श्री राय सवाल सुन कर खुश होंगे और विस्तार से जवाब देंगे। लेकिन सवाल का असर उल्टा हुआ। उनका चेहरा उतर गया। अनमने ढंग से उन्होंने मेरे सवालों के जवाब दिये। जातिवाद पर बोलने के बदले उन्होंने सांप्रदायिकता पर छोटा सा जवाब दिया। मैं मायूस हो गया। लगा कि शायद श्री राय मेरा सवाल नहीं समझ पाये। ऐसा उनके प्रति मेरी आस्था के कारण हुआ। लेकिन वह सवाल और श्री राय का बेतुका जवाब मेरे मन को अकेले में हमेशा मथता रहता था।

अचानक अनिल चमड़‍िया जी का मामला सामने आया, तो लगा मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गये। दरअसल श्री राय जैसे प्रगतिशील और सेकुलर लोग हमारे समाज में भरे पड़े हैं, जिनको पहचानना मुश्किल होता है। लेखनी में उदार दिखने वाले ऐसे लोग करनी में बहुत खतरनाक होते हैं। ऐसे लोगों कि लंबी सूची तैयार की जा सकती है, जो प्रगतिशीलता का नकाब ओढ़ कर सारे कुकर्म करते हैं। इस सूची में बड़ी तादाद तो पत्रकारों की है, जो कलमचोरों की जातिवादी फौज तैयार करने में जुटे हैं। बिभूति जी तो इस बीमारी के प्रतीक भर हैं। यह संकट जैसा दिख रहा है, उससे कई गुना अधिक गहरा है। अगर ऐसा नहीं होता, तो बड़े-बड़े नामचीन कलमची महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के उत्पीड़न और अनिल चमड़‍िया प्रकरण पर कलम चलने के बदले चुप नहीं रहते। इस गंभीर मसले पर सोचने-विचारने के बदले बड़े लोगों ने चुप्पी साध रखी है और टुच्चे किसम के लोग पूरे मामले को जातिवादी बहस में उलझा कर रख देना चाह रहे हैं ताकि समस्या की जड़ पर हमला न हो सके। हंसी तो उन लोगों पर आती है, जो अनिल चमड़‍िया की जाति का उदभेदन में लगे हैं। अरे भाई, उन्होंने तो अपनी जाति को लेकर कभी कुछ कहा ही नहीं है। वे तो सही फरमा रहे हैं कि उनका निष्कासन एक हिटलरी सोच का नमूना है, जो असहमति की आवाज को अपने बूटों तले कुचलना चाहता है।

जाहिर है, असहमति की आवाज तो वहीँ से उठेगी जहां उत्पीड़न हो रहा है। और उत्पीड़न किनका और कहां हो रहा है, यह पूरी दुनिया देख-समझ रही है। वह वंचित लोग ही हैं, जिनका उत्पीड़न हो रहा है। उनके ही अवसर छीने जा रहे हैं। एक ऐसे दौर में, जब सामाजिक सुरक्षा का सवाल हाशिये पर चला गया है, तब यह खतरा और गंभीर हो गया है। क्योंकि जिन्हें सुरक्षा और संरक्षण की जरूरत है, वह सबसे अधिक असुरक्षित होते जा रहे हैं।

(हेमंत पटना में रहते हैं। पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

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