चोरगुरु के चक्रव्‍यूह में फंसे हैं और भी कई विश्‍वविद्यालय

Awesh Tiwari

लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ आवेश तिवारी

Dr Anil K Rai Ankit Imageचोर गुरु उर्फ अनिल कुमार राय उर्फ अंकित। वर्धा विश्‍वविद्यालय के जनसंचार विभाग के इस विभागाध्यक्ष के कई चेहरे हैं। वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का यह सिपहसालार न सिर्फ अनिल चमड़‍िया के खिलाफ साजिश का सूत्रधार है बल्कि इसके खिलाफ शैक्षणिक अपराध के भी कई मामले बनते हैं। विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग ने जहां पिछले सप्ताह इसके द्वारा फर्जी तरीके से नियुक्त किये गये रिसर्च फेलो की नियुक्ति को रद्द करते हुए जांच बैठा दी है और इसकी किताबों को पूरे देश में प्रतिबंधित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है, वहीं रीवां विश्‍वविद्यालय ने पठन सामग्री की चोरी को लेकर इसे पुनः नोटिस जारी की है। सिर्फ इतना ही नहीं, अनिल कुमार राय अंकित की वर्धा में नियुक्ति को लेकर विभूति नारायण राय खुद ही कटघरे में खड़े हो गये हैं।

पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के इस भगोड़े शिक्षक ने वर्धा में नियुक्ति के पूर्व पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय को झांसे में रखा। इसके द्वारा रीवां विश्‍वविद्यालय में रीडरशिप के लिए तीन वर्ष का अवकाश लिया गया था, मगर पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय को बिना किसी सूचना के इसने वर्धा में नियुक्ति प्राप्त कर ली। और तो और, ये सब गड़बड़ी विभूति नारायण राय के संज्ञान में हुई। पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के कुलपति सारस्वत कहते हैं, हमने इस संदर्भ में इन्हें कई बार नोटिस दी मगर अनिल राय अंकित ने उसे संज्ञान में नहीं लिया। अब हम इस मामले में सख्त कार्यवाही करने जा रहे हैं।

खबर ये भी है कि छात्रों और शिक्षकों से अवैध तौर पर धन की वसूली और रीवां विश्‍वविद्यालय से पठन सामग्री की चोरी के आरोप में भी इन पर किसी वक्‍त मुकदमा किया जा सकता है। वहीं इनके आर्थिक घोटालों की जांच आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दी गयी है।

क्या आपने कभी स्पाइस, मीडिया फोरम या सादर का नाम सुना है? नहीं सुना होगा, ये सब तिकड़मी गुरु अनिल राय अंकित की फर्जी संस्थाएं हैं, जिनसे ये बड़े पैमाने पर बेनामी वसूली करता रहा है। पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में अपने कार्यकाल के दौरान इसने स्पाइस और मीडिया फोरम नामक संस्थाएं बनाकर प्रति छात्र 500 और प्रति शिक्षक एक हजार रुपए की दर से लाखों की वसूली की और वहां से जुगाड़ से छुट्टी लेकर रायपुर चला आया और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, रायपुर के इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया विभाग में रीडर हो गया। वहां भी उसने सोसायटी फार अप्लाएड डेवलपमेंट एंड रिसर्च (सादर) नामक एक अपना एनजीओ बनाया है और बेहद धूर्तता से उसका पता डिपार्टमेंट आफ मास कम्यूनिकेशन, वीबीएस पूर्वांचल विवि, जौनपुर दे दिया, जिससे लोगों को यहां लगे कि एनजीओ पूर्वांचल विवि के पत्रकारिता विभाग का है। इस एनजीओ के माध्यम से और राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत से इसने करोड़ों रुपये की वसूली की। आश्‍चर्यजनक तथ्य ये है कि ये सारी वसूली अंग्रेजी और हिंदी माध्यम के पत्रकारों के लिए सेमिनार आयोजित करने और उन्हें प्रशिक्षित करने के नाम पर की गयी। जब ये सारा मामला केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के संज्ञान में लाया गया और इस गड़बड़ घोटाले की जांच शुरू हो गयी तो अनिल कुमार राय अंकित पूर्वांचल विश्‍विद्यालय के पूर्व कुलपति पीसी पतंजलि और वर्धा के कुलपति वीएन राय के संबंधों का फायदा उठाते हुए वर्धा जा पहुंचा।

रायपुर में अपने कार्यकाल के दौरान उसने अवधेश प्रताप सिंह रीवां विश्‍वविद्यालय से छपी कई किताबों और पठन सामग्री को अपने नाम से प्रकाशित करा दिया, जिस पर रीवां विश्‍विद्यालय ने उससे कई बार जवाब तलब किया और अब कार्यवाही का मन बना रहा है। यहां पर ये बताना आवशयक है कि अनिल कुमार राय अंकित के गॉड फादर और पीसी पतंजलि के बीच चोरी का रिश्ता है। खुद भी कॉपी राइट चोरी के मामले में पकड़े गये पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के इन पूर्व कुलपति महोदय की बदौलत ही अनिल पूर्वांचल पहुंचा। पतंजलि, अनिल को पूर्वांचल में ठेके पर लेक्चरर बना कर लाये और फिर पत्रकारिता विभाग का प्रमुख बना दिया। हद तो तब हो गयी, जब अनिल अंकित के लिए विशेष तौर पर पद सृजित करके उसे विश्‍वविद्यालय में स्थायी नियुक्ति दे दी गयी।

अनिल के गोरखधंधों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। शातिर दिमाग के अनिल ने काली कमाई की नीयत से एक पब्लिशर से मित्रता की और जौनपुर से लेकर रायपुर तक छात्रों को दोयम दर्जे की किताब पढ़ने पर मजबूर कर दिया। अनिल अंकित राय और यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन के संबंध आज पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में किसी से छुपे नहीं हैं। ये पब्लिकेशन श्री पब्लिकाशन और इंडिका पब्लिकेशन नाम से भी कित्ताबें छापता है। जिस वक्‍त पतंजलि कुलपति थे, अनिल ने पूर्वांचल से संबद्ध लगभग 40 महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में इसी पब्लिकेशन की किताबें जबरन भिजवा दी। यही काम उसने अपने रिश्तों का लाभ उठाते हुए रायपुर में भी किया। अगर सूत्रों की मानें, तो अनिल राय अंकित को इस सहयोग के बदले में यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन ने बाकायदे पार्टनरशिप दे दी है। यहां ये बताते चलें कि अनिल चमड़‍िया जैसे प्राध्यापकों की बदौलत अनिल अंकित और यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन की दाल वर्धा में नहीं गल पायी, जिसको लेकर भी अनिल अंकित के मन में बहुत खुन्नस थी।

अनिल अंकित द्वारा पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में अपने कार्यकाल के दौरान की गयी प्रोजेक्ट फेलो की नियुक्ति में भी आर्थिक घोटाला किया गया। 10 जुलाई 2007 को अमर उजाला में प्रोजेक्ट फेलो की नियुक्ति हेतु एक विज्ञापन प्रकाशित कराया गया। 17 जुलाई 2007 को साक्षात्कार के बाद नियुक्ति कर भी ली गयी। मगर आश्‍चर्यजनक ये रहा कि एक महीने बाद जब फेलो के वेतन का समय आया, अनिल ने 13 महीने पहले की नियुक्ति दिखाकर गुपचुप तरीके से वेतन बनवा लिया। बताया जाता है कि ये फेलो की नियुक्ति भी इसी शर्त पर की गयी थी कि जो भी अतिरिक्त पैसा मिलेगा, वो अंकित की जेब में जाएगा। कुछ दिनों बाद जब यह मामला खुला, तो वर्तमान कुलपति सारस्वत ने इसे गंभीर प्रकरण मानते हुए इसकी सूचना विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग को देकर अपने स्तर से भी जांच बैठा दी। जांच के बाद विश्‍वविद्यालय अनुदान योग ने उस नियुक्ति को ही रद्द कर दिया। जानकारी मिली है कि अब आगे की कार्यवाही के लिए आर्थिक अपराध शाखा को पूरी रिपोर्ट भेज दी गयी है।

अब जबकि अनिल चमड़‍िया के वर्धा विश्‍वविद्यालय से अकारण सेवा समाप्ति के प्रकरण में पूरे देश में विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे हैं, अनिल कुमार राय अंकित के काले कारनामों पर कार्यवाही को लेकर पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के प्राध्यापक भी एकजुट हो रहे हैं।

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