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वेलेंटाइन डे : अनूठी मोहब्‍बत के चंद अफसाने

14 February 2010 15 Comments

♦ चण्डीदत्त शुक्ल

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कहते हैं, दिल की लगी क्या जाने ऊंच-नीच, रीत-रिवाज, घर-बिरादरी और लोक-लाज। फिर क्यों भला मोहब्बत के अफसाने सुनते-सुनाते वक्त भी किसी लड़की की निगाह लड़के की जेब पर और लड़कों की निगाह लड़की के फिगर पर अटक जाती है! मोहब्बत करने वाले खफा होंगे, तमतमा जाएंगे, कहेंगे – अंगूर खट्टे हैं मोहतरम के! खुद को लैला नहीं मिली, सो मोहब्बत को बदनाम करने चले हैं। लेकिन जनाब, कम ही सही, सच तो है ये भी। बहुत-सी मोहब्बतें टाइमपास हो गयी हैं। बड़ी गाड़ी, भरी जेब और महंगे गिफ्ट। बड़े से बड़े आशिक दिल का जनाजा निकालने और बेवफाई की दास्तान लिखने के लिए उकसाने को काफी हैं।

ऐसी बहुत-सी मोहब्बतें, जो बरिस्ता, मैकडी या पार्कों की बेंचों पर शुरू होती हैं, एक-आधे थप्पड़ और कुछ अश्लील एसएमएस के साथ खत्म हो जाती हैं। तो ऐसी चाहतों का क्या कीजिए। आराम बड़ी चीज है, मुंह ढंक के सोइए या फिर लगाते रहिए दिल बार-बार और हर बार तुड़वाने को तैयार हो जाइए। या फिर हो भी सकता है कि सच्ची मोहब्बत मिल ही जाए, कभी-कहीं! खैर, हमारे पाठक कहेंगे, गजब की मनहूसियत है मियां! वेलेंटाइन डे के दिन इश्क के इजहार की बात होती तो कुछ बात बनती।

ये जनाब तो बेवफाई और झूठी मोहब्बतों का रोना ले बैठे। सो मोहतरम… बात तो मोहब्बत की ही करेंगे हम भी, लेकिन ये आशिकी जरा अलग-सी है, अनूठी है। अच्छा, अफसाना शुरू करने से पहले जरा कुछ सवाल-जवाब हो जाएं। आप ही बताएं, आपका महबूब गर किसी गैर की बाहों में सिमट जाए, तो आप उसे चाहेंगे? या तड़पेंगे, झुलसेंगे और भुला देंगे? और कहीं पता चले कि वो नैतिक ही नहीं है, देह की उसे फिक्र ही नहीं है, तो? तब पक्का है कि आप थर्रा जाएं। कल तक जिसका नाम रटते-रटते आपकी जुबान नहीं थकती थी, वो ही आपकी नजर से गिर जाए! पर मंटो, ऐसे महबूब से ही प्यार करता था… क्यों? बताएंगे हम, आगे की लाइनों में। अब शुरू करते हैं हम अफसाना… अनूठी मोहब्बत का।

लीजिए साहब, जब ढोल-ताशे बज ही गये, एलान हो गया नये अफसाने की शुरुआत का, तो बात मुद्दे की हो जाए। एक मियां मंटो हुए हैं अदब की दुनिया में। खुद बा-होश रहे और ऐसी-ऐसी बातें लिखीं कि पढ़ कर अच्छे-खासे लोग बेहोश हो जाएं। उसकी निगाह में मोहब्बत का बयान भी अनूठा है… मंटो कहता है, “किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए, तो मैं उसे जुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ जरूर खींचेगा, जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियां जान देती हैं, लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा। इस बजाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियां भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा।”

कमाल का है मंटो, तभी तो उसने कई ऐसे अफसाने लिखे, जो अदालत तक खींच ले जाने का सबब बने। एक कहानी तो कहर ही बरपाती है – “बू”। कहानी कुछ यूं शुरू होती है – बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवन के स्प्रिंगदार पलंग पर, जो अब खिड़की के पास थोड़ा इधर सरका दिया गया, एक घाटन लड़की…

आगे की लाइनें यहां नहीं लिखी जा सकतीं? क्यों भला… अश्‍लील लगेंगी। पर मंटो को कोई दिक्कत नहीं होती। वो नैतिकता के नाम पर घबराने, थर्रा जाने और लोगों को परेशान करने वालों से कहता है, जब तुम्हारा समाज ऐसा है, तो उसे साफ करो। मैं तो जो है, वो ही लिखता हूं।

इस कहानी का पढ़ा-लिखा नायक रणधीर सब कुछ समझता था, लेकिन वो कभी “मिट्टी पर पानी छिड़कने से निकलने वाली सोंधी-सोंधी बू” नहीं भुला सका। एक वन-डे स्टैंड में घाटन नायिका से मिला रणधीर उस बू को हरदम याद करता है, जो “…कुछ और ही तरह की थी। उसमें लेवेंडर और इत्र की मिलावट नहीं थी, वह बिलकुल असली थी, औरत और मर्द के शारीरिक संबंध की तरह असली और पवित्र।”

अब क्या कहेंगे! क्या इसे अपवित्र, अनैतिक कहकर अनूठी किस्म की मोहब्बत का एक हिस्सा मानने से इनकार कर दिया जाए? ये लगाव नहीं, तो और क्या है, जो “हिना के इत्र की तेज खुशबू” से अलग हटाकर रणधीर के दिमाग में किसी के जिस्म की बू भर देती है!

पाक-साफ, सच्ची मोहब्बतों की दास्तान पढ़ कर खुद को लैला-मजनू समझ लेने वालों को मंटो बार-बार झटका देता है। उसकी एक कहानी है – “सौ कैंडल पावर का बल्ब”। यहां भी कोई जन्म-जन्म की मोहब्बत नहीं है… सिर्फ एक रात की बात है। रात है और एक शहर… नौजवान मुसाफिर एक दलाल से मिलता है। तमाम रातों की जागी हुई एक वेश्या के पास जाता है, जो मजबूरी की शिकार होकर, उनींदी सी ग्राहक के साथ चल देती है। भलामानस ग्राहक उसे वापस पहुंचा देता है, ताकि वो दो घड़ी नींद हासिल कर सके। दो दिन बाद ही वो फिर उसके ठिकाने पर जाता है। बार-बार खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खुलता, तो वो झांककर देखता है। वेश्या ने दलाल का सिर ईंट से तोड़ दिया है और खुद चैन की नींद सो रही है। हाजरीन कहेंगे – इसमें मोहब्बत कहां है? जनाब, मोहब्बत क्या सिर्फ लड़के और लड़की के बीच दिलों के कारोबार को कहते हैं? इश्क क्या महज जन्म-जन्म की कसमें खाने के व्यापार को कहते हैं? यहां शुरुआत में वेश्या के जिस्म की भूख भले हो, ग्राहक के लिए उसकी नींद अपने दैहिक सुख से ज्यादा बड़ी लगती है…। पल भर की सही, एक दिन की सही, ऐसी मोहब्बत अनूठी नहीं, तो क्या है? (भले ही आप इसे हमदर्दी जैसा कुछ मान लें!)

एक कहानी, जिसका शीर्षक याद नहीं आता, में तवायफ अपने आशिक की जान बचा लेती है, खुद हलाक होकर। कौन कहेगा, इससे ज्यादा वफादार कोई पतिव्रता औरत भी होगी? ऐसे ही तो झटके हमेशा देता रहा मंटो। मंटो का जिस्म भले अब दुनिया में न हो, लेकिन उसने अपने अफसानों में सच का जो तेजाब भरा, वो सभ्य समाज के खोखले बदन को पता नहीं, कब तक झुलसाता रहेगा। मंटो तवायफों पर कहानियां लिखता था और उन्हें किसी भी समर्पित प्रेमिका से ज्यादा ईमानदार और पवित्र मानने से कभी गुरेज नहीं करता था। वो मजहबी था या नहीं, इस पर कोई फैसला कर पाना आसान नहीं है, लेकिन कहानियों की शुरुआत से पहले कागज पर 786 लिखने वाला मंटो अपने अफसानों में मोहब्बत के रंग खुद ही भरता था। इसके लिए उसने किसी ईश्वरीय सत्ता से परमिशन लेने की भी जरूरत नहीं समझी। कहीं पढ़ा था – कब्र में पड़ा मंटो अब भी सोच रहा है कि वो ज्यादा बड़ा अफसानानिगार है या खुदा? यही सच भी तो है…

मोहब्बत किससे हो, कितनी हो, कब तक हो, हो भी तो क्यों हो, होने से क्या मिले… इतना जिसने सोचा, उसने मोहब्बत कहां की… इतना सोच-विचार करके दिल लगाने वालों से तो लाख गुना अच्छे मंटो के बुरे चरित्र वाले, खूब खराब नायक-नायिकाएं। वो कम से कम संस्कारों, आदर्शों, नैतिकताओं के नाम पर न जिस्म की गुहार का मुंह बांधते हैं, न ही दिल को रोक लेते हैं – नहीं, इस गली से नहीं गुजरना। यहां कोयला बिकता है… चेहरे पर कालिख लग जाएगी!

chandidutt shukla(चंडीदत्त शुक्‍ल। गोंडा, यूपी में जन्म। दिल्ली में निवास। अखबारों-मैगजीन में चाकरी करने, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद इन दिनों फोकस टीवी के प्रोग्रामिंग सेक्शन में स्क्रिप्टिंग। दूरदर्शन-नेशनल के साप्ताहिक कार्यक्रम कला परिक्रमा की लंबे अरसे तक स्क्रिप्टिंग की है। अब इनसे chandiduttshukla@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

15 Comments »

  • Sanjay Grover said:

    “”वो मजहबी था या नहीं, इस पर कोई फैसला कर पाना आसान नहीं है, लेकिन कहानियों की शुरुआत से पहले कागज पर 786 लिखने वाला मंटो अपने अफसानों में मोहब्बत के रंग खुद ही भरता था। इसके लिए उसने किसी ईश्वरीय सत्ता से परमिशन लेने की भी जरूरत नहीं समझी। कहीं पढ़ा था – कब्र में पड़ा मंटो अब भी सोच रहा है कि वो ज्यादा बड़ा अफसानानिगार है या खुदा? यही सच भी तो है…”"

    Achchha lagaa. Maza aaya.

  • meenu khare said:

    बेहतरीन पोस्ट लिखी है शुक्ल जी. सारगर्भित और तथ्यात्मक आलेख के लिए बधाई.

  • rashmi ravija said:

    बरसों पहले पढ़ी थी ये कहानियां,आज फिर याद आ गयीं…सच है…मुहब्बत किसे कहाँ,कब मिल जाए…पता नहीं और मंटो के इन चरित्रों के अन्दर भी दिल तो एक सामान्य इंसान वाला ही है…जिसमे निखालिस मुहब्बत पनप सकती है….बहुत ही बढ़िया आलेख…

  • nirmla.kapila said:

    बहुत सार्गर्भित आलेख है। बधाइ

  • Shikha said:

    wah gazab ki bhasha shailee…sargarbhit aalekh…

  • Yatish said:

    “कब्र में पड़ा मंटो अब भी सोच रहा है कि वो ज्यादा बड़ा अफसानानिगार है या खुदा?”
    बहुत बढ़िया…

  • प्रेम said:

    बहुत बढ़िया। क्या बात कही है आपने। मंटो की कहानी बू मैंने भी पढ़ी है। काफी अच्छी लगी थी। यहां पर आपने उल्लेख करके कहानी की याद को फिर से तरोताजा कर दिया। वैसे आपके साथ कोई इस तरह की घटना घटी है कि नहीं।

  • अजित वडनेरकर said:

    वैलेटाईन डे पर असली हिन्दुस्तानी चरित्रों की याद, मार्फत मंटो….
    बढिया है चंडीबाबू

    हम भी मंटो के फैन हैं। तब से जब कुछ नहीं समझते थे। गर्म गोश्त, बू, काली सलवार, खोल दो जैसी कहानियों के मायने एक बारह साल के लौंडे को भला क्या समझ आते, पर मंटो का नशा उसी उम्र में चढ़ा था।

    बढिया आलेख।

  • तेजेन्द्र शर्मा said:

    भाई चण्डीदत्त जी,

    वैलेन्टाइन दिवस के संदर्भ में मण्टो की बेहतरीन कहानियों का उल्लेख करते हुए आपने सच्ची मुहब्बत के अर्थ बहुत से अर्थहीन लोगों को समझा दिये। आपकी भाषा में विट है और आप अपनी बात को बेहतरीन सलीक़े से कहते हैं। आपने मण्टो की प्रासंगिकता वर्तमान में एक बार फिर स्थापित कर दी है। एक वेश्या की सच्ची मुहब्बत की कहानी मुर्दाघर के लेखक जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने अपनी कहानी मुहब्बत में बहुत ख़ूबसूरती से की है। मौक़ा लगे तो ज़रूर पढ़ियेगा।

    तेजेन्द्र शर्मा
    महासचिव – कथा यू.के. (लंदन)

  • Pramod Tambat said:

    अच्छे आलेख के लिए चण्डीदत्त जी को बधाई। मगर पोस्ट पर लगाए गए पेन्टिंग के चित्र को अश्लील कहने के लिए मजबूर हूँ।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    http://www.vyangya.blog.co.in

  • Dileepraaj Nagpal said:

    Sir Jee, Hindustaan Me To Valentines Dapy Per Jitna Karobaar Phoolon Ka Hota Hai, Utna Hi Condom Ka Bhi…Aag Lagi Hai To Aap Aur Sab To Bolenge Hi Na…

  • tara chandra gupata said:

    bahut sundar post hai badhai. ho.

  • Rohit said:

    yehi photo mili thi ,,

  • sanjeev kumar said:

    janaab aap ke kahne ka andaaj kuchh-kuchh manto se milta hai. halanki ye bhi sach hai ki is mahaan afsaananigar ki tulna kisi se nahin ki ja sakti, lekin phir bhi apke dhaardar lekhanshaili ko padhkar barbas tulna karne ko vivash ho gaya hun. janaab isi tarah lage rahen inshaa-allah ek din aap jarur us bulandi ko chumenge.

  • वेदसिन्धु said:

    वेलन्टाइन्स डे के आपके विचार से मैँ पूरी तरह से सहमत हूँ मगर वह चित्र ठीक नहीँ है

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