सवाल पात्रता का नहीं, दुराग्रह का है
♦ चंद्रिका
संपूर्ण सत्य भूल या गलती से ही प्रकाश में आता है। यह मेरे अपने अनुभव की बात है। मैं फिजूल के विवरणों, बहानों में विश्वास नहीं रखता – न मैं अभियुक्तों और गवाहों पर विश्वास करता हूं। इच्छा न रहते हुए भी लोग अक्सर झूठ बोलते हैं। तुम्हें ऐसे गवाह मिलेंगे जो दिल पर हाथ रखकर वचन देंगे कि उन्हें अभियुक्त के प्रति कोई दुश्मनी या बैर भावना नहीं है – किंतु उन्हें स्वयं नहीं मालूम कि कहीं बहुत गहरे में उनका अवचेतन मन घृणा और द्वेष से भरा है। मैं अच्छी तरह से जानता हूं, आदमी लोग बेईमान जानवर हैं…
चेकोस्लोवाकिया के लेखक कारेल चापेक की कहानी प्रत्यक्ष प्रमाण से

व्यवस्था को सुबूत चाहिए होता है। सच्चाई पता होने के बावजूद वह कोई कार्यवाही तब तक नहीं कर सकती, जब तक उसके पास पर्याप्त सबूत न हों और सबूतों की तादाद यदि झूठ के पक्ष में अधिक हो गयी तो जीत झूठ की ही होनी है। हमारी न्यायपालिका की संरचना में यही होता है। ऐसी स्थिति में सत्ता संरचना में खड़ी मजबूत ताकतें अक्सर झूठ के साथ नजर आती हैं। चूंकि उनकी मजबूती जिस आधार पर टिकी होती है, वह बेहद थोथी और खोखली होती है। यह खोखलापन तब और बढ़ जाता है, जब वे एक गलती को सुधारने के बजाय इसे संवारने के लिए कई गलतियां कर जाते हैं।
हिंदी समाज इस खोखलेपन का एक धनी समाज है। यह वैचारिक शून्यता के बजाय वैचारिक ऋणात्मकता में जा रहा है। जहां चल रही बहसें संकल्पनाओं के आधार पर देखे जाने के बजाय निजी स्तर पर दृष्टिपात की जा रही हैं। जिसमें घोर दृष्टिविहीनता व भविष्य में कुहासा ही दिख रहा है। लिहाजा किसी मसले पर सार्थक बहस होने के बजाय वह सब कुछ इस कुहासे की धुंध में, झगड़े सा चल रहा है, जिसमें कोई किसी का चेहरा तक नहीं पहचान रहा। वह सब कुछ कहा जा रहा है, जो नहीं कहा जाना चाहिए और जो कुछ कहा जाना चाहिए उसके लिए रिक्त स्थान का अभाव और इसे भरने वालों की कमी सी दिख रही है।
पिछले दिनों महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में वरिष्ठ पत्रकार और वहां के प्राध्यापक प्रो अनिल चमड़िया को विश्वविद्यालय से निकाले जाने का मामला कुछ इसी रूप में रहा है, जिसमें वहां के वर्तमान कुलपति, कथाकार विभूति नारायण राय, मृणाल पांडेय, शिक्षाविद कृष्ण कुमार, गंगा प्रसाद विमल जो कि विश्वविद्यालय ईसी के सदस्यों में से हैं। इन पर निजी तौर पर कई तीखी टिप्पण्णियां की गयीं और बौद्धिक समाज में उनकी प्रतिष्ठा से हटकर उन्हें आंकने का प्रयास किया गया। यह होना भी चाहिए कि समाज में ऐसे व्यक्ति जो समाज की संरचना को अपनी रचनाओं-वक्तव्यों से तौलते हैं व एक बौद्धिक हस्तक्षेप रखते हैं, उनके निजी जीवन को आंका और तौला जाए, क्योंकि इनका जीवन एक बड़े वर्ग की निर्मिति में कम-ओ-बेश भूमिका निभाते हैं। कम-अज-कम उनके जीवन निर्माण में जो इस बौद्धिक समाज की अगली पीढ़ी है या उस कतार में खड़े हैं। पर अफसोसजनक यह कि इस तरह की बहस में मुख्य मुद्दा व स्वर गायब हो जाता है और बहस संकल्पना के बजाय चेहरे पर केंद्रित हो जाती है।
यहां पर यह पूरा मसला शिक्षा संस्थानों में पात्रता की योग्यता को लेकर था। उच्च शिक्षा के संस्थानों में अध्यापन के लिए किस तरह की पात्रता को मानक बनाया जाना चाहिए, क्या इसका आधार महज अंकों वाली शिक्षा और विश्वविद्यालयों में कराये जा रहे शोध की डिग्रियां होनी चाहिए या फिर इसके अन्य पैमाने भी बनाये जाने चाहिए, क्योंकि विश्वविद्यालयों में कराये जा रहे शोध की बदहाल स्थितियों से हम वाकिफ हैं। इसी आधार पर यूजीसी ने 1998 में एक निर्देशन विश्वविद्यालयों के लिए बनाया था ताकि समाज के विभिन्न आयामों में काम करने वाले बुद्धिजीवियों को विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए लाया जा सके। इसी आधार पर देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में कई प्रध्यापकों को अध्यापन के लिए लिया भी गया है, जो न सिर्फ विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे हैं बल्कि उससे विश्वविद्यालय की गरिमा भी बढ़ी है। हिंदी विश्वविद्यालय में अनिल चमड़िया की प्राध्यापक के रूप में मौजूदगी कुछ इसी रूप में थी। विश्वविद्यालय ने छह माह पूर्व 12 नियुक्तियां की थी, जिसमें मीडिया विभाग में अनिल चमड़िया, कृपाशंकर चौबे और अनिल राय अंकित के साथ अख्तर आलम नाम के एक व्यक्ति की नियुक्ति की गयी थी। इन चारों नामों में से तीन नाम अनभिज्ञ नहीं हैं। अनिल अंकित चोरी करके किताबें लिखने के कारण ख्याति पा चुके हैं तो अनिल चमड़िया अपनी पत्रकारिता के कारण लोगों में जाने जाते हैं। ऐसे में कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाविदों के होते हुए, जो यह मानते हैं कि शिक्षा सामाजिक विकास का पीढ़ीगत हस्तांतरण है, भी अनिल चमड़िया का निष्कासन और चोर गुरु के नाम से कुख्यात अनिल अंकित को लिया जाना विश्वविद्यालय के ईसी सदस्यों पर ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार और इन बुद्धिजीवियों द्वारा उस भ्रष्टाचार की पुष्टि अफसोसजनक है और सवाल खड़ा करती है।
इस पूरे मसले पर कुलपति विभूति नारायण राय को जातिवादी भी घोषित किया गया जबकि यह मसला जाति का नहीं है। यह एक ऐसा मामला है, जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों में कुलपति द्वारा अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल है, जिसमें कोई अध्यापक असहमत होने का अधिकार नहीं रख सकता। यदि रखता है तो तब तक, जब तक कि उसके विपक्ष में सुबूत न जुटाये जा सकें। यह एक तरह से प्रतिरोध करने वाली संस्कृति का सत्ता में आसीन शक्तियों के साथ संघर्ष है।
सवाल जब पात्रता का हो, तो शिक्षण संस्थानों में महज अध्यापन के लिए ही पात्रता को मापदंड नहीं बनाया जाना चाहिए बल्कि संस्थान निर्माण व विकास की प्रक्रिया में सभी तरह के जिम्मेवार अधिकारियों का चुनाव अहमियत रखता है। विभूति नारायण राय को जब हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर चुना गया, उसके पहले तक वे एक उच्च पुलिस अधिकारी के रूप में यूपी में कार्यरत थे। आखिर इस तरह के चुनाव में क्या मानदंड होते हैं। शिक्षा और पुलिस विभाग के बीच किस तरह के संबंध हैं, जिसके कारण एक पुलिस अधिकारी को उच्च शिक्षण संस्थान के कर्ताधर्ता के रूप में चुना जाता है। इस चुनाव के अलावा जो एक महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि क्या एक व्यक्ति अपने जीवन के लंबे समय को जिस संरचना, संस्कृति में जीता है उसका उसकी जीवन शैली व कार्य प्रणाली पर कोई फर्क नहीं पड़ता? मसलन पुलिस विभाग की संस्कृति और संरचना में जीने वाले व्यक्ति का वहां के तौर तरीकों का उस व्यक्ति पर प्रभाव पड़ना लाजमी है और जब उन्हें शिक्षण संस्थानों में नियुक्त किया जाएगा, तो अपनी पूरी जीवन संस्कृति को कोई व्यक्ति स्थानांतरण मात्र से नहीं त्याग सकता और न ही उसे दोषी ठहराया जा सकता है बल्कि ऐसे मामले में चुनाव प्रक्रियाएं और चुनाव करने वाले लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें समाज के विभिन्न अनुशासनों का बोध होना चाहिए और समरूपी कार्यसंस्कृति के आधार पर उच्च अधिकारियों का चुनाव किया जाना चाहिए। पर शिक्षण संस्थानों में पिछले कुछ वर्षों से यह देखा जा सकता है कि सेना व पुलिस विभाग से नियुक्तियां की जाने लगी हैं। हिंदी विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय जिसके उदाहरण हैं। ऐसे में क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय उच्च शिक्षण संस्थानों के महत्वपूर्ण पदों के निर्णयों को बहुत ही चलताऊ किस्म से लेता है, जबकि उच्च शिक्षण संस्थानों में तैयार होने वाले छात्र जिन्हें मंत्रालय द्वारा संसाधन के रूप में देखा जा रहा है, इस तरह के फैसले से पांच वर्षों तक प्रभावित होते रहते हैं।
हाल के दिनों में कपिल सिब्बल उच्च शिक्षा में जिस तरह के सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं, उसे प्रभावी रूप से लागू करने के लिए शिक्षण संस्थानों में ऐसे शिक्षाविदों को नियुक्त किया जाना चाहिए, जिससे शिक्षण संस्थानों की संरचना में चल रही इस तरह की गड़बड़िया कम हों और लोकतंत्र के दायरे को व्यापक किया जा सके।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना वर्धा में की गयी, तो इस संकल्पना के साथ कि यह विश्वविद्यालय हिंदी में मौलिक शोध व कार्य से हिंदी समाज को समृद्ध करेगा। हिंदी विश्वविद्यालय को हिंदी समाज एक आशा भरी नजर से देख रहा है। कुलपति के रूप में प्रथम संबोधन में विभूति नारायण राय ने विश्वविद्यालय में यह बात कही थी। साथ में यह भी कि हम लोकतंत्र के दायरे को बढ़ाएंगे। उन्होंने विश्वविद्यालय में ऐसा करने का प्रयास किया भी होगा, पर एक ढांचा बनाने के लिए कार्यशैली की जरूरत होती है और लोकतंत्र के अपने-अपने मायने हैं। इस लोकतंत्र की विविधता यदि देश में ही देखें तो मणिपुर, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में अलग-अलग नजर आएगी। लिहाजा वर्तमान कुलपति के लोकतंत्र की परिभाषा को हमें जानने का प्रयास करना चाहिए।
मेरा अनुरोध है कि इस पोस्ट पर टिप्पणी करने वाले मित्र अपने सही नामों व परिचय के साथ टिप्पणी करें ताकि एक स्वस्थ बहस इस पर हो सके। मॉडरेटर से अनुरोध है कि अपरिचित व झूठे नामों की टिप्पण्णियों से बहस गलत दिशा में मुड़ जाएगी, अतः उन्हें सम्मलित न करें।
(चंद्रिका। पत्रकार, छात्र। फ़ैज़ाबाद (यूपी) के निवासी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बाद फिलहाल महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अध्ययन। आंदोलन। मशहूर ब्लॉग दखल की दुनिया के सदस्य। उनसे chandrika.media@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









chandrika
galat tarike se dusro ko badnam karne ka ganda khel kab tak khalego. university ne jo kiya court ke direction ke mutabik kiya. tumhe agar koi problem hai to court mein ek PIL dalo. galat tarike se dusro per kichad charitrahin log uchala karte hai. jinki apni koi aukat nahi hai.zindgi ke is mukam per kutch karne ke bazaye time pass mat karo mere bhai. mein tumhara classmate hu isliye tumhe chamariya ke changul se bachana chahata hu. anil mishra tu barbad ho hi chuka hai. tum apne aap ko bacha lo. tumhe tumhare pujya mata pita ka wasta.
पृथ्वीनाथ अज्ञानी, कोर्ट से कोई निर्देश आया है, ऐसा तो वीसी भी नहीं कह रहे हैं। हाईकोर्ट में आए केस के बाद जारी नोटिस के जवाब में विवि ने कहा कि चमड़िया की नियुक्ति में गड़बड़ी हो गई। इसके बाद ईसी का फैसला आ गया। ईसी का फैसला हाई कोर्ट में सबमिट किया गया। इस वजह से अनिल चमड़िया की नियुक्ति के खिलाफ याचिका को कोर्ट ने डिस्पोज ऑफ कर दिया क्योंकि जिस नियुक्ति के खिलाफ याचिका दायर की गई थी, वो नियुक्ति ही निरस्त की जा चुकी थी। इसलिए केस चल ही नहीं सकता था।
इसका मतलब समझते हो, या जो मन में आएगा वो बकोगे। वीसी से आज पूछकर कल लिखना कि उन्होंने क्या बताया। मोटे दिमाग को समझ में आने वाली बात ये है कि विवि ने स्टैंड ले लिया कि नियुक्ति में गड़बड़ी हुई। कोर्ट ने कोई निर्देश किसी को नहीं दिया है। समझे।
‘bhaasaa me jhut bolana koi humse sikhe’
ye samaj hamara banaya gaya hai fir aaj tumahari bari hai to kal hamari.halanki aap sahi hai ye sab jante hain par khel kuch aur hi hai,ye to tum samjhte hi ho.par han vishwavidyalaya ka academic zero ho gaya hai ye kafi khatarnaak hai.
ab bas nach gana hi ho raha hai aur sab thirak rahe hain.
nam lok ka hai par kin logon ka lok hai ye.jara laut aao anil ji ke ghar se fir bat karenge.
मोहल्ला पर पहली बार इस संबंध में यथार्थपरक लेख पढ़ने को मिला.
बहुत सुचिंतित और गम्भीर आलेख।
चन्द्रिका जी
कहते है ताकत आती है तो जिम्मेदारिया भी आती है लकिन यहाँ तो ताकत आती है तो स्वार्थ आता है बईमानी आती है. इंसान का ये प्रकृति होती है इसे न तो न्याय पालिका बदल सकती है न तो कार्यपालिका.
Sanjay bhai
Aapki durdarshita kisi dritrastra ke hi kaam aa sakti hai. Aur aapka dritrastra kaun hai ye bhi kise se chupa hua nahi hai. mere pyare gyani bhai court me mamla tha. ye to aap bhi mante ho. apki baton ke anusar EC ke faisala court me submit kiya gaya. agar EC ka faisla galat hota to kya court maan leti? Aur agar EC ka faisla sahi hai to phir kahe ko farzi halla bol kar rahe ho mere bhai. jaoo jakar nind ki goli khakar chain se so jaoooooooooo
पृथ्वीनाथ,
हाईकोर्ट में क्या केस था। यही न कि एक कैंडिडेट ने रिट फाइल की थी कि चमड़िया की नियुक्ति गलत है, उसकी जगह मुझे रखा जाना चाहिए। राइट? इस पर कोर्ट ने क्या किया? चमड़िया और विवि को नोटिस भेजा। विवि ने कहा गलती हो गई, सुधार लेंगे। फिर ईसी ने गलती सुधार दी। कोर्ट ने कहा जब नियुक्ति ही कैंसिल है तो केस डिस्पोज ऑफ किया जाता है। अब इतनी सी बात तुम्हें नहीं समझ आती है तो क्या ये मेरी या जमाने की गलती है? तुमने बचपन में शंखपुष्पी नहीं खाई, तो क्या अब जमाने का दिमाग खाकर उसकी भरपाई करोगे।
vibhooti narayan ke ang vishesh ke ird gird uge baalo ko bhi ye chitte ukhad nahi payenge.
मै चन्द्रिका जी की बातों से पूर्णतया सहमत हूँ ,वर्धा में अनिल चमडिया को निकाले जाने और इस पूरे मामले में वी .एन .राय एंड कम्पनी की भूमिका को लेकर अलग अलग प्लेटफार्मों पर जो कुछ भी कहा जा रहा है वो ज्यादातर जनवादी और जातिवादी विचारधारा से प्रेरित है ऐसे में इस महत्वपूर्ण मुद्दे का अनावश्यक विशेषीकरण हो रहा है और चाहते हुए भी देश के बुद्धिजीवियों ,छात्रों और पत्रकार इस मामले के कुछ कहने से बच रहे थे ,निस्संदेह इस पूरे मामले को देश की शिक्षण संस्थाओं में लोकतंत्र के विलोपन से जोड़ कर देखा जाना चाहिए था |संस्थाओं और संस्थाओं के सिंहासन पर बैठे लोगों के द्वारा लोकतंत्र केr खिलाफ की जा रही साजिश के खिलाफ समूह का विद्रोह तभी संभव हो सकता है जब अनिल चमडिया को एक व्यक्ति नहीं एक प्रतीक के रूप में लिखा जाता |
Maoist killed 30 policemen in Bengal and killed 9 villagers in Bihar. Avinash will not discuss that issue because none of the killed belong to his family. Maoist are more dangerous then Pakistan . Soon our Govt realises this thing is better. They should arrest the sympathizers of Maoist who are providing base and collecting money for them
तो तुम अब फतवा जारी कर रहे हो की हिंदी समाज खोखला है .होगा भी जब तुम्हारे जैसे होनहार लोग आयेंगे. . निजी और सार्वजनिक क्या होता है जी. सब सार्वजनिक होता है . जब जनता का धन खर्च हुआ तो सब जनता का. निजी आक्रमण तो तुम कर ही रहे हो. चोर गुरु कह कर पुकारना कहा तक ठीक है. जबकि कल तक उनकी चरण चापलूसी कर रहे थे . आखिर
किसी भी चयन का कोई भी आधार तो होगा ही . तो क्या तुम्हारे चमडिया के लिए वि वि से शोध ही बंद करा दिया जाय . तो फिर तुम जब फैल हो गए थे क्यों छटपटा रहे थे. प्रवेश क्यों लिया . १९९८ का यूं जी सी का निर्देशन ख़ास अवसर के लिए है/था. न की दुरुपयोग के लिए जो की हो रहा है. तुम ठीकेदार हो गए हो किसी को कुछ भी कहने के लिए कौन प्रसिद्ध है और कौन कुख्यात या कि कौन किस जगह से जुड़ा कौन कम्युनिस्ट है कौन फासिस्ट है कौन भाजपाई है है या आर एस एस का है. तुम्हे यह अधिकार किसने दिया है. अभिव्यक्ति की स्वतत्रता यही सिखाती है . तुम अपने को देखो . यूं जी सी की बात करते हो तो यह भी पढू की कैम्पस में धूम्रपान मना है जिसके तुम शिकार हो . हास्टल में हीटर तुम जलाते हो. नियम विरुद्ध . दूसरो को सीख देने से पहले खुद में सुधार करो . कहना आसान होता है प्यारे पर चलना कठिन . भूल गए वो दिन जब तुम भी हिन्दी समय के लिए वि वि के टेलीफोन पर तमाम विद्वानों को बुला रहे थे . तब तो यही विभूति जी लोकतंत्र के नायक बन कर आये थे . इतना ही नहीं हर जायज नाजायज मांग पर मुहर भी तुम लोगो ने लगवाए थे.चमडिया भी तुम्ही लोगो के पसंद थे . उसने तुम लोगो के लिए अको में हेरफेर भी की और दुबारा हुए इक्जाम में तुम पास हुए . तब तुम्हारा प्राकृतिक न्याय कहा गया था . उसी इलिना सेन जिनके यहाँ तुब सब दिन रात उठा बैठा करते थे जब गलत तरीके से अनुपस्थित छात्र को भी अंक दिया था तब कहा थे . क्यों नहीं उस पर ब्लॉग लिखा. ता इसी विभूति ने उनको अभय दिया . कहा गया था तब सब का लोकतंत्र .
विभूति जातिवादी नहीं है. यह कोई नई बात नहीं कह रहे हो . वह तो सेकुलर है जिसका प्रमाण वि वि में है भी .दरअसल विभूति को होना चाहिए था गुण का पारखी, जो वह नहीं हो पाए . हो भी नहीं पायेंगे क्योकि वैसी स्कूलिंग नहीं है. वैसे भी बड़े पद के आसपास चापलूस अपना डेरा डंडा लेकर हाजिर हो जाते है और इसका प्रमाण है लाइब्रेरी के पीछे तुम्हारा तम्बू.
व्यक्ति किसी भी अनुशासन का अच्छा हो सकता है. बस उसमे अच्छा बनाने का हौसला हो. और सच कहने सुनाने कि ताकत तो ही उस पर चलने का भी माद्दा हो.
अकेले कपिल सिब्बल क्या कर लेंगे . जब हम और तुम सुधारने के लिए तैयार नहीं है तो कोई क्या कर लेगा. सोचू कि तुम और तम्हारा ब्लॉग चमडिया के लिए इस प्रचार तंत्र का कितना दुरुपयोग किया . तुम इस बात को मानोगे भी नहीं क्योकि विभूति कि तरह तुम्हारा भी अपना लोक तंत्र है और उन्ही कि तरह में रे मात्र लिखने से तुम्हारा स्वभाव बदल जाएगा ऐसा मै सोचता भी नहीं हु. पर यह जरूर चाहूँगा अगर है इमानदारी कि बात करते हो तो अपने शे शुरुआत करो. अभी तो तुन बेकार के शब्दू के साथ लफ्फाजी कर रहे हो . तुम्हारा आलेख लिखने का उद्देश्य क्या है क्यों है इसका लोगो को पता भी नहीं लगेगा . कुछ स्पस्ट हे नहीं है . tumhaaraa राजीव रंजन
दोस्तों, उपरोक्त टिप्पणी जिन भाई द्वारा लिखा गया है इनका इस बार पी.एच.डी. में नहीं हो पाया कारण कि ये हनुमान प्रसाद की चेलाई करते थे और ऐन मौके पर हनुमान जी यहाँ से उड़ चले. तो उम्मीद है इस बार यह ठीक स्टैंड पर हैं और इनका हो जायेगा पालीवाल ऐसे लोगों को ढूंढ़्ते हैं. यह टिप्पणी विभूति और पालीवाल को सेंड कर देना.
संरचना, संस्कृति, उसकी जीवन शैली व कार्य प्रणाली पर कोई फर्क नहीं पड़ता? मसलन संस्कृति और संरचना में जीने वाले व्यक्ति का वहां के तौर तरीकों का उस व्यक्ति पर प्रभाव पड़ना लाजमी है…….
Chand ladke apne ko university ka baap sabit karne mein lage hain, Chamadiya k chele iske siva kar bhi sakte hain……Ek ladki ne sahi kaha tha manch pe..”Yahe ke student Adhikar chahte hain, Duty nahi”.
Ma-Bap apni duty karte hue padhate hain, Aur ladke padhai ke siya kuch bhi karne ko taiyar hain…..teacher k sath daru,murga…aur n jane kya-kya?
chandrika tumhe kabhi swasth bahas karte nahi dekha. Lalach mein chinghadte aksar dekha…Delhi,Raipur se wardha tak.
Hairan na ho main ab apni family ke sare kharch uthane bhar ka kma kar Duty kar raha hun, Kabhi tumhare dohre charitra k sath main use hua karta tha!
bahut kARAB HUA, per jaisa karoge waisa hi bharoge
bahut khub ab to comment jane lage hai, socha kuch likh du, waise blog mahoday aap to bin paidi ke lote hai, jo ludak rahe hai, kita likhoge, kuch nahi bigad sakte, main bhi likh ker bheja tha , per nahi publish kiya, mujhe pata hai kyu nahi publish kiya, kyu ki anil tumahe jija hai, or jija ka to khayal rakha jata hai, yaha jija kehna jija sabd ka apmaan hoga, kutta kaha ja sakta hai, jab kutta raat ko bhokta hai to ushke sathi kutte bhi bhokne lagte hai
मि रामलाल फर्जी मै हनुमान का भक्त तो जरूर हूँ पर शुक्ल का नहीं . कृपया तथ्य को जाने तब कोई बात करें . गलत सलत बात न लिखें . .. मुझे शोध से क्या मतलब . तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं की जो मै चाहता हूँ वह करता हूँ. स्टैंड वगरह देखने का कार्य तुम्हारा है मेरा नहीं .
हिन्दी के कुछ लोग बाल की खाल निकालते हैं और ऐसा करते समय यह भी देखते चलते हैं कि अपनी गोटी लाल हो रही है कि नहीं. अनिल चमडिया का निकाला जाना एक ऐसा मुद्दा है जिसपर बहस हो सकती है लेकिन इस तरह! हर कोई तो फतवाबाजी पर उतरा हुआ है. तू तडाक करते हुए हम अपने गँवाड होने का ही प्रमाण देते हैं.
lage raho india.
telbajee se nahin to laththbaji se sahi.
भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवियों के 2010 में तीन नए कार्यभार-
1. अनिल चमडि़या की नौकरी बचाना
2. वी एन राय की नौकरी खाना
3. वास्तविक मुद्दों से मुंह चुराना
ek chautha bhi hai jab tak ho tel lagana aur kam na bane to ankh dikhana.
b.n. bhai khud bhi kaum-red hai.
sawal to kahi hai hi nahin. yahan to jabab hi jabab hai.
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